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सर्वशक्तिमान परमेश्वर मुझे शुद्धिकरण पाने के मार्ग पर ले गए

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गैंगकिआंग यूएसए

अपनी जिंदगी में बहुत दबाव की वजह से, 2007 में, मैं आजीविका कमाने हेतु काम करने के लिए सिंगापुर आ गया था। पूरे साल, सिंगापुर में जलवायु बहुत गर्म रहती है, इसलिए हर रोज जब मैं काम कर रहा होता था तो मुझे बहुत पसीना आया करता था। यह इतना कठिन था जिसे मैंने अकथनीय बार सहा, और इन सबसे भी ऊपर यह किसी रिश्तेदार या मित्र के बिना एक अपरिचित जीवन था, इसलिए मैंने इसे उबाऊ और थकाऊ माना। अगस्त में एक दिन, अपने काम से घर जाते हुए मुझे एक सुसमाचार पत्रक मिला जिसमें लिखा था: "अब परमेश्‍वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिसने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्त महिमा के लिये बुलाया, तुम्हारे थोड़ी देर तक दु:ख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा" (1पतरस 5:10)। इन वचनों को पढ़कर मुझे अपने दिल में गर्मजोशी महसूस हुई। तब एक भाई मुझे कलीसिया लेकर गए, और भाइयों व बहनों ने मित्रवत तरीके से मेरा स्वागत किया और मुझे स्वादिष्ट भोजन दिया। घर छोड़ने के एक वर्ष बाद से बेहतर हिस्सा मैंने अब जिया था, और परिवार की गर्मजोशी और घर का बना स्वादिष्ट खाना कुछ ऐसा था जो मुझे इतने लंबे समय से नहीं मिला था। चूंकि मैं अकेला था और उद्देश्यहीन घूम रहा था, इसलिए मेरी आँखों से तुरंत आंसू निकल आए, और उस पल मुझे लगा कि मैं घर वापस आ गया हूं। तब से, वह कलीसिया एक ऐसी जगह बन गई जहां मैं हर रविवार जाया करता हूं।

मैंने दिसंबर में बपतिस्मा लिया, और परमेश्वर में विश्वास करने एवं अपने पापों को कबूल करने व पश्चाताप करने के मार्ग में औपचारिक रूप से प्रवेश किया। एक बार कलीसिया में, मैंने एक उपदेशक को मत्ती के अध्याय 18 की 21-22 आयत को पढ़ते हुए सुना: "तब पतरस ने पास आकर उस से कहा, "हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" यीशु ने उससे कहा, "मैं तुझ से यह नहीं कहता कि सात बार तक वरन् सात बार के सत्तर गुने तक।" जब मैंने यह सुना, तो मैंने खुद में सोचा: "प्रभु यीशु की क्षमाशीलता और धैर्य इतना महान कैसे हो सकता है? लोगों के लिए उनकी क्षमाशीलता सात के सत्तर गुणा तक है। यदि लोग वास्तव में इसे प्राप्त करने में सक्षम हो गए होते, तो लोगों के बीच प्यार और उत्साह होता!" यह बात मेरे दिल को छू गई, और मैंने यह निर्धारित किया कि मैं प्रभु की शिक्षाओं के अनुसार कार्य करूंगा।

इन तीन सालों में, जब से मैंने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया, मैं बैठकों में जाने और उपदेशों को सुनने लेकर बहुत उत्साहित था। कुछ समय बाद, मेरे मालिक ने मुझे एक निर्माण स्थल के प्रबंधन का प्रभारी बना दिया, इसलिए मैंने अपने सारी ऊर्जा अपने काम में लगा दी और धीरे-धीरे बैठकों में शामिल होना बंद कर दिया। इसके बाद, एक मित्र के परिचय कराने पर, मैं एक मालिक श्री ली से मिला, और एक निर्माण कंपनी की स्थापना करके उनके साथ काम करने लगा। मैं बहुत खुश था, और एक बड़ी कोशिश करने का निश्चय ले लिया था। उस समय, मैं पूरी तरह से धन के भंवर में खिंच गया था, और कलीसिया में जाना बंद कर दिया था। लोगों से अपनी क्षमताओं की प्रशंसा करवाने हेतु इस परियोजना को सफल बनाने के लिए, मुझे अपने श्रमिकों से कोई प्यार या धैर्य नहीं था और मैं अक्सर उन्हें धमकाता था, और यहां तक ​​कि अक्सर उनके टीम लीडर को अपनी गालियों से रुला तक देता था। सभी श्रमिक मुझे घबराहट से देखते थे, और मुझसे बचने की कोशिश में भाग जाया करते थे। यहां तक ​​कि वे लोग जो कभी मेरे अच्छे दोस्त हुआ करते थे, वे भी मेरे ओर भावनारहित हो गए थे और अपने दिल की बातें तक मेरे साथ साझा नहीं करना चाहते थे। मेरे दिल के लिए इस बर्ताव को सह पाना काफी मुश्किल था! प्रभु यीशु ने सिखाया था कि हमें दूसरों को सात के सत्तर गुणा बार माफ करना चाहिए। मैंने तो एक बार भी माफ नहीं किया था, तो मैं एक ईसाई की तरह हो भी कैसे सकता हूं? मैं जानता था कि मैंने जो किया वह गलत था, और मैं अपने दिल को बदलना भी चाहता था, लेकिन इतने समय से मैं मार्गदर्शन की कमी से गुजर रहा था। जब मैं अवसाद में था, तो मैं बस प्रभु से प्रार्थना कर सकता था और मेरे दिमाग में जो कुछ भी था वह उससे कह सकता था, और तब ही मैं कुछ राहत महसूस कर सकता था।

अगस्त 2015 में, हमने अपने व्यापारिक संचालनों को बंद कर दिया क्योंकि कंपनी अच्छा व्यवसाय नहीं कर रही थी, और मैं घर वापस आ गया। उस समय, मैं बहुत अवसाद महसूस कर रहा था, मैंने पूरे दिन शराब पीना व जुआ खेलना शुरू कर दिया। जब मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि मुझे शराब पीना बंद कर देना चाहिए, तो मैंने बहुत बुरी तरह से उसे गालियां दी और कहाः "यह मेरा धन है, मैंने इसे कमाया है और मैं जैसे चाहूं इसे खर्च करूंगा..." मैं उसे बहुत बुरी तरह से गालियां दी, और मेरी बेटी एक कोने में सहमी हुई खड़े होकर यह सब देखने के अलावा, कुछ भी नहीं कर पाई थी। मेरी पत्नी मेरा कुछ नहीं कर पाई और एक कोने में बैठकर रोने लगी। इसके बाद हर बार मैं इसी तरह से अपने परिवार को दुख देता था, मुझे इस पर पछतावा होता था लेकिन मैं खुद को रोक नहीं पाता था। उन दिनों, मैंने ईसाइयों की शराफत को पूरी तरह से खो दिया था, और मेरा बर्ताव व कार्य बिल्कुल नास्तिकों की तरह हो गए थे।

जब मैं असहाय था और आपदा सह रहा था, तो मैंने फिर से कलीसिया में जाना आरंभ कर दिया। उस अवधि में, मैंने नियमित रूप से प्रभु यीशु से प्रार्थना कीः "प्रभु! मैंने ऐसे कई काम किए जो मैं करना नहीं चाहता था, और मैंने लोगों को कई दिल दुखाने वाली बातें भी कहीं। हर बार जब मैं यह पाप करता था, मैं उस पर पछताता भी था। खासतौर पर, मुझे खुद से नफरत हो जाती थी, लेकिन मैं कभी भी इस पर नियंत्रण नहीं पा सका। मैं शाम को प्रार्थना की और अपने पापों को स्वीकार किया, लेकिन दिन के दौरान मैं फिर वही पाप करता, और अंततः आज मैं एक ऐसा इंसान बन गया हूं जिससे कोई किसी भी तरह का मतलब नहीं रखना चाहता। हर किसी ने मुझसे दूरी बना ली है। हे प्रभु! मैं आपसे याचना करता हूं कि मुझे बचा लें। इन पापों से बचने के लिए मुझे आखिरकार क्या करना चाहिए?"

नव-वर्ष 2016 के दिन, मैंने अमेरिका की जमीन पर कदम रखा, जहां मैं न्यूयार्क में आजीविका कमाने के लिए आया था। इसके कुछ समय बाद ही, मैंने एक आध्यात्मिक अध्ययन पाठ्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए कलीसिया गया, और वहीं पर मेरी मुलाकात बहन क्विंग लिआन से हुई। एक दिन, बहन क्विंग लिआन ने मुझे फोन यह कहने के लिए कॉल किया कि एक अच्छी खबर थी जो वह मुझे बताना चाहती थी। मैंने कहा,"क्या अच्छी खबर है?" उन्होंने कहा, "यहां एक धर्म प्रचारक आया है। क्या तुम उनकी बातें सुनने के लिए जाना चाहते हो?" मैंने कहा, "बहुत बढ़िया! कहां है वह?" फिर उन्होंने मुझे उनके घर आने का समय बताया।

हमें जो दिन बताया गया था, उस दिन मैं बहन क्विंग लिआन के घर गया, और बहन झाओ भी वहां थी। मैंने उन्हें एक भाषण का हिस्सा चलाने के लिए टेलीविजन का प्रयोग करते हुए देखाः "और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल कार्य को खो दिया है, और मनुष्य के अन्तश्चेतना, ने भी, अपने मूल कार्य को खो दिया है। … मनुष्य का स्वभाव उसके सार के ज्ञान की शुरुआत से बदल जाना चाहिए और उसकी सोच, स्वभाव, और मानसिक दृष्टिकोण के बदल जाने से—मौलिक परिवर्तन के द्वारा। केवल इसी ढंग से मनुष्य के स्वभाव में सच्चे बदलाव आ सकेंगे। मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव शैतान के द्वारा उसे जहर देने और रौंदे जाने के कारण उपजा है, उस प्रबल नुकसान से जिसे शैतान ने उसकी नैतिकता, अंतर्दृष्टि, और समझ पर पहुँचाया है। यह ठीक है क्योंकि मनुष्य की मौलिक चीजें शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दी गईं हैं, और पूरी तरह से उसके विपरीत है जैसे परमेश्वर ने उन्हें मूल रूप से बनाया था, कि मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं समझता। इस प्रकार, मनुष्य के स्वभाव में बदलाव उसकी सोच, अंतर्दृष्टि और समझ में बदलाव के साथ शुरू होना चाहिए जो परमेश्वर के बारे में उसके ज्ञान को और सत्य के बारे में उसके ज्ञान को बदलेगा।" ( "वचन देह में प्रकट होता है" से "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है" से).

मैं इन वचनों को सुनकर द्रवित हो गया। "क्या ये मेरे बारे में ही बात नहीं कर रहे हैं। मैंने हमेशा लोगों को नीचा दिखा, उन्हें सबक सिखाने की या फिर किसी काम के लिए उन्हें गालियां देने की कोशिश की, किसी भी नैतिकता या कारण के बिना, और संतों के शिष्टाचार को खो दिया था।" इन वचनों ने मेरे अंतर्मन तक मुझे छेद दिया। मैंने पहले कभी भी इस तरह के वचन नहीं पढ़े थे, न ही कभी किसी प्रचारक को इस तरह की बात करते हुए सुना था। कुल मिलाकर, मैंने जो पाप किए थे उनके लिए मैं चिंतित था, लेकिन मैं कभी भी पाप के नियंत्रण से बाहर निकल पाने में सक्षम नहीं हो पाया था। इन वचनों ने मुझे पाप को पीछे छोड़ने का मार्ग दिखाया था, और यह मेरे लिए काफी अजीब बात थीः इन वचनों को बहुत अच्छी तरह से बोला गया था, लेकिन इन्हें कौन लिख सकता है?

