अब मैं लोगों से सिद्धांतों के अनुसार पेश आ सकती हूँ

20 अप्रैल, 2026

लिन हुई, चीन

जून 2023 में, मुझे पाठ आधारित कार्य का पर्यवेक्षक चुना गया। भाई-बहनों के साथ बातचीत करने से मुझे पता चला कि उनके पेशेवर कौशल और कार्यक्षमता अपेक्षाकृत कमजोर थे, इसलिए मैं धैर्यपूर्वक उनका मार्गदर्शन और मदद करती थी और उनके सामने आने वाली किसी भी कठिनाई को सुलझाने के लिए मैं उनके साथ संगति करती थी। लेकिन जब काम बढ़ गया, तो मैंने अपना धैर्य खो दिया और मैं उन्हें नीची नजर से देखने लगी। जुलाई में, कलीसिया को सीसीपी की उन्मत्त गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा। मैं कई पाठ आधारित कार्यकर्ताओं से संपर्क नहीं कर सकी और हमारे काम के नतीजे गिरने लगे। एक टीम के भाई-बहन चाहते थे कि मैं चर्चा करूँ कि आगे का काम कैसे किया जाए। उस समय, मैं दूसरा काम संभाल रही थी, इसलिए मैंने उन्हें काम करने की सामान्य दिशा के बारे में संक्षेप में लिखकर बता दिया, यह सोचकर कि उन्हें इसे लागू करना आना चाहिए। हालाँकि, टीम अगुआ ने फिर भी लिखकर भेजा कि उन्हें कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। मैंने मन ही मन सोचा, “जब कलीसिया को पहली बार गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा था तो मुझे भी नहीं पता था कि क्या करना है, लेकिन प्रार्थना और खोज करने के जरिए मुझे कुछ राह मिल गई थी। तुम अपने लिए कोई राह क्यों नहीं खोज सकती? तुम्हें बस कठिनाइयों के बारे में शिकायत करना आता है। तुम अपने कर्तव्य को लगन से नहीं कर रही हो; तुम बस बने-बनाए समाधान का इंतजार कर रही हो। तुम टीम अगुआ हो; जब तुम कठिनाइयों के बारे में शिकायत करती हो, तो इसका दूसरों पर नकारात्मक असर पड़ेगा।” एक सभा के दौरान, मैंने दोष लगाने वाले लहजे में कहा, “क्या तुम लोगों ने इन कठिनाइयों के किसी समाधान पर चर्चा की है? तुम लोग हर दिन करते क्या हो? तुम अपने लिए कोई राह खोजने की कोशिश क्यों नहीं करते?” मैंने देखा कि वह बहन परेशान लग रही थी और मुझे एहसास हुआ कि मेरा लहजा ठीक नहीं था। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैंने जो कहा वह सच था, मैं तो कठिनाइयों का सामना करते समय सिर्फ शिकायत करने के बजाय परमेश्वर पर और अधिक निर्भर रहने में उसका मार्गदर्शन करने की कोशिश कर रही थी। मैंने खुद से कहा कि यह उसकी भलाई के लिए ही है। कभी-कभी, जब मैं बहन लियू से सवाल पूछती थी, तो मेरे जल्दी-जल्दी बोलने के कारण, वह तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे पाती थी और जवाब थोड़ा घुमाकर देती थी। मैं उसे नीची नजर से देखती और सोचती, “तुम मेरे सवाल का जवाब भी नहीं दे रही हो। क्या तुम सीधा और सटीक जवाब नहीं दे सकती? घुमा-फिराकर बात करने की क्या जरूरत है?” फिर मैं फटकारने वाले लहजे में कहती, “घुमा-फिराकर बात मत करो। बस उस सवाल का जवाब दो जो तुमसे पूछा गया है, वरना कोई तुम्हें समझ नहीं पाएगा!” मेरे ऐसा कहने के बाद, वह कुछ हद तक बाधित महसूस करती। एक बार, बहन झांग ने अपनी दशा साझा की, उसने कहा कि कभी-कभी जब मैं उससे कुछ पूछती हूँ, तो वह तुरंत नहीं समझ पाती कि मेरा मतलब क्या है। जब उसके जवाब सटीक नहीं होते, तो मैं उसे डाँट देती और फिर वह और कुछ कहने की हिम्मत नहीं करती, इस डर से कि मुद्दे पर जवाब न देने के लिए उसकी काट-छाँट की जाएगी। जब मैंने बहन झांग को यह कहते सुना, तब भी मैंने आत्मचिंतन नहीं किया। इसके बजाय, मैंने सोचा कि उसे अपनी प्रतिष्ठा बचाने की बहुत चिंता है। मैंने सोचा, “क्या यह तुम्हारी भलाई के लिए नहीं है कि मैं तुम्हारे मुद्दों की ओर इशारा कर रही हूँ? तुम बाधित महसूस ही क्यों करती हो? तुम कुछ ज्यादा ही नाजुक हो!” कुछ समय बाद, बहनें मुझसे थोड़ी दूर हो गईं। कभी-कभी, मैं उन्हें दफ्तर में बातें करते और हँसते हुए सुनती थी, लेकिन मेरे अंदर आते ही वे चुप हो जाती थीं। मुझे एहसास हुआ कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो वे सभी मुझसे बचेंगी—फिर हम अपने कर्तव्य निभाने में सहयोग कैसे कर पाएँगे? इसलिए, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन ढूँढे जो घमंडी स्वभाव का गहन-विश्लेषण करते थे और यह देखने की कोशिश की कि वे मुझ पर कैसे लागू होते हैं। मैंने बाहरी तौर पर भी खुद को संयमित किया और आम तौर पर उनसे नरम लहजे में बात करने की कोशिश की, या माहौल को हल्का करने के लिए चुटकुले सुनाए।

