बीमारी द्वारा मिली आशीष

27 दिसम्बर, 2021

किन लीन, चीन

2014 में, कम्युनिस्ट पार्टी 28 मई के झाओयुआन मामले को लेकर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करते हुए भाई-बहनों को गिरफ़्तार करने लगी। हमारे इलाके के ज़्यादातर कलीसिया अगुआओं को पकड़ लिया गया, हमारे कुछ नए विश्वासी भाई-बहन डर और निराशा में जीने लगे। ऐसे अहम मौके पर मुझे कई कलीसियाओं के काम की जिम्मेदारी देकर प्रोन्नत किया गया। मैंने मन-ही-मन सोचा कि संकट के समय ऐसा नियंत्रण मिलना बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, मैं परमेश्वर को निराश नहीं कर सकती। इसलिए सिर पर गिरफ़्तारी की तलवार लटकने के बावजूद मैंने खुद को कर्तव्य में झोंक दिया। मैंने सोचा कि ऐसे खतरे के बीच कलीसिया के काम को बचाने को परमेश्वर स्वीकार करेगा और मैं पक्के तौर पर इस काबिल बन जाऊँगी कि परमेश्वर मुझे बचाकर अपने राज्य में ले जाए। फिर अचानक, मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।

अक्टूबर 2014 की एक शाम, डिनर करते समय अचानक मेरे हाथ से कटोरा फ़र्श पर गिर गया। मैंने सोचा शायद थोड़ी लापरवाही हो गई होगी, मैंने फ़ौरन उसे उठाना और टिशू से अपना हाथ साफ़ करना चाहा, तभी मुझे एहसास हुआ कि मेरे हाथों पर मेरा नियंत्रण नहीं रह गया और मैं टिशू भी नहीं उठा पा रही हूँ। जल्दी ही मेरे हाथ-पैर सुन्न पड़ गए और मैं कुर्सी पर बैठी रही, हिल भी नहीं पाई। परिवार के लोगों ने फ़ौरन मेरा ब्लड प्रेशर चेक किया, जो 200 से अधिक था। ब्लड प्रेशर कम करने के लिए मैंने कुछ दवाएं लीं, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। मैं उलझन में पड़ गई, मैंने सोचा कि ऐसा कैसे हो सकता है। पता नहीं ये कोई गंभीर समस्या थी या नहीं। मगर फिर मैंने सोचा कि आस्था के इन बरसों में मैंने खुद को कर्तव्य में झोंक दिया था, इसलिए मुझे परमेश्वर का अनुग्रह ज़रूर मिलेगा और मुझे कोई गंभीर समस्या नहीं होगी। मैंने सोचा, भले ही मैं बीमार हूँ, मगर परमेश्वर मुझे ज़रूर बचाएगा और ठीक करेगा। उसके बाद मेरा मन काफ़ी शांत हो गया। अगली सुबह सोकर उठी, तो धीरे-धीरे अपने हाथ-पैरों को हिलाने की कोशिश की, तब पता चला कि मेरे शरीर के दाएं हिस्से में सब कुछ सामान्य है लेकिन मेरा बायां हाथ-पैर सुन्न पड़ गए हैं। मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। मैं परेशान हो गई : मैं पूरी तरह ठीक क्यों नहीं हूँ? क्या मुझे एक तरफ़ लकवा मार गया है? अगर ऐसा है, तो मैं अब अपना कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी। क्या मैं बेकार हो जाऊँगी, हटा दी जाऊँगी, और तब क्या मुझे उद्धार का मौक़ा मिलेगा? मगर फिर, मैंने सोचा कि जो कुछ हुआ वो गंभीर था, मेरे आधे हिस्से का रातों-रात ठीक हो जाना परमेश्वर की आशीष ही है। अगर परमेश्वर मुझे चंगा कर दे तो पूरी तरह ठीक होना कोई बड़ी बात नहीं, है न? मुझे लगा कि मेरे पास परमेश्वर की सुरक्षा है और मुझे अधिक चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।

