मैं लगभग एक मसीह-विरोधी के साथ खड़ी हो गई थी

05 फ़रवरी, 2023

अगस्त 2021 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। तीन महीने बाद, मारजोरी और मुझे, दोनों को कलीसिया अगुआ चुना गया। मारजोरी ने मुझसे तीन महीने पहले परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा था, और एक ही कलीसिया में न होने के बावजूद, हम सहकर्मियों की सभाओं में एक साथ जाते और कलीसिया कार्य पर चर्चा करते थे। एक बार, एक सभा में, मारजोरी ने अपने एक मौजूदा अनुभव के बारे में बताया। उसने कहा कि वह बीमार पड़ जाने पर भी अपना कर्तव्य निभा रही थी। हालाँकि उसके पति उसका दमन करते थे, फिर भी वह निराश होकर पीछे नहीं हटी थी। मैं सच में उसकी प्रशंसक थी, सोचती थी कि उसका आध्यात्मिक कद अच्छा है। अगर मैं उस हालत में रही होती, तो इससे कर्तव्य निभाने की मेरी सामर्थ्य पर असर पड़ा होता। मेरे मन में उसकी अच्छी छवि थी। वह कर्तव्य का बोझ उठाती थी, और पति के दमन के बावजूद उसने इसे नहीं छोड़ा था। मुझे लगा कि यह उसे उस किस्म की इंसान के रूप में दिखाता था जो सत्य पर अमल करती थी, और परमेश्वर जिसकी सराहना करता था। बाद में, एक नई कलीसिया बनी तो मारजोरी और मैं अलग हो गए।

पाँच महीने बाद, एक दिन हमारी सुपरवाइजर मारिया ने हमारे ग्रुप चैट में यह संदेश डाला कि उस रात हमारी सभा में हम सब मसीह-विरोधियों को जानने-समझने के बारे में चर्चा करेंगे, और फिर उसने मारजोरी के फेसबुक पेज का एक लिंक भेजकर हमसे कहा कि हम उससे संपर्क न रखें क्योंकि वह एक मसीह-विरोधी थी। मुझे झटका लगा। मैं बिल्कुल यकीन नहीं कर पाई कि मारजोरी एक मसीह-विरोधी थी। मैं सोचती थी कि अपने कर्तव्य का उसे बड़ा जूनून था, वह त्याग करने, खुद को खपाने और कष्ट सहने में समर्थ थी। बीमारी और परिवार के दमन का सामना करके भी वह अपना कर्तव्य निभा पा रही थी—सत्य को इस तरह खोजने वाला कोई इंसान क्या सच में मसीह-विरोधी हो सकता है? मारिया से जरूर कोई गलती हुई होगी! मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह सच था। सुपरवाइजर ने एक और संदेश भेजकर कहा कि उसे आशा थी कि मैं फेसबुक पर मारजोरी को ब्लॉक कर दूँगी, ताकि वह मुझे बाधित कर मुझसे छल न कर सके। इसे मानने में मुझे थोड़ा कष्ट हुआ। मारजोरी से इस तरह पेश आना मुझे अनुचित लगा। वह कर्तव्य में जुनूनी और उत्साही थी, पहले उसने मुझे बढ़ावा दिया था, मेरी मदद की थी। मैं नहीं जानती कि उसके साथ क्या हुआ था या उसे मसीह-विरोधी क्यों माना गया था। मैं सचमुच असमंजस में थी, दुखी थी और उसे ब्लॉक नहीं करना चाहती थी। इसलिए मैंने कहा : "मारजोरी मसीह-विरोधी नहीं है, बस उसकी अपनी कुछ धारणाएँ हैं। उसे ब्लॉक करना जरूरी नहीं है। चीजों को उसके नजरिए से देखने की कोशिश करें और सोचें कि उसे कैसा लगता है।" तब सुपरवाइजर ने मुझसे संगति की, लेकिन मैंने नहीं सुनी। उसने मसीह-विरोधियों को जानने-समझने के बारे में अनुभव वाला गवाही वीडियो भी भेजा, और उसे यह कहकर देखने को कहा कि वीडियो मेरे लिए उपयोगी होगा। लेकिन मैंने बस उसे नजरअंदाज कर दिया। इसके बाद, मैंने मारजोरी को एक संदेश भेजकर पूछा कि क्या हुआ था। मारजोरी ने कहा : "मैं कुछ धारणाएँ फैला रही थी, इसलिए मुझे ग्रुप चैट से निकाल दिया गया और सबने मुझे ब्लॉक कर दिया। यह सच में मेरा दिल दुखाने वाला था। मुझे सफाई देने की जरूरत नहीं है, परमेश्वर मेरे