ईमानदार इंसान होने का अनुभव

15 दिसम्बर, 2020

मार्च महीने के आखिर में एक दिन सभा में, एक अगुआ ने एक भाई के बारे में बताया जिसे गिरफ्तार करके बहुत सताया गया। वो इतना कमज़ोर पड़ गया था कि उसने कलीसिया के दो अन्य सदस्यों को खतरे में डाल दिया— उसने परमेश्वर को धोखा दिया। वो पछतावे से भर गया, फिर परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन वाले वचनों को पढ़कर, उसे अपनी नाकामी की असली वजह का पता लगा और उसने सच्चा पश्चाताप किया। अगुआ ने इस अनुभव के बारे में हमारी राय माँगी और पूछा कि क्या यह सच्ची गवाही मानी जायेगी। उन्होंने हमसे हमारे विचार भी साझा करने को कहा। मैं बहुत घबरा गयी और सोचने लगी: वो इस बारे में हमसे बात क्यों करना चाहते हैं? क्या इसलिए कि वो इस समस्या को लेकर हमारी समझ को परखना चाहते हैं? मैंने सोचा, "उस भाई ने सिर्फ एक पल की कमज़ोरी की वजह से दूसरों को खतरे में डाल दिया। ये एक अपराध था। मगर बाद में उसने खुद को जाना और सच्चा पश्चाताप किया, इसलिए उसके अनुभव को गवाही माना जाना चाहिए।" मगर फ़िर मैंने दोबारा सोचा, "मैं पहले दूसरों की राय सुनूँगी ताकि मैं ज़्यादा अस्पष्ट बातें कहकर खुद को बुरा न बना लूँ।" दूसरे भाई-बहन अपने विचारों के बारे में बात करने लगे। शुरुआत में, एक बहन ने करीब-करीब वही बात कही जो मैं सोच रही थी, तो मैं निश्चिंत हो गयी। मगर इसके तुरंत बाद, एक और बहन ने कहा कि वो भाई यहूदा के जैसा था, जिसने परमेश्वर को धोखा दिया, ऐसी की गवाही को परमेश्वर के लिए दी जाने वाली गवाही नहीं मानी जायेगी। फ़िर कुछ और भाई-बहनों ने पूरे विश्वास के साथ कहा कि उसके अनुभव को गवाही नहीं माना जा सकता। इतने लोगों का एक ही बात पर सहमत होते और साथ देते देखकर मैं असमंजस में पड़ गयी, मैं कुछ सोच नहीं पा रही थी। तभी, अगुआ ने कहा, "जिन्हें ये अनुभव गवाही नहीं लगती वो हाथ उठाये।" कई लोगों ने अपने हाथ उठाये, मगर मैं असमंजस में थी, तो मैंने अपना हाथ नहीं उठाया। मैं सोच रही थी, "मैं गलत वक्त पर अपना हाथ नहीं उठा सकती। क्या इससे ये स्पष्ट नहीं होगा कि मुझमें काबिलियत और समझ की कमी है?" जब मैं ऐसा सोच रही थी, तभी अगुआ ने मुझसे पूछा, "तुमने अपना हाथ क्यों नहीं उठाया?" मैंने मन ही मन सोचा, "अरे नहीं, वो मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? क्या मुझे अपना हाथ उठाना चाहिए था?" मैंने फ़ौरन अपना हाथ उठा लिया। मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा— मैं घबराने लगी। मुझे अपना हाथ उठाना चाहिए था या नही? हालांकि मेरा दिल मानता था कि ये एक गवाही है, मगर मैंने बिना सोचे-समझे ही अपना हाथ उठा लिया। मुझे एहसास हुआ कि मैं अपना हाथ उठा चुकी थी, फिर मुझे उम्मीद के मुताबिक दूसरों की राय सुननी पड़ी। वो सब अपने-अपने विचार साझा कर रहे थे, तो मैं शांति से इस बारे में सोचने लगी। उस भाई ने सच्चा पश्चाताप किया था, इसलिए उसकी गवाही को सही माना जाना चाहिए। मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपना हाथ नहीं उठाना चाहिए था। मैं उस वक्त अपनी राय साझा करना तो चाहती थी, मगर फ़िर मैंने सोचा कि मुझे अभी पूरी समझ नहीं है, मैं सही हो भी सकती हूँ और नहीं भी। मगर फ़िर, अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वो कहेंगे कि मुझमें काबिलियत नहीं है या मेरे अनुभव में गहराई नहीं है? अगर अगुआ को मुझमें ये कमी दिखी, तो उनको लगेगा कि मैं प्रशिक्षण के काबिल नहीं हूँ, फिर परमेश्वर के घर में मेरा कोई भविष्य नहीं होगा। साथ ही, वहाँ बहुत सारे भाई-बहन मौजूद थे, ऐसे में अगर मैं ग़लत साबित हुई तो वो काफ़ी शर्मनाक होगा। मैं बहुत सोचने लगी और कई बार कुछ कहने की कोशिश भी की, मगर फ़िर आखिर में चुप रह गयी।

उसके बाद, अगुआ ने सहभागिता करते हुए बताया कि बेशक यह एक गवाही मानी जायेगी, एक कमज़ोर पल में परमेश्वर को धोखा देने के बाद, न्याय और ताड़ना का अनुभव करके सच्चा पश्चाताप करना एक बेहतरीन गवाही है। ये कई भाई-बहनों के लिए प्रेरणादायक था, इससे पता चला कि परमेश्वर सच्ची आस्था रखने वालों पर महान दया दिखाता है। परमेश्वर जानता है कि हम कितने भ्रष्ट हैं, अगर हम वास्तव में पछतावा करके उसके साथ रहेंगे, वो हमें पश्चाताप करने का मौक़ा देगा, इस तरह की गवाही परमेश्वर की महिमा बढ़ाती है और शैतान को शर्मिंदा करती है। अगुआ ने स्पष्ट किया कि हमारी समझ गलत है और कहा कि हम धोखेबाज़ और बेईमान हैं जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं सोचते। ये देखकर कि हमें इस समस्या के बारे में बात करनी चाहिए, हमें लगा कि उस भाई के अनुभव में कुछ तो गड़बड़ थी। हम बिना कोई सच्ची बात कहे ये अंदाजा लगाने की कोशिश करने लगे कि अगुआ क्या सोच रहे हैं। अगुआ ने शांति से हमारे साथ सहभागिता करते हुए बताया कि हमें हर बात पर अपने बारे में सोचना चाहिए और अपनी खुद की राय बनानी चाहिए, चाहे हम ग़लत हों या सही, हमें सिर्फ़ सत्य बोलना चाहिए। यही बात सबसे ज़रूरी है। "सबसे ज़रूरी" शब्द सुनकर मुझे बहुत बेचैनी होने लगी। मैंने सोचा, "उनकी बात सही है। गलत होने के बावजूद, अपनी राय ज़ाहिर करना, भेड़ चाल में शामिल होने से तो बेहतर है। कम से कम वो मेरी अपनी राय होगी, और मैं ईमानदार भी रहूँगी।" मुझे अपनी राय ज़ाहिर नहीं करने के लिए खुद से नफ़रत होने लगी। सिर्फ़ दस मिनट की बात थी जब मुझे अपनी खुद की राय ज़ाहिर करनी थी, मगर मैंने कपट से काम लिया और सत्य का अभ्यास नहीं किया, मैं तो मानवीय आचरण की कसौटी पर भी खरी नहीं उतरी। मैंने न सिर्फ़ झूठ कहा या गलत काम किया, बल्कि मैं तो सही तरीके से पेश आने में भी नाकाम रही।

सभा के बाद अपनी प्रार्थना के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों में ये पढ़ा: "परमेश्वर में अपनी आस्था में और अपने आचरण में लोगों को सही रास्ता अपनाना चाहिए; टेढ़े और बुरे रास्ते और साधन नहीं अपनाने चाहिए। टेढ़े और बुरे रास्ते और साधन क्या हैं? ये हैं परमेश्वर में ऐसी आस्था जो हमेशा छोटी-छोटी चालाकियों पर आधारित हो, और स्वांग, ढोंग, और घटिया किस्म की चालबाजियों पर आधारित हो; ये हैं अपनी भ्रष्टता को छिपाने की कोशिश करना, और अपनी समस्याओं जैसेकि अपनी कमियों, खामियों और अयोग्यताओं को ढंकने की कोशिश करना। वे चीजों को करने के लिए हमेशा शैतान के दर्शन का सहारा लेते हैं, प्रत्यक्ष मामलों में परमेश्वर की और कलीसिया के अगुआ की कृपा पाने की कोशिश करते हैं, पर सत्य का अभ्यास नहीं करते, चीजों को सिद्धांतों के अनुसार नहीं करते, और लोगों को शीशे में उतारने के लिए उनकी खुशामद करते नहीं थकते; वे पूछते हैं, 'मैं आजकल कैसा चल रहा हूँ? क्या आप सब मुझसे खुश हैं? क्या परमेश्वर मेरे अच्छे कामों के बारे में जानता है? अगर वह जानता है तो क्या वह मेरी तारीफ करेगा? परमेश्वर के दिल में मेरी क्या जगह है? क्या परमेश्वर की नजर में मैं कुछ हूँ?' वे असल में यह पूछ रहे होते हैं कि क्या परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण उन पर उसकी कृपा हो सकती है। क्या निरंतर ऐसी ही बातें सोचते रहना टेढ़े और बुरे रास्ते और साधन नहीं हैं? यह सही रास्ता नहीं है। तो फिर सही रास्ता क्या है? सही रास्ता तब होता है जब लोग अपनी आस्था में सत्य की खोज करते हैं, जब वे सत्य को पाने में सक्षम हो जाते हैं, और अपने स्वभाव में बदलाव लाने में सफल