जीवन में परमेश्वर के अधिकार और प्रभुता को जानना

29 अगस्त, 2020

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान, परमेश्वर की सामर्थ्‍य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार को अपनी कल्पनाओं पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता है। जबकि तुम परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए कल्पनाओं पर भरोसा नहीं कर सकते हो, तो तुम किस रीति से परमेश्वर के अधिकार के सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, संगति से और परमेश्वर के वचनों के अनुभवों से यह किया जा सकता है। इस प्रकार, तुम्हारे पास परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और प्रमाणीकरण होगा और इस प्रकार तुम उसकी एक क्रमानुसार समझ और निरन्तर बढ़ने वाले ज्ञान को प्राप्त करोगे। यह परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान को प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है; और कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोग कल्पना न करो कहने का अर्थ यह नहीं है कि तुम सबको शिथिलता से विनाश के इन्तज़ार में बैठा दिया गया है या तुम सबको कुछ करने से रोका गया है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का इस्तेमाल न करने का मतलब अनुमान लगाने के लिए अपने तर्क का इस्तेमाल न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल न करना, विज्ञान को आधार के रूप में इस्तेमाल न करना, बल्कि समझना, जाँच करना और प्रमाणित करना है कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो उसके पास अधिकार है और प्रमाणित करना है कि वह तुम्हारी नियति के ऊपर प्रभुता रखता है और उसकी सामर्थ्‍य हर समय यह साबित करती है कि परमेश्वर के वचनों के द्वारा, सत्‍य के द्वारा, उन सबके द्वारा जिसका तुम अपने जीवन में सामना करते हो, वह स्वयं सच्चा परमेश्वर है। यही एकमात्र तरीका है जिसके द्वारा कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की समझ को प्राप्त कर सकता है" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैं सोचता था कि किसी बड़ी घटना या चमत्कार को देखकर ही परमेश्वर के अधिकार को जाना जा सकता है। परमेश्वर के अधिकार के बारे में मेरी समझ सच में सीमित थी। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा है कि उसके अधिकार को जानने के लिए उसके वचनों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में अनुभव करना बहुत ज़रूरी है, उसके वचनों को अनुभव करके, हम हर चीज़ पर उसके अधिकार और प्रभुता को देख सकेंगे। इस तरह परमेश्वर में हमारी आस्था बढ़ती है।

पिछले साल मेरे परिवार ने करीब चौथाई एकड़ में टमाटर उगाए थे, अचानक फसल पर भयंकर कीट संक्रमण हो गया और कीट फल, फूल और पत्तियाँ—सबकुछ खा गए। मुझे बहुत फ़िक्र हुई, मैंने अपने परिवार से बात की कि कीड़ों से कैसे छुटकारा पाया जाए। कीटनाशक इस्तेमाल करने पर मिट्टी बरबाद हो जाएगी और विषैली भी, जिससे उसमें उगाई हर चीज़ विषैली हो जाएगी। हमने उन्हें हाथ से पकड़ने की कोशिश की मगर उनकी आबादी तेज़ी से बढ़ती गई। हमने तीन-चार दिन काम किया मगर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। उनकी संख्या बेतहाशा बढ़ गई। उनसे छुटकारा पाने के लिए मैंने ताबड़तोड़ और भी उपाय किए। जब यह हुआ तब मैंने परमेश्वर से प्रार्थना तो की थी, मगर मैंने परमेश्वर के अधिकार और शासन को नहीं समझा था, इसलिए उसने मेरे हृदय में जगह नहीं बनाई थी। मुझे नहीं पता था कि कैसे सच में परमेश्वर पर आश्रित हुआ जाए और कैसे उसकी इच्छा की खोज की जाए। ऐसे कीड़े से पहली बार मेरा सामना हुआ था, बरसों से खेती करता आ रहा हूँ और मेरे पास कीट नियंत्रण का भी काफ़ी तजुर्बा था। मैंने सोचा हाथ-पैर मारता रहूँगा तो हल मिल ही जाएगा। जितने भी उपाय मुझे पता थे, एक-एक करके सारे आज़मा लिए, छह या सात उपाय आज़माए होंगे मगर कोई नतीजा नहीं निकला। मैंने अपने जीवन में ऐसा ढीठ कीड़ा नहीं देखा था। इससे पहले, मैंने हर कीट संक्रमण पर काबू पाया था, मगर इस बार मेरा सारे उपाय बेकार हो रहे थे। फिर मेरे एक दोस्त ने कहा, कृषि विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर ने बताया है कि नीम का तेल बढ़िया कीट निवारक है, मैं फ़ौरन खरीद लाया, मगर उससे भी बात नहीं बनी। मैं सब करके हार गया था, मगर कोई हल नज़र नहीं आ रहा था। अगले कुछ दिन मैं रोज़ सुबह अपनी फसल देखने जाता रहा, मैंने देखा कि कीट के कारण टमाटर के सभी पौधे खराब हो गए थे। कुछ पौधों के फूल गिर गये थे, कुछ की पत्तियाँ मुरझा गईं थी और कुछ में फल सड़ने लगे थे। मैं बहुत दुखी हुआ। टमाटर उगाने में भाई-बहनों ने हर रोज़ मेरी मदद की थी। उन्होंने बहुत काम किया था, जाली बनाई, पौधों की काट-छाँट की, उन्हें खूंटों से बांधा, और जब टमाटर फलने-फूलने लगे और लग रहा था कि बढ़िया फसल होगी, तो अचानक इन कीड़ों ने हमला कर दिया। मैं समझ गया कि इस साल की फसल बेकार जाएगी। पौधों को कीटों से लदा देखकर, मैं घबरा गया। मेरे पड़ोसी वॉन्ग का खेती में काफ़ी तजुर्बा था और उसे कीटों की अच्छी जानकारी थी, तो मैंने सोचा शायद उसके पास कोई हल होगा। मैं उसके पास गया, मगर वह बोला, "खेती करते 30 साल हो गए, मगर ऐसा कभी कुछ नहीं देखा। दिन में तीन बार कीटनाशक का छिड़काव कर रहा हूँ, उससे टमाटर खत्म हो गए मगर कीड़े नहीं मरे।" एक दूसरा पड़ोसी, ज़ैंग, मायूसी से बोला, "मैंने तो तीन-चार कीटनाशक मिलाकर इस्तेमाल किए, मगर कीड़े नहीं मरे!" यह सब सुनकर मैं बहुत निराश हुआ। यह कीटों का प्लेग था, और उनसे छुटकारा पाने का कोई तरीका नहीं था। लग रहा था कि मेरे सारे टमाटर बरबाद हो जाएँगे। लाचार होकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की : "ओ परमेश्वर! मुझे नहीं पता कि मैं इस प्रकोप से कैसे निजात पाऊँ। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। कृपया मुझे प्रबुद्ध करें और राह दिखाएँ, ताकि मैं जान सकूँ कि इसे कैसे अनुभव करना है और मुझे इससे क्या सबक सीखना चाहिए।"

किसी सभा में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े थे। "परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं, उन सब के जीवन कुछ नियमों द्वारा शासित होते हैं, और वे उनके साथ बने रहते हुए बढ़ते हैं और बहुगुणित होते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज़ इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है, परमेश्वर के अधिकार के कारण। या, दूसरे शब्दों में, तो परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों के कारण; क्योंकि स्वयं परमेश्वर यह सब करता है। अर्थात्, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मन है जो इन नियमों को उत्पन्न करता है; ये उसके विचार के अनुसार स्थानांतरित होंगे एवं बदलेंगे, और ये सभी स्थानांतरण और बदलाव उसकी योजना के वास्ते घटित होंगे और गायब होंगे। उदाहरण के लिए, महामारियों को ही लें। वे बिना चेतावनी दिए अचानक शुरू हो जाती हैं, कोई भी उनके उद्भव को या सही कारणों को नहीं जानता है कि वे क्यों होती हैं, और जब कभी भी कोई महामारी किसी निश्चित स्थान पर आती है, तो ऐसे लोग जो अभागे होते हैं वे विपत्ति से बच नहीं सकते हैं। मानव विज्ञान समझता है कि महामारियाँ ख़तरनाक या हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं के फैलने के द्वारा उत्पन्न होती हैं, और उनकी गति, दायरे, और प्रसारण के तरीके का पूर्वानुमान या नियन्त्रण मानव विज्ञान के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यद्यपि मानवजाति हर सम्भव तरीके से उनका प्रतिरोध करती है, फिर भी वे इस बात को नियंत्रित नहीं कर सकती है कि महामारियाँ अचानक आने पर कौन से लोग और पशु अपरिहार्य रूप से प्रभावित होते हैं। एकमात्र चीज़ जिसे मानवजाति कर सकती है वह है उनकी रोकथाम करने का प्रयास करना, उनका सामना करना, और उन पर शोध करना। परन्तु कोई भी उस मूल कारण को नहीं जानता है जो किसी विशिष्ट महामारी के आरम्भ और अंत का वर्णन करता है, और कोई उन्हें नियन्त्रित नहीं कर सकता है। किसी महामारी के उदय और फैलाव का सामना करते समय, पहला उपाय जो मनुष्य करते हैं वह है कोई टीका विकसित करना, परन्तु कई बार टीके के तैयार होने से पहले ही वह महामारी अपने आप ही ख़त्म हो जाती है। क्यों महामारियाँ समाप्त हो जाती हैं? कुछ लोग कहते हैं कि रोगाणुओं को नियन्त्रण में लाया जा चुका है, अन्य लोग कहते हैं कि ऋतुओं में बदलावों के कारण वे समाप्त हो जाती हैं...। जहाँ तक यह बात है कि ये बेबुनियाद अटकलबाज़ियाँ विश्वास-योग्य हैं या नहीं, विज्ञान कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं कर सकता है, और कोई सटीक उत्तर नहीं दे सकता है। जिसका मानवजाति सामना करती है वह न केवल ये अटकलबाज़ियाँ हैं बल्कि महामारियों के बारे में मानवजाति की समझ की कमी और उसका भय है। अंतिम विश्लेषणों में कोई नहीं जानता है, कि क्यों ये महामारियाँ शुरू होती हैं या क्यों वे समाप्त हो जाती हैं। क्योंकि मानवजाति का विश्वास केवल विज्ञान में है, वह पूरी तरह से इस पर ही आश्रित है, किन्तु वह सृजनकर्ता के अधिकार को नहीं पहचानती है या उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करती है, इसलिए उसके पास कभी कोई उत्तर नहीं होगा" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है। सब कुछ उसके हाथ में है। छोटा हो या बड़ा, आँखों के सामने हो या ओझल, ज़िन्दा हो या मुर्दा, सब कुछ परमेश्वर की मर्ज़ी के मुताबिक आता या जाता है। हर आपदा परमेश्वर के शासन के अधीन होती है। लोग नहीं जानते कि प्लेग या कीट-प्लेग कहाँ से आती हैं या उन्हें कैसे रोका जाए। हमें नहीं पता वे कब गायब होंगी। इन सब पर परमेश्वर का शासन है। मगर मैंने वास्तव में परमेश्वर के अधिकार और प्रभुता को नहीं समझा था, इसलिए जब कीड़ों ने मेरे टमाटरों को संक्रमित किया, तो मैं फ़ौरन परमेश्वर को ढूँढ़ने और उस पर भरोसा करने के लिए उसके समक्ष नहीं आया, बल्कि अपने तरीकों से हल ढूँढ़ने की कोशिश करता रहा। वह सब बेकार रहा, फिर भी मैं परमेश्वर की शरण में नहीं गया या उसका सहारा नहीं लिया। जब कीटनाशकों ने काम नहीं किया तो मुझे मायूसी और लाचारी महसूस हुई। मुझे परमेश्वर पर विश्वास था और उससे प्रार्थना की थी, मगर उसने मेरे हृदय में जगह नहीं बनाई थी। मुझे लगा मैं खुद ही कीड़ों से छुटकारा पा सकता हूँ। मैं कितना अभिमानी और अज्ञानी था! फिर मुझे एहसास हुआ कि उनका आना और जाना तो परमेश्वर तय करता है। यह हमारे बस से बाहर है। मुझे तब भी समझ नहीं आया कि उस कीट संक्रमण में परमेश्वर की क्या इच्छा थी. मगर यह जानता था कि मुझे अपना काम करना है और कीटों को परमेश्वर पर छोड़ देना है। मुझे परमेश्वर की व्यवस्था के आगे सिर झुकाना था। इस एहसास से मुझे शांति मिली। उसकी व्यवस्था के आगे सिर झुकाने और उसे अनुभव करने के लिए तैयार होकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की।