बाद में, एक सहकर्मी, भाई वांग को पता चला कि टीम के कई सदस्य मेरी वजह से बाधित महसूस करते हैं और उसने मेरी समस्या की ओर इशारा किया। उसने मुझे परमेश्वर के कई वचन पढ़कर सुनाए और विशेष रूप से एक अंश ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर तुम केवल शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलकर भाषण झाड़ते हो और उनकी काट-छाँट करते हो, तो क्या तुम सत्य समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने में उनकी मदद कर सकते हो? जिसके बारे में तुम संगति करते हो, अगर वह व्यावहारिक नहीं है, और अगर वह शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के अलावा कुछ नहीं है, तो तुम कितना भी उनकी काट-छाँट करो और उन्हें भाषण दो, उसका कोई लाभ नहीं होगा। क्या तुम्हें लगता है कि लोगों का तुमसे थोड़ा-बहुत डरना चाहिए, जो तुम उनसे कहते हो वह करना, और विरोध करने की हिम्मत न करना, उनके सत्य को समझने और समर्पण करने के समान है? यह पूरी तरह गलत है। जीवन प्रवेश इतना आसान नहीं है। कुछ लोग जो अगुआ बन जाते हैं, मजबूत छाप छोड़ने की कोशिश करने वाले नए प्रबंधकों की तरह होते हैं; वे शुरू में अपने नए प्राप्त अधिकार को परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर थोपने की कोशिश करते हैं और हर व्यक्ति से अपना आज्ञापालन करवाने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे उनका काम आसान हो जाएगा। अगर तुममें सत्य वास्तविकता नहीं है और तुम समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य पर संगति नहीं कर सकते, तो जल्दी ही तुम्हारे असली आध्यात्मिक कद का खुलासा हो जाएगा और तुम्हारे असली रंग उजागर हो जाएँगे, और तुम्हें हटाया भी जा सकता है। कुछ प्रशासनिक कार्यों में थोड़ी काट-छाँट और अनुशासन स्वीकार्य है। लेकिन अगर तुम सत्य पर संगति करने में अक्षम हो, तो अंत में तुम समस्याएँ हल करने में भी असमर्थ रहोगे और इससे कार्य के नतीजे प्रभावित होंगे। अगर, कलीसिया में चाहे जो भी समस्याएँ आएँ, तुम हमेशा लोगों को व्याख्यान देते हो, लगातार उन्हें दोष देते हो और अगर तुम हमेशा अहंकारी होकर पेश आते हो, तो यह तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव है जो प्रकट हो रहा है और तुमने अपनी भ्रष्टता का बदसूरत चेहरा दिखा दिया है। अगर तुम हमेशा खुद को किसी आसन पर खड़ा करके इसी तरह लोगों को भाषण देते रहे तो समय बीतने के साथ लोग तुमसे जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकेंगे, वे कुछ भी व्यावहारिक हासिल नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें तुमसे घृणा और मितली आएगी। इसके अलावा, कुछ लोग ऐसे होंगे जो भेद पहचानने की कमी के कारण तुमसे प्रभावित होंगे, दूसरों को भाषण देना और उनकी काट-छाँट करना सीखेंगे; वे भी क्रोधित हो जाया करेंगे और अपना आपा खो दिया करेंगे। न केवल तुम लोगों की समस्याएँ हल करने में अक्षम होगे—तुम उनके भ्रष्ट स्वभाव को बढ़ावा भी दोगे। और क्या यह लोगों को विनाश के मार्ग पर नहीं ले जा रहा? क्या यह कुकर्म नहीं है? अगुआ को प्राथमिकता से सत्य पर संगति करते हुए और जीवन की आपूर्ति करते हुए अगुआई करनी चाहिए। अगर तुम हमेशा खुद को आसन पर खड़ा करके दूसरों को व्याख्यान देते हो, तो क्या वे सत्य समझ पाएँगे? अगर तुम कुछ समय तक इसी तरह से काम करते रहे, और लोग तुम्हारी असलियत देख लेंगे, वे तुम्हें नकार देंगे। क्या तुम इस तरह से काम करके लोगों को परमेश्वर के सामने ला सकते हो? बिल्कुल नहीं। तुम सिर्फ कलीसिया का काम खराब कर दोगे और परमेश्वर के सभी चुने हुए लोगों को तुमसे घृणा करने और तुम्हें नकारने पर मजबूर कर दोगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया तो उन्होंने सचमुच मेरे दिल को भेद दिया। परमेश्वर ने जो उजागर किया, वह ठीक मेरी ही दशा थी। मैं एक पर्यवेक्षक थी, लेकिन जब मैंने भाई-बहनों को अपने कर्तव्यों में कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करते देखा तो न केवल मैं उनके साथ संगति करने और उनकी मदद करने में नाकाम रही, बल्कि इसके बजाय मैं ऊँचे आसन पर खड़े होकर उन्हें भाषण देती और उनकी आलोचना करती रही। इस वजह से हर कोई मुझसे बचने लगा और डरने लगा। उनकी दशा खराब हो गई और उनके कर्तव्य करने की क्षमता प्रभावित हुई। अपने भ्रष्ट स्वभाव के आधार पर लोगों के साथ पेश आना परमेश्वर के लिए वाकई घृणित और दूसरों के लिए घिनौना था। कुछ समय पहले, कलीसिया को बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ा था, कई पाठ आधारित कार्यकर्ताओं से संपर्क नहीं हो पा रहा था और पाठ आधारित कार्य की प्रगति धीमी हो गई थी। भाई-बहन मुश्किल में जी रहे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इसका अनुभव कैसे करें। यह वह समय था जब उन्हें मेरी संगति और मदद की जरूरत थी, ताकि मैं उनके साथ आगे बढ़ने की राह खोज सकूँ और उनके सामने आ रही विभिन्न कठिनाइयों और समस्याओं को सुलझा सकूँ। लेकिन व्यावहारिक संगति और मदद देने के बजाय, मैंने बहनों को नीची नजर से देखा और उन्हें भाषण दिया। नतीजतन, उन्हें कोई मदद तो मिली नहीं उल्टे वे हर मोड़ पर मेरी वजह से बाधित महसूस कर रही थीं। यह बिल्कुल भी अपना कर्तव्य निभाना नहीं था! क्या मैं बस बुरा काम नहीं कर रही थी? मुझे यह तब और ज्यादा महसूस हुआ जब मैंने परमेश्वर के ये वचन देखे : “अगर तुम हमेशा खुद को किसी आसन पर खड़ा करके इसी तरह लोगों को भाषण देते रहे तो समय बीतने के साथ लोग तुमसे जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकेंगे, वे कुछ भी व्यावहारिक हासिल नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें तुमसे घृणा और मितली आएगी।” एक पर्यवेक्षक के रूप में, ऊंचे स्थान पर खड़े होकर और दूसरों को भाषण देकर और बाधित करके, मैं न केवल काम अस्तव्यस्त करूँगी, बल्कि अगर भाई-बहनों को मुझसे कोई मदद नहीं मिल सकी तो वे मुझे नकार देंगे। अब हमारे काम के नतीजे गिर गए थे, भाई-बहनों की दशा खराब थी और इस तरह से मेरी काट-छाँट की जा रही थी और मुझे उजागर किया जा रहा था। क्या यह परमेश्वर का मुझे ताड़ना देना नहीं था? यह एहसास होने पर मैं बहुत दुखी और दोषी महसूस करने लगी। मैं बस अपने दिल को शांत करना चाहती थी और अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए सत्य खोजना चाहती थी।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा, जिसने मुझ पर बहुत गहरा असर डाला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मैंने पाया है कि कई अगुआ केवल लोगों को व्याख्यान देने और उच्च स्थान से दूसरों को उपदेश देने में सक्षम होते हैं, वे उनके साथ समान स्तर पर संवाद नहीं कर सकते। वे लोगों के साथ सामान्य रूप से बातचीत नहीं कर पाते। जब कुछ लोग बात करते हैं, तो हमेशा ऐसा लगता है मानो वे भाषण दे रहे हों या रिपोर्ट कर रहे हों। उनके शब्द हमेशा केवल अन्य लोगों की अवस्थाओं पर निर्देशित होते हैं, मगर वे अपने बारे में कभी खुलकर नहीं बताते। वे कभी अपने भ्रष्ट स्वभावों का विश्लेषण नहीं करते, केवल अन्य लोगों के मुद्दों का विश्लेषण करते हैं, उनका मिसाल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, ताकि सभी लोग जान सकें। वे ऐसा क्यों करते हैं? वे ऐसे उपदेश क्यों देते हैं और ऐसी बातें क्यों कहते हैं? यह इस बात का प्रमाण है कि उन्हें कोई आत्मज्ञान नहीं होता, उनमें विवेक की बहुत कमी होती है, वे बहुत अहंकारी और आत्मतुष्ट होते हैं। उन्हें लगता है कि अन्य लोगों के भ्रष्ट स्वभावों को पहचानने की उनकी क्षमता यह साबित करती है कि वे अन्य लोगों से ऊपर हैं, वे लोगों और चीजों का भेद दूसरों से बेहतर पहचानते हैं और वे अन्य लोगों की तुलना में कम भ्रष्ट हैं। वे दूसरों का विश्लेषण करने और व्याख्यान देने में सक्षम होते हैं, लेकिन खुद को सबके सामने खोल नहीं पाते या अपने भ्रष्ट स्वभाव को उजागर नहीं करते या उसका विश्लेषण नहीं करते, अपना असली चेहरा नहीं दिखाते या अपनी प्रेरणाओं के बारे में कुछ नहीं कहते। वे केवल दूसरों को अनुचित व्यवहार करने पर भाषण झाड़ते हैं। यह अपने आप को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना और खुद को ऊँचा उठाना है। तुम अगुआ होकर भी विवेकहीन रूप से कष्टदायी कैसे हो सकते हो? कलीसिया के अगुआ बनाए जाने के बाद, क्यों तुम यूँ ही लोगों को फटकारते हो, मनमाना व्यवहार करते हो और अपनी मरजी से काम करते हो? तुम कभी अपने शब्दों के परिणामों पर विचार क्यों नहीं करते, अपनी पहचान के बारे में क्यों नहीं सोचते? तुम ऐसा क्यों करते हो? ऐसा इसलिए, क्योंकि अगुआ होकर भी तुम अपने रुतबे या पहचान से वाकिफ नहीं हो। तुम्हें अगुआ बनाना सिर्फ तुम्हें ऊँचा उठाना और अभ्यास का एक अवसर देना है। ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास दूसरों के मुकाबले अधिक वास्तविकता है या तुम दूसरों से बेहतर हो। वास्तव में, तुम बाकी सबके समान ही हो। तुममें से किसी के पास वास्तविकता नहीं है, और कुछ मायनों में, तुम दूसरों से भी अधिक भ्रष्ट हो सकते हो। तो फिर क्यों तुम बेवजह परेशानी खड़ी करते हो, मनमाने ढंग से भाषण झाड़ते हो, दूसरों को फटकारते और बाधित करते हो? तुम गलत होकर भी दूसरों को अपनी बात सुनने को मजबूर क्यों करते हो? इससे क्या साबित होता है? इससे साबित होता है कि तुम गलत स्थिति में हो, तुम इंसान की स्थिति से नहीं, बल्कि परमेश्वर की स्थिति से काम कर रहे हो और खुद को दूसरों से ऊपर समझते हो(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, राज्य के युग में परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के बारे में)। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से मेरा दिल बींध गया। क्या मैं उसी तरह की इंसान नहीं थी जिसके बारे में परमेश्वर बात कर रहा था? बहनों के पेशेवर कौशल और कार्यक्षमता अपेक्षाकृत कमजोर थे और जब बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के माहौल की वजह से उनके काम में बाधा आई, तो उन्हें जरूरत थी कि मैं समाधान की राह खोजने में उनकी मदद करूँ। लेकिन न केवल मैंने उनकी मदद करने में दिल नहीं लगाया, बल्कि मैंने ऊँचे आसन से उन्हें भाषण भी दिया। क्योंकि मैं जल्दी-जल्दी बोलती हूँ, अगर किसी बहन को मेरा मतलब समझ नहीं आता तो उसे मेरी डाँट सुननी पड़ती। मैं दूसरों के लिए बस दर्द और नुकसान लेकर आई और मैंने काम को भी प्रभावित किया। उसमें मानवता का एक अंश भी कहाँ था? मैंने मसीह-विरोधी, ये (Ye) के बारे में सोचा, जिसे कुछ समय पहले निकाल दिया गया था। जब वह भाई-बहनों के कर्तव्यों में कुछ विचलन या समस्याएँ देखती थी, तो वह संदर्भ पर विचार किए बिना या उनकी वास्तविक कठिनाइयों को समझे बिना उन्हें भाषण देती, उनकी काट-छाँट करती और उन्हें सताती थी। इस कारण उसे देखने पर भाई-बहन डरे हुए होते थे और सावधानी की दशा में जीते थे, जिससे उनके कर्तव्यों पर असर पड़ता था। फिर मैंने खुद को देखा। यूँ तो मैं लोगों को ये (Ye) जितनी कठोरता से भाषण नहीं देती थी और सताती नहीं थी, फिर भी सारी बहनें सावधानी की दशा में जी रही थीं क्योंकि मैं टीम के सदस्यों को नीची नजर से देखती थी और भाषण देती थी। वे केवल यह सोच रही थीं कि मुझे कैसे संतुष्ट करें ताकि डाँट खाने से बच सकें, जिससे उनकी दशा और काम दोनों प्रभावित हुए। मुझे एहसास हुआ कि मेरे द्वारा दूसरों को बाधित करने की प्रकृति और नतीजे बहुत गंभीर थे, और अगर मैंने चीजों को नहीं बदला तो ठीक ये (Ye) की तरह, मैं मसीह-विरोधी की राह पर चली जाऊँगी और मुझे हटा दिया जाएगा। मैं डरी हुई और दोषी दोनों महसूस कर रही थी, इसलिए मैंने पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे विनती की कि वह आगे आत्मचिंतन करने और खुद को जानने में मेरा मार्गदर्शन करे।

उसके बाद, मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े और अपनी समस्या के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर अपने हृदय में तुम वास्तव में सत्य को समझते हो तो तुम जान लोगे कि सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है और तुम स्वाभाविक रूप से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू कर दोगे। अगर तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह उचित है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, तो पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा—ऐसी स्थिति में तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की संभावना घटती जाएगी। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम न चाहते हुए भी यह करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकारी और दंभी स्वभाव होगा तो तुम्हें परमेश्वर का विरोध न करने को कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि तुम खुद को नियंत्रित नहीं कर पाओगे—यह तुम्हारे लिए कोई अनैच्छिक चीज होगी। तुम ऐसा जानबूझकर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे अनदेखा कर दोगे; वे तुम्हें खुद की बड़ाई करने की ओर ले जाएँगे और उनके कारण तुम हर मोड़ पर खुद का दिखावा करोगे; वे तुम्हें दूसरों को नीची नजर से देखने के लिए मजबूर करेंगे और तुम्हारे दिल में तुम्हें छोड़कर और किसी को नहीं रहने देंगे; वे तुम्हारे दिल से परमेश्वर का स्थान छीन लेंगे, और अंततः तुम्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठने और यह माँग करने के लिए मजबूर करेंगे और चाहेंगे कि लोग तुम्हें समर्पित हों, तुमसे अपने ही विचारों, ख्यालों और धारणाओं को सत्य मानकर पूजा करवाएँगे। लोग अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन इतनी बुराई करते हैं!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है)। परमेश्वर के वचनों से, मैं समझ गई कि लोगों को नीची नजर से देखने और उन्हें बाधित करने की मुख्य वजह यह थी कि मेरी प्रकृति बहुत घमंडी थी। जब बहनों को कठिनाइयाँ होती थीं और उन्हें नहीं पता होता था कि उन्हें कैसे सुलझाया जाए, तो उन्हें मेरी व्यावहारिक मदद की जरूरत होती थी। लेकिन मैंने सोचा कि उन्हें अपने दम पर प्रार्थना और खोज करके आगे बढ़ने की कुछ राह मिल जानी चाहिए, अगर मैं चीजों को बस सरलता से समझा दूँ, तो उन्हें मेरा मतलब समझ आ जाना चाहिए। जब उन्हें फिर भी कठिनाइयाँ होतीं तो मैं उन्हें नीची नजर से देखने लगती और वास्तव में यह पूछे बिना कि वे आखिर कहाँ अटके हैं, बस उनकी काट-छाँट कर देती। दरअसल, जब मैंने अतीत में कठिनाइयों का सामना किया था तो मैं अक्सर भटक जाती थी और मुझे नहीं पता होता था कि उन्हें कैसे सुलझाया जाए और कभी-कभी मैं चुपके से रोती भी थी। फिर भी, मैंने खुद को टीम के सदस्यों से बेहतर माना, अपने दिल में खुद को ऊंचा उठाया और उन्हें तुच्छ समझा। मैं कितनी घमंडी थी और मुझमें बिल्कुल विवेक नहीं था! अपने घमंडी स्वभाव के अनुसार बहनों के साथ पेश आकर, मैंने उन्हें बाधित किया और हमारे कर्तव्य में गड़बड़ी की और बाधा डाली। क्या यह परमेश्वर का प्रतिरोध करना नहीं था? मैं इसके बारे में जितना ज्यादा सोचती, मुझे उतना ही लगता कि अगर मेरा घमंडी स्वभाव नहीं सुलझाया गया तो मैं न चाहते हुए भी बुरा कर सकती हूँ। मैं चीजों को बदलना और खुद में बदलाव लाना चाहती थी और परमेश्वर के वचनों के अनुसार बहनों के साथ पेश आना चाहती थी।

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े, जिन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया और मुझमें सत्य का अभ्यास करने का संकल्प जगाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “इसका कारण यह है कि मेरी नजर में अपनी खराब काबिलियत के साथ तुम लोग बहुत सुन्न हो, और सत्य के प्रति प्रेम नहीं रखते, और सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हो, जिसके बारे में मुझे विस्तार से बताना चाहिए। मुझे हर बात स्पष्ट करके बतानी चाहिए, और अपने भाषण में उन्हें टुकड़े-टुकड़े करके बताना चाहिए, और हर पहलू से और हर तरह से इन चीजों के बारे में बात करनी चाहिए। केवल तभी तुम लोगों को कुछ समझ आएगा। यदि मैं तुम लोगों के साथ बेपरवाह होता, और अपनी मर्जी के मुताबिक किसी भी विषय पर बात करता, न उस पर विचार करता और न कष्ट उठाता, दिल से बात न करता, जब मेरा मन न होता तो न बोलता, तो तुम लोग क्या हासिल कर सकते थे? तुम लोगों की जितनी काबिलियत है, तुम लोग कभी भी सत्य को नहीं समझ पाते या कुछ भी हासिल नहीं कर पाते, उद्धार पाना तो बहुत दूर की बात है। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता, बल्कि मुझे विस्तार से बात करनी होगी। मुझे विस्तार में बात करनी होगी और हर तरह के व्यक्ति की स्थिति, सत्य के प्रति लोगों के रवैये और हर प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव के बारे में उदाहरण देना होगा; तभी तुम लोग जान पाओगे कि मैं क्या कह रहा हूँ, और जो सुन रहे हो उसे समझ पाओगे। मैं चाहे सत्य के किसी भी पहलू पर संगति करूँ, मैं विभिन्न साधनों के माध्यम से बोलता हूँ, वयस्कों और बच्चों से उन्हीं की शैली में संगति करता हूँ, तर्क और कहानियों के रूप में बताता हूँ, सिद्धांत और अभ्यास का उपयोग करता हूँ और अनुभवों की बात करता हूँ, ताकि लोग सत्य समझकर वास्तविकता में प्रवेश करें। इस तरह, जिनमें काबिलियत है और जिनके पास दिल है, उनके पास सत्य समझने, उसे स्वीकारने और बचाए जाने का मौका होगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए व्यक्ति में कम से कम जमीर और विवेक तो होना ही चाहिए)। मैंने सोचा कि हमारी भ्रष्ट प्रकृति हम सब में कितनी गहराई तक समाई हुई है। चूँकि हम परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते, इसलिए हम अक्सर उसके बारे में धारणाएँ और गलतफहमियाँ पाल लेते हैं और तरह-तरह के भ्रष्ट स्वभाव एक के बाद एक सामने आते रहते हैं। ज्यादातर समय, भले ही हम थोड़ा सत्य समझ भी लें, फिर भी हम उसे अभ्यास में नहीं ला पाते। लेकिन परमेश्वर ने कभी हमसे उम्मीद नहीं खोई है। वह हमारी आपूर्ति और मदद करने के लिए लगातार वचन व्यक्त करता है। कुछ सांत्वना और प्रोत्साहन के वचन हैं, जबकि अन्य न्याय और प्रकाशन के। कभी-कभी, हमें बेहतर ढंग से समझने में मदद करने के लिए, वह उदाहरणों, दृष्टांतों और कहानियों का भी उपयोग करता है। परमेश्वर हमें सत्य समझाने के लिए वह सब करता है जो वह कर सकता है, ताकि हम अपनी समस्याओं पर चिंतन कर सकें और उन्हें पहचान सकें और अभ्यास का मार्ग पा सकें। मैंने देखा कि परमेश्वर का दिल कितना सुंदर और भला है और वह हमारे लिए जो कुछ भी लाता है, वह सब फायदेमंद होता है। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं भाई-बहनों के साथ कैसे पेश आती थी—मुझमें बिल्कुल भी धैर्य या प्रेम नहीं था। जब बहनों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता तो मैं एक या दो बार उनकी मदद करती और फिर उन्हें नीची नजर से देखने लगती। मैं उन्हें कोई लाभ तो नहीं पहुँचा पाई, बल्कि इसके बजाय मैं उनके लिए बंधन और नुकसान ही लेकर आई। मुझमें मानवता बिल्कुल भी नहीं थी! बाद में, मैंने टीम के सदस्यों के साथ खुलकर बात की, अपनी भ्रष्टता को उजागर किया और उनसे माफी माँगी।

बाद में, मैंने फिर से आत्मचिंतन किया और महसूस किया कि मेरे द्वारा लोगों को बाधित करने की एक और वजह थी : मुझे सिद्धांतों के अनुसार लोगों के साथ पेश आना नहीं आता था। मैंने बहनों की वास्तविक कठिनाइयों और परिस्थितियों पर विचार नहीं किया; मैंने बस सबके लिए एक ही तरीका अपनाया। दरअसल, वे भी अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाना चाहती थीं, लेकिन उनकी काबिलियत बस औसत थी और उनमें कार्यक्षमता की कमी थी। इसके लिए जरूरी था कि मैं और अधिक प्रयास करूँ और उनकी मदद करने के लिए ज्यादा समय और ऊर्जा लगाऊँ। बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “तुम्हें उन कुछ अगुआओं और कार्यकर्ताओं से कैसे पेश आना चाहिए जिनकी काबिलियत खराब है और जिनमें कार्य क्षमता की कमी है? ... तुम्हें उन्हें विशिष्ट रूप से यह बताने की जरूरत है कि कार्य कैसे करना है, और इसे कैसे कार्यान्वित करना है। तुम्हें उन्हें यह बताना चाहिए कि इस कार्य के लिए किसे नियुक्त करना चाहिए और किसे जिम्मेदार बनाना चाहिए, और इस पर साथ मिलकर सहयोग करने के लिए किन लोगों को चुनना चाहिए। उन्हें ये सभी विवरण समझाओ और उन्हें इसका निर्वहन करने दो। इसे इस तरीके से क्यों करना चाहिए? क्योंकि स्थानीय कलीसिया के सदस्यों के पास आम तौर पर बहुत ही उथला अनुभव होता है और उनमें कार्य करने की क्षमता की कमी होती है, जिससे उपयुक्त अगुआओं और कार्यकर्ताओं को चुनना असंभव हो जाता है। सिर्फ इसी तरीके से कार्य करके ही कार्य-व्यवस्थाओं को कार्यान्वित किया जा सकता है। अगर तुम इस तरीके से कार्य नहीं करते हो और इन लोगों के साथ दूसरे अगुआओं और कार्यकर्ताओं जैसा ही व्यवहार करते हो, उन्हें सिर्फ विशिष्ट सिद्धांतों और योजनाओं के बारे में बताते हो और अविभेदी होते हो, तो कार्य-व्यवस्थाएँ कार्यान्वित नहीं की जाएँगी। अगर तुम इस पर कोई ध्यान नहीं देते हो, तो क्या यह जिम्मेदारी की उपेक्षा नहीं है? (हाँ, है।) यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कहते हैं, ‘दूसरे लोगों को तो पता है कि कार्य-व्यवस्थाओं को कैसे कार्यान्वित करना है और अभ्यास कैसे करना है; इस व्यक्ति को क्यों नहीं पता है? अगर उसे नहीं पता है, तो मैं उसे लेकर परेशान नहीं होऊँगा। यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। चाहे जो हो, मैं अपना काम पूरा कर चुका हूँ।’ क्या यह तर्क मान्य है? (नहीं।) मिसाल के तौर पर, मान लो कि एक माँ के तीन बच्चे हैं, और उनमें से एक बच्चा कमजोर है, वह हमेशा बीमार रहता है, और खाना नहीं खाना चाहता है। अगर यह माँ इस बच्चे को खाना नहीं खाने की अनुमति दे देती है, तो शायद यह बच्चा ज्यादा दिन तक जीवित नहीं रहेगा। उसे क्या करना चाहिए? एक माँ होने के नाते, उसे इस कमजोर बच्चे की विशेष देखभाल करनी होगी। मान लो कि यह माँ कहती है, ‘यह तो पहले से ही काफी है कि मैं अपने सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार करती हूँ। मैंने इस बच्चे को जन्म दिया और उसके लिए खाना पकाया। मैंने अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी है। चाहे वह खाए या ना खाए, मुझे इसकी परवाह नहीं है। अगर वह नहीं खाता है, तो उसे भूखा रहने दो, और जब उसे वाकई भूख लगेगी, तो वह खाना खा लेगा।’ इस तरह की माँ के बारे में तुम क्या सोचते हो? (वह गैर-जिम्मेदार है।) क्या ऐसी माँएँ होती हैं? सिर्फ एक बेवकूफ महिला या सौतेली माँ ही ऐसी होगी। अगर वह सगी माँ है और बेवकूफ नहीं है, तो वह अपने बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार कभी नहीं करेगी, है न? (सही कहा।) अगर कोई बच्चा कमजोर है, हमेशा बीमार पड़ जाता है, और खाना खाना पसंद नहीं करता है, तो उसकी माँ को ज्यादा देखभाल और प्रयास करने पड़ते हैं। उसे बच्चे को खाना खिलाने के तरीके ढूँढ़ने पड़ते हैं, उसे बच्चे की पसंद का खाना पकाना पड़ता है, उसके लिए खास पकवान बनाने पड़ते हैं और जब बच्चा खाना खाने से मना करता है, तो उसे मनाना पड़ता है। जब वह अठारह-उन्नीस वर्ष का हो जाता है और उसका शरीर एक सामान्य वयस्क की तरह स्वस्थ होता है, तो माँ निश्चिन्त हो सकती है और पीछे हट सकती है, और अब उसे इस बच्चे की विशेष देखभाल करने की जरूरत नहीं पड़ती है। अगर कोई माँ खास हालातों वाले बच्चे के साथ ऐसे पेश आ सकती है और अपनी जिम्मेदारी पूरी कर सकती है, तो एक अगुआ या कार्यकर्ता के बारे में तुम्हारा क्या कहना है? अगर तुम्हारे दिल में भाई-बहनों के लिए माँ का प्यार तक नहीं है, तो इसका यह अर्थ है कि तुम बिल्कुल गैर-जिम्मेदार हो। तुम्हें अपनी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए; तुम्हें उन कलीसियाओं का ध्यान रखना चाहिए जिनमें अपेक्षाकृत कमजोर और अपेक्षाकृत खराब कार्य क्षमता वाले लोग प्रभारी हैं। अगुआओं और कार्यकर्ताओं को इन मामलों पर विशेष ध्यान देना चाहिए और इनमें विशेष मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए। विशेष मार्गदर्शन का क्या अर्थ है? तुम्हें सत्य पर संगति करने के अलावा, ज्यादा विशिष्ट और विस्तृत निर्देश और सहायता भी प्रदान करनी चाहिए, जिसके लिए संप्रेषण के संबंध में ज्यादा प्रयास करने की जरूरत पड़ती है। अगर तुम उन्हें कार्य समझाते हो और फिर भी उन्हें समझ नहीं आता है, और वे यह नहीं जानते हैं कि इसे कैसे कार्यान्वित करना है, या भले ही वे इसे धर्म-सिद्धांत के संबंध में समझ जाते हैं, और ऐसा लगता है कि वे जानते हैं कि इसे कैसे कार्यान्वित करना है, लेकिन फिर भी तुम अनिश्चित हो और इस बारे में थोड़ा चिंतित हो कि वास्तविक कार्यान्वयन कैसे होगा, तो तुम्हें क्या करना चाहिए? तुम्हें उनका मार्गदर्शन करने और उनके साथ कार्य को कार्यान्वित करने के लिए स्थानीय कलीसिया में व्यक्तिगत रूप से गहराई में जाने की जरूरत है। जिन कार्यों को कार्य-व्यवस्थाओं की अपेक्षाओं के अनुसार करने की जरूरत है, उनसे संबंधित विशिष्ट व्यवस्थाओं को करते समय उन्हें सिद्धांत बता दो, जैसे कि पहले क्या करना है और उसके बाद क्या करना है, और लोगों का उचित रूप से कैसे आवंटन करना है—इन सभी चीजों को उचित रूप से व्यवस्थित करो। यह व्यावहारिक रूप से उनके कार्य में उनका मार्गदर्शन करना है, जो कि सिर्फ नारे लगाने और अंधाधुंध आदेश देने और कुछ धर्म-सिद्धांतों के साथ उन्हें व्याख्यान देने और फिर, अपना कार्य खत्म हो चुका मान लेने के विपरीत है—वह विशिष्ट कार्य करने की अभिव्यक्ति नहीं है, और नारे लगाना और आसपास के लोगों पर हुक्म चलाना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी नहीं है। एक बार जब स्थानीय कलीसिया के अगुआ या पर्यवेक्षक कार्य की जिम्मेदारी उठा पाते हैं, और कार्य सही रास्ते पर आ जाता है, और मूल रूप से कोई प्रधान समस्या नहीं रह जाती है, सिर्फ तभी अगुआ या कार्यकर्ता वहाँ से जा सकते हैं(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (10))। “लोगों द्वारा अनुभव की जाने वाली कठिनाइयाँ हल करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के काम की गतिशीलता को समझना चाहिए; तुम्हें समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा विभिन्न लोगों पर कैसे काम करता है, तुम्हें लोगों के सामने आने वाली कठिनाइयों और उनकी कमियों को समझना चाहिए, और तुम्हें समस्या के महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना चाहिए और बिना विचलित हुए या बिना कोई त्रुटि किए, समस्या के स्रोत पर पहुँचना चाहिए। केवल इस तरह का व्यक्ति ही परमेश्वर की सेवा में समन्वय करने योग्य है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो चरवाहा उपयोग के लिए उपयुक्त है उसके पास क्या होना चाहिए)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि खराब काबिलियत वाले लोगों को ज्यादा मार्गदर्शन और मदद की जरूरत होती है और सबके लिए एक ही तरीका नहीं अपनाया जा सकता। यह ऐसा है जैसे एक माँ जिसके कई बच्चे हों, और उनमें से एक कमजोर और बीमार हो। माँ को इस बच्चे की दूसरों के मुकाबले ज्यादा देखभाल करनी पड़ती है ताकि वह स्वस्थ होकर बड़ा हो सके। लेकिन एक गैर-जिम्मेदार माँ, यह देखकर कि उसका बच्चा कमजोर है, उसकी देखभाल नहीं करती और इसके बजाय पर्याप्त मजबूत न होने के लिए बच्चे को ही दोषी ठहराती है। भला ऐसे में कोई बच्चा स्वस्थ होकर कैसे बड़ा हो सकता है? परमेश्वर लोगों को वह करने के लिए मजबूर नहीं करता जो उनकी क्षमता से बाहर है; लोगों के लिए उसकी अपेक्षाएँ उनकी अंतर्निहित काबिलियत पर आधारित होती हैं। मुझे भी परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपने भाई-बहनों के साथ पेश आना चाहिए और उन्हें ज्यादा मार्गदर्शन और मदद देनी चाहिए। उसके बाद, जब मैंने देखा कि मेरी बहनों को काम में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो मैं धैर्यपूर्वक उनकी समस्याओं और कठिनाइयों को सुनती और उनकी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करके उनकी मदद के लिए संगति करती। इस तरह अभ्यास करने से, बहनें अब पहले की तरह मेरे द्वारा बाधित महसूस नहीं करती थीं। जब उनका अपने कर्तव्यों में ऐसे मसलों से सामना होता जिन्हें वे साफ तौर पर नहीं समझ पातीं, तो वे पहल करके मुझसे उनके बारे में पूछतीं। फिर हम उन्हें सुलझाने के लिए एक साथ मिलकर सत्य खोजते और हमारे काम के नतीजों में भी सुधार हुआ।

इस अनुभव के जरिए, मैंने साफ तौर पर देखा कि भ्रष्ट स्वभाव के आधार पर लोगों के साथ पेश आने से वे सिर्फ बाधित होते हैं और उन्हें चोट ही पहुँचती है और काम को भी नुकसान पहुँचता है। सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपने भाई-बहनों के साथ पेश आना और अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना काम के लिए फायदेमंद है; और इससे दूसरों की उन्नति भी होती है।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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