एक अमिट फैसला

24 जनवरी, 2021

जब मैं पंद्रह बरस की थी तभी एक बीमारी के कारण मेरे पिता गुज़र गये, और हमने अपने परिवार का मुख्य सहारा खो दिया। मैं इसे स्वीकार नहीं कर पायी। मुझे लगा आसमान टूट कर गिर पड़ा है। मेरी माँ भी इसे संभाल नहीं पायी और बहुत बीमार हो गयी, उसे पांच दिन तक तेज़ बुखार रहा। हमें सहारा देना पड़ेगा, इस डर से कोई भी रिश्तेदार हमसे मिलने नहीं आया। मैं अपनी बीमार माँ को अस्पताल ले गयी, वह वहां एक बेंच पर ढेर हो गयी। कोई भी मदद करने नहीं आया, मैं मायूस हो गयी। मैंने सोचा, "मेरे पिता अभी-अभी गुज़रे हैं। अगर मेरी माँ को कुछ हो गया, तो मैं और मेरी बहन क्या करेंगे?" बाद में, किसी ने हमें प्रभु यीशु का सुसमाचार सुनाया। प्रभु के अनुग्रह से, मेरी माँ सिर्फ़ दो सभाओं में भाग लेने के बाद ही बेहतर महसूस करने लगी। हमने इस तरह से प्रभु में विश्वास रखना शुरू किया। जब मैं समझ सकी कि इंसान के छुटकारे के लिए उसे किस तरह सूली पर चढ़ा दिया गया था, तो परमेश्वर के महान प्रेम ने मेरे दिल को छू लिया। प्रभु ने अपने अनुयायियों से कहा: "मेरे पीछे चले आओ" (मत्ती 4:19)। "मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कहीं हैं कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले। संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैं ने संसार को जीत लिया है" (यूहन्ना 16:33)। इन वचनों ने मुझे बहुत सुकून पहुँचाया। ख़ास तौर से जब मैंने उन पश्चिमी मिशनरियों के बारे में सुना जिन्होंने अपना जीवन प्रभु के लिए समर्पित कर दिया, तो मैंने प्रेरित महसूस किया, इसलिए मैंने प्रभु के सामने संकल्प लिया कि मैं उसके लिए खुद को खपाऊंगी और सुसमाचार का प्रचार करूंगी! उन दिनों जीवन की हर बात निरर्थक लगती थी। सिर्फ प्रभु का अनुसरण करना, उसके लिए काम करना, लोगों को उसके सामने लाना ही सार्थक और लाभकारी लगता था। मैं उस दिन का इंतज़ार करने लगी जब मैं प्रभु के लिए प्रचार करने और काम करने के लिए घर छोड़ कर जा सकती। एक प्रार्थना सभा में मैंने प्रभु से प्रार्थना की और उसे अपनी इच्छा बतायी। उस वक्त मेरी माँ मेरे साथ थी। घर पहुँचने पर उसने मुझे यह कहकर "तू इतनी बेवकूफ कैसे हो सकती है? तूने ऐसा क्यों कहा? प्रभु में विश्वास रखना ठीक है, मगर तू अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ सकती। तुझे हाई स्कूल पर ध्यान देना चाहिए। हमारे रिश्तेदार तुझे तभी इज्ज़त से देखेंगे जब तू कामयाब होगी।" इससे मैं झिझक गयी। मैंने सोचा, "माँ ठीक कहती है। मेरे परिवार की उम्मीदें मेरे कंधों पर हैं। अगर सुसमाचार का प्रचार करने के लिए मैंने पढ़ाई छोड़ दी, तो वाकई मेरी माँ का दिल बहुत दुखेगा। हमें सहारा देने के लिए उसने कड़ी मेहनत की थी, मैं उसे और ज़्यादा तकलीफ नहीं दे सकती।" इसलिए मैं स्कूल जाती रही, साथ ही सभाओं में भाग लेती, प्रचार भी करती, मैंने प्रभु के लिए प्रचार करने और काम करने की अपनी इच्छा को दबा दिया।

जुलाई 2001 में, मैंने अभी-अभी कॉलेज में प्रवेश की परीक्षा दी थी कि मेरी मुलाक़ात कुछ ऐसे लोगों से हो गयी जो स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैला रहे थे। मेरी बहन और मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़ा और हम जान गयीं कि वह वापस आया हुआ प्रभु है, जो सत्य व्यक्त करने, परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय का कार्य करने, और सदा-सदा के लिए इंसान को शुद्ध करके उसे बचाने आया है। मैं रोमांच से भर उठी। मैं जिस प्रभु का लंबे समय से इंतज़ार कर रही थी, आखिरकार वह वापस आ गया है, उसकी वाणी को सुनना और उसकी अगुआई पाकर उसके हाथों बचाया जाना, उसका महान अनुग्रह है! बाइबल को पढ़ते समय मैं प्रभु के अनुयायियों से ईर्ष्या करती थी, क्योंकि वे जब चाहें उसकी शिक्षाओं को सुनने की सामर्थ्य रखते थे। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मैं उन जैसी भाग्यशाली बन सकूंगी। उन सब लोगों के बारे में सोचकर जो प्रभु के प्रकटन के लिए तरस रहे थे मगर नहीं जानते थे कि प्रभु लौट आया है, और यह सोच कर कि उन लोगों से पहले मैं यह महान समाचार सुन चुकी हूँ, मैं समझ गयी कि मुझे स्वर्ग के राज्य के सुसमाचार को फैलाना होगा। मैंने सोचा : "अगर मुझे कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला, तो बहुत अच्छा होगा। तब अपनी माँ को बताने के लिए मुझे एक अच्छा कारण मिल जाएगा कि मैं परमेश्वर के बारे में प्रचार और उसकी सेवा करनेवाली हूँ।"