हो जाते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक')। इसमें परमेश्वर हमें अपने आचरण में और विश्वासी होने के नाते सही मार्ग चुनने की चेतावनी दे रहा है। हमें सत्य की खोज करके सत्य का अभ्यास करना होगा। अगर हमने ये सकारात्मक काम करने की कोशिश नहीं की, अगर हम बेचैन होकर अपनी गलतियाँ छुपाते रहे, दिखावा करते रहे, अगुआओं के साथ अच्छे रिश्ते बनाते रहे, कलीसिया में अपने रुतबे की परवाह करते रहे और अगर हम इसी चिंता में डूबे रहे कि परमेश्वर और अगुआ हमारे बारे में क्या सोचेंगे, तो इसे बुराई के मार्ग पर चलना कहा जाएगा। मुझे एहसास हुआ कि मैं बिलकुल वही कर रही थी जिसका खुलासा परमेश्वर ने किया है। हाँ, मुझे पक्का यकीन नहीं था कि उस भाई की गवाही सच्ची गवाही थी या नहीं, मगर मैंने अपने मन की बात नहीं कही। इसके बजाय मैंने सबकी राय सुनी, दूसरों के मन को पढ़ने की कोशिश की और उसी के मुताबिक अपनी राय बनायी। अगुआ ने जैसे ही मुझसे पूछा कि मैंने हाथ क्यों नहीं उठाया, मुझे लगा कि अपनी राय ज़ाहिर करना गलत होगा, जब ज़्यादातर भाई-बहनों का यही मानना था कि उस भाई के अनुभव को सच्ची गवाही नहीं माना जायेगा, मैंने फ़ौरन सभी की हाँ में हाँ मिला दी। मैंने बस हवा का रुख देखकर अपनी राय बदल दी। ऐसा करके मैंने सिर्फ़ अपना कपटी शैतानी स्वभाव दिखाया। मैंने इस बात पर विचार किया कि मैं एक सच्ची बात क्यों नहीं कह सकी। मुझे एहसास हुआ कि मुझमें कुछ ग़लत कहकर शर्मिंदा होने का डर समाया था, मैंने सोचा कि कहीं अगुआ मेरे बारे में नीचा न सोचें या मुझे तुच्छ समझकर प्रशिक्षित न करें, और अगर ऐसा कुछ होता रहा तो शायद मुझे मेरे कर्तव्य से निकाल दिया जाता। मैं सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और पद को बनाये रखना चाहती थी, ताकि अपनी कमज़ोर काबिलियत को छिपा सकूँ और अच्छा दिखने की कोशिश करती रहूँ। मैं एक ऐसे काबिल इंसान की तरह दिखना चाहती थी जिसे सत्य की समझ और चीज़ों की अच्छी परख है। मैं चाहती थी मेरे पास हमेशा हर सवाल का सही जवाब हो, जो अगुआ की राय के सामान हो ताकि वो मेरे बारे में अच्छा सोचें और मैं उनके सामने अच्छी दिखूँ। ऐसा होने पर भाई-बहनें भी मुझसे सहमत होंगे और मेरे बारे में ऊँचा सोचेंगे। मुझे एहसास हुआ कि मेरी सोच छल-कपट से भरी थी। मैं तो इतनी आसान सी बात भी सीधे तौर पर नहीं कह सकी। मैं एक शब्द भी ईमानदारी और मन से नहीं कह सकी। मैं हमेशा सभा में दूसरों की बात सुनकर जवाब देती थी ताकि परमेश्वर में घर में अपनी जगह बनाए रखूँ। मैं सही मार्ग पर चलने के बजाय, बुराई के मार्ग पर चल रही थी। मैं सब कुछ समझ गयी थी मगर फिर भी कोई आत्म-विश्लेषण नहीं किया।

फ़िर तीन महीने बाद मैंने परमेश्वर की ये सहभागिता सुनी। परमेश्वर कहते हैं, "मसीह-विरोधी मसीह के साथ उसी तरह से जुड़ते हैं जैसे वे लोगों के साथ व्यवहार करते हैं, कुछ भी कहते और करते हुए उससे संकेत लेते हुए, उसका सुर सुनते हुए और उसके वचनों का अर्थ समझने की भावना जताते हुए। जब वे बोलते हैं तो उनका एक भी शब्द सच्चा या संजीदा नहीं होता; उन्हें सिर्फ खोखले शब्द और सिद्धांत बोलने आते हैं। वे इस व्यक्ति को धोखा देने और ठगने की कोशिश करते हैं, जो उनकी नजर में सिर्फ एक आम व्यक्ति है। वे ऐसे बात करते हैं जैसे एक साँप रेंगता है, लहरदार और टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता चुनते हुए। उनके शब्दों का अंदाज और दिशा किसी खंभे पर चढ़ती खरबूजे की बेल की तरह होते हैं। जब तुम लोग कहते हो कि किसी में भरपूर योग्यता है और उसे आगे बढ़ाया जा सकता है, तो वे फौरन बताने लगते हैं कि वे कितने अच्छे हैं, और उनमें क्या अभिव्यक्त और उजागर होता है; और अगर तुम लोग कहते हो कि कोई बुरा है, तो वे यह कहने में देर नहीं लगाते कि वे कितने बुरे और दुष्ट हैं, और वे किस तरह कलीसिया में उत्पात मचाते और व्यवधान पैदा करते रहते हैं। जब तुम लोग किसी चीज के बारे में सच्चाई जानना चाहते हो, तो उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता; वे टालमटोल करते रहते हैं और इंतजार करते हैं कि तुम खुद ही किसी फैसले पर पहुँच जाओ, वे तुम्हारे शब्दों का अर्थ टटोलने और तुम्हारे इरादों को भाँपने की कोशिश करते हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं वह सिर्फ चापलूसी, चमचागीरी और निचले दर्जे की चाटुकारिता होती है; उनके मुंह से सत्य का एक शब्द भी नहीं निकलता" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (20)')। परमेश्वर के इन वचनों को सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। मैं हमेशा से बेईमान बनी रही और दूसरों के मन को पढ़कर ही अपने कदम उठाती रही। हालांकि मसीह के साथ मेरा सीधा संपर्क नहीं था, मगर मैंने परमेश्वर के बनाये माहौल में उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं करना चाहती थी। मैं बस दिखावा करके खुद को अगुआ की चहेती बनाना चाहती थी, मैंने सोच-समझकर वही जवाब दिया जो अगुआ सुनना चाहते थे, जिसमें ईमानदारी का ज़रा सा भी अंश नहीं था। ये सब सिर्फ़ छलावा था। मेरे बोलने और काम करने का तरीका बिलकुल एक साँप जैसा था, परमेश्वर ऐसे आचरण से नफ़रत करता है। मुझे लगा दूसरों की राय सुनकर अपनी बात रखने से अगुआ को बेवकूफ़ बनाया जा सकता है, शायद जवाब देते वक्त अच्छी दिखकर मैं उन पर अच्छा प्रभाव डालूँगी, इससे परमेश्वर के घर में मेरा पद और भविष्य दोनों ही सुरक्षित रहेंगे। मैं बेवकूफों वाली हरकत कर रही थी, मैं तो परमेश्वर को भी बेवक़ूफ़ बनाने की कोशिश कर रही थी। सच कहूँ तो मुझे यकीन ही नहीं था कि परमेश्वर हर चीज़ की जाँच करता है। मेरी काबिलियत, मेरा आध्यात्मिक कद और मेरे विचार, मेरा बर्ताव और हर परिस्थिति में मेरी राय— परमेश्वर को ये सब स्पष्ट नज़र आता है। भले ही मैं अपने आस-पास के लोगों को बेवक़ूफ़ बना लूँ, मगर परमेश्वर को कभी बेवक़ूफ़ नहीं बना सकूँगी। दरअसल, परमेश्वर यह नहीं देखता कि मैं दूसरों के सामने क्या कहती या करती हूँ, वो यह देखता है कि मैं सत्य तक कैसे पहुँचती हूँ। वो यह देखता है कि मैं हर दिन कैसे अभ्यास करती और जीवन जीती हूँ, अपने काम को लेकर मेरा बर्ताव कैसा है। परमेश्वर ऐसी हर छोटी सी चीज़ की जाँच करता है। वो यह देखता है कि मैं सत्य से प्रेम और सत्य का अभ्यास करती हूँ या नहीं, मेरा दिखावटी बर्ताव उसे बेवक़ूफ़ नहीं बना सकता। फ़िर मुझे एहसास हुआ कि मैं सिर्फ़ धोखा ही नहीं दे रही थी, बल्कि मैं तो परमेश्वर की धार्मिकता और इस सच को ठुकरा रही थी कि वो हर चीज़ की जाँच करता है। मेरा बर्ताव एक अविश्वासी की तरह था। जब मैंने मसीह विरोधियों द्वारा मसीह को ठुकराए जाने और उसकी चापलूसी करने को लेकर परमेश्वर की जाँच-पड़ताल के बारे में सुना, तब मुझे लगा नहीं कि इसका मुझसे कोई लेना-देना है। मेरा खुद कभी मसीह से सामना नहीं हुआ, तो मुझे लगा कि मुझमें वो शैतानी स्वभाव कभी नज़र नहीं आयेगा। फ़िर मुझे एहसास हुआ कि मैं गलत थी, ऐसा शैतानी स्वभाव प्रकट करने के लिए हमें मसीह के संपर्क में आने की ज़रूरत नहीं है। मैंने अगुआ का साथ देकर अपनी छवि सुधारने की कोशिश की, मैं ऐसी चीज़ें करने को तैयार थी, ताकि परमेश्वर के घर में अपना पद बनाये रख सकूँ। मुझमें वो शैतानी स्वभाव बिलकुल साफ़ नज़र आ रहा था। अगर मेरा कभी मसीह से सामना हुआ होता, तो ये बात और भी स्पष्ट हो जाती। फ़िर मैं परमेश्वर को धोखा देने और विरोध करने से खुद को नहीं रोक पाती।

कुछ दिनों तक, मैं यही सोचती रही कि कैसे हमारे गलत जवाब देने के बावजूद, जैसा मैंने सोचा था अगुआ ने उस तरह हमारी कांट-छांट कर हमें निपटाया नहीं, और न ही ऐसा कहा कि हममें काबिलियत की कमी है, उन्होंने न तो हमें बाहर निकाला, और न ही हमें सिखाने से इनकार किया। उन्होंने बस हमारे विचार साझा करने को कहा ताकि सत्य पर सहभागिता करने और सिद्धांतों पर हमारा मार्गदर्शन करने से पहले उन्हें हमारी कमियों का पता चल सके। उन्होंने हमारे भ्रष्ट स्वभाव को भी उजागर किया और हमें आत्मचिंतन करने को कहा। उन्होंने जो किया वो सिर्फ़ हमें सहारा देने और मदद करने के लिए था। परमेश्वर के घर में और भाई-बहनों से बात करते हुए सोच-विचार करने की ज़रूरत नहीं है। इससे मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आये: "मूल बात ये है कि परमेश्वर निष्ठावान है, अत: उसके वचनों पर भरोसा किया जा सकता है; इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है, यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार होते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ')। हमें परमेश्वर के वचनों और कर्मों पर भरोसा रखना चाहिए, क्योंकि वो हमारे साथ ईमानदार रहता है। जब परमेश्वर ने इंसान को बनाया, तो उसने बताया कि वो बाग़ के कौन से फल खा सकता है और कौन से नहीं। उसने अपनी बात साफ़ तौर पर सामने रखी—किसी अनुमान की गुंजाइश नहीं थी। अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने हमेशा यही कहा "मैं तुम से सच कहता हूँ" परमेश्वर के कार्य के इस चरण में, हमें देख सकते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कितने ईमानदार और वास्तविक हैं। सबसे बड़ी बात, वो ऐसे अच्छे और सुंदर वचन हैं जो दिल को छू जाते हैं, फिर भी हमारे भ्रष्ट स्वभाव को उजागर करने वाले वचन कठोर लगते हैं, क्योंकि उसके वचन वास्तविकता पर आधारित हैं, वो हमें शुद्ध करने और बचाने के लिए हैं। परमेश्वर हमारे साथ ईमानदार और पारदर्शी है। इसमें कोई दिखावा नहीं है। मैं उस परिस्थिति में बेईमानी से सोच-विचार करके अपना जाल बिछा रही थी। मुझे एहसास हुआ कि मैं बहुत बड़ी धोखेबाज़ और नीच इंसान थी।

फ़िर मुझे परमेश्वर के कुछ वचन याद आये। "मैं उन लोगों की बहुत अधिक सराहना करता हूँ जो दूसरों के बारे में संदेह को आश्रय नहीं देते हैं और उन्हें भी बहुत पसंद करता हूँ जो सहजता से सत्य को स्वीकार करते हैं; इन दो तरह के मनुष्यों के लिए मैं बहुत अधिक परवाह दिखाता हूँ, क्योंकि मेरी दृष्टि में वे ईमानदार मनुष्य हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे। इसी कारण से, मुझ में तुम्हारा विश्वास संदेह कि नींव पर बना है। इस प्रकार के विश्वास को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें')। मैं पहले कभी इस बात को नहीं समझ पायी कि परमेश्वर ने ऐसा क्यों कहा कि ऐसा इंसान जो दूसरों पर शक नहीं करता और आसानी से सत्य को स्वीकार करता है वो उसकी नज़रों में ईमानदार है। मगर अब, उसके वचनों पर विचार करके, मैं ये समझने लगी हूँ। ईमानदार लोग परमेश्वर या इंसान पर शक नहीं करते; क्योंकि वो मासूम होते हैं। वो अपने दिमाग का इस्तेमाल करके चीज़ों को समझने के बजाय, परमेश्वर के सामने आकर सत्य की खोज करते हैं। उन्हें जो समझ आता है उसे स्वीकार करके उसका अभ्यास करते हैं और वही करते हैं जो परमेश्वर कहता है। वो साफ़ हृदय से सत्य की खोज करते हैं, और ऐसा हृदय अनमोल है। इसे ही बच्चे जैसा होना कहा जाता है। परमेश्वर उनको आशीष दे, उनके भीतर पवित्र आत्मा बसती है जो उनका मार्गदर्शन करके उन्हें प्रबुद्ध बनाती है। फ़िर वो आसानी से सत्य को जान और समझ पाते हैं। हालांकि, अगर कोई इंसान थोड़ी- बहुत सच्ची बातें कहकर अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करता है, अगर वो अंदर से उलझा हुआ है, उसे अपनी सुरक्षा को लेकर शक है, यहाँ तक कि उसे प्यारे और दयावान परमेश्वर पर भी शक है, ऐसा इंसान सबसे अधिक कपटी और बेईमान होता है। अब मैं समझने लगी थी, परमेश्वर ने ऐसा क्यों कहा कि कपटी लोगों को बचाया नहीं जा सकता। पहली बात तो ये कि परमेश्वर बहुत सच्चा है, उसे कपटी लोगों से नफरत है और वो उनकी रक्षा नहीं करता। और दूसरी बात ये कि कपटी लोग सिर्फ़ अपने बारे में सोचते हैं। कपटी लोग बहुत उलझे हुए होते हैं। वो हमेशा अनुमान लगाते हैं, चीज़ों को आंकते हैं, वे लोगों से, चीज़ों से और परमेश्वर से बचने की कोशिश करते हैं। उन्हें दूसरों का मन पढ़ना भी आता है। उनका मन ऐसी बातों से भरा होता है और वो सत्य की खोज बिल्कुल भी नहीं करते। पवित्र आत्मा उनमें कोई काम नहीं कर सकता। इसलिए वो सत्य को समझने में हमेशा नाकाम रहेंगे। जैसे कि परमेश्वर कहता है, "परमेश्वर उन लोगों को सिद्ध नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। यदि तुम लोगों का हृदय ईमानदार नहीं है, यदि तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, तो परमेश्वर कभी भी तुम्हें प्राप्त नहीं करेगा। इसी तरह, तुम भी कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे, और परमेश्वर को पाने में भी असमर्थ रहोगे" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'जीवन संवृद्धि के छह संकेतक')। फिर मैंने एक और बार खुद पर कठोरता से विचार किया। समस्या आने पर, परमेश्वर के सामने आकर सच्चे मन से सत्य की खोज करने के बजाय, मैं दूसरों की राय को आंकती रही। भाई-बहनों के साथ आम चर्चाओं के दौरान भी मेरा बर्ताव कुछ ऐसा ही रहता था। कभी-कभी जब मुझे पूरी बात समझ नहीं आती थी, तो मैं दूसरों की समझ के आधार पर अपनी राय बना लेती थी। कभी-कभी मेरे पास अपनी राय होती, मगर मैं गलत बात कहने के डर से उन्हें साझा नहीं करती थी, मैं चुप रहकर पहले दूसरों की राय सुनती और सिर्फ़ तभी कुछ बोलती जब मुझे अपने सही होने का यकीन होता। वरना, गलत होने के डर से मैं चुप रह जाती थी। मुझे पता चला कि मैं कितनी कपटी और झूठी थी। जब मुझे कुछ समझ नहीं आता था, तब मैं भीड़ के साथ चलती थी और दूसरों की बात सुनकर ही अपनी बात कहती थी। इससे मैं सत्य को समझने के आस-पास भी नहीं आ सकी। हालांकि काबिलियत कम होने या सत्य को नहीं जानने में कोई बुरी बात नहीं है। बुरी बात तो हमेशा लोगों का अपनी समझ को छुपाना है। ऐसे लोग कभी भी सत्य को नहीं समझ पायेंगे। मुझे लगा कि ऐसा करना खतरनाक होगा और ईमानदार दिखना ज़्यादा ज़रूरी है।

मैंने अपनी खोज शुरू कर दी कि भविष्य में समस्याओं का सामना होने पर कैसे ईमानदार बनूँ और किन सिद्धांतों का पालन करूँ। मैंने परमेश्वर के वचनों में ये पढ़ा: "परमेश्वर के साथ खुले दिल से मिलने के लिए तुम लोगों को पहले अपनी निजी इच्छाओं को एक तरफ रखना होगा। यह ध्यान देने की बजाय कि परमेश्वर तुम्हारे साथ किस तरह का व्यवहार करता है, जो कुछ तुम्हारे दिल में है वह कह दो, और इस बात की चिंता या परवाह न करो कि तुम्हारे शब्दों का क्या परिणाम होगा; जो कुछ तुम सोच रहे हो वह कह दो, अपनी मंशाओं को एक तरफ रख दो, और किसी मकसद को हासिल करने के लिए शब्दों का इस्तेमाल करने की कोशिश न करो। 'मुझे यह कहना चाहिए, वह नहीं, मुझे सावधानी बरतनी चाहिए कि मैं क्या कहता हूँ, मुझे अपना मकसद हासिल करना है'—क्या यहाँ व्यक्तिगत मंशाएँ जुड़ी हुई हैं? ये लोग कोई शब्द कहने से पहले ही अपने मन में उधेड़बुन में उलझे रहे हैं, उन्होंने जो कुछ कहना है उसे कई बार संसाधित कर लिया है, और अपने दिमाग में कई बार छान लिया है। जब ये शब्द उनके मुंह से बाहर निकलेंगे तो ये शैतान की चालबाजियों में लिपटे हुए होंगे; परमेश्वर के साथ व्यवहार करने का यह खुले दिल का रास्ता नहीं है" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (20)')। "सभी मामलों में, तुम्हें परमेश्वर के साथ खुला हुआ और खुले दिल का होना चाहिए—यह एकमात्र शर्त और अवस्था है जिसका परमेश्वर के सामने ध्यान रखना जरूरी है। जब तुम लोग खुले हुए नहीं भी होते, तो भी परमेश्वर के सामने तुम खुले हुए होते हो। परमेश्वर जानता है कि तुम लोग खुले हुए हो या नहीं। अगर तुम्हें यह दिखाई नहीं देता तो क्या तुम मूर्ख नहीं हो? तो तुम बुद्धिमान कैसे हो सकते हो? तुम जानते हो कि परमेश्वर हर चीज पर नजर रखता है और सब कुछ जानता है, इसलिए यह न सोचो कि शायद उसे नहीं पता है; क्योंकि यह निश्चित है कि परमेश्वर लोगों के दिमागों में चुपके-से देखता रहता है, इसलिए थोड़ा और खुला दिल रखना, थोड़ा और निर्मल होना, और थोड़ा और ईमानदार होना लोगों के लिए बुद्धिमानी की बात होगी—ऐसा करने में ही होशियारी है। ... जब लोग स्वरूप पर ध्यान देने लगते हैं, जब यह चीज उनके दिमाग में घूमने लगती है, जब वे इसके बारे में सोचने लगते हैं, तो यह एक उलझा हुआ मामला बन जाता है। अपने दिमाग में वे हमेशा सोचते हैं, 'मैं ऐसा क्या कहूँ कि परमेश्वर मेरे बारे में अच्छा सोचे, और उसे यह पता न चले कि मैं अंदर क्या सोच रहा हूँ। कौनसी बात कहनी ठीक रहेगी? मुझे ज्यादा बातें अपने मन में ही रखनी चाहिए, मुझे थोड़ा होशियारी से काम लेना चाहिए, मुझे कोई तरीका सोचना चाहिए; तो फिर शायद परमेश्वर मेरे बारे में अच्छा सोचे।' क्या तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर को पता नहीं चलेगा कि तुम हमेशा इस तरह की बातें सोचते रहते हो? तुम जो कुछ भी सोचते हो परमेश्वर को उसका पता होता है। इस तरह से सोचना कितना थका देने वाला काम है। इससे कहीं ज्यादा आसान है ईमानदारी और सच्चाई से बात करना, और इससे तुम्हारी जिंदगी भी कहीं ज्यादा आसान हो जाती है। परमेश्वर कहेगा कि तुम ईमानदार और निर्मल हो, और तुम खुले दिल के हो—यह असीमित रूप से एक अनमोल चीजहै। अगर तुम्हारे पास खुला हुआ दिल है और ईमानदार रवैया है, तो कई बार हद पार कर देने पर भी और मूर्खताएँ करने पर भी परमेश्वर इसे उल्लंघन नहीं मानेगा; यह तुम लोगों की घटिया चालों से कहीं बेहतर है, और तुम्हारी निरंतर उधेढ़बुन और संसाधन प्रक्रिया से भी" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'नायकों और कार्यकर्ताओं के लिए, एक मार्ग चुनना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है (9)')। परमेश्वर के वचनों में कहा गया है, परमेश्वर और उसके बनाये हालात का सामना करने में सबसे ज़रूरी और सबसे मूल बात यही है कि हम अपना मन साफ़ रखें। हमें बिना कुछ छिपाये, बिना कोई छल किये, चीज़ों का अंदाज़ा लगाने की कोशिश किये बिना, परमेश्वर के सामने अपना दिल खोलकर रखना होगा। हमें शब्दों का जाल नहीं बिछाना चाहिए और न ही कोई बुरी मंशा रखनी चाहिए, हमें बस सच्चे मन से अपने विचार साझा करने चाहिए। मुझे मानना होगा कि मैं उन बातों को नहीं समझती जिनकी थाह नहीं पा सकती, और फिर मुझे साफ़ और सच्चे मन से परमेश्वर के सामने आकर सत्य की खोज करनी होगी। बुद्धिमान होने का यही अर्थ है। परमेश्वर हमें और हमारे कर्मों के बारे में सब कुछ जानता है। मेरी काबिलियत, मेरी सत्य की समझ, मेरे अनुभव की गहराई, और मुझे कोई बात समझ आ रही है या नहीं, परमेश्वर हर बात अच्छी तरह जानता है। मेरा सब कुछ परमेश्वर के सामने स्पष्ट है। ऐसे में अपनी गलतियों को छिपाकर सब कुछ समझने का नाटक क्यों करना? दरअसल, हमेशा चीज़ों को आंकते रहना, दूसरों पर ध्यान देना, उनके मन को पढ़ने की कोशिश करना और क्या कहें क्या न कहें, ये सोचकर दिमाग पर जोर डालना मानसिक और भावनात्मक दोनों ही तरीके से थका देने वाला है, परमेश्वर इससे नफरत करता है। तब जाकर मुझे यह एहसास हुआ कि मन से साफ़ और सच्चा होना कितना ज़रूरी है। परमेश्वर इसे संजोकर रखता है, यही जीवन जीने का उन्मुक्त और आसान तरीका भी है। मैंने ये भी जाना कि परमेश्वर सिर्फ़ लोगों की काबिलियत या उनकी सही-गलत राय पर ध्यान नहीं देता। वो इस दौरान हमारे दिल, सत्य के प्रति हमारे रवैये और हमारे स्वभाव को देखता है। अगर हम सच्चे और ईमानदार हैं, तो कभी-कभार गलत होने, बेवकूफ़ दिखने या कम काबिलियत होने से परमेश्वर को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, और न ही इसके लिए वो हमें दंड देता है। इसके बजाय, परमेश्वर को हमेशा कपटी लोगों से घृणा और नफरत होती है। तभी मैंने तय कर लिया कि मैं सत्य का अभ्यास करके एक ईमानदार इंसान बनूँगी। परमेश्वर के बनाये हालात में अपना मन साफ़ रखकर, दूसरों के साथ बर्ताव में निष्पक्ष रहकर, दिल से अपनी बातें कहकर और अपनी समझ को साफ़ तौर पर ज़ाहिर करके ही, मैं अपने पाखंडी, कपटी और भ्रष्ट स्वभाव को धीरे-धीरे ठीक कर सकती हूँ।

एक बार हम एक कलीसिया भजन को लेकर चर्चा के लिये अगुआ के पास गये, जिसकी कुछ पंक्तियाँ हमें समझ नहीं आ रही थीं। उन्होंने हमें उन पंक्तियों के बारे में समझाने के बजाय, ये कहा कि उनका कोई मतलब नहीं है और उनसे कोई फ़ायदा नहीं। तभी मेरे मुँह से "हाँ" शब्द निकल गया। मुझे तभी एहसास हो गया कि मैं दोबारा झूठी बन रही थी। मैं उसमें वो समस्याएँ नहीं देख सकी जो वो देख पा रहे थे। मैं फिर से हाँ में हाँ मिलाने लगी और सब कुछ समझने का नाटक करने लगी। मुझे इस बात से नफ़रत होने लगी कि मैं मुँह खोलते ही झूठ बोलने लगती हूँ, मैं इन हालात से झांसा देकर नहीं निकलना चाहती थी। अगर मुझे ये बात समझ नहीं आयी तो नहीं आयी। फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया: "ईमानदार होने का अर्थ है अपने कार्यों और वचनों में शुद्धता रखना..." ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास')। मैं जानती थी मुझे ईमानदारी दिखाकर अपना झूठ सुधारना होगा। मैंने अगुआ से कहा, "मुझे लगा था कि इन दो पंक्तियों में कुछ गड़बड़ है। मगर मैं नहीं समझ पायी कि इन्हें सुधारा नहीं जा सकता।" उन्होंने शांत भाव से उस भजन की समस्याओं पर हमारे साथ सहभागिता की और फिर उस भजन को लेकर मेरी समझ में थोड़ा सुधार आया। मेरे मन को शांति मिली। सच ये है कि हमें अपने शब्दों, कर्मों या विचारों में तोल-मोल करने की ज़रूरत नहीं, हमें बस ऐसे ईमानदार इंसान बनना चाहिए जो व्यावहारिक और वास्तविक हो। अब अपनी टीम के भाई-बहनों की समस्याओं पर चर्चा करते वक्त मैं ईमानदारी का अभ्यास करने लगी। चाहे गलत रहूँ या सही, मैं अपनी राय साझा करने लगी थी। मुझे जो बात समझ नहीं आती, उसे खुलकर सामने रख देती और अपनी गलतियों को ठीक करती थी। इससे मुझे काफ़ी शांति मिली। मैं अभी भी एक सच्ची, ईमानदार इंसान बनने के मानक के आस-पास नहीं पहुँची हूँ, मगर मैंने ईमानदार होने के महत्व को ज़रूर समझ लिया है और मैं जान गयी हूँ कि यही परमेश्वर द्वारा बचाये जाने का एकमात्र तरीका है। मैं वाकई एक ईमानदार इंसान बनना चाहती हूँ और उसके लिये निरंतर कोशिश करते रहना चाहती हूँ। परमेश्वर का धन्यवाद!

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