कर्तव्य के लिए चाहिए सत्य

20 मार्च, 2022

टेरेसा, फ़िलीपीन्स

मई 2021 में, मैं अगुआ बनी, बहुत-सी कलीसियाओं का काम मेरे जिम्मे था। मैंने सोचा कि मुझे कीमत चुकानी है और अपना काम अच्छे ढंग से करना है, वरना परमेश्वर स्वीकृति नहीं देगा। इसलिए मैं कलीसिया के कार्य में हर दिन व्यस्त रहने लगी, कलीसियाओं के अगुआओं के साथ संगति करने में काफी समय और ज़ोर लगाने लगी, सुसमाचार कार्य को आगे बढ़ाने और नए लोगों के सिंचन के तरीकों पर उनसे चर्चा की, खाली समय में, नए विश्वासियों का हाल पूछने जाती। इन सबमें मैं बड़ी मेहनत करती। हर दिन इतने सारे काम होते थे कि कभी-कभी खाने का भी वक्त नहीं मिलता था, हालत ऐसी हो गई कि मैं भक्ति कार्य भी नहीं कर पाती। मुझे लगता था कि अपने कर्तव्य में मेहनत करने और परिणाम पाने के लिए कीमत चुकाने से, परमेश्वर की स्वीकृति और आशीष मिलेंगे, एक अच्छी मंजिल मिलेगी।

अपने कर्तव्य के लिए, मैंने देह-सुख का त्याग किया और अपना सब-कुछ झोंक दिया, यहाँ तक कि खाने का समय भी नए विश्वासियों से जुड़ने या सभाओं की योजना बनाने में लगा देती, कभी थकान की परवाह नहीं करती। बाद में, एक कलीसिया, सुसमाचार टीम बनाने वाली थी, तो मैंने तुरंत अच्छे उम्मीदवारों की खोज की, पता लगाया कि किन्हें प्रशिक्षण देना है। नए लोगों में जोश की कमी देखकर, मैं साझा करने के लिए परमेश्वर के वचन ढूँढ़ती, ताकि उन्हें अपना काम सार्थक लगे। कुछ दिन कड़ी मेहनत के बाद, एक सुसमाचार टीम तैयार हो गई। लेकिन मुझे संतोष नहीं हुआ। लगा जैसे मुझे और कीमत चुकानी है, असल काम करना है, ज्यादा सदस्य शामिल करने के लिए भाई-बहनों की अगुआई करनी है, ताकि मैं ज्यादा योगदान करूँ, परमेश्वर स्वीकृति दे, और मुझे एक अच्छी मंजिल मिल जाए। लेकिन काम में मुश्किलें आने पर, मैं नकारात्मक और कमजोर हो जाती। उदाहरण के लिए, जब मैं कलीसिया-अगुआओं को उलझन में, या नए लोगों को काम में ढीला पाती, या जब काम के लिए बढ़िया योजना न बना पाती, तो मुझे लगता कि मैं उस काम में सक्षम नहीं हूँ। अगर मैंने कुछ भी हासिल नहीं किया, तो मुझे अच्छी मंजिल कैसे मिलेगी? इस ख्याल से मुझे तनाव हो जाता, मैं थकी हुई, उदास और चिंतित हो जाती। मुझे अपनी समस्या का पता नहीं था, बुरी हालत में होने पर ही मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती थी। ज्यादातर वक्त मैं अपने काम में व्यस्त रहती। मुझे लगता परमेश्वर के वचनों के खान-पान और मनन में बहुत वक्त लगता है, मेरे पास कर्तव्य के लिए समय नहीं बचेगा, इसलिए मैं इसे टाल देती। कभी-कभी शाम को पढ़ने की सोचती, मगर दिन भर काम की थकान से मुझे नींद आने लगती। इसलिए मैं वचन नहीं पढ़ती थी। मैं अपने जीवन-प्रवेश पर काम नहीं कर रही थी, सिर्फ सतही प्रयास कर रही थी, उस हालत में कर्तव्य निभाने से मैं थकी-हारी महसूस करती। एक दिन मैंने सोचा, क्या मेरा इस तरह काम करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है, क्या वह इसे स्वीकृति देगा। मुझे लगा जैसे कुछ गड़बड़ है, मैं समझ गई कि मेरा रवैया ठीक नहीं है। मैं सिर्फ काम करने में व्यस्त थी, अपने जीवन-प्रवेश की अनदेखी कर रही थी। मैंने कभी भी सच में नहीं सोचा कि परमेश्वर मुझे किस तरह काम करते हुए देखना चाहता है। मैंने उसके सामने आकर प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मुझे डर है कि मैं अपने काम में असफल हो जाऊंगी और तुम स्वीकृति नहीं दोगे, मेरे भविष्य पर बुरा असर पड़ेगा। हे परमेश्वर, अगर मैं गलत राह पर हूँ, तो मुझे प्रबुद्ध करो, मुझे दिखाओ कि मैं कहाँ गलत हूँ। हे परमेश्वर, मैं तुम्हें संतुष्ट करना चाहती हूँ, लेकिन नहीं जानती कि क्या करूँ। मुझे तुम्हारा मार्गदर्शन चाहिए।"