एक सप्ताह बीत जाने के बाद, मैं अपनी परीक्षा के नतीजे लेने गयी। मेरे शिक्षक ने खुशी-खुशी मुझे बताया कि मुझे एक अच्छे कॉलेज में दाखिला मिल गया है। मेरे सहपाठियों ने यह कह कर मेरी तारीफ़ की, "हमारे प्रांत के हज़ारों में से सिर्फ़ दस छात्रों को ही चुना गया है। उस कॉलेज में प्रवेश पाकर तुमने बढ़िया कामयाबी हासिल की है।" जब मैंने अपने शिक्षक और सहपाठियों को यह सब कहते हुए सुना, तो मैंने दुविधा महसूस की, क्योंकि मैंने सोचा था कि अगर मैं परीक्षा में फेल हो गयी, तो सुसमाचार का प्रचार कर पाऊँगी। लेकिन अब मेरी माँ जानती है कि मुझे कॉलेज में दाखिला मिल गया है, तो अब वह उस विचार के और भी ज़्यादा खिलाफ होगी। घर पहुँची तो देखा कि मेरी माँ लगातार मुस्करा रही थी, मगर मैं बहुत परेशान थी। इतने साल से मैं इंतज़ार कर रही थी कि प्रभु हमें वापस स्वर्ग ले जाने के लिए आयेगा। अब वह आ चुका है, हमें बचाने के लिए खुद सत्य व्यक्त कर रहा है, मैं ऐसा दुर्लभ मौक़ा नहीं गँवाना चाहती थी। जब हमारे रिश्तेदारों को मेरी परीक्षा के बारे में पता चला, तो वे सब मुझे बधाई देने और मेरी बड़ाई करने आये। मगर मैंने सोचा : "ये सब बहुत नकली हैं। जब मेरे पिता चल बसे, तो इनमें से एक भी हमसे मिलने नहीं आया। अब मुझे कॉलेज में दाखिला मिल गया है, तो सारे लोग यहाँ हैं। इन सबको उम्मीद है कि अगर मैं कभी कामयाब हो गयी, तो इनकी इज्ज़त बढ़ा दूंगी।" मैंने अपने प्रति उनकी "चिंता" को जितना ज़्यादा देखा उतना ही ज़्यादा मुझे समझ आया कि लोग कितने ओछे होते हैं। लेकिन मेरी माँ उनके साथ खुशी-खुशी बात कर रही थी, मैं जानती थी कि मेरे कॉलेज में दाखिला पाने को लेकर उसे मुझ पर बहुत गर्व है और मेरी वजह से अब लोग उसकी इज्ज़त कर रहे हैं। अगर मैंने कॉलेज न जाने का फैसला किया, तो मेरी माँ टूट जायेगी, हमारे रिश्तेदार हमें फिर से नीची नज़रों से देखेंगे। जब मैंने इस बारे में सोचा कि हमारे रिश्तेदारों के बर्ताव की वजह से मेरी माँ कितनी तकलीफ़ सहा करती थी, तब मुझे लगा : "हमें बड़ा करना माँ के लिए बहुत मुश्किल काम था। अगर मैं वह काम न करूं जो वह चाहती है, तो मैं वाकई उसे निराश कर दूँगी। मेरा दिल परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता है, मगर मैं अपनी माँ को इस तरह दुख नहीं पहुँचा सकती।" इसी कारण से, मुझे लगा कि मेरे पास कोई विकल्प नहीं है: मुझे कॉलेज जाना ही होगा। कॉलेज जाना शुरू करने के बाद मैंने देखा कि गरीब और अमीर छात्रों के बीच बड़ी दूरी है। अमीर परिवारों के छात्र गरीब छात्रों को नीची नज़र से देखते और उन पर हुक्म चलाते। सिर्फ़ दो हफ़्ते के सैन्य प्रशिक्षण के ख़त्म होते ही दो प्रशिक्षकों ने क्लास की कुछ ख़ूबसूरत लड़कियों के साथ डेटिंग शुरू कर दी। जब एक सहपाठी ने जन्मदिन मनाया, तो सभी ने अच्छे-से-अच्छा तोहफा देने की होड़ लगा दी। वे शानदार दावतों में गये, मुझे ऐसा लगा मानो मेरे सहपाठी एक-दूसरे को धोखा दे रहे हैं और उनका इस्तेमाल कर रहे हैं। उनके बीच कोई सच्ची दोस्ती नहीं है। मुझे यह सब बहुत बुरा लगा। यह सोचना भी मेरी बर्दाश्त के बाहर था कि वहाँ चार साल पढ़ने के बाद मैं जाने किस चीज़ में तब्दील हो जाऊंगी। उस वक्त, मुझे घर के पास की कलीसिया के जीवन और कलीसिया के दूसरे सदस्यों की याद आने लगी। मैं कॉलेज छोड़कर उन सबके बीच जाने को उतावली होने लगी।

कॉलेज में तीन महीने और संघर्ष करने के बाद, सर्दी की छुट्टियां आ गयीं। मैंने अपना मन बना लिया था कि घर पहुँचने के बाद अपनी माँ से सवाल करूंगी और उसे बताऊंगी कि मैं स्कूल छोड़ रही हूँ। घर पहुँचने पर पहले दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन बजाया: "शुद्ध प्रेम बिना दोष के।" "'प्रेम' एक ऐसा भाव है जो पूर्ण रूप से विशुद्ध व निष्‍कलंक है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध या कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट, और कोई धूर्तता नहीं होती। प्रेम में कोई व्यापार नहीं होता और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो तुम धोखा नहीं दोगे, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह नहीं करोगे, किसी चीज को छीनने या उसे प्राप्त करने की या कोई खास धनराशि प्राप्त करने की कोशिश नहीं करोगे।

'प्रेम' एक ऐसा भाव है जो पूर्ण रूप से विशुद्ध व निष्‍कलंक है, जहाँ तुम प्रेम करने, महसूस करने, और विचारशील होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हो। प्रेम में कोई शर्त, कोई अवरोध या कोई दूरी नहीं होती। प्रेम में कोई संदेह, कोई कपट, और कोई धूर्तता नहीं होती। प्रेम में कोई व्यापार नहीं होता और कुछ भी अशुद्ध नहीं होता। यदि तुम लोग प्रेम करते हो, तो खुशी-खुशी खुद को समर्पित करोगे, विपत्ति को सहोगे, और मेरे अनुकूल हो जाओगे, तुम अपना सर्वस्व मेरे लिए त्याग दोगे, तुम अपना परिवार, भविष्य, जवानी और विवाह तक छोड़ दोगे। वरना तुम लोगों का प्रेम, प्रेम न होकर केवल कपट और विश्वासघात होगा!" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे गहराई तक झकझोर दिया। रोमांच के साथ ही मुझे पछतावा भी हुआ। मैंने अपना पूरा जीवन परमेश्वर का अनुसरण करने, परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने में लगाने का संकल्प कर लिया। प्रेम में, कोई धोखा या विश्वासघात नहीं होता। अगर मैं उससे सच्चा प्रेम करती होती, तो मैं उसके प्रति समर्पित हो जाती, उसके लिए सब-कुछ छोड़ देती। मगर ये सब बस बातें ही थीं। ऐन वक्त पर, मैं सिर्फ़ अपने परिवार और उनकी भावनाओं के बारे में सोचने लगती। मैं परमेश्वर से प्रेम नहीं करती थी। मैंने उसे धोखा दिया, उससे विश्वासघात किया।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : "परमेश्वर से प्रेम करने की चाह रखने वाले व्यक्ति के लिए कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है, और ऐसा कोई न्याय नहीं जिस पर वह अटल न रह सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और इस प्रेम का उपयोग करके उसकी इच्छा को कैसे संतुष्ट करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है। सबसे बढ़कर, तुम्हारे अंदर ऐसी आकांक्षा और कर्मठता होनी चाहिए, न कि तुम्हें एक रीढ़विहीन और निर्बल प्राणी की तरह होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाता है, तुम्हें अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव करना चाहिए, और अपने-आपसे लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। यह अहसास किए बिना, तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथ से निकल जाएगा; क्या उसके बाद तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का दूसरा अवसर मिलेगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर पतरस के समान ही आकांक्षाएँ और चेतना होनी चाहिए; तुम्हारा जीवन अर्थपूर्ण होना चाहिए, और तुम्हें अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए! एक मनुष्य के रूप में, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले एक व्यक्ति के रूप में, तुम्हें इस योग्य होना होगा कि तुम बहुत ध्यान से यह विचार कर सको कि तुम्हें अपने जीवन के साथ कैसे पेश आना चाहिए, तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर के सम्मुख कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण विश्वास कैसे होना चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तुम्हें उससे कैसे प्रेम करना चाहिए कि वह ज्यादा पवित्र, ज्यादा सुंदर और बेहतर हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। परमेश्वर के वचनों में मैंने इंसान के लिए उसकी उम्मीदें महसूस कीं। परमेश्वर से अपने जीवन में मिल पाना बहुत दुर्लभ है। दो हज़ार साल पहले, प्रभु के अनुयायियों ने परमेश्वर से मुलाक़ात की थी, और अब परमेश्वर मुझे उसका अनुसरण करने, उसे जानने और प्रेम करने का दुर्लभ अवसर दे रहा है। अगर मैं अपनी माँ का दिल दुखाने के डर से अपने पारिवारिक बंधनों से ऊपर नहीं उठ पायी, शैतान के सांसारिक रास्ते पर चलती रही, तो क्या मैं अपना समय बर्बाद नहीं करूंगी? परमेश्वर का कार्य किसी भी इंसान का इंतज़ार नहीं करता, वह पृथ्वी पर थोड़े समय के लिए ही कार्य करता है। अगर मैंने इस मौके को हाथ से जाने दिया, तो यह मुझे दोबारा नहीं मिलने वाला। मैंने पतरस को याद किया। उसके माता-पिता चाहते थे कि वह एक अधिकारी बने, लेकिन वह पारिवारिक बंधनों में जकड़ा हुआ नहीं था। उसने परमेश्वर का अनुसरण करने और उससे प्रेम करने का रास्ता चुना, और प्रभु ने उसे पूर्ण कर दिया। हालांकि मैं पतरस से तुलना के लायक नहीं थी, फिर भी जानती थी कि मुझे भी उसकी तरह परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने की कोशिश करनी चाहिए। यह सबसे अधिक सार्थक जीवन होगा। तब से मैंने खुद को पारिवारिक बंधनों में जकड़ी हुई महसूस नहीं किया, और इस बार परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करने का संकल्प कर लिया!

स्कूल दोबारा शुरू होने से एक दिन पहले मैंने बहुत ईमानदारी से माँ से कहा कि मैं वापस नहीं जाऊँगी। उसने मुझे यह कह कर डांट लगायी, "मैं जानती हूँ कि तू परमेश्वर के लिए स्कूल छोड़ देना चाहती है, लेकिन तू नहीं छोड़ सकती, इसलिए दिल से वह ख़याल निकाल दे!" मैंने कहा, "परमेश्वर ने हम सबको बनाया है। हमें उसकी आराधना करनी चाहिए। यह सही और उचित है। बाइबल में भी शिक्षा दी गयी है: 'तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो। यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं है' (1 यूहन्ना 2:15)। परमेश्वर के विश्वासियों को भविष्य की संभावनाओं के पीछे भागने के लिए सांसारिक रास्ते पर नहीं चलना चाहिए। यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। मैं परमेश्वर का अनुसरण करना चाहती हूँ और अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।" फिर मेरी माँ ने कहा, "दूसरे परिवारों के पास हमसे ज़्यादा पैसा है। वे चाहें तो अपना पूरा समय प्रभु की सेवा में लगा सकते हैं। तेरे पिता छोटी उम्र में चल बसे, हमारे पास पैसा नहीं है, और हमारे रिश्तेदार हमें नीची नज़र से देखते हैं। मैंने इतने साल तक किसलिए कष्ट झेले हैं? इसलिए ताकि तू कॉलेज जा सके, कामयाब हो, और अच्छी ज़िंदगी जिये! यह बहुत मुश्किल था। तू बस आखिरी पड़ाव पर है, मगर अब दौड़ से बाहर हो जाना चाहती है। तू इस तरह मेरा दिल कैसे दुखा सकती है?" उसकी यह बात सुनकर मैं कमज़ोर पड़ने लगी। मैंने सोचा: "माँ सही कहती है। अगर मैं कॉलेज जाऊंगी, तो मुझे अच्छी नौकरी मिलेगी और हमारे पास पैसा होगा, फिर माँ को कोई भी नीची नज़र से नहीं देखेगा।" मगर फिर मैंने सोचा : "मैं एक खुशहाल सांसारिक जीवन जियूंगी, लोग मुझे इज्ज़त से देखेंगे, लेकिन जब परमेश्वर का कार्य ख़त्म हो जाएगा तो शैतान की ये दुनिया नष्ट हो जाएगी और सिर्फ मसीह का राज्य ही बचेगा। सारा मौज-मज़ा और घमंड हवा हो जाएगा।" इसलिए मैंने माँ से कहा, "यहाँ पृथ्वी पर हम सिर्फ मेहमान हैं। हम चाहे जितनी शान से जीवन जियें, जब परमेश्वर का उद्धार कार्य ख़त्म हो जाएगा, तो महाविपत्तियाँ टूट पड़ेंगी, हमारा जीवन तबाह हो जाएगा। पैसे से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। प्रभु यीशु ने कहा था, 'यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्‍त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? या मनुष्य अपने प्राण के बदले क्या देगा?' (मत्ती 16:26)।" मेरी माँ ने यह कह कर मुझे रोक दिया, "तेरे परमेश्वर में विश्वास रखने से मुझे कोई आपत्ति नहीं। बस, इसे इतनी ज़्यादा गंभीरता से मत ले। परमेश्वर में विश्वास रख, ठीक है, मगर दुनिया को मत छोड़, वरना तू खुशहाल ज़िंदगी कैसे जियेगी? बिना पैसा कमाये मैं तुम दोनों को बड़ा कैसे कर पाती?" उसकी बात सुनकर मुझे एहसास हो गया कि उसकी आस्था सिर्फ़ शब्दों तक सीमित है। वह सीधी बात नहीं बोलना चाहती थी, वह परमेश्वर का आशीष और दुनियादारी दोनों चाहती थी। मैंने अपनी बात जारी रखी, "लोग कितनी भी कड़ी मेहनत कर लें, परमेश्वर के आशीष के बिना पैसा नहीं कमा सकते। जीवन में हमारे पास कितना पैसा होगा इसका फैसला परमेश्वर करता है, और सत्य के बिना, वैसे भी यह सब निरर्थक है।" मगर वह सुनना ही नहीं चाहती थी, उसने मेरी इच्छाओं का विरोध करने की ठान ली थी। फिर उसने मेरे चचेरे भाई और चाची को बुला लिया, उनसे मुझे समझाने को कहा। मेरी माँ को टस-से-मस न होती देख मुझे बहुत बेचैनी हो गयी। मैंने सोचा : "माँ क्यों नहीं समझती है?" मुझे कोई अनुमान नहीं था कि आगे क्या होगा, इसलिए मैंने परमेश्वर से मौन प्रार्थना की, किसी भी हाल में अडिग रह सकने की विनती की।

जितने भी रिश्तेदार मिले उन सबको माँ ने घर पर बुला लिया। जैसे ही मेरे चाचा पहुँचे, उन्होंने गुस्से से कहा, "परमेश्वर को लेकर यह सब क्या चल रहा है? तू बहुत छोटी है, इतनी अंधविश्वासी होना ठीक नहीं!" मेरी चाची बोली, "तेरी माँ बस तेरा भला चाहती है।" वे सब इस बात को लेकर मुझ पर बरस पड़े। मुझे मालूम था कि वे नास्तिक हैं, और वे मेरी बात नहीं सुननेवाले, बल्कि मैं कुछ कहूंगी, तो वे बस परमेश्वर का और अधिक तिरस्कार करेंगे, इसलिए मैं कुछ नहीं बोली। एकाएक मेरे चाचा पीछे घूम कर मेरी माँ से बोले, "ये परमेश्वर में इसलिए विश्वास रखती है, क्योंकि ये महाविपत्तियों में मरने से डरती है, तो इसे महाविपत्तियों से पहले ही मर जाने दो। पुलिस को बुला लो, उन्हें इसे बिजली की छड़ियों से पीटने दो, फिर देखो क्या ये तब भी विश्वास रखती है!" मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरे अपने चाचा ऐसी बात कह सकते हैं। मैंने सोचा : "ये मेरे रिश्तेदार हैं या हैवान?" मुझे हैरानी हुई जब मेरी माँ उनका साथ देते हुए बोली, "इसे अनुशासन की ज़रूरत है, यह आज्ञा नहीं मानती!" उसे उनका साथ देते और मेरी आस्था छुड़वाने को तैयार देख कर मेरा दिल टूट गया। फिर मेरा चचेरा भाई बोला, उसने कहा, "अगर तू विश्वास रखना बंद कर दे और कॉलेज की पढ़ाई पर ध्यान दे, तो हम सब तेरी मदद करेंगे। हम तेरी माँ की देखभाल करेंगे और तेरी बहन को अच्छी नौकरी लगने में मदद करेंगे। लेकिन अगर तू अपनी आस्था पर कायम रही, तो हम तेरे परिवार से सारे नाते तोड़ देंगे, आज के बाद, कुछ भी हो जाए, हम तुम सबकी कोई मदद नहीं करेंगे। अब से हमारा कोई रिश्ता नहीं रहेगा। अच्छी तरह सोच ले!" वह मुझे मसीह का अनुसरण करने से दूर जाने का प्रलोभन देना चाहता था। हाई स्कूल में जब तक मेरी पढ़ाई चली, उनमें से एक ने भी हमारी मदद नहीं की! अब मैं परमेश्वर का अनुसरण करना और सही मार्ग पर चलना चाहती थी, वे सब "अच्छी" बातों का प्रलोभन देकर, मुझे रोकने आये थे। यह शैतान की चाल थी, और मैं उसके फेर में नहीं पड़नेवाली थी। मगर फिर मैंने सोचा : "अगर मैं वाकई कॉलेज वापस नहीं गयी, तो मेरी माँ का दिल दुखेगा। उसने काफ़ी तकलीफें झेली हैं। अगर मैंने उसे और अधिक पीड़ा दी, तो मैं कैसे जियूंगी?" फिर मैंने परमेश्वर से मौन प्रार्थना की। मैंने कहा, "हे परमेश्वर, मैं तुम्हें छोड़ना नहीं चाहती। मैं जानती हूँ कि तुम्हारा अनुसरण करना और सत्य की खोज करना ही सही मार्ग है, लेकिन जब मैं माँ के बारे में सोचती हूँ, तो दुविधा में पड़ जाती हूँ। क्या करूं, नहीं जानती। मेरी मदद करो।" फिर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के उन वचनों को याद किया जिनमें कहा गया है : "किसी व्‍यक्ति को जितना भी दुख भोगना है और अपने मार्ग पर जितनी दूर तक चलना है, वह सब परमेश्‍वर ने पहले से ही तय किया होता है, और इसमें सचमुच कोई किसी की मदद नहीं कर सकता" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मार्ग... (6)')। एकाएक मैं समझ गयी। मैंने सोचा, "हाँ। परमेश्वर ही यह फैसला करता है कि किसी इंसान को कितना दुख सहना है। यह हमारे हाथ में नहीं है, सिर्फ बहुत सारा पैसा कमा कर और उसे माँ के हाथ में दे कर मैं माँ की तकलीफ़ रोक नहीं सकती। हमारी पीड़ा की जड़ शैतान की भ्रष्टता, और हमारे भीतर का पूरा शैतानी ज़हर और वहशी आकांक्षाएं हैं। अगर लोग अभी परमेश्वर की आराधना न करें और शुद्ध होने के लिए उसके न्याय को स्वीकार न करें, तो वे कभी भी पीड़ा से मुक्त नहीं होंगे। लेकिन अगर लोग परमेश्वर में विश्वास रखें और सत्य का अनुसरण करें, तो उनका जीवन मुश्किल होने के बावजूद, परमेश्वर और उसके आशीषों से सबसे खुशहाल हो जाएगा।" पहले मेरा ख़याल था कि मेहनत से पढ़ने, ढेरों पैसा कमाने और दूसरों से आदर पाने से मेरी माँ की पीड़ा कम हो जाएगी। मगर यह बेतुका था। मैं शैतान की चाल में फंसते-फंसते बच गयी। इन विचारों के साथ, मेरा संकल्प दृढ़ हो गया। उन्होंने परमेश्वर का चाहे जैसे भी तिरस्कार किया और उसे बदनाम किया, परमेश्वर के सामने मेरा दिल शांत रहा, हर समय मैं उसे पुकारती रही। मेरी चुप्पी देखकर मेरी माँ बहुत नाराज़ हो गयी। उसने मुझे धक्का देकर मेरे बिस्तर पर गिरा दिया। मेरे साथ उसके इस बर्ताव से मैं हैरान रह गयी। मैं बहुत बेचैन होकर रोने लगी। मगर पूरे समय मैं चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना करती रही, उससे अपने दिल को मज़बूत रखने की विनती करती रही ताकि मैं उसकी गवाही दे सकूं, और न झुकूं। मैंने प्रभु द्वारा कभी कहे गये वचन को याद किया : "और जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे न चले वह मेरे योग्य नहीं" (मत्ती 10:38)। और सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है, "युवा लोगों में उस सत्य के मार्ग पर बने रहने की दृढ़ता होनी चाहिए, जिसे उन्होंने अब चुना है—ताकि वे मेरे लिए अपना पूरा जीवन खपाने की अपनी इच्छा साकार कर सकें। उन्हें सत्य से रहित नहीं होना चाहिए, न ही उन्हें ढोंग और अधर्म को छिपाना चाहिए—उन्हें उचित रुख पर दृढ़ रहना चाहिए। उन्हें सिर्फ यूँ ही धारा के साथ बह नहीं जाना चाहिए, बल्कि उनमें न्याय और सत्य के लिए बलिदान और संघर्ष करने की हिम्मत होनी चाहिए। युवा लोगों में अँधेरे की शक्तियों के दमन के सामने समर्पण न करने और अपने अस्तित्व के महत्व को रूपांतरित करने का साहस होना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अपने चुने हुए मार्ग पर टिके रहने के लिए आस्था और शक्ति दी, आत्मविश्वास दिया।

मेरी माँ मार्केट में काम पर नहीं गयी, बल्कि मेरी बहन और मुझ पर बाज़ जैसी नज़र रखने के लिए घर पर ही रही। परमेश्वर के वचनों की मेरी किताब और भजनों की कैसेट्स खोजने के लिए मेरी चीज़ें टटोलीं और गुस्से से बोली, "अब से तुम दोनों में से किसी को भी सभाओं में जाने की इजाज़त नहीं है। तुम दोनों जहां भी जाओगी, मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगी। मैं तेरी सभाओं की जगह का पता लगाऊँगी।" मुझे लगा कि मैं घर में नज़रबंद हूँ। अपने ही घर में मैंने अपनी आज़ादी खो दी थी। मैं परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ सकती थी और कलीसिया का जीवन जीना तो दूर, अपनी आस्था के बारे में अपनी बहन से बात करने की हिम्मत तक नहीं कर पाती थी। बहुत परेशान करनेवाली बात थी। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती रही, उससे रास्ता दिखाने की विनती करती रही। कुछ दिन बाद, जब मेरी माँ बाथरूम में थी, मैं अपनी बहन की आड़ में परमेश्वर के वचनों की अपनी किताब और भजनों के कैसेट्स उठाकर हमारी कलीसिया की अगुआ बहन टैंग के घर दौड़ पड़ी। मैंने उन्हें आपबीती बतायी और उस बारे में अपनी सोच का खुलासा किया। मैंने कहा, "सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से मैं जान गयी हूँ कि परमेश्वर का अनुसरण करना उद्धार पाने का प्रकाश मार्ग है। मैं परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ, मगर मेरी माँ मुझे रोक रही है। मेरी बहन और मैं सभाओं में नहीं जा सकतीं। हमारे साथ यह सब क्यों हो रहा है?" फिर बहन टैंग ने धैर्य के साथ यह कह कर संगति की, "परिवार का दबाव वास्तव में आध्यात्मिक जगत का एक युद्ध है। हम परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहते हैं, लेकिन शैतान हमें रोकने के लिए हमारे परिवारों का इस्तेमाल करता है, हमला करने के लिए हमारी कमजोरियों का इस्तेमाल करता है, ताकि हम बचाये न जा सकें। उसकी चालों को समझाने के लिए हमें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए।" फिर उन्होंने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर सुनाया : "परमेश्वर द्वारा मनुष्य के भीतर किए जाने वाले कार्य के प्रत्येक चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य अंतःक्रिया प्रतीत होता है, मानो यह मानव-व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय हस्तक्षेप से उत्पन्न हुआ हो। किंतु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाली हर चीज़, शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी है, और लोगों से अपेक्षित है कि वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब को आजमाया गया था : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ दाँव लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कर्म थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों में किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ बाज़ी होती है—इस सब के पीछे एक संघर्ष होता है। ... जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में संघर्ष करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए, और किस प्रकार उसकी गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है, वह एक महान परीक्षण है और ऐसा समय है, जब परमेश्वर चाहता है कि तुम उसके लिए गवाही दो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है')। इन वचनों से मैं समझ पायी कि अगर इस बुरी और अंधेरी दुनिया में मुझे मसीह का अनुसरण करना है, तो यह आसान नहीं होगा। इसमें आध्यात्मिक युद्धों और कठिन विकल्पों की भरमार होगी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर अभी न्याय का कार्य कर रहा है, जोकि इंसान को शुद्ध करने और बचाने का अंतिम और सबसे अहम चरण है। परमेश्वर को आशा है कि सभी लोग उसके सत्य और जीवन को पा लेंगे, बचाये जाएंगे और जीवित रहेंगे। लेकिन वह लोगों से ज़बरदस्ती नहीं करता, बल्कि हमें खुद विकल्प चुनने देता है। मेरी माँ चाहती थी कि मैं कॉलेज जाऊं, पढूं और कामयाब इंसान बनूँ। लेकिन उसने सत्य को नहीं समझा। उसने शैतान के ज़हर से धोखा खाया था और ऐसे प्रयासों के खोखलेपन को नहीं समझ पायी थी। मैं उसकी बात मानकर गलत रास्ता नहीं चुन सकी। बहन टैंग ने अपनी बात जारी रखी, "तुम समझ सकती हो कि ज्ञान पाने की कोशिश करना कितना बेमानी है, तुमने परमेश्वर के लिए खुद को खपाने का संकल्प लिया है और सत्य की खोज का मार्ग चुना है। यह परमेश्वर को स्वीकार्य है। लेकिन जीवन में अपने लिए तुम कौन सा मार्ग चुनती हो, यह तुम पर है, तुम्हें और अधिक प्रार्थना और प्रयास करना चाहिए।" मैंने सोचा : "हाँ। मैंने मसीह का अनुसरण करने का संकल्प ज़रूर लिया है, मगर मेरी माँ मुझ पर एक बाज़ की तरह नज़र रखती है, कहती है कि वह हमारी सभाओं की जगह का पता लगाना चाहती है। अगर मैं कॉलेज वापस नहीं गयी, तो वह भाई-बहनों के लिए यकीनन मुसीबत खड़ी करेगी।" इसलिए मैंने उससे कहा कि मुझे कॉलेज जाना होगा।

वहां जाने के बाद, मैंने अपनी पढ़ाई निलंबित करने की अर्ज़ी दे दी, इसे मंज़ूर कर लिया गया। नहीं, उसने मंज़ूर नहीं किया। वह बस रोती रही, उसने कहा कि उसने कितना दुख सहा है, मुझे और मेरी बहन को बड़ा करना कितना मुश्किल था। उसे इस हाल में देख कर, मैं वाकई परेशान हो गयी, मैंने सोचा, "मेरी माँ ने हमें बड़ा करने के लिए वाकई संघर्ष किये हैं, मैंने उसका ऋण नहीं चुकाया है। अगर मैं उसकी मर्जी का काम न करूँ, तो क्या मैं एहसानफरामोश नहीं बन जाऊंगी?" मैंने जल्दी से परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए विनती की, "हे परमेश्वर, मैं क्या करूँ? मेरी मदद करो।" तभी मेरे मन में परमेश्वर के वचनों का एक अंश कौंधा : "जब वसंत की गर्माहट आएगी और फूल खिलेंगे, जब स्वर्ग के नीचे सब कुछ हरियाली से ढक जाएगा और पृथ्वी पर हर चीज़ यथास्थान होगी, तो सभी लोग और चीजें धीरे-धीरे परमेश्वर की ताड़ना में प्रवेश करेंगी, और उस समय पृथ्वी पर परमेश्वर के समस्त कार्य का अंत हो जाएगा। फिर परमेश्वर पृथ्वी पर कार्य नहीं करेगा या नहीं रहेगा, क्योंकि परमेश्वर का महान कार्य पूरा हो गया होगा। क्या लोग इतने से समय के लिए अपनी देह की इच्छाओं को अलग रखने के काबिल नहीं हैं? कौन सी बातें मनुष्य और परमेश्वर के प्रेम में दरार पैदा कर सकती हैं? कौन है जो मनुष्य और परमेश्वर के बीच के प्रेम को अलग कर सकता है? क्या माता-पिता, पति, बहनें, पत्नियाँ या पीड़ादायक शोधन ऐसा कर सकते हैं? क्या अंतःकरण की भावनाएँ मनुष्य के अंदर से परमेश्वर की छवि को मिटा सकती हैं? क्या एक-दूसरे के प्रति लोगों की कृतज्ञता और क्रियाकलाप उनका स्वयं का किया है? क्या इंसान उनका समाधान कर सकता है? कौन अपनी रक्षा कर सकता है? क्या लोग अपना भरण-पोषण कर सकते हैं? जीवन में बलवान लोग कौन हैं? कौन मुझे छोड़कर अपने दम पर जी सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 24 और अध्याय 25')। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ पायी कि परमेश्वर हममें से प्रत्येक के जीवन को पहले से निर्धारित कर उस पर शासन करता है। ऐसा लगा जैसे मेरी माँ ने मुझे बड़ा तो किया, मगर वास्तव में हमारा जीवन हमें परमेश्वर से मिलता है। परमेश्वर ही हमारे लिए प्रावधान कर हमें बड़ा करता है। बच्चों को बड़ा करना एक ज़िम्मेदारी है जो माता-पिता को निभाना पड़ता है, कोई किसी का ऋणी नहीं होता। मेरी ज़रूरत की हर चीज़ परमेश्वर ने मुझे दी, हर प्रकार के लोगों और चीज़ों की व्यवस्था की ताकि वे मुझे उसका उद्धार स्वीकार करने के लिए उसके सामने पहुँचा सकें। परमेश्वर का प्रेम बहुत महान है! मैंने परमेश्वर से बहुत अधिक पाकर आनंद उठाया है, लेकिन मैंने उसे कुछ भी नहीं चुकाया है। जो कुछ घटा, उसके कारण मेरा परमेश्वर को दिया हुआ वचन धोखा हो गया है। मैं सृजनकर्ता, परमेश्वर की ही ऋणी हूँ। यह सोच कर कि पृथ्वी पर परमेश्वर का मौजूदा कार्य छोटा ही होगा, जैसे कि प्रभु यीशु का कार्य था, मुझे परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभा कर उसके प्रेम का ऋण चुकाने के इस दुर्लभ मौके को संजोना होगा। जैसे ही मैंने मसीह का अनुसरण करने का फैसला लिया, एकाएक हालात बदल गये। मेरी माँ को पता चला कि अगर मैं कक्षाओं में ज़्यादा गैरहाजिर रही, तो मुझे निष्कासित कर दिया जाएगा, और उसे डर था कि मैं अब कॉलेज नहीं जा पाऊँगी, इसलिए वह मेरे घर लौटने की बात मान गयी। घर पहुँचने के बाद, उसने मुझे यह कह कर चेतावनी दी, "तुझे अब परमेश्वर में विश्वास नहीं रखना है। तुझे यहाँ नौकरी तलाशनी होगी, एक साल काम करना होगा, फिर कॉलेज वापस जाना होगा।" मैंने उसे ऐसा करने का वचन दिया, मगर मन- ही-मन सोचा, "परमेश्वर ने मेरे लिए मसीह का अनुसरण करना पहले ही निर्धारित कर रखा है, यही मेरा विकल्प है। मैं इसे आसानी से नहीं छोड़ूँगी।"

मुझे नौकरी मिल गयी, मैं अपने काम पर जाती और कलीसिया की सभाओं में भी हिस्सा लेती, अपने खाली समय में मैं दूसरों के सामने सुसमाचार का प्रचार करती। परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करके, धीरे-धीरे मैं कुछ सत्य समझने लगी, यह समझ गयी कि सिर्फ़ सत्य का अनुसरण करना ही सार्थक जीवन है। परमेश्वर का अनुसरण करने का मेरा आत्मविश्वास और बढ़ गया। मुझे पता भी नहीं चला, और स्कूल वापस जाने का दिन आ गया, अब मुझे यह अंतिम फैसला करना था : मैंने परमेश्वर को चुना। मैंने परमेश्वर से मौन प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मुझे इस परीक्षण में, गवाह बनने की आस्था दो।" उस दिन अपनी सभा के बाद घर पहुँचने पर मैंने देखा कि मेरी माँ अपनी चीज़ें पैक कर रही है। मुझे पता चला कि एक पड़ोसी ने मेरी माँ का परिचय एक आदमी से करवाया है और वह उससे शादी करनेवाली है। मुझे यह सोच कर हैरानी हुई, मेरा दिल दुखा : "माँ जा रही है? हमारी देखभाल कौन करेगा?" मैंने उससे पूछा कि क्या अब उसे हमारी ज़रूरत नहीं है। उसने कहा, "ऐसी बात नहीं है कि मुझे तेरी ज़रूरत नहीं है। तूने परमेश्वर में विश्वास रखने की ठान ली है, और अब मैं तुझ पर भरोसा नहीं कर सकती। मैं तुझे एक आख़िरी मौक़ा देती हूँ। यह मेरे मंगेतर का फोन नंबर है। अगर तू स्कूल वापस जा रही है, तो घर आने से पहले इस नंबर पर फोन किया कर, हम तुझे लेने आ जाया करेंगे। लेकिन अगर तुम दोनों अपनी आस्था पर टिकी रहना चाहती हो, तो मैं तुम लोगों की मदद करने के लिए तैयार नहीं मिलूंगी।" उसकी इस बात ने मुझे बेचैन कर दिया। मैंने आस्था के मार्ग का अनुसरण करने की ठान ली थी, मगर फिर माँ हमें स्वीकार नहीं करेगी। मैं अभी भी छोटी हूँ और मेरी एक छोटी बहन है। हम कहाँ रहेंगी? मैं इस बारे में कुछ सोच सकूं, इससे पहले ही माँ हमें स्कूल जाने वाली बस तक ले गयी। रास्ते में, मैंने घटनाक्रम के बारे में सोचा। बस एक ही दिन में, मैं और मेरी बहन बेघर बंजारे हो गये थे। यह बर्दाश्त के बाहर था। मेरी बहन ने बेसहारा महसूस करते हुए कहा, "माँ को अब हमारी ज़रूरत नहीं है। अगर तू स्कूल वापस नहीं गयी, तो फिर हम क्या करेंगी?" मेरी बहन की बातों ने मेरे दिल को चीर कर रख दिया। मैंने सोचा, "हाँ, पहले हमें सहारा देने के लिए माँ हमेशा साथ होती थी। अब हमारे न कोई मित्र हैं न परिवार, और माँ किसी दूसरे से शादी कर रही है। अगर मैं परमेश्वर में आस्था रखूँगी, तो हम जियेंगे कैसे? हम जाएँ तो कहाँ जाएं? आखिर मैं करूं तो क्या करूं?" उस पल मुझे वाकई बहुत पीड़ा हुई, मैंने कमज़ोर महसूस किया, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की। मैंने विनती की, "हे परमेश्वर, मैं अब बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी। मैं तुम्हें संतुष्ट करना चाहती हूँ, मगर आगे बढ़ने के लिए मुझमें आस्था और शक्ति नहीं रही। मैं जानती हूँ कि तुमने मेरे लिए बहुत-कुछ किया है, मगर मैं बहुत कमज़ोर हूँ। मैं बचाये जाने लायक नहीं हूँ।"

उसी पल, मेरे मन में परमेश्वर के वचनों का एक अंश कौंध गया : परमेश्वर कहते हैं, "जब इस कार्य को फैलाने का दिन आएगा, और तुम उसकी संपूर्णता को देखोगे, तब तुम्हें अफसोस होगा, और उस समय तुम भौंचक्के रह जाओ। आशीषें हैं, फिर भी तुम्हें उनका आनंद लेना नहीं आता, सत्य है, फिर भी तुम्हें उसका अनुसरण करना नहीं आता। क्या तुम अपने-आप पर अवमानना का दोष नहीं लाते? ... उनसे ज्यादा मूर्ख और कोई नहीं है जिन्होंने उद्धार को देखा तो है लेकिन उसे प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते; वे ऐसे लोग हैं जो पूरी तरह से देह-सुख में लिप्त होकर शैतान का आनंद लेते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान')। मैंने सोचा, "हाँ। परमेश्वर का कार्य जल्दी ही समाप्त हो जाएगा, मैंने सच्चे मार्ग को समझ लिया है। अगर मैं शारीरिक पीड़ा बर्दाश्त न कर पाने के कारण अपने देह-सुख को चुनूँगी, तो परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाने पर मैं सत्य को प्राप्त करने का यह दुर्लभ अवसर खो दूंगी, और मेरे पास पछतावे के सिवाय कुछ भी नहीं बचेगा।" मैंने कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने में बिताये पिछले साल को याद किया। हालांकि भाई-बहन अलग-अलग जगहों से आये थे, मगर वे सभी एक-दूसरे से प्यार और ईमानदारी से पेश आते थे। वे प्यार से एक-दूसरे के भ्रष्ट स्वभाव की ओर संकेत करते थे, एक-दूसरे को बिल्कुल एक परिवार की तरह सहारा देने के लिए सत्य के बारे में संगति करते थे। परमेश्वर के वचनों द्वारा सिंचित और पोषित होकर, मैंने सत्य को कुछ हद तक समझा और धीरे-धीरे दुनिया की बहुत सारी बातों को समझ लिया। मैंने जाना कि सिर्फ़ सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन ही लोगों को शुद्ध करके बचा सकते हैं, और मसीह का अनुसरण करना ही उद्धार का प्रकाश मार्ग है। मुझे फैसला करना था। मेरा जीवन परमेश्वर से आया है, परमेश्वर ने ही मुझे तमाम चीज़ें दी हैं। एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना बिलकुल उचित है! माँ ने मेरी आस्था का समर्थन नहीं किया बल्कि वह चाहती थी कि मैं ज्ञान का अनुसरण करके कामयाबी हासिल करूं। अगर मैं उसका चाहा हुआ करती हूँ और गलत मार्ग को अपनाती हूँ, तो मुझे शैतान ज़्यादा-से-ज़्यादा भ्रष्ट कर देगा, मैं दंडित और नष्ट कर दी जाऊंगी। ज्ञान मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त नहीं कर पायेगा, या शुद्ध नहीं कर पायेगा। सिर्फ परमेश्वर ही हमें बचा सकता है। अगर मेरे परिवार को मेरी ज़रूरत नहीं तो मेरे पास परमेश्वर है न। पूरे घटनाक्रम के बारे में सोच कर मैं कई बार कमज़ोर पड़ गयी, लेकिन परमेश्वर के वचनों ने मुझे सहारा दिया, मदद की और मुझे शक्ति दी। अपने सबसे कमज़ोर पल में, जब मैं परमेश्वर को छोड़ देना चाहती थी, परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को झकझोरा। उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा। मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम दुनिया की सबसे वास्तविक चीज़ है! इस बारे में सोच कर, मुझे एहसास हो गया कि मैं परमेश्वर की बहुत अधिक ऋणी हूँ, मेंरा आत्मविश्वास लौट आया। मैंने अपने आंसू पोंछ लिये और अपनी बहन से कहा, "सिर्फ़ परमेश्वर पर ही हम भरोसा कर सकते हैं, वही हमें रास्ता दिखायेगा। चलो, कलीसिया वापस चलें।" अगले दिन, हमने घर लौटने की बस पकड़ ली, और कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने लगीं। परमेश्वर के वचनों ने शारीरिक कमज़ोरी से उबरने और सबसे उजले मार्ग को चुनने में मेरी अगुआई की। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन के बारे में सोचा, "एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो सामान्य है और जो परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण करता है, परमेश्वर के जन बनने के लिए राज्य में प्रवेश करना ही तुम सबका असली भविष्य है और यह ऐसा जीवन है, जो अत्यंत मूल्यवान और महत्वपूर्ण है; कोई भी तुम लोगों से अधिक धन्य नहीं है। क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वो देह के लिए जीते हैं और वो शैतान के लिए जीते हैं, लेकिन आज तुम लोग परमेश्वर के लिए जीते हो और परमेश्वर की इच्छा पर चलने के लिए जीवित हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हारे जीवन अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। केवल इसी समूह के लोग, जिन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया है, अत्यंत महत्वपूर्ण जीवन जीने में सक्षम हैं: पृथ्वी पर और कोई इतना मूल्यवान और सार्थकजीवन नहीं जी सकता" (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ)।

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