बहन झाओ ने मुझे बताया कि यह परमेश्वर के वचन थे, यह कि इन वचनों को वापस आए प्रभु यीशु ने व्यक्त किया था, और यह कि प्रभु यीशु देह धरकर वापस आ गए हैं! जब मैंने यह समाचार सुना, तो बड़ी मुश्किल से मैं अपने कानों पर विश्वास कर सका। परमेश्वर में विश्वास करने वालों में कौन उसकी वापसी पर विश्वास नहीं करता है? अब मैं अप्रत्याशित रूप से प्रभु की वापसी के बारे में खबर सुन रहा था, और मैं पूरी तरह से खो गया थाः क्या प्रभु वाकई वापस लौट आए थे? मैंने तुरंत ही बहनों से इस बारे में और जानकारी पानी चाही। बहन झाओ ने कहा, "प्रभु यीशु वाकई वापस लौट आए हैं, और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अवतरण हैं। उन्होंने लोगों का शुद्धिकरण करने और उन्हें बचाने के बारे में सत्य को व्यक्त किया, और परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। उनका लक्ष्य हमें शैतान के क्षेत्र से पूरी तरह बचाना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना है। अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने केवल छुटकारा दिलाने, पापों से हमें मुक्ति दिलाने, और हमारे पापों को मुक्त करने का कार्य पूरा किया था ताकि हम व्यवस्था के तहत अपराधी न बन जाए, लेकिन उन्होंने हमारी पापी प्रकृति को दूर नहीं किया था। हम सभी इस अनुभव से सीखने में सक्षम हैं कि भले ही प्रभु ने हमारे पापों को मुक्त कर दिया, फिर भी हम अपनी पापी प्रकृति की श्रृंखलाओं से पीड़ित हैं। हम अक्सर ही पाप और परमेश्वर का विरोध करते हैं, और ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे हम पाप के नियंत्रण से बाहर आ सकते हैं। पहले, हम यह नहीं जानते थे कि ऐसा क्यों होता था, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढ़कर ही हम इसके बारे में जान पाएं। शैतान द्वारा हमें भ्रष्ट किए जाने के बाद, हम शैतान की भ्रष्ट प्रवृत्ति से पूरी तरह से भर गए थे, जैसे कि हठी, अभिमानी, कुटिल, विश्वासघाती, स्वार्थी, तिरस्कारी, लालची, दुर्भावनापूर्ण, व अन्य हो गए। इन भ्रष्ट प्रवृत्तियों के नियंत्रण में, लोग एक-दूसरे से लड़ते हैं और षडयंत्र बनाते हैं और संपत्ति व प्रसिद्धि के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, और सामंजस्य में रहने में असक्षम हो जाते हैं; वे अक्सर ही पाप करते हैं और परमेश्वर का विरोध भी करते हैं। पाप से लोगों को पूरी तरह से बचाने के लिए, व्यक्ति को अब भी जरूरत है कि परमेश्वर आए और मानव की पापी प्रकृति को दूर करने का कार्य करे, और तब ही हम परमेश्वर द्वारा शुद्ध होने, बचाए जाने और प्राप्त किए जाने में सक्षम होंगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के कुछ अंशों को पढ़ने के बाद, हम इसे समझ जाएंगे।" बहन झाओ ने परमेश्वर के वचन की किताब खोली और पढ़ना शुरू कियाः "यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जाता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य देह में रहता है और उसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, तो वह, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। वैसे तो, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। ..."( "वचन देह में प्रकट होता है" स "देहधारण का रहस्य (4)" से ).

"यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया है, उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे के कार्य को पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना, मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। शैतान के प्रभाव से मनुष्य को पूरी तरह बचाने के लिये यीशु को न केवल पाप-बलि के रूप में मनुष्यों के पापों को लेना आवश्यक था, बल्कि मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से पूरी तरह मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़े कार्य करने की आवश्यकता थी जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था।"( "वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रस्तावना" से).

"परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से मनुष्य के पापों को क्षमा किया गया था, परन्तु मनुष्य पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीवन बिताता रहा। वैसे तो, मनुष्य को भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से अवश्य पूरी तरह से बचाया जाना चाहिए ताकि मनुष्य का पापी स्वभाव पूरी तरह से दूर किया जाए और फिर कभी विकसित न हो, इस प्रकार मनुष्य के स्वभाव को बदले जाने की अनुमति दी जाए। इसके लिए मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवन में उन्नति के पथ को, जीवन के मार्ग को, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझे। साथ ही इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है ताकि मनुष्य के स्वभाव को धीरे-धीरे बदला जा सके और वह प्रकाश की चमक में जीवन जी सके, और यह कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सभी चीज़ों को कर सके, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके, और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, उसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा।"("वचन देह में प्रकट होता है" स "देहधारण का रहस्य (4)" से). बहन झाओ ने इस प्रकार से सहभागिता की: परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ने के बाद, हमें यह बात साफ हो गई है, है ना? भले ही हमने कई सालों तक प्रभु में विश्वास किया है, लेकिन हम अपने पाप के बंधन को तोड़कर मुक्त हो पाते सक्षम नहीं हुए हैं। इसका कारण यह है कि अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने केवल छुटकारा दिलाने का कार्य किया था, लेकिन पाप को दूर करने का कार्य नहीं किया था। तो हम चाहे अपने पापों को कितना ही स्वीकार करें और पश्चाताप करें, और अपने स्वार्थ को पराजित करें, या व्रत रखें और प्रार्थना करें, पर हम पाप न करने की स्थिति को नहीं पा पाएंगे। इसका अर्थ है कि अगर हम अपनी पापी प्रकृति के बंधन से मुक्त होना चाहते हैं, तो प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य का अनुभव करना बस पर्याप्त नहीं है। हमें वापस आए प्रभु यीशु द्वारा किए गए न्याय के कार्य को स्वीकार करने की जरूरत है क्योंकि अंत के दिनों में केवल परमेश्वर के न्याय का कार्य ही उन पापों के अस्तित्व को प्रकट कर सकता है जो लोग करते हैं और लोगों को उनकी पापी प्रकृति से मुक्त होने और शुद्धिकरण प्राप्त करने का मार्ग दिखाता है। परमेश्वर आज जो कह रहे हैं जब हम उसके अनुसार कार्य करने लगते हैं, तो हमारे अंदर की भ्रष्ट प्रवृत्ति धीरे—धीरे स्वच्छ हो जाएगी, और हम पाप के बंधन से मुक्त हो जाएंगे, और केवल तब ही हम सच्ची मुक्ति व स्वतंत्रता पा सकते हैं। तो, अनुग्रह के युग में 'पाप के लिए प्रायश्चित करना' और अंत के दिनों में परमेश्वर का 'पाप का दूर करना' दो अलग प्रकार के कार्य हैं। 'पाप के लिए प्रायश्चित करना' बस प्रभु यीशु द्वारा मानवों के पापों के लिए खड़े होना था, और लोगों को उस दंड से बचाना था जो उन्हें उनके द्वारा किए गए पापों के लिए मिलना चाहिए था। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लोग पापरहित है, न ही यह कि लोग अब पाप नहीं करेंगे और पूरी तरह से शुद्ध रहेंगे। बल्कि 'पाप दूर करना' का अर्थ है लोगों के पाप करने के स्रोत को दूर करना, ताकि वे और पाप न करें और अपनी जिंदगी की प्रवृत्ति में परिवर्तन लाएं, और पूरी तरह से शुद्ध हो जाएं। तो केवल अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करके ही, हम उद्धार पाते हैं, परमेश्वर के साम्राज्य में ले जाए जाते हैं, और परमेश्वर का वादा व आशीर्वाद पाते हैं।

परमेश्वर के वचन और बहन ने जो संगति की उसे सुनकर, मुझे महसूस हुआ कि यह सत्य से बहुत निकटता से मेल खाता और बहुत ही यथार्थ था। उन सभी वर्षों पर वापस विचार करते हुए जब मैं हठी था और किसी भी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा करता था, तो मेरे कार्यस्थल में लोग मुझसे डरा करते थे और मुझसे दूरी बनाए रखा करते थे, घर में मेरी पत्नी व बेटी भी मुझसे डरने लगी थी, कोई भी मुझसे दोस्ती नहीं करना चाहता था। यहां तक कि मैं ऐसा एक भी व्यक्ति खोजने में सक्षम नहीं था जो मुझसे अपने मन की बात कर सके, और मुझे बहुत दर्द महसूस हुआ और एक व्यक्ति के तौर पर मैं असफल हो गया था। मुझे भी खुद से नफरत होती थी लेकिन बदलने का कोई रास्ता नहीं था। हमें वाकई प्रभु यीशु के वापस आने और उसके उद्धार व शुद्धिकरण का कार्य करने की जरूरत थी। सत्य को व्यक्त करने और लोगों का शुद्धिकरण करने व बदलने के लिए प्रभु यीशु के वापस आने के बारे में आज सुनकर, मैं बहुत भाग्यशाली महसूस करने लगा था! उस दिन, जब मैं घर के लिए निकल रहा था, तो बहन ने मुझे "परमेश्वर की भेड़ों ने परमेश्वर की आवाज सुनी" पुस्तक की एक प्रति दी और कहा कि शुरुआत में वह भी मेरी ही तरह पाप में जिया करती थी और खुद को इससे निकाल पाने में सक्षम नहीं हो पा रही थी। बाद में, इस पुस्तक में वचनों को पढ़ने के बाद, उसे आखिरकार अभ्यास करने के लिए मार्ग मिला। मैं खुशी—खुशी वह पुस्तक ले ली और सर्वशक्तिमान परमेश्वर में अच्छी तरह से विश्वास रखने का निश्चय किया!

अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद से, मैंने परमेश्वर के कई वचन पढ़े, और धीरे—धीरे परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों, देहधारण के रहस्य, परमेश्वर के नामों के अर्थ, बाइबल के पीछे की कहानी, और अन्य पहलुओं के बारे में कुछ बातें समझ गया, और परमेश्वर में मेरी श्रद्धा भी बढ़ गई थी। जब मैं बस शुरू किया था, तो लोगों की शैतानी प्रकृति पर परमेश्वर के न्याय के बारे में दिए गए वचनों को पढ़ने पर मेरी दिल टूट गया और मुझे बहुत दर्द महसूस हुआ। मेरे अंदर मुझमें कुछ अवधारणा थी, और सोचा कि परमेश्वर ने बहुत ज्यादा कठोरता से बोला था। बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा: "अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को प्रकट करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्य शामिल हैं, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर केन्द्रित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह प्रगट करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का अवतार और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। जब परमेश्वर न्याय का कार्य करता है, तो वह केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है, बल्कि लम्बे समय तक प्रकाशन, व्यवहार, और काँट-छाँट कार्यान्वित करता है। इस प्रकार का प्रकाशन, व्यवहार और काँट-छाँट साधारण वचनों से नहीं बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके का कार्य ही न्याय समझा जाता है, केवल इसी प्रकार के न्याय के द्वारा ही मनुष्य को समझाया जा सकता है, परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है।" ("वचन देह में प्रकट होता है" स "मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है" से). परमेश्वर के वचनों से समझ गया कि लोगों के अक्खड़पन और भ्रष्टाचार को प्रकट करने और लोगों की बातों व बर्ताव का विश्लेषण करने के लिए अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय का कार्य उस सत्य का प्रयोग करता है जिस पर मानवों का अधिकार नहीं है। परमेश्वर के दीर्घकालिक प्रकटन, आचरण व छंटाई करने के माध्यम से ही, वे धीरे—धीरे अपनी भ्रष्ट प्रवृत्ति और महत्वपूर्ण प्रकृति को जानने में, और अपने खुद के भ्रष्टाचार, बुरे बर्ताव को साफ तौर पर देखने, और खुद से नफरत करने व खुद को बदलने की स्थिति में पहुंचने में सक्षम हो सकते हैं। अगर परमेश्वर ने इस तरह से काम नहीं किया होता, तो मैं अपनी खुद की भ्रष्ट प्रवृत्ति को नहीं जान पाता, तो मैं कैसे अपनी पापी प्रकृति से मुक्त हो पाता और शुद्धिकरण पा सकता? मैं परमेश्वर के वचनों को जितना ज्यादा पढ़ता, मुझे उतना ही ज्यादा महसूस होता था कि परमेश्वर के न्याय का कार्य बहुत अच्छा था! परमेश्वर का कार्य निश्चित रूप से लोगों का शुद्धिकरण, परिवर्तन करता है और उन्हें बचाता है।

एक बार, एक सभा में, जब मैं अपने खुद के अनुभव साझा किया करता था, तो जहां कहीं भी मैं "मुझे लगता है," और "इस बारे में मैं क्या सोचता हूं" जैसे वाक्यांश कहा करता था, तो एक भाई कहा करता था मेरी बातों में ऐसी आदत घमंड का संकेत थी। अगर पहले किसी ने इस तरह की बात मुझसे की होती, तो मैं बहस करने लगता और तुरंत ही उसका खंडन करने लगता। लेकिन समय के साथ, मैंने बहस किए और खुद को सही साबित किए बिना शांत रहना चुनने लगा, क्योंकि मैंने "जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप" के वचनों के बारे में सोचा: "किसी भी मामले का सामना करते समय अगर आप हमेशा 'मेरे ख्याल से' कहते हैं, तो खैर, सबसे अच्छा है कि आप अपने विचारों को जाने दें। मैं आपसे निवेदन करता हूं कि अपने विचारों को छोड़ दें और सत्य की खोज करें। परमेश्वर के वचनों का परीक्षण करें। आपके ‘विचार’ सत्य नहीं है!... आप बहुत ज्यादा हठी और स्वार्थी हैं! सत्य के सामने, आप अपनी खुद की अवधारणा व भ्रम को छोड़ तक नहीं सकते और इसे मना भी नहीं कर सकते हैं। आप थोड़ा सा भी परमेश्वर का पालन नहीं करना चाहते हैं! वे लोग जो सच में सत्य को खोजते हैं और जिनका दिल सच में परमेश्वर का आदर करता है, उनमें से जो अब भी 'मेरे ख्याल से' बोलते हैं? इस कहावत को पहले ही दूर कर दिया गया है। यह शैतानी प्रवृत्ति को प्रकट करना है।" इसलिए मुझे लगा कि उस भाई ने जो भी कहा वह सही था, और मेरे पास कोई आधार नहीं था जिस पर मैं उसे गलत साबित करता। इंसान जिसे सत्य समझता है वह सत्य का स्थान नहीं ले सकता। इंसान जो सोचता है वे शैतान से आता है। अगर कोई व्यक्ति जो भी कहता है, उसकी शुरुआत में वह हमेशा 'मैं' शब्द का प्रयोग करता है, तो यह वह स्थिति है जिसमें उस व्यक्ति के दिल में परमेश्वर नहीं है, वह परमेश्वर का सम्मान न करने का संकेत है। मैं कितना घमंडी था जो हमेशा ऐसी बातें किया करता था! बाद में, मैंने "जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप" पुस्तक में भी एक अवतरण पढ़ा जिसने कहा: "कुछ संपत्ति बना लेने के बाद लोग घमंडी हो जाते हैं। अगर किसी की क्षमता अच्छी है और उसके पास एक निश्चित स्तर की दक्षता है, तो वह सोचेगा 'मैं' दूसरों से बेहतर हूं।' ऐसा करने में वे अपनी घमंडी प्रवृत्ति को प्रकट करते हैं, और उन्हें किसी भी अन्य से कोई मतलब नहीं होता है। यह आम बात है, क्योंकि वे कुशल व दक्ष होते हैं। अगर वे सच में खुद को जानते होते, तो वे सोच रहे होते कि वे किसी भी योग्य नहीं हैं। तो फिर उनमें किस चीज का घमंड हो गया है? अगर वह सोचता है कि उसके पास जो है वह घमंड करने योग्य नहीं है, और उसके पास ऐसी संपत्ति नहीं जिस पर वह घमंड करे, तो वह घमंडी नहीं होगा। क्या यही बात नहीं है? ऐसे कुछ लोग हैं जो खुद को दूसरों से बेहतर समझते हैं, और यह कि वे किसी भी मामले को साफ तौर पर समझ सकते हैं, तो क्या एक दिन यह होना निश्चित है? कि जब वे एक बड़ी बाधा को सहते हैं, तो असफलता से अपमानित होते हैं, तो क्या वे तब भी घमंडी रहने में सक्षम हो पाएंगे? वे ऐसा महसूस करेंगे कि वे अपना सिर नहीं उठा सकते, किसी से नजर मिलाने की हिम्मत नहीं कर सकते। तो जब ये घमंडी व हठी प्रवृत्ति वाले लोग असफलता का अनुभव करेंगे या कई बार अपमानित होंगे, या उनसे गंभीर रूप से निपटा जाएगा या अलग किया जाएगा, तो उनकी घमंडी प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से खत्म हो जाएगी। सभी लोग ऐसे ही हैं। परमेश्वर के न्याय व ताड़ना का अनुभव करके, अलग होकर और निपट कर, पवित्र आत्मा द्वारा अनुशासित होकर, और कुछ असफलता व बाधाओं को सहकर, लोग ज्यादा ईमानदार हो जाएंगे। उनका घमंड कम से कमतर होता जाएगा, और वे उतने आत्मकेंद्रित नहीं रह जाएंगे। भले ही वे किसी चीज को अच्छी तरह से समझते हैं, फिर भी वे कोई भी गलती करने की संभावना से बचने हेतु सावधानी बरतने के लिए, उसके बारे में सत्य को खोजने का प्रयास करेंगे, दूसरों के विचार समझेंगे। यह सब परिणाम परमेश्वर के न्याय व ताड़ना से मिला है। तो आप चाहे कितने भी घमंडी व दंभी हो, डरे नहीं और चिंता भी न करें। जब आप परमेश्वर के न्याय व ताड़ना का अनुभव करते हैं, और ज्यादा छंटाई व निपटारा स्वीकार करते हैं, खासतौर पर पवित्र आत्मा का अनुशासन, तो धीरे—धीरे आप बदलना शुरू हो जाएंगे। इसमें आपकी मदद कोई नहीं कर सकता है, तो आपको परमेश्वर से प्रार्थना करने, और सत्य को खोजने, पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने पर भरोसा करना है, क्योंकि एक बार पवित्र आत्मा आप पर कार्य करना शुरू कर दे, तो आपकी सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।" इस अवतरण की सहभागिता ने काफी अंदर भेद दिया था, वाकई अपना काम पूरा कर दिया था! मैंने जाना कि पिछली बार कार्यस्थल में, या घर पर, मैं हमेशा ही उच्च पद पर रहकर दूसरों को भाषण देता था, और यह सब कुछ शैतान की घमंडी प्रकृति द्वारा नियंत्रित किए जाने के कारण होता था। खुद में क्षमता होने, धन कमाने में सक्षम होने के बारे में सोचकर, मैंने अपनी वरिष्ठता दिखाई थी, और खुद को छोड़कर हर किसी को नीचा दिखाया था, और यह सोचने लगा था कि मेरे जैसा अच्छा कोई और नहीं है, हमेशा खुद को एक आदर की स्थिति में रखा था। अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने के बाद, मैंने परमेश्वर के न्याय व लोगों की घमंडी प्रकृति को प्रकट करने से संबंधित कई वचन पढ़ें, और साथ ही धर्मसभाओं में भाइयों व बहनों ने जो सहभागिता की थी, उससे मैंने अपनी खुद की घमंडी प्रकृति को थोड़ा समझना शुरू कर दिया था। मैंने जाना कि मैं असल में किसी से अन्य व्यक्ति से बेहतर नहीं था, और यह मेरी दक्षता व संपत्ति सब कुछ परमेश्वर द्वारा दिया गया दान था, तो मेरे पास ऐसा कुछ नहीं था जिस पर घमंड करूं। इसी के साथ, मैंने परमेश्वर के वचन में अपनी घमंडी प्रकृति को बदलने का मार्ग भी खोजा, जो भाइयों व बहनों के साथ पेश आने और उनके द्वारा अलग किए जाने को स्वीकार करना, परमेश्वर के वचन से खुद की तुलना करना और खुद को और भी प्रकट करना, खुद का और खुद से घृणा करने का सच्चा ज्ञान प्राप्त करना, और मैं जो भी करता हूं उसमें शैतानी प्रवृत्ति पर और निर्भर न होना बल्कि परमेश्वर के वचन के अनुसार कार्य करना है। कई बार इस प्रकार से अलग किए जाने और पेश आने, और आत्मचिंतन के माध्यम से मैं जो बन गया था, उसका अनुभव करके, मेरी घमंडी प्रकृति में धीरे—धीरे परिवर्तन आना शुरू हो गया था।

परमेश्वर के और ज्यादा वचनों को पढ़ने, और लगातार कलीसिया की जिंदगी जीने से, मुझे और भी ज्यादा यह महसूस होने लगा था कि मैं कितना भाग्यशाली हूं जो मैं अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर सका। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कलीसिया में, सभी भाई व बहनें बहुत उत्साहित हैं, एक—दूसरे के साथ बहुत ईमानदारी से बर्ताव करते हैं। वे सभी शुद्ध व साधारण हैं, और एक—दूसरे के साथ अपने अनुभवों को बांटा करते हैं, और यदि उनकी भ्रष्ट प्रवृत्ति प्रकट भी होती है, तो वे उस पर प्रतिक्रिया देने और परमेश्वर के वचन के आधार पर खुद को समझने में सक्षम हैं। मैं यह देखा है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर का वचन लोगों का शुद्धिकरण करने और उन्हें बदलने में सच में सक्षम है। परमेश्वर ने हमें पाप से मुक्ति पाने और उद्धार प्राप्त करने हेतु मार्ग दिखाने के लिए खुद वचनों को व्यक्त किया था, इसलिए हम वाकई धन्य हैं! यह सोचकर कि कितने सारे लोग अब भी हैं जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उत्सुकता से प्रभु यीशु की वापसी का इंतजार कर रहे हैं, पाप की श्रृंखला को तोड़ने व शुद्धिकरण पाने के इच्छुक हैं, मैंने परमेश्वर की प्रार्थना करने में एक संकल्प लिया: मैं साम्राज्य के सुसमाचार को और भी लोगों तक प्रचारित करने, और उन्हें अपनी तरह बनाने के लिए, परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण करने, और अंत के दिनों का परमेश्वर का उद्धार पाने के लिए इच्छुक हूं।