एक दिन, एक बहन ने मुझे बताया कि मुश्किलें आने पर वह नहीं जानती थी कि सत्य कैसे खोजे, निश्चित नहीं थी कि कर्तव्य ठीक से कैसे निभाना है। उसे अपने हाल की समझ नहीं थी, तो उसने मुझसे पूछा कि वो इसे बेहतर ढंग से कैसे समझे, और भ्रष्टता दिखाने पर उसे क्या करना चाहिए। मैंने उसे बताया कि अपना हाल समझने के लिए हमें अपनी सोच पर चिंतन करना चाहिए, जानना चाहिए कि हमारे विचार, नजरिया, लक्ष्य और व्यवहार परमेश्वर के इच्छा के अनुसार हैं या नहीं। इसके बाद, उसने मुझसे पूछा कि मैंने आत्मचिंतन करने और खुद को जानने की अपनी सोच के बारे में समझ कैसे हासिल की। मैं चौंक गई। उसका सवाल मेरे लिए एक तमाचे जैसा था। जब मैं ही इस पर अमल नहीं करती, तो उसकी क्या मदद करती? मैंने बहुत-सा काम किया, लेकिन मैं अपने कर्तव्य में सत्य नहीं खोज रही थी। मेरे सामने कई समस्याएँ आईं, मैंने बहुत-सी भ्रष्टता दिखाई, जैसे नए विश्वासियों को सहारा देते हुए धैर्य और प्रेम की कमी होना, अगुआओं के काम की जाँच करते समय उनके कामकाज की आलोचना करना। जब लगा कि कोई भी चीज मेरे हिसाब से नहीं होती, तब भी खुद को जानने के लिए आत्मचिंतन नहीं किया। मुझे लगता कि मुझे बस अपना काम करना है, अगर मैंने ज्यादा काम किया, तो परमेश्वर की स्वीकृति मिलेगी जो काफी है। इसलिए जीवन-प्रवेश को पूरी तरह किनारे कर मैंने परमेश्वर के वचनों को भी समय नहीं दिया। मुझे लगा परमेश्वर के वचन पढ़ने से वक्त बरबाद होगा, मैं इसे अपने काम में लगा सकती थी। मैं ऊपर से व्यस्त दिखती थी, लेकिन खुद को परमेश्वर के लिए नहीं खपा रही थी। मैं सिर्फ काम कर रही थी, काम निपटा रही थी। बुरी हालत में होने पर मैं न आत्मचिंतन करती, न सत्य खोजती। जीवन-प्रवेश को अनदेखा कर रही थी, परमेश्वर के साथ मेरा रिश्ता ठीक नहीं था। मैं अपने तरीके से, अपने ही मन से अपना काम कर रही थी। तब, मुझे अपनी हालत की फिक्र होने लगी। पता नहीं परमेश्वर की दृष्टि में मैं कैसी हूँ, क्या वह मेरे प्रयासों को स्वीकृति देगा।