कर्मों की जाँच करेगा। क्या तुम सब भी मुझे परख रही हो? मैं उदास महसूस कर रही हूँ। सभी लोग मुझे परखकर छोड़ रहे हैं।" उसने सुपरवाइजर के साथ अपने असंतोष के बारे में भी बहुत-कुछ बताया। उसकी बातें सुनकर मैं भी सुपरवाइजर के खिलाफ हो गई। मुझे लगा कि वह चीजों को निष्पक्ष रूप से नहीं सँभाल रही थी। अगर मारजोरी की कुछ धारणाएँ या समस्याएँ थीं, तो उसे उसकी सहायता कर संगति करनी चाहिए, न कि तुरंत फैसला कर लेना चाहिए कि वह मसीह-विरोधी थी। मसीह-विरोधियों को जानने-समझने के बारे में उस रात की सभा की बात करें, तो मैंने उसमें भाग नहीं लिया, इसके बजाय सोने चली गई। मैं बहुत उदास थी, समझ नहीं आया कि हालात से कैसे निपटूं। परमेश्वर से दूर न जाने और उस हालत में जीते न रहने की इच्छा से मैंने सोने से पहले प्रार्थना की। मैंने परमेश्वर से मुझे प्रबुद्ध करने की विनती की ताकि इन सबमें उसकी इच्छा को समझ सकूँ।

अगली सुबह, मैंने बड़ा सुकून महसूस किया। मैंने पिछली रात की संगति की सामग्री पर नजर दौड़ाई, तो मेरा ध्यान सुपरवाइजर और मारजोरी की बातचीत के एक क्लिप पर गया। मारजोरी ने कहा : "ऐसा हो ही नहीं सकता कि परमेश्वर देहधारी हुआ है। हम भाई-बहनों में से किसने देखा है परमेश्वर को? सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुरूप नहीं हैं, वे उससे परे हैं।" मैं देखकर चौंक गई कि मारजोरी ने ये बातें कही थीं। वह अंधाधुंध तरीके से धारणाएँ फैला रही थी, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य में विश्वास भी नहीं रखती थी। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मैं सच में नहीं समझ पाई थी कि मारजोरी के मसीह-विरोधी माने जाने का कारण क्या था और मैंने उसके व्यवहार पर भी सचमुच गौर नहीं किया था। मैं बस अपनी सोच के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँच गई थी कि वह मसीह-विरोधी नहीं हो सकती। मैं बहुत अंधी और अहंकारी थी! मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश देखा जिसमें कहा गया था : "कुछ लोग कठिनायाँ सह सकते हैं; वे कीमत चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा होता है, वे बहुत आदरणीय होते हैं; और लोग उनकी सराहना करते हैं। क्या तुम लोग इस प्रकार के बाहरी आचरण को, सत्य को अभ्यास में लाना कह सकते हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि ऐसे लोग परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहे हैं? लोग बार-बार ऐसे व्यक्तियों को देखकर ऐसा क्यों समझ लेते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्यों कुछ लोग इस प्रकार सोचते हैं? इसका केवल एक ही स्पष्टीकरण है। और वह स्पष्टीकरण क्या है? स्पष्टीकरण यह है कि बहुत से लोगों को, ऐसे प्रश्न—जैसे कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और यथार्थ में सत्य की वास्तविकता से युक्त होना क्या है—ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग अक्सर ऐसे लोगों के हाथों धोखा खा जाते हैं जो बाहर से आध्यात्मिक, कुलीन, ऊँचे और महान प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो वाक्पटुता से शाब्दिक और सैद्धांतिक बातें कर सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके हाथों धोखा खा चुके हैं उन्होंने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धांतों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं, इसे कभी नहीं देखा है। उन्होंने यह कभी नहीं देखा कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, वे लोग सचमुच परमेश्वर का भय मानकर बुराई से दूर रहते हैं या नहीं हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना। बल्कि, उनसे परिचित होने के साथ ही, थोड़ा-थोड़ा करके वे उन लोगों की तारीफ करने, और आदर करने लगते हैं, और अंत में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, मानते हैं कि वे अपने परिवार एवं नौकरियाँ छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें मन में लगता है कि परमेश्वर इन आदर्श लोगों की प्रशंसा करता है। उनके ऐसे विश्वास की वजह क्या है? इस मुद्दे का सार क्या है? इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? ... इसका प्रत्यक्ष परिणाम ये होता है कि लोग अच्छे मानवीय व्यवहार को, सत्य को अभ्यास में लाने के विकल्प के तौर पर उपयोग करते हैं, इससे परमेश्वर की कृपा पाने की उनकी अभिलाषा भी पूरी हो जाती है। इससे लोगों को सत्य के साथ संघर्ष करने का बल मिलता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा स्पर्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और जिन आदर्शों को वे सराहते हैं उन्हें परमेश्वर के स्थान पर रख देते हैं" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैंने आत्म-चिंतन शुरू किया। मैं हमेशा लोगों को उनके बाहरी व्यवहार से परखती थी, सोचती थी कि त्याग करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने वाले लोग सत्य के खोजी और परमेश्वर के प्रेमी थे। लेकिन परख का यह मानक सत्य के अनुरूप नहीं था, इसने मुझे लोगों के बाहरी व्यवहार से धोखा खाने की ओर धकेल दिया। मैंने सोचा कि किस तरह फरीसी उपासनागृहों में लोगों के सामने अक्सर धर्मग्रंथों की व्याख्या करते थे। बाहर से वे धर्मनिष्ठ दिखते थे, कष्ट सहने वाले, त्यागी और नेक कर्म करने वाले लगते थे, लेकिन जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने आया, तो उन्होंने खोज और जाँच-पड़ताल नहीं की, बल्कि अंधाधुंध तरीके से उसका प्रतिरोध और निंदा की, और आखिरकार उसे सूली पर चढ़ा दिया। इससे मुझे एहसास हुआ कि जरूरी नहीं कि बाहर से अच्छा व्यवहार दिखाने वाले लोग नेक हों। सिर्फ परमेश्वर को समर्पित होकर, सत्य से प्रेम करने और उसे स्वीकारने वाले लोग ही, सही मायनों में नेक होते हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य को बिल्कुल स्वीकार नहीं करते, भले ही वे ऊपर से नेक काम करते हों, वे बस झूठी धर्मनिष्ठा दिखाते हैं। बाहर से मारजोरी कुछ कष्ट सहती-सी और कीमत चुकाती-सी दिखती थी, लेकिन भीतर गहराई से वह सत्य को पसंद नहीं करती थी, परमेश्वर से घृणा करती थी। वह सार्वजनिक तौर पर परमेश्वर की आलोचना कर उसे नकारती भी थी। वह शैतान की किस्म की ही थी। लेकिन मैंने सिर्फ उसे बाहर से कष्ट सहते, त्याग करते देखा, और अपनी धारणाओं के आधार पर यकीन कर लिया कि वह सत्य खोजती थी, जिम्मेदार और कर्तव्यनिष्ठ थी, वह मसीह-विरोधी नहीं हो सकती थी। जब सुपरवाइजर ने हमें समझ-बूझ का अभ्यास कर मारजोरी को ब्लॉक करने को कहा, तो मैं उसके खिलाफ भी हो गई और अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहती थी। मैं मारजोरी को जरा भी जानती-समझती नहीं थी, नतीजतन मेरे साथ छल हुआ। मैं सच में बेवकूफ थी।

अगले दिन, मैंने देखा कि मारजोरी फेसबुक पर अफवाहें और भ्रांतियाँ फैला रही थी, कह रही थी कि हमारी कलीसिया एक इंसान का अनुसरण करती है, परमेश्वर का नहीं। उसे कलीसिया को इस तरह बदनाम करते देख, मुझे सचमुच पछतावा हुआ कि मैंने उसे ब्लॉक कर फटकारा नहीं था, बल्कि उसका बचाव करने की भी कोशिश की थी। इसलिए मैंने उसे संदेश भेजकर पूछा कि वह ऐसे काम क्यों कर रही थी। मारजोरी ने जवाब देकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम किया, उसने मुझसे भी कलीसिया छोड़ देने का आग्रह किया। मैंने बस उसे अनदेखा कर दिया। दो महीने बाद, मुझे सुपरवाइजर से पता चला कि मारजोरी ने उसे संदेश भेजे थे जिनमें उसने कलीसिया की बदनामी और निंदा की थी, और यह भी कहा था कि वह नए सदस्यों को बदनामी वाले वीडियो भेजने वाली है। उसने परमेश्वर के कार्य के बारे में अपने अनेक विचार एक ग्रुप चैट में फैला दिए। मारजोरी की चाची ने भी धारणाएँ पालकर कलीसिया छोड़ दी। मारजोरी का लोगों को धोखा देने के लिए धारणाएँ फैलाना, सच्चे मार्ग को जानकर भी उसका स्पष्ट रूप से प्रतिरोध करना था। यह एक गंभीर अपराध है—वह मसीह-विरोधी थी। मारजोरी के बर्ताव से मैं समझ सकी कि परमेश्वर के कार्य को लेकर उसकी धारणाएँ थीं, लेकिन उसने सत्य खोजकर उन्हें सुलझाने की कोशिश नहीं की। उसने अफवाहें और भ्रांतियाँ भी फैलाईं, परमेश्वर का तिरस्कार किया, कलीसिया को बदनाम किया, और परमेश्वर को नकार कर उससे दूर जाने के लिए भाई-बहनों के साथ छल किया। मुझे लगा कि मारजोरी सही मायनों में कपटी और विश्वासघाती थी, एक चालाक भेड़िये की तरह जो लोगों को धोखा देकर, उन्हें परमेश्वर को नकार कर उससे दूर जाने देता है। वह दूसरे भाई-बहनों के लिए सचमुच खतरनाक थी। बाद में, मेरी नजर परमेश्वर के वचनों के इस अंश पर पड़ी। "भाइयों और बहनों के बीच जो लोग हमेशा अपनी नकारात्मकता का गुबार निकालते रहते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और वे कलीसिया को परेशान करते हैं। ऐसे लोगों को अवश्य ही एक दिन निकाल और हटा दिया जाना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, अगर लोगों के अंदर परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भाव से भरा दिल नहीं है, अगर ऐसा दिल नहीं है जो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी हो, तो ऐसे लोग न सिर्फ परमेश्वर के लिये कोई कार्य कर पाने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उपस्थित करने वाले और उसकी उपेक्षा करने वाले लोग बन जाएंगे। परमेश्वर में विश्वास करना किन्तु उसकी आज्ञा का पालन नहीं करना या उसका आदर नहीं करना और उसका प्रतिरोध करना, किसी भी विश्वासी के लिए सबसे बड़ा कलंक है। यदि विश्वासी वाणी और आचरण में हमेशा ठीक उसी तरह लापरवाह और असंयमित हों जैसे अविश्वासी होते हैं, तो ऐसे लोग अविश्वासी से भी अधिक दुष्ट होते हैं; ये मूल रूप से राक्षस हैं। जो लोग कलीसिया के भीतर विषैली, दुर्भावनापूर्ण बातों का गुबार निकालते हैं, भाइयों और बहनों के बीच अफवाहें व अशांति फैलाते हैं और गुटबाजी करते हैं, तो ऐसे सभी लोगों को कलीसिया से निकाल दिया जाना चाहिए था। अब चूँकि यह परमेश्वर के कार्य का एक भिन्न युग है, इसलिए ऐसे लोग नियंत्रित हैं, क्योंकि उन्हें निश्चित रूप से बाहर निकाला जाना है। शैतान द्वारा भ्रष्ट ऐसे सभी लोगों के स्वभाव भ्रष्ट हैं। कुछ के स्वभाव पूरी तरह से भ्रष्ट हैं, जबकि अन्य लोग इनसे भिन्न हैं : न केवल उनके स्वभाव शैतानी हैं, बल्कि उनकी प्रकृति भी बेहद विद्वेषपूर्ण है। उनके शब्द और कृत्य न केवल उनके भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव को प्रकट करते हैं, बल्कि ये लोग असली पैशाचिक शैतान हैं। उनके आचरण से परमेश्वर के कार्य में बाधा पहुंचती है; उनके सभी कृत्य भाई-बहनों को अपने जीवन में प्रवेश करने में व्यवधान उपस्थित करते हैं और कलीसिया के सामान्य कार्यकलापों को क्षति पहुंचाते हैं। आज नहीं तो कल, भेड़ की खाल में छिपे इन भेड़ियों का सफाया किया जाना चाहिए, और शैतान के इन अनुचरों के प्रति एक सख्त और अस्वीकृति का रवैया अपनाया जाना चाहिए। केवल ऐसा करना ही परमेश्वर के पक्ष में खड़ा होना है; और जो ऐसा करने में विफल हैं वे शैतान के साथ कीचड़ में लोट रहे हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला और उसे प्रेम करने वाला हृदय होता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्य करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुरूप होना चाहिये, उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; ऐसा करना संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं होता। छल-प्रपंच में लिप्त चारों तरफ अपनी अकड़ में चलते हुए, सभी जगह परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए लोग उन्मत्त होकर हिंसा पर उतारू न हों; यह बहुत ही विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून; क्या परमेश्वर के घर में यह बात और भी अधिक लागू नहीं होती? क्या इसके मानक और भी अधिक सख़्त नहीं हैं? क्या इसके पास प्रशासनिक आदेश और भी ज्यादा नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानव के अपराध को सहन नहीं करता; वह परमेश्वर है जो लोगों को मौत की सजा देता है। क्या लोग यह सब पहले से ही नहीं जानते?" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि जो लोग हमेशा धारणाएँ फैलाते हैं, निराशा के बीज बोते और कलीसिया को बाधित करते हैं, वे शैतान के प्यादे हैं। वे सत्य से प्रेम नहीं करते, उनके दिलों में परमेश्वर का लेशमात्र भी भय नहीं होता। जो लोग गुट बनाकर दरारें पैदा करते हैं, जो परमेश्वर को नकारते हैं, उसका तिरस्कार करते हुए धारणाएँ और अफवाहें फैलाते हैं, वे सब दानव हैं, उन्हें परमेश्वर निश्चित ही त्याग देगा और दंडित करेगा। जो अफवाहों से भटक कर कुकर्मियों और मसीह-विरोधियों के साथ खड़े होते हैं, उन्हें भी उन लोगों को न ठुकराने पर निकाल बाहर किया जाएगा। मारजोरी परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ती थी, न अपनी धारणाओं को ठीक करने के लिए सत्य खोजती थी, और न ही दूसरे भाई-बहनों के साथ खोज करती थी। इसके बजाय, वह परमेश्वर पर सवाल उठाकर उसे नकारती थी, धारणाएँ भी फैलाती थी, परमेश्वर की खुलकर आलोचना और तिरस्कार करती थी। वह भाई-बहनों में मनमुटाव के बीज बोती थी और उन्हें अपनी तरफ खींचकर अपना साथ देने के लिए धोखा देती थी, वह सुपरवाइजर के खिलाफ पक्षपात करवाती थी, जिससे कलीसिया का कार्य बाधित होता था। मारजोरी सच में दुष्ट थी। उसका सार सत्य और परमेश्वर से घृणा करने वाले मसीह-विरोधी का था। अगर परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन न मिले होते, तो मैं भी उसके साथ खड़े होकर परमेश्वर को अपना दुश्मन मानने की चाल में फंस जाती। मुझे यह भी एहसास हुआ कि परमेश्वर के वचन पढ़ने और मसीह-विरोधियों को जानने-समझने के लिए संगति करने का प्रयोजन सत्य समझने और विवेक हासिल करने में भाई-बहनों की मदद करना था, ताकि वे मसीह-विरोधियों से परेशान होकर धोखा न खाएँ। मसीह-विरोधियों का कलीसिया से निष्कासन परमेश्वर के चुने हुए लोगों को बचाने के लिए होता है। अगुआ होने के बावजूद, मैं इस मसीह-विरोधी को जानती-समझती नहीं थी, उसकी झूठी बातों पर यकीन करती थी। मैंने उसके साथ खड़े होकर उसका बचाव भी किया। मैंने देखा कि मैं शैतान की साथी बन गई थी। मैंने मसीह-विरोधी के साथ सहानुभूति रखकर उसे बचाया और उसके प्रति प्रेम दिखाया। यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों के प्रति क्रूरता थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं कितनी मूर्ख थी, मैंने खुद से घृणा की, परमेश्वर से प्रार्थना करके प्रायश्चित्त किया और उससे क्षमा माँगी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के ये अंश पढ़े : "मनुष्य जिस मानक से दूसरे मनुष्य को आंकता है, वह व्यवहार पर आधारित है; वे जिनका आचरण अच्छा है, धार्मिक हैं और जिनका आचरण घृणित है, दुष्ट हैं। परमेश्वर जिस मानक से मनुष्यों का न्याय करता है, उसका आधार है कि क्या व्यक्ति का सार परमेश्वर को समर्पित है या नहीं; वह जो परमेश्वर को समर्पित है, धार्मिक है और जो नहीं है वह शत्रु और दुष्ट व्यक्ति है, भले ही उस व्यक्ति का आचरण अच्छा हो या बुरा, भले ही इस व्यक्ति की बातें सही हों या गलत हों" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। "परमेश्वर जब देहधारण कर इंसानों के बीच काम करने आता है, तो सभी उसे देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, और सभी लोग उन कर्मों को देखते हैं जो परमेश्वर देह रूप में करता है। उस क्षण, इंसान की तमाम धारणाएँ साबुन के झाग बन जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखा है, यदि वे अपनी इच्छा से उसका आज्ञापालन करेंगे, तो उनका तिरस्कार नहीं किया जाएगा, जबकि जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से उसकी आज्ञा मानते हैं, वे निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की नीयत और क्रियाकलापों के आधार पर उसे दंडित करता है, उसके विचारों और मत के आधार पर कभी नहीं। यदि वह विचारों और मत के आधार पर इंसान को दंडित करता, तो कोई भी परमेश्वर के रोषपूर्ण हाथों से बच कर भाग नहीं पाता। जो लोग जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसकी अवज्ञा करने के कारण दण्ड पाएँगे। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, उनका विरोध परमेश्वर के प्रति उनकी धारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं। ये लोग जानते-बूझते परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। परमेश्वर के बारे में न केवल उनकी धारणाएँ होती हैं, बल्कि वे उन कामों में भी लिप्त रहते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि इस तरह के लोगों की निंदा की जाएगी" (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं)। परमेश्वर के वचन स्पष्ट हैं : परमेश्वर लोगों का उनके सार और सत्य के प्रति उनके रवैए के आधार पर न्याय करता है। कुछ लोगों के मन में परमेश्वर के कार्य को लेकर धारणाएँ हो सकती हैं, लेकिन अगर वे सत्य खोजकर अपनी धारणाओं को दूर रखने में समर्थ हों, तो परमेश्वर उनकी निंदा नहीं करेगा। जिनके मन में परमेश्वर के देहधारण को लेकर कोई राय होती है, जो सत्य को स्वीकार नहीं करते, और परमेश्वर पर सवाल उठाकर उसे नकार देते हैं, उनका बाहरी व्यवहार जितना भी बढ़िया क्यों न हो, वे सब परमेश्वर के दुश्मन और मसीह-विरोधी हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों की निंदा कर उन्हें निकाल देता है। मैं सिर्फ लोगों के बाहरी व्यवहार पर ही विचार करती थी। मैंने सोचा कि जुनूनी और त्यागी, खुद को खपानेवाली और एक कलीसिया अगुआ होने के नाते मारजोरी जरूर परमेश्वर की भक्त और सत्य की खोजी होगी, लेकिन मैंने उसके सार या परमेश्वर और सत्य के प्रति उसके रवैए पर विचार नहीं किया। मारजोरी की परमेश्वर के कार्य को लेकर कुछ खास धारणाएँ थीं, वह दूसरे भाई-बहनों की संगति स्वीकार नहीं करती थी। वह अपनी धारणाएँ भी फैलाती थी और सार्वजनिक रूप से देहधारी परमेश्वर को नकारती थी। उसका सार परमेश्वर और सत्य से घृणा करने का था—वह मसीह-विरोधी थी। मैं मारजोरी के बाहरी भ्रमजाल से गुमराह होकर उसकी चाल में फँस गई थी और एक मसीह-विरोधी का साथ दे रही थी। मुझमें सच में समझ-बूझ नहीं थी। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि हमें लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों और सत्य के सिद्धांतों के अनुसार परखना चाहिए, सिर्फ लोगों के बाहरी व्यवहार से नहीं।

इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा, जिसमें कहा गया था : "परमेश्वर कलीसिया को शुद्ध कर रहा है, उसमें से विघ्नकर्ताओं और उपद्रवियों, मसीह-विरोधियों, दुष्ट आत्माओं, दुष्ट लोगों, गैर-विश्वासियों और उन लोगों को निकाल रहा है, जो वास्तव में उस पर विश्वास नहीं करते, और जो सेवा तक नहीं कर सकते। इसे खेत की सफाई करना कहा जाता है; इसे ओसाई कहा जाता है। ... तुम देख सकते हो कि परमेश्वर सब-कुछ समय पर करता है। वह बेतरतीब ढंग से काम नहीं करता। उसका प्रबंधन-कार्य उसके द्वारा बनाई गई योजना का अनुसरण करता है, और वह सब-कुछ कदम-दर-कदम शैली में करता है, बेतरतीब ढंग से नहीं। और वे कदम कैसे होते हैं? परमेश्वर द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य का प्रत्येक कदम प्रभावी होना चाहिए, और जब वह उसे प्रभावी होता देख लेता है, तो कार्य का अगला कदम पूरा करता है। परमेश्वर ने स्वयं समझ लिया है कि उसके कार्य को कैसे प्रभावी होना है, उसे क्या कहना और करना है। वह लोगों की जरूरत के अनुसार अपना कार्य करता है, बेतरतीब ढंग से नहीं। लोगों पर जो भी कार्य प्रभावकारी होगा, उसे ही परमेश्वर करता है, और प्रभावशीलता की दृष्टि से जो कुछ भी सारहीन है, परमेश्वर उसे निश्चित रूप से नहीं करता। उदाहरण के लिए, जब नकारात्मक वस्तुनिष्ठ पाठों की आवश्यकता होती है, जिनके आधार पर परमेश्वर के चुने हुए लोग अपनी समझ विकसित कर सकते हैं, तो नकली मसीह, विरोधी-मसीह, दुष्ट आत्माएँ, दुष्ट लोग, और विघ्नकर्ता और उपद्रवी कलीसिया में दिखाई देंगे, जिन पर अन्य लोग अपनी समझ विकसित कर सकते हैं। अगर परमेश्वर के चुने हुए लोग सत्य समझकर ऐसे लोगों की पहचान कर लेते हैं, तो उन लोगों ने अपनी सेवा प्रदान कर दी होती है, और फिर उनके अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं रह जाता। उस समय, परमेश्वर के चुने हुए लोग उन्हें उजागर कर उनकी रिपोर्ट करने के लिए उठेंगे, और कलीसिया उन्हें तुरंत निकाल देगी। परमेश्वर के समस्त कार्य के अपने कदम होते हैं, और उन सभी कदमों की परमेश्वर द्वारा इस आधार पर व्यस्था की जाती है कि मनुष्य को अपने जीवन में और अपने आध्यात्मिक कद के लिए क्या चाहिए" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (3))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि भले ही बहुत-से लोग कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाते हैं, पर सभी परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं होते और सभी उसकी भेड़ें नहीं होतीं। उस झुंड में भेड़िए भी छुपे हुए होते हैं। परमेश्वर मसीह-विरोधियों, कुकर्मियों और गैर-विश्वासियों को कलीसिया में आने देता है, ताकि हम विवेक हासिल करें, सबक सीखें, और अच्छाई-बुराई में फर्क कर सकें। कलीसिया में कर्तव्य निभाने के बावजूद, मारजोरी सच्चे दिल से परमेश्वर में विश्वास नहीं रखती थी। वह सिर्फ परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण करने के लिए कलीसिया में आई थी, न कि सत्य को खोजने और समझने के लिए। वह भेड़ की पोशाक में भेड़िया थी, और परमेश्वर द्वारा दूर की गई दुष्ट इंसान थी। परमेश्वर अब कलीसिया को शुद्ध कर रहा है और हर किस्म के इंसान को उजागर कर रहा है। एक भी मसीह-विरोधी, कुकर्मी और गैर-विश्वासी कलीसिया में छिपा नहीं रह सकता, बल्कि परमेश्वर के कार्य द्वारा उजागर होकर दूर कर दिया जाएगा। सिर्फ परमेश्वर में दिल से विश्वास रखने वाले, सत्य से प्रेम कर उसे खोजने वाले ही वहाँ रहेंगे, और परमेश्वर सिर्फ उन्हें ही शुद्ध कर बचाएगा।

इस अनुभव से मुझे थोड़ा विवेक हासिल हुआ और मैंने कुछ बातें सीखीं। पहली यह कि मुझे सिर्फ लोगों के बाहरी व्यवहार, उनके कष्ट सहने और खपने पर ही विचार नहीं करना चाहिए, क्योंकि बहुत-से लोग, खास तौर से धार्मिक जगत के धोखेबाज, ये काम कर सकते हैं। दूसरी यह कि मुझे लोगों को पूजना नहीं चाहिए, क्योंकि परमेश्वर को लोगों की आराधना से घृणा है। इंसान को सिर्फ परमेश्वर का आदर कर उसकी आराधना करनी चाहिए। तीसरी यह कि एक कलीसिया अगुआ के तौर पर, मुझे भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश पर विचार करना चाहिए, उनके लाभ की चीजों को तरजीह देनी चाहिए। चौथी यह कि समस्याओं का सामना होने पर, मुझे दिल से परमेश्वर का भय मानना चाहिए, और सत्य की खोज और प्रतीक्षा करना सीखना चाहिए। लापरवाही से अपनी धारणाओं के आधार पर परखकर निंदा नहीं करनी चाहिए। इससे परमेश्वर के स्वभाव का अपमान हो सकता है। पाँचवीं यह कि सत्य समझने के लिए मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ज्यादा वचन पढ़ने चाहिए। परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन से ही हम शैतान की दुष्ट साजिशों को समझकर सत्य के साथ खड़े हो सकते हैं। मुझे यह भी एहसास हुआ कि सत्य कितना अनमोल है। सत्य को समझ कर ही हम चीजों को वास्तव में समझ सकते हैं, और हर किस्म के कुकर्मियों, मसीह-विरोधियों और गैर-विश्वासियों को जान-समझ सकते हैं। आगे से, मैं परमेश्वर के ज्यादा वचन पढ़ूँगी, अपने कर्मों के साथ-साथ लोगों और चीजों की अपनी परख के लिए सत्य को सिद्धांत मानकर परमेश्वर के वचनों को आधार बनाऊँगी। परमेश्वर का धन्यवाद!

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