उसी दिन सबेरे मैं डॉक्टर के पास गई, सीटी स्कैन कराया, तब डॉक्टर ने गंभीरता से कहा, "तुम्हें दायीं तरफ़ इंट्राक्रेनियल हेमरेज़ हुआ है जिसमें करीब 10 मिलीलीटर खून निकल गया है। अगर खून निकलने वाली जगह थोड़ी-सी भी ऊपर होती, तो बोल पाना मुश्किल हो जाता। तुम्हारी बोलने की क्षमता चली जाती और शायद तुम पूरी तरह बेबस हो जाती। कल रात को इतना सब हुआ, तुम्हारी किस्मत अच्छी है कि तुम अब तक बची हुई हो। तुम्हें फ़ौरन इलाज की ज़रूरत है।" उन्होंने कहा कि वे इन्फ्यूजन और एप्रोच के साथ पूरी सावधानी से इलाज शुरू करेंगे। अगर मेरे दिमाग में जमे खून के थक्के ख़त्म नहीं हुए, तो दिमाग की सर्ज़री करनी पड़ेगी। दिमाग से खून निकलने की बात सुनकर मैं सन्न रह गई। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मामला इतना गंभीर होगा। मैं तो 50 साल की भी नहीं हुई, अगर इलाज असफल रहा और आधे शरीर में लकवे की स्थिति बनी रही या मैं पूरी तरह जिंदा लाश बन गई, तो क्या होगा? मेरी जिंदगी कितनी भयानक हो जाएगी? दिमाग की सर्जरी कितनी खतरनाक है, इसमें मेरी जान भी जा सकती है। तब क्या मुझे बचाया जा सकेगा और मैं परमेश्वर के राज्य में जा सकूँगी? अपनी आस्था के इन बरसों में, मैंने अपना सब कुछ दे दिया, फिर मुझे ऐसी गंभीर बीमारी कैसे हो गई। परमेश्वर मेरी रक्षा क्यों नहीं कर रहा था? मैं जितना सोचती उतनी ही परेशान हो जाती, खाना भी गले से नीचे नहीं उतर रहा था। अस्पताल में पांचवें दिन, मेरे पास वाले बेड पर एक बूढ़ी महिला की तबीयत अचानक बिगड़ गई और उसे दूसरे अस्पताल भेज दिया गया। यह देखकर मैं फिर से घबरा गई। हम दोनों एक ही दिन भर्ती हुए थे और वो चलती-फिरती रहती थी, लेकिन अब उसे व्हील चेयर पर बिठा कर ले गए। लगा कि ऐसी हालत में इंसान जिंदा बच भी पाएगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता, सोचने लगी कि क्या मेरी हालत भी अचानक और बिगड़ जाएगी।

करीब एक हफ़्ते अस्पताल में रहने के बाद भी, मेरे बाएं पैर में अब तक कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था। मैंने सोचा, "परमेश्वर मेरी देखभाल क्यों नहीं कर रहा? ऐसे अहम मौके पर मैं कर्तव्य नहीं निभा सकती, तो क्या मैंने उद्धार का मौक़ा गँवा दिया?" यह सोचकर मेरे दिल में एक सिहरन-सी दौड़ गई और मैं ज़ार-ज़ार रोने लगी। मैंने अपनी आस्था के नौ सालों में कड़ी मेहनत की थी, अपने रास्ते में कोई रुकावट नहीं आने दी। कलीसिया की किसी भी परेशानी या समस्या की ज़िम्मेदारी लेने में संकोच नहीं किया, गिरफ़्तारी के खतरे का सामना करते हुए भी मैं पीछे नहीं हटी। निरंतर अपना कर्तव्य निभाती रही। अगुआ की ज़िम्मेदारी निभाते हुए, मैंने दूसरे भाई-बहनों के मुकाबले अधिक तकलीफें सहीं और मन लगाकर काम किया। मैंने सोचा था कि इतना सब कुछ देने और इस तरह का अनुसरण करने पर, परमेश्वर मुझे आशीष देगा। फिर अचानक मैं इतनी बीमार कैसे हो गई? क्या ऐसा इसलिए था कि परमेश्वर को अब मेरी परवाह नहीं थी? अगर मैं ठीक नहीं हुई और अपना कर्तव्य नहीं निभा पाई, तो क्या मुझे बचाया जाएगा? अगर नहीं, तो क्या इतने बरसों का त्याग और कड़ी मेहनत बेकार चली गई? लगा जैसे अगर मुझे पता होता कि मेरे साथ ऐसा कुछ होगा, तो मैं इतनी मेहनत नहीं करती। मैं बहुत असहाय महसूस कर रही थी। अब परमेश्वर से प्रार्थना या उसके वचनों पर विचार नहीं करना चाहती थी। मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था, कि तभी अनजाने में मेरा हाथ सिर के नीचे लगी इन्फ्यूजन पाइप से लग गया और उसकी सुई निकल गई, जिससे मेरा हाथ काफ़ी फूल गया। अपना फूला हुआ हाथ देखकर मैं और भी दुखी हो गई। मैंने उन भाई-बहनों के बारे में सोचा जो पूरे उत्साह के साथ सुसमाचार का प्रचार करते हुए अपने कर्तव्य निभा रहे थे, जबकि मैं अस्पताल में पड़ी, कोई भी कर्तव्य निभा पाने में नाकाम थी। क्या मैं बिल्कुल बेकार नहीं थी? राज्य के सुसमाचार के प्रचार का समय होने के कारण, अन्य भाई-बहन अपना कर्तव्य निभाते हुए अच्छे कर्म कर रहे थे जबकि मुझे शायद हटा ही दिया जाएगा। लगा जैसे परमेश्वर मुझे बिल्कुल भी नहीं बचाएगा। उस रात, मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही, नींद बिल्कुल नहीं आई। अपने दुख में डूबे हुए, मैंने रोते हुए परमेश्वर से यह प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं अभी बहुत तकलीफ़ में हूँ। मैं जानती हूँ कि तुमने यह सब होने की अनुमति दी है और मुझे तुम्हें गलत नहीं समझना चाहिए। मुझे राह दिखाओ, ताकि मैं तुम्हारी इच्छा समझ सकूँ, तुम्हारे नियम और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो सकूँ।"

जब मैं अस्पताल में थी, तो सौभाग्य से एक बहन ने मुझे एमपी5 प्लेयर भेजा था, जब सभी लोग सो जाते थे, तब मैं ईयरफोन लगाकर परमेश्वर के वचन सुनती थी। उन वचनों के एक अंश से मुझे काफ़ी मदद मिली। परमेश्वर के वचन कहते है, "सभी लोगों के लिए शुद्धिकरण कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शुद्धिकरण के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धर्मी स्वभाव स्पष्ट करता है और मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ सार्वजनिक करता है, और अधिक प्रबुद्धता, अधिक वास्तविक काट-छाँट और व्यवहार प्रदान करता है; तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से वह मनुष्य को अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान देता है, और उसे परमेश्वर की इच्छा की और अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के प्रति सच्चा और शुद्ध प्रेम प्राप्त करने देता है। शुद्धिकरण का कार्य करने में परमेश्वर के ये लक्ष्य हैं। उस समस्त कार्य के, जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, अपने लक्ष्य और अपना अर्थ होता है; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता, और न ही वह ऐसा कार्य करता है, जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शुद्धिकरण का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना है। बल्कि इसका अर्थ है शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना, और उसके पूरे जीवन को बदलना। शुद्धिकरण मनुष्य की वास्तविक परीक्षा और वास्तविक प्रशिक्षण का एक रूप है, और केवल शुद्धिकरण के दौरान ही उसका प्रेम अपने अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल शुद्धिकरण का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है')। इस पर विचार करने पर, मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर का लोगों की परीक्षा लेकर शोधन करना, उन्हें हटाने के लिए नहीं बल्कि उन्हें शुद्ध करके बदलने के लिए होता है। मगर मैं परमेश्वर की इच्छा खोजने और उसके कार्य को समझने की कोशिश नहीं कर रही थी। लकवे का शिकार क्या हुई, मैं तो परमेश्वर को गलत समझकर उसे दोष देने लगी। मैं कितनी बेवकूफ़ थी! इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की। मैं समर्पित होने, परमेश्वर के वचन पढ़कर विचार करने, खुद को जानने और सबक सीखने को तैयार थी।

मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : "परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दु:खद बात यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य के बीच अपने खुद के प्रबंधन का संचालन करता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता इस बात में है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का प्रयास करता है, उसी समय कैसे वह अपनी आदर्श मंज़िल का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रच रहा होता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंज़िल कैसे प्राप्त किए जाएँ। यहाँ तक कि अगर कोई समझता भी है कि वह कितना दयनीय, घृणास्पद और दीन-हीन है, तो भी ऐसे कितने लोग अपने आदर्शों और आशाओं को तत्परता से छोड़ सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और केवल अपने बारे में सोचना बंद कर सकने में सक्षम हैं? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की ज़रूरत है, जो अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य में अर्पित कर उसके प्रति समर्पित होंगे। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत नहीं है, जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं, और उनकी तो बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है, जो थोड़ा-सा देते हैं और फिर पुरस्कृत होने का इंतज़ार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है, जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है, जो उसके प्रबंधन-कार्य से नाराज़ रहते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक घृणा करता है, जो उसके द्वारा मानवजाति के बचाव के लिए किए जा रहे कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ उठाते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन-कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय की परवाह नहीं करते, और पूरी तरह से अपनी संभावनाओं और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य से कुढ़ते हैं और इस बात में ज़रा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसकी क्या मर्ज़ी है, वे केवल वही कर रहे हैं जो उन्हें अच्छा लगता है और उनका तरीका परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य से अलग-थलग है। उनके व्यवहार को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है—परमेश्वर द्वारा उसे कृपापूर्वक देखे जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है')। इन वचनों ने मेरी हालत को उजागर कर दिया। जब मैं सबसे पहले विश्वासी बनी, मैंने जाना कि परमेश्वर ने इंसान से वादा किया है और अगर हम कड़ी मेहनत करते हुए परमेश्वर के लिए त्याग करें, तो परमेश्वर हमें बचाकर अपने राज्य में ले जाएगा। इसलिए मैं दिल लगाकर कर्तव्य निभाने लगी और हर मुश्किल हालात का सामना किया। कलीसिया के दूसरे भाई-बहनों को कोई परेशानी होती, तो भागकर उनकी मदद के लिए जाती। गिरफ़्तारी के खतरे का सामना करते हुए भी मैंने अपना कर्तव्य निभाना नहीं छोड़ा। मैंने सोचा इस तरह के त्याग से मुझे परमेश्वर की सुरक्षा और आशीष ज़रूर मिलेगी, मुझे स्वर्ग के राज्य में जगह भी मिल जाएगी। जब मैं बीमार हुई और मुझे एक तरफ़ के लकवे की संभावना दिखने लगी, तो लगा जैसे परमेश्वर ने मेरी रक्षा नहीं की, मुझे आशीष नहीं दी, मैंने अच्छा भविष्य और मंज़िल पाने का मौक़ा गँवा दिया। मुझे बहुत सी शिकायतें थीं, मैं अपने किए हर काम का हिसाब-किताब करना चाहती थी। मैं परमेश्वर से कुतर्क और बहस कर, अपने सभी त्यागों के द्वारा अपना पक्ष मजबूत करने लगी। मैं परमेश्वर को गलत समझकर उसके ख़िलाफ़ हो गई। परमेश्वर ने जैसा कहा मेरी हालत वैसी ही थी, "जो थोड़ा-सा देते हैं और फिर पुरस्कृत होने का इंतज़ार करते हैं" और "जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं।" गंभीर बीमारी का सामना करते हुए, अपनी आस्था में त्याग के पीछे मेरी छिपी हुई मंशाएं और लेन-देन की सोच बिल्कुल उजागर हो गई। मैं सत्य का अनुसरण करने और भ्रष्टता मिटाने के लिए अपना कर्तव्य नहीं निभा रही थी, बल्कि मैं कड़ी मेहनत का दिखावा करके बदले में परमेश्वर के अनुग्रह और आशीष, और राज्य की आशीष पाना चाहती थी। मैं परमेश्वर के साथ लेन-देन कर रही थी, उसका इस्तेमाल कर उसे धोखा दे रही थी। मेरी जैसी मौक़ा-परस्त इंसान परमेश्वर के राज्य में कैसे जा सकती है? अगर लकवा न मारता, तो अपने सभी ऊपरी दिखावों की वजह से पूरी तरह मूर्ख बन गई होती और मुझे कभी आशीष पाने की अपनी नीच मंशाओं या अपनी आस्था में मौजूद मिलावट का पता नहीं चल पाता। मैं अपनी आस्था में परमेश्वर का विरोध करती रहती और मुझे पता भी नहीं चलता।

उसके बाद, मैंने लगातार इस पर आत्मचिंतन किया कि मैं अपने कर्तव्य में परमेश्वर के साथ लेन-देन क्यों कर रही थी। खोज के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा: "सभी भ्रष्ट लोग स्वयं के लिए जीते हैं। मैं तो बस अपने लिए सोचूँगा, बाकियों को शैतान ले जाए—यह मानव प्रकृति का निचोड़ है। लोग अपनी ख़ातिर परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; वे चीजों को त्यागते हैं, परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते हैं और परमेश्वर के प्रति वफादार रहते हैं—लेकिन फिर भी वे ये सब स्वयं के लिए करते हैं। संक्षेप में, यह सब स्वयं के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जाता है। दुनिया में, सब कुछ निजी लाभ के लिए होता है। परमेश्वर पर विश्वास करना आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए ही कोई व्यक्ति सब कुछ छोड़ देता है, और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कोई व्यक्ति बहुत दुःख का भी सामना कर सकता है। यह सब मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति का प्रयोगसिद्ध प्रमाण है" ("अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर')। परमेश्वर के वचनों से मुझे अपनी आस्था में लेन-देन करने की सोच की जड़ का पता चला। "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये" और "फ़ायदा न हो तो उंगली भी मत उठाओ" जैसे शैतानी विचारों ने मेरे दिल में गहराई तक जड़ें जमा ली थीं और ये मेरे लिए जीवन जीने के नियम बन गए थे। मेरे हर काम में मेरे निजी फ़ायदे सबसे ऊपर होते थे, इसलिए लगा कि मेरे योगदानों के लिए मुझे इनाम मिलना चाहिए। परमेश्वर के लिए अपने काम में भी, मैं बस उससे सौदा करना चाहती थी, मैंने सोचा कि अपनी आस्था में आशीष पाने की चाह बिल्कुल स्वाभाविक है। जब इतनी कड़ी मेहनत और इतने सारे त्याग करने के बाद मुझे लकवा मार गया और लगा कि मैं कभी भी मर सकती हूँ, तो बचाए जाने, अच्छा परिणाम और मंज़िल पाने की सारी उम्मीदें ख़त्म हो गईं, फिर मैं फ़ौरन परमेश्वर के ख़िलाफ़ होकर उसे दोष देने लगी। मैं अपने किए हर काम का हिसाब लगाकर परमेश्वर से बहस करने लगी, उसके ख़िलाफ़ हो गई। मैंने देखा कि मैं शैतान के विषों के अनुसार जीवन जी रही हूँ। मेरे अंदर ज़रा-सी भी इंसानियत नहीं थी। अगर मैंने पश्चाताप नहीं किया, तो कभी न कभी मुझे हटाकर दंडित किया जाएगा।

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े, जिनसे मैं अपनी आस्था में अनुसरण को लेकर अपनी गलत सोच को समझ पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "जब मनुष्य दूसरों को आँकता है, तो वह उनके योगदान के अनुसार उन्हें आँकता है। जब परमेश्वर मनुष्य को आँकता है, तो वह मनुष्य की प्रकृति के अनुसार उन्हें आँकता है। उन लोगों में जो जीवन की तलाश करते हैं, पौलुस ऐसा व्यक्ति था जो स्वयं अपना सार नहीं जानता था। वह किसी भी तरह विनम्र या आज्ञाकारी नहीं था, न ही वह अपना सार जानता था, जो परमेश्वर के विरुद्ध था। और इसलिए, वह ऐसा व्यक्ति था जो विस्तृत अनुभवों से नहीं गुज़रा था, और ऐसा व्यक्ति था जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाया था। पतरस भिन्न था। वह परमेश्वर का सृजित प्राणी होने के नाते अपनी अपूर्णताएँ, कमज़ोरियाँ, और अपना भ्रष्ट स्वभाव जानता था, और इसलिए उसके पास अभ्यास का एक मार्ग था जिसके माध्यम से वह अपने स्वभाव को बदल सके; वह उन लोगों में से नहीं था जिनके पास केवल सिद्धांत था किंतु जो वास्तविकता से युक्त नहीं थे। वे लोग जो परिवर्तित होते हैं नए लोग हैं जिन्हें बचा लिया गया है, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करने की योग्यता से संपन्न हैं। वे लोग जो नहीं बदलते हैं उन लोगों में आते हैं जो स्वभाविक रूप से पुराने और बेकार हैं; ये वे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है, अर्थात्, वे लोग जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिन्हें ठुकरा चुका है। उनका कार्य चाहे जितना भी बड़ा हो, उन्हें परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। जब तुम इसकी तुलना स्वयं अपने अनुसरण से करते हो, तब यह स्वतः स्पष्ट हो जानना चाहिए कि तुम अंततः उसी प्रकार के व्यक्ति हो या नहीं जैसे पतरस या पौलुस थे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। "यदि तुम जिसकी खोज करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है, और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो वह सही पथ है। यदि तुम जिसे खोजते हो वह देह के आशीष हैं, और तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह तुम्हारी अपनी अवधारणाओं का सत्य है, और यदि तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है, और तुम देहधारी परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी आज्ञाकारी नहीं हो, और तुम अभी भी अस्पष्टता में जीते हो, तो तुम जिसकी खोज कर रहे हो वह निश्चय ही तुम्हें नरक ले जाएगा, क्योंकि जिस पथ पर तुम चल रहे हो वह विफलता का पथ है। तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा या हटा दिया जाएगा यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है, जिसका तात्पर्य यह भी है कि सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। जब मैंने इस पर और विचार किया, तो जो यह मुझे काफ़ी प्रबोधक लगा। परमेश्वर किसी इंसान को इस आधार पर नहीं परखता कि उसने बाहर से क्या योगदान दिया है, बल्कि इसका आधार ये है कि चीज़ों को लेकर उसकी प्रवृत्ति और सोच कैसी है, उसका रुख क्या है और वह सत्य पर अमल करके परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकता है या नहीं। मगर मैंने सोचा कि कड़ी मेहनत और त्याग करने से परमेश्वर खुश होकर आशीष देगा और एक अच्छी मंज़िल मिलेगी। क्या यह साफ़ तौर पर परमेश्वर के वचनों के विपरीत नहीं है? अनुग्रह के युग में, पौलुस प्रभु का सुसमाचार साझा करने यूरोप के ज़्यादातर हिस्से में गया। उसने काफ़ी मुसीबतें सहीं, बहुत सारा काम पूरा किया और कई कलीसियाओं की स्थापना की। मगर उसने जो भी किया वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होकर या एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए नहीं किया। उसने यह सब इसलिए किया कि उसे खास तौर पर आशीष और इनाम मिलेगा। इसी कारण इतनी सारी यात्राएं और कड़ी मेहनत करने के बाद, उसने कहा "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है" (2 तीमुथियुस 4:7-8)। पौलुस साफ़ तौर पर परमेश्वर से ताज माँग रहा था। उसके त्याग सच्चे नहीं थे, वे परमेश्वर के प्रति समर्पण से नहीं आए थे। अंत में, उसे राज्य में प्रवेश भी नहीं मिला और नर्क में जाकर दंड भी भोगना पड़ा। अपनी आस्था में, मैं चीज़ों को सत्य और परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के नजरिये से नहीं, बल्कि परमेश्वर के कार्य को शैतान के तर्क और लेन-देन के रवैये के अनुसार आंक रही थी। मैंने बड़ी बेवकूफ़ी कर दी। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "यदि तुम जिसकी खोज करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है, और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर क़दम रखते हो वह सही पथ है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। मुझे एहसास हुआ कि मुझे सत्य की खोज करनी होगी और अपना कर्तव्य निभाते हुए खुद को जानने पर ध्यान देना होगा, तभी मेरी गलत सोच, मेरी गलत मंशाओं और मेरे भ्रष्ट स्वभाव का समाधान होगा, मैं परमेश्वर की आज्ञाकारी बनूंगी, और परमेश्वर की इच्छा को ध्यान में रखते हुए अपना कर्तव्य निभा पाऊँगी। परमेश्वर द्वारा बचाये जाने का यही तरीका है। ये एहसास होने के बाद, मैंने प्रार्थना की : "चाहे मेरी सेहत जैसी भी रहे, मैं समर्पित होने के लिए तैयार हूँ। अगर मैं अस्पताल से ज़िंदा बचकर निकल पाती हूँ, तो आख़िरी साँस तक परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए अपना कर्तव्य निभाती रहूँगी!"

अस्पताल में बारहवें दिन, मैंने पूछा कि क्या मेरी जांच कर अस्तपाल से छुट्टी दी जा सकती है। जांच करने के बाद डॉक्टर ने कहा, "खून का रिसाव बंद हो गया है, लेकिन थक्के पूरी तरह से खत्म नहीं हुए हैं। सिर्फ़ 12 दिनों के इलाज में यह वाकई अच्छा सुधार है।" यह सुनकर मैं बहुत खुश हो गई और रक्षा करने के लिए मैंने परमेश्वर का धन्यवाद किया। डॉक्टर ने मुझे यह भी कहा कि अस्पताल से बाहर जाने के बाद, मुझे अपनी सेहत का ख्याल रखते हुए आराम करना होगा, मेरे दिमाग की नसें काफ़ी कमज़ोर हैं, इसलिए मुझे गिरने से भी बचना होगा, वरना, दूसरी बार के स्ट्रोक के नतीजे बहुत भयानक होंगे। जिस दिन मैं घर वापस आई, मुझे एक संदेश मिला जिसमें लिखा था कि मेरी सहकर्मी बहन झांग, चार दिन पहले अपने मेजबान के घर गई थी, लेकिन अब तक वापस नहीं लौटी। काफ़ी संभावना थी कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। यह ख़बर काफ़ी चिंताजनक थी। इसका मतलब था कि जिन सभाओं में वो गई थी और जिन घरों में कलीसिया की भेंटें रखी थीं, सभी खतरे में थे, इसलिए उन्हें फ़ौरन सावधानी बरतने की सूचना देना ज़रूरी था। लेकिन इसमें कई जगहें शामिल थीं और मैं अभी अस्पताल से निकली थी, इसलिए इतनी ज़्यादा भाग-दौड़ नहीं कर सकती थी। यह सब पहले या बाद में क्यों नहीं हो सकता था? ऐसे अहम मौके पर ऐसी घटना क्यों हुई? अगर मुझे दोबारा स्ट्रोक आया, तो शायद मैं फिर से खड़ी भी न हो पाऊं, और उन सभी लोगों से मिलकर सूचना देना वाकई खतरनाक था। अगर मुझे गिरफ़्तार कर लिया गया, तो क्या मैं पुलिस की क्रूर यातना सह पाऊँगी? यह शायद मेरे जीवन का अंत होगा। मगर सिर्फ़ बहन झांग और मुझे ही सभी भाई-बहनों के ठिकाने पता थे, अगर मैंने खुद जाकर नहीं बताया और पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर भेंटें ले लीं, तो बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा। इस उलझन में, मुझे वह प्रार्थना याद आई जो मैंने अस्पताल से निकलने से पहले की थी कि अगर मैं अस्पताल से ज़िंदा बाहर निकल पाई, तो मैं खुद को अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित कर दूँगी और आख़िरी साँस तक परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाऊँगी। अब ऐसी घटना होने पर, मैं अपना वादा कैसे भूल सकती हूँ? मैंने परमेश्वर के सामने दंडवत होकर प्रार्थना की, "परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि तुम मुझे और मेरे रवैये को देख रहे हो। इस अहम मौके पर, मुझे परमेश्वर के घर का कार्य कायम रखते हुए अपना कर्तव्य निभाना होगा।" मैंने उस बारे में भी सोचा जब प्रभु यीशु को क्रूस पर कीलों से ठोका गया था, जिससे मुझे काफ़ी प्रेरणा मिली। प्रभु यीशु ने क्रूस वाली जगह जाते हुए एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा, उसने भयंकर पीड़ा और अपमान सहा, यह सब इंसान को छुटकारा दिलाने के लिए था। इंसान के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महान है। उसने हमारे लिए अपना जीवन त्याग दिया, तो फिर मैं अपने निजी हितों को छोड़कर परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान देने को कलीसिया के कार्य की रक्षा क्यों नहीं कर सकती? एक सृजित प्राणी के रूप में, मैं सिर्फ़ परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हुए अपनी आशीषों के बारे में नहीं सोच सकती। अगर मैंने अपना कर्तव्य नहीं निभाया, तो मैं इंसान कहलाने लायक भी नहीं। परमेश्वर के वचनों से प्रोत्साहित होकर, मैं मामले को संभालने के लिए व्यवस्थाएं करने लगी। जब मैं एक बहन के हाथों का सहारा लेकर दूसरी मेजबान के घर जा रही थी, मुझे पता चला कि बहन झांग गिरफ़्तार नहीं हुई थी। मैंने परमेश्वर का बहुत आभार माना। मुझे काफ़ी सुकून महसूस हुआ, क्योंकि मैं अपनी सोच और मंशाओं को ठीक कर पाई थी और सत्य पर अमल कर पाई थी।

ये छह साल बहुत तेज़ी से बीत गए। अभी मैं पूरी तरह से ठीक नहीं हुई हूँ, मेरा बायां हाथ और पैर अब भी थोड़ा सुन्न है, मगर मैं जानती हूँ कि मेरी सेहत परमेश्वर के हाथों में है। पूरी तरह से ठीक नहीं होना मेरे लिए एक चेतावनी है, यह याद दिलाता है कि मैं आशीष पाने के लिए कोशिशें न करूं, पौलुस की तरह गलत रास्ते पर न चलूँ। मैंने इन सारी मुसीबतों का सामना किया, मगर इससे मुझे अपनी शैतानी प्रकृति को बेहतर ढंग से समझने और अनुसरण को लेकर अपनी गलत सोच को ठीक करके आशीष पाने में मदद मिली। मैंने समझ लिया है कि अपनी आस्था में मुझे सत्य की खोज करते हुए परमेश्वर के प्रति समर्पित होना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना चाहिए। अब अपने अनुसरण को लेकर मेरा लक्ष्य साफ़ है—यह बीमारी मेरे लिए एक अप्रत्यक्ष आशीष साबित हुई! मुझे यह सब कुछ एक सहज परिवेश में कभी नहीं मिल पाता। उद्धार के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!

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