अपनी समस्या देखकर, मैंने उस बहन से कहा, "मेरी समस्या भी वही है। मैं बस खुद को कामों में व्यस्त रखती हूँ, मगर अपनी ही हालत नहीं समझती। कई बार सही हाल में न होने पर भी मैं उसे अनदेखा करती हूँ। मैं आत्मचिंतन नहीं करती, न ही मुझे जीवन-प्रवेश हासिल है।" फिर हमने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "यदि तुम सचमुच अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत करना चाहते हो, तो तुम्हें समझदारी के साथ सहयोग का कार्य करना होगा। कहने का अर्थ यह है कि तुममें से प्रत्येक को अपने धार्मिक कार्यों के लिए समय निकालना होगा, ऐसा समय जब तुम लोगों, घटनाओं, और वस्तुओं को खुद किनारे कर देते हो, जब तुम अपने हृदय को शांत कर परमेश्वर के समक्ष स्वयं को मौन करते हो। हर किसी को अपने व्यक्तिगत धार्मिक कार्यों के नोट्स लिखने चाहिए, परमेश्वर के वचनों के अपने ज्ञान को लिखना चाहिए और यह भी कि किस प्रकार उसकी आत्मा प्रेरित हुई है, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए कि वे बातें गंभीर हैं या सतही। सभी को समझ-बूझके साथ परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करना चाहिए। यदि तुम दिन के दौरान एक या दो घंटे एक सच्चे आध्यात्मिक जीवन के प्रति समर्पित कर सकते हो, तो उस दिन तुम्हारा जीवन समृद्ध अनुभव करेगा और तुम्हारा हृदय रोशन और स्पष्ट होगा। यदि तुम प्रतिदिन इस प्रकार का आध्यात्मिक जीवन जीते हो, तब तुम्हारा हृदय परमेश्वर के पास लौटने में सक्षम होगा, तुम्हारी आत्मा अधिक से अधिक सामर्थी हो जाएगी, तुम्हारी स्थिति निरंतर बेहतर होती चली जाएगी, तुम पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग पर चलने के और अधिक योग्य हो सकोगे, और परमेश्वर तुम्हें और अधिक आशीषें देगा। तुम लोगों के आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य समझ-बूझ के साथ पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त करना है। यह नियमों को मानना या धार्मिक परंपराओं को निभाना नहीं है, बल्कि सच्चाई के साथ परमेश्वर के सांमजस्य में कार्य करना और अपनी देह को अनुशासित करना है। मनुष्य को यही करना चाहिए, इसलिए तुम लोगों को ऐसा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन लोगों को सही मार्ग पर ले जाता है')। इससे मुझे समझने में मदद मिली कि चाहे जितनी भी व्यस्त क्यों न रहूँ, मुझे परमेश्वर के वचनों के लिए एक उचित आध्यात्मिक जीवन और समय की जरूरत है, मुझे चिंतन करना होगा कि क्या मेरे विचार और कर्म परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं। लेकिन मैंने तो उसके वचन पढ़ने और उन पर मनन करने पर ध्यान नहीं दिया। यह भी लगता था कि भक्ति कार्य उस समय की बरबादी है, जो मैं काम में लगा सकती थी। मैं अपने कर्तव्य में सत्य नहीं खोज रही थी, न ही आत्मचिंतन करती थी कि क्या मैं परमेश्वर द्वारा अपेक्षित काम कर रही हूँ। समस्याएँ आने पर मैं सत्य नहीं खोजती थी, बस अपने कर्तव्य पर ही ध्यान लगाती थी, सिर्फ अपने कौशल और अनुभव से काम करना चाहती थी। कभी-कभी जब मैं पहले ही बुरे हाल में होती, तो आत्मा के कार्य को महसूस नहीं कर पाती, तब भी मैं खुद को काम करते रहने पर मजबूर करती। मैं बहुत व्यस्त लगती, मगर मेरे दिल में खालीपन और अंधेरा था और मैं कुछ नहीं सीख रही थी। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ सकी कि उसके वचनों का खान-पान, भक्ति-कार्य और आत्मचिंतन करना कितना अहम है। अगर हम परमेश्वर के वचन न पढ़ें, तो हम उनकी मदद से अपने विचारों और व्यवहार का विश्लेषण नहीं कर पाएंगे, ये नहीं जान पाएँगे कि हम कैसी भ्रष्टता दिखाते हैं। फिर हमारा भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं बदलेगा, हम परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पाएँगे। इन सब बातों के एहसास ने बाद में मुझे जगा दिया। ये जानकर कि मैं किन हालात में थी, मैं डर गई, मैं वैसी नहीं रहना चाहती थी, काम करते हुए मैं अपने आध्यात्मिक जीवन पर भी ध्यान देना चाहती थी, ताकि परमेश्वर के वचनों पर अमल करके उनमें प्रवेश कर सकूँ।