कुछ दिनों बाद मैं खेत पर गया और देखा कि टमाटर के पौधों पर मकड़ियों के जाले लगे हुए हैं। सोचने लगा कि ये कहाँ से आ गईं। और करीब से देखा तो जालों में कई छोटे-छोटे पतंगे फँसे हुए थे, फिर मुझे याद आया कि मकड़ियाँ इन्हें खाती हैं। पतंगे नहीं तो अंडे नहीं और अंडे नहीं तो कीड़े नहीं। मैंने ग़ौर किया कि दो दिन पहले की तुलना में कीट बहुत कम हो गए थे। मुझे पता था यह परमेश्वर का कार्य है, वही कीटों को खाने के लिए मकड़ियों को लेकर आया। मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया! सात या आठ दिन बाद मैंने देखा टमाटर के पौधों के फलों, टहनियों, फूलों और पत्तियों से कीड़े गायब थे। मैं बहुत खुश हुआ। सोचा भी न था कि कुछ ही दिनों में मकड़ियाँ उन सब कीटों को खा लेंगी। परमेश्वर वाकई सर्वशक्तिमान है! अपनी आँखों से न देखा होता तो यकीन ही न होता कि यह सच है। मैं परमेश्वर के प्रति आभार और प्रशंसा से भर उठा। नास्तिकों को परमेश्वर का शासन और अधिकार समझ नहीं आता। वे आपदाओं की जानकारी पाने और उनसे बचने के लिए विज्ञान पर ही विश्वास और भरोसा करते हैं मगर उन्हें पूरी तरह से समझ नहीं पाते। उनके पास आश्रय लेने को कुछ नहीं होता, आपदा आने पर वे असहाय होते हैं, इसलिए उनकी फसल को भारी नुकसान होता है। मगर जब मैं परमेश्वर की शरण में गया, उसके आगे सिर झुकाने और उसका सहारा लेने को तैयार हुआ, तो उसने कीड़ों को खाने के लिए उन छोटी मकड़ियों का इस्तेमाल किया, और बड़ी आसानी से कीट संक्रमण को निपटा दिया। इसने मुझे दिखा दिया कि हर चीज़ पर परमेश्वर का शासन है और वही सभी चीज़ों को चलाता है। वह बहुत बुद्धिमान और सर्वशक्तिमान है! जब टमाटरों के पकने का समय था, मुझे लगा कि कीट संक्रमण के कारण बहुत खराब फसल होगी, मगर मेरी हैरानी का ठिकाना न रहा, भरपूर फसल हुई। परमेश्वर चमत्कारिक तरीके से काम करता है! जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में कहा गया है : "उसके कार्य सभी जगह हैं, उसका सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। प्रत्येक नियम और व्यवस्था उसी के कार्य का मूर्त रूप है, और उनमें से प्रत्येक उसकी बुद्धि और अधिकार प्रगट करता है। कौन है जो उसके प्रभुत्व से बच सकता है? कौन है जो उसकी रूपरेखा से मुक्त रह सकता है? प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है" (वचन देह में प्रकट होता है)। परमेश्वर का धन्यवाद! इससे मैंने अनुभव किया कि परमेश्वर का अधिकार और बुद्धि सर्वत्र है। मौसम, सूरज और बारिश पर परमेश्वर का शासन है और हर तरह के कीट पर भी। कोई भी सृजित प्राणी इनमें से किसी भी चीज़ को नियंत्रित नहीं कर सकता। परमेश्वर की रचना के कण-कण में और सभी चीज़ों के प्रबंधन में, हम परमेश्वर के असाधारण अधिकार को देख सकते हैं। वह बहुत बुद्धिमान और सर्वशक्तिमान है! मैंने खुद से कहा कि भविष्य में चाहे जो भी हो, मुझे परमेश्वर पर भरोसा करना है और उसके कर्मों को बेहतर तरीके से समझना है।

दो महीने बाद, हमने चौलाई बोयी और कुछ हफ़्तों बाद बढ़िया हरे पौधे निकल आए। मैंने सोचा बढ़िया फसल होगी। मगर एक सुबह, मेरी बीवी ने बताया कि पौधों पर डायमंडबैक पतंगे का लार्वा लगा हुआ है और मुझे उससे निपटने को कहा। यह सुनकर मैं डर गया। यह लार्वा बहुत फुर्तीला होता है और उसे हाथ से पकड़ना मुश्किल होता है, वे बहुत तेज़ी से प्रजनन करते हैं। एक या दो दिन में ही विकसित हो जाते हैं। एक बार वे हमारे तरबूज़ों की फसल पर आ गए थे, मैंने दर्जनों चीज़ें आज़मा ली थी, मगर कोई भी कारगर साबित नहीं हुई। दो-एक दिनों में ही वे हमारी सब्जियों को चट कर गए और हमारा लहलहाता बगीचा चौपट हो गया था। मुझे फ़िक्र होने लगी, कि कहीं दो दिनों में ही वे हमारी सारी चौलाई चट न कर जाएँ। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ। मैंने फ़ौरन परमेश्वर से प्रार्थना की कि मेरा मार्गदर्शन करे ताकि मैं उसकी इच्छा को समझ सकूँ।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "अय्यूब ने परमेश्वर को देखने या परमेश्वर के वचनों को सुनने में असमर्थ होने पर इन चीज़ों को धारण किया और इनकी खोज की; यद्यपि उसने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, फिर भी वह उन उपायों को जान गया था जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है; और उस बुद्धि को समझ गया था जिससे परमेश्वर ऐसा करता है। यद्यपि उसने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को कभी नहीं सुना था, फिर भी अय्यूब जानता था कि मनुष्य को प्रतिफल देने और मनुष्य से ले लेने के सभी कर्म परमेश्वर की ओर से आते हैं। हालाँकि उसके जीवन के वर्ष किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न नहीं थे, फिर भी उसने अपने जीवन की असाधारणता को सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के अपने ज्ञान को प्रभावित करने, या परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग के अपने अनुसरण को प्रभावित करने नहीं दिया। उसकी नज़रों में, सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर के कार्यों से भरे हुए थे, और परमेश्वर की संप्रभुता को व्यक्ति के जीवन के किसी भी भाग में देखा जा सकता था। उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, परन्तु वह यह एहसास कर पाता था कि परमेश्वर के कर्म हर जगह हैं, और पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान, अपने जीवन के हर कोने में वह परमेश्वर के असाधारण और चमत्कारिक कर्मों को देख पाता था, और परमेश्वर की चमत्कारिक व्यवस्थाओं को देख सकता था। परमेश्वर की गोपनीयता और खामोशी ने अय्यूब के द्वारा परमेश्वर के कर्मों के एहसास को बाधित नहीं किया, न ही इसने सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के उसके ज्ञान को प्रभावित किया। उसका जीवन, हर चीज़ मैं छुपे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं जो उसके दैनिक जीवन के दौरान, सभी चीज़ों के बीच छिपा हुआ था। अपने दैनिक जीवन में उसने उस परमेश्वर के हृदय की आवाज़ को और परमेश्वर के वचनों को सुना और समझा था, जो सभी चीज़ों के बीच खामोश है, फिर भी अपने हृदय की आवाज़ और अपने वचनों को सभी चीज़ों के नियमों के शासन के द्वारा अभिव्यक्त करता है। तो तुम देखो, कि यदि लोगों के पास अय्यूब के समान ही मानवता और खोज हो, तो वे अय्यूब के समान एहसास और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, और अय्यूब के समान ही सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की समझ और ज्ञान को अर्जित कर सकते हैं" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैने परमेश्वर के वचनों में देखा कि अय्यूब ने अपने दैनिक जीवन में परमेश्वर के अधिकार, उसके शासन और सर्वशक्तिमत्ता को समझने पर ज़्यादा ध्यान दिया। इसके ज़रिए, उसने देखा कि सब कुछ परमेश्वर से आता है, सभी चीज़ों और मानवजाति के भाग्य पर परमेश्वर का शासन और नियंत्रण है। अय्यूब को इस बात पर कोई संदेह नहीं था कि उसका धन परमेश्वर के आशीष और शासन के कारण है और वह उसकी मेहनत से उसके पास नहीं आया। जब उसका धन छिन गया, तब उसे विश्वास था कि परमेश्वर की अनुमति से ही वैसा हुआ है। जो दिया और लिया जाता है, वह परमेश्वर द्वारा शासित और निर्धारित होता है। इसलिए उसने शिकायत नहीं की, बल्कि परमेश्वर की प्रशंसा की। मगर जब ऐसा कुछ हुआ जो मुश्किल था या मुझे नापसंद था, मैं उसे स्वीकार न कर सका और परमेश्वर के आगे सिर न झुका सका। मैंने देखा कि परमेश्वर ने मेरे हृदय में जगह नहीं बनाई थी और मुझ में आस्था की कमी थी। इस खयाल से मैं बहुत शर्मिंदा हुआ और मैं समझ गया कि यह परमेश्वर की इजाज़त से हो रहा था। परमेश्वर चाहता था कि मैं उसकी सर्वशक्तिमत्ता और शासन को जानूँ और अपने दैनिक जीवन में वास्तव में उसके आगे सिर झुकाऊँ। कीटों से छुटकारा पाना और चौलाई की अच्छी फसल होना, सब परमेश्वर के हाथ में था। एक पुरानी कहावत है, "जुताई इंसान के हाथ में है, फसल परमेश्वर के हाथ में है।" जानता था कि मुझे अनुभव को स्वीकार करना चाहिए, परमेश्वर की इच्छा को खोजना और उसकी व्यवस्था के आगे सिर झुकाना सीखना चाहिए। इस खयाल से मुझे काफ़ी राहत मिली और मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की, "ओ परमेश्वर, मुझे विश्वास है कि यह तुम्हारे हाथ में है कि चौलाई की फसल कितनी अच्छी हो। मैं अपनी योजनाओं और चिंताओं को छोड़ दूँगा, इस माहौल में तुम्हारे वचनों को अनुभव करूँगा और तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा।" उसके बाद हमने लार्वा से निजात पाने के लिए कुछ चीज़ों को आज़माया, मगर किसी से बात नहीं बनी। मैंने धैर्य नहीं खोया। जानता था कि फसल अच्छी न भी हुई, तो वह परमेश्वर की इच्छा होगी। मैंने उसकी व्यवस्था के आगे सिर झुका दिया। दो-एक दिन के बाद मैं खेत में गया तो मैंने देखा कि गोरैयों के झुंड चौलाई पर लगे कीड़े खा रहे थे। मैं देखकर हैरान रह गया कि एक बार फिर परमेश्वर ने मुझे राह दिखाई और उस समस्या का हल निकाला जिसे मैं सुलझा नहीं सका था। मैंने परमेश्वर का आभार मनाया! और दो दिनों में गोरैयों ने सारा लार्वा खा लिया। हम बहुत खुश हुए, बार-बार परमेश्वर का धन्यवाद किया और उसकी स्तुति की। परमेश्वर वाकई सर्वशक्तिमान है!

फिर, मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की, तब उसने उन्हें सन्तुलित करने के लिए, पहाड़ों और झीलों के वास की स्थितियों को सन्तुलित करने के लिए, पौधों और सभी प्रकार के पशुओं, पक्षियों, कीड़ों-मकोड़ों के वास की स्थितियों को सन्तुलित करने के लिए सभी प्रकार की पद्धतियों और तरीकों का उपयोग किया— उसका लक्ष्य था कि सभी प्रकार के प्राणियों को उन नियमों के अंतर्गत जीने और बहुगुणित होने की अनुमति दे जिन्हें उसने स्थापित किया था। सृष्टि की कोई भी चीज़ इन नियमों के बाहर नहीं जा सकती है, और उन्हें तोड़ा नहीं जा सकता है। केवल इस प्रकार के मूल वातावरण के अंतर्गत ही मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी सकुशल जीवित रह सकते हैं और बहुगुणित हो सकते हैं" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैंने परमेश्वर के वचनों से देखा कि जब उसने सब चीज़ों की रचना की थी, उसने हर तरह से उनकी आजीविका की स्थितियों को संतुलित किया था ताकि उसके शासन के अधीन हर सजीव वस्तु बेहद व्यवस्थित तरीके से रहे और अपनी संतति बढाये, एक दूसरे को सहारा देते हुए और नियंत्रण में रखते हुए, जैसा परमेश्वर ने तय किया है। परमेश्वर के बनाए इन नियमों का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता। परमेश्वर ने पारिस्थितिक संतुलन के लिए सभी जानवरों, पौधों और कीटों को बनाया, हमारे सजीव पर्यावरण की रक्षा करने और उसे स्थिरता प्रदान करने के लिए। परमेश्वर की ऐसी व्यवस्थाओं, उसके बनाए नियमों के बिना, जानवरों और कीटों में अराजकता होती और उससे हमारे जीवन में भी अराजकता फैल जाती। हम बच न पाते। परमेश्वर के विवेचन में कोई मीन मेख नहीं है। सभी चीज़ें उसके महान सामर्थ्य, बुद्धि, दृढ़ता और इन सबसे बढ़कर, मानवजाति के लिए उसके प्रेम को प्रकट करती हैं। जैसे हमने देखा कि हमारी सब्जियों पर लगे कीटों का कोई हल नहीं था, मगर परमेश्वर ने उन्हें खाने के लिए गोरैयों और मकड़ियों का इस्तेमाल किया, ताकि हम परमेश्वर के दिए भोजन का लुत्फ़ उठा सकें। परमेश्वर की बनायी हर चीज़ का अपना उद्देश्य होता है, छोटी मकड़ियों और गोरैयों तक का भी अपना उद्देश्य है। परमेश्वर पर्यावरण के संतुलन में उनका इस्तेमाल करता है। परमेश्वर सभी चीजों का आपसी संबंध बनाता है, ताकि हम बेहतर तरीके से जी सकें। फिर एक बार हमारी सब्जियों में काले कीट और बदबूदार कीड़े आ गए, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, फिर खयाल आया कि इन कीड़ों का प्राकृतिक दुश्मन है, मेंढक। हमने खेत में पाँच मेंढक छोड़ दिए और दो महीनों में ही वे 30 हो गए। कीड़े कम होते गए और हमारी फसल शानदार हुई। मैंने इसके लिए परमेश्वर का बेहद आभार मनाया! मुझे परमेश्वर के वचन याद आए, "यद्यपि यह वाक्यांश 'परमेश्वर का अधिकार' अथाह प्रतीत हो सकता है, फिर भी परमेश्वर का अधिकार बिल्कुल भी काल्पनिक नहीं है। वह मनुष्य के जीवन के प्रत्येक क्षण में उसके साथ है, और प्रतिदिन उसकी अगुआई करता है। इसलिए, हर मनुष्य दिन-प्रति-दिन के अपने जीवन में आवश्यक रूप से परमेश्वर के अधिकार के अत्यंत साकार पहलू को देखेगा और अनुभव करेगा। यह साकारता इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर का अधिकार असलियत में मौज़ूद है, और यह किसी भी व्यक्ति को इस तथ्य को पहचानने और समझने की अनुमति देता है कि परमेश्वर इस अधिकार को धारण करता है" (वचन देह में प्रकट होता है)। मैं सोचा करता था कि परमेश्वर के अधिकार को समझने के लिए मेरे साथ कोई बड़ी घटना होनी चाहिए, इसलिए मैंने अपने दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों में इसे अनुभव करने की ओर ध्यान नहीं दिया। उसके बाद, मैने देखा कि परमेश्वर के अधिकार को समझना उतना मुश्किल नहीं है जितना मैंने सोचा था। उसका अधिकार और सामर्थ्य हमेशा प्रत्यक्ष हैं और हमारे दैनिक जीवन में हमारे साथ होते हैं। चाहे कोई बात बड़ी हो या छोटी, जब तक हम परमेश्वर के वचनों को अनुभव करने की ओर ध्यान देते हैं, हम उसके अधिकार को देख सकते हैं।

उन महीनों की ओर मुड़कर देखें, जब कीट संक्रमण से मेरा सामना हुआ, पहले-पहल मैं अपने तजुर्बे और वैज्ञानिक ज्ञान पर भरोसा करना ही जानता था, मगर उससे मुझे कोई लाभ नहीं हुआ। जब मैंने सिर नवाया और परमेश्वर के वचनों को अनुभव किया, मैंने उसके कर्मों को देखा, परमेश्वर के अधिकार और प्रभुता की व्यावहारिक समझ हासिल की। परमेश्वर में मेरी आस्था भी बढ़ी। परमेश्वर का धन्यवाद!

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