हमने उस बारे में परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि तुम परमेश्वर की प्रशंसा पाना चाहते हो, तो सबसे पहले तुम्हें शैतान के अंधकारमय प्रभाव से निकलना चाहिए, अपना हृदय परमेश्वर के लिए खोलना चाहिए, और इसे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ देना चाहिए। क्या जिन कामों को तुम अब कर रहे हो उनकी परमेश्वर द्वारा प्रशंसा की जाएगी? क्या तुमने अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया है? तुमने जो काम किये हैं, क्या वे वही हैं जिनकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है? क्या वे सत्य के अनुरूप हैं? तुम्हें हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान देना चाहिए; अपना हृदय परमेश्वर के सामने रख देना चाहिए, ईमानदारी से परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, और निष्ठा के साथ परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहिए। ऐसे लोगों को निश्चित रूप से परमेश्वर की प्रशंसा मिलेगी।" "यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों में रहता है, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों में नहीं रहता, तो वह शैतान के बंधन में रहता है। यदि इंसान भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीता है, तो उसमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति या पवित्र आत्मा का काम नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में रह रहे हो, यदि तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिस्थिति में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर के हो, और उसका काम तुम पर किया जाएगा; अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे, बल्कि शैतान के अधीन रह रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान के भ्रष्टाचार के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में रहकर अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके, तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो; तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; तभी तुम परमेश्वर के होगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे')। वचनों की रोशनी में मैंने आत्मचिंतन किया। मैं अपने काम में जोशीली थी, मगर सब-कुछ अपनी ही सोच के अनुसार करती थी। मैं परमेश्वर के वचनों से भटक गई थी, सत्य नहीं खोजती थी, सिर्फ काम पर ध्यान देती थी। यह परमेश्वर की इच्छा नहीं थी। मैं सोचती थी कि अगर मैं पूरे लगन से काम करूँ और ज्यादा कीमत चुकाऊँ, तो परमेश्वर स्वीकृति देगा, लेकिन मामला यह नहीं था। वह सिर्फ सतही योगदान को नहीं बल्कि हमारे दिल को देखता है, इस उम्मीद में कि हम उसके वचनों का पालन करेंगे, अपने काम में सत्य का अनुसरण करेंगे, उसके वचनों पर अमल कर शैतान की भ्रष्टता से बचकर निकल सकेंगे। लेकिन मैं बस काम करना चाहती थी। मैं सत्य नहीं खोजती थी, न ही अपनी भ्रष्टता के बारे में सोचती या परमेश्वर के वचनों पर अमल करती थी। तब मैं समझ सकी कि मैं गलत राह पर हूँ, और उस राह पर चलते रहना खतरनाक होगा—परमेश्वर कभी इसकी स्वीकृति नहीं देगा।

बाद में, मुझे पौलुस को उजागर करने वाले परमेश्वर के वचन याद आए, जिससे मुझे अपने प्रयासों में आ रही समस्याओं को समझने में मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "इन दिनों, अधिकांश लोग इस तरह की स्थिति में हैं : 'आशीष प्राप्त करने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाना होगा और परमेश्वर के लिए कीमत चुकानी होगी। आशीष पाने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए सब-कुछ त्याग देना चाहिए; मुझे उसके द्वारा सौंपा गया काम पूरा करना चाहिए, और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए।' इस पर आशीष प्राप्त करने का इरादा हावी है, जो अपने आपको पूरी तरह से परमेश्वर से पुरस्कार पाने और मुकुट हासिल करने के उद्देश्य से खपाने का उदाहरण है। ऐसे लोगों के दिल में सत्य नहीं होता, और निश्चित रूप से उनकी समझ केवल सिद्धांत के कुछ शब्दों से युक्त होती है, जिसका वे जहाँ भी जाते हैं, वहीं दिखावा करते हैं। उनका रास्ता पौलुस का रास्ता है। ऐसे लोगों का विश्वास निरंतर कठिन परिश्रम का कार्य है, और गहराई में उन्हें लगता है कि वे जितना अधिक करेंगे, परमेश्वर के प्रति उनकी निष्ठा उतनी ही अधिक सिद्ध होगी; वे जितना अधिक करेंगे, वह उनसे उतना ही अधिक संतुष्ट होगा; और जितना अधिक वे करेंगे, वे परमेश्वर के सामने मुकुट पाने के लिए उतने ही अधिक योग्य साबित होंगे, और उसके घर में निश्चित रूप से सबसे बड़ा आशीष प्राप्त करेंगे। वे सोचते हैं कि यदि वे पीड़ा सह सकें, उपदेश दे सकें और मसीह के लिए मर सकें, यदि वे अपने जीवन का त्याग कर सकें, और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए सभी कर्तव्य पूरे कर सकें, तो वे परमेश्वर के सबसे धन्य लोगों में से होंगे—जो सबसे बड़ा आशीष प्राप्त करते हैं—और फिर उन्हें यकीनन मुकुट प्राप्त हो जाएगा। पौलुस ने भी यही कल्पना की थी और यही चाहा था; वह भी इसी मार्ग पर चला था, और ऐसे ही विचार लेकर उसने परमेश्वर की सेवा करने का काम किया था। क्या इन विचारों और इरादों की उत्पत्ति शैतानी प्रकृति से नहीं होती? यह सांसारिक मनुष्यों की तरह है, जो मानते हैं कि पृथ्वी पर रहते हुए उन्हें ज्ञान की खोज करनी चाहिए, और उसे प्राप्त करने के बाद ही वे भीड़ से अलग दिखायी दे सकते हैं, पदाधिकारी बनकर हैसियत प्राप्त कर सकते हैं; वे सोचते हैं कि जब उनके पास हैसियत हो जाएगी, तो वे अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी कर सकते हैं और अपने घर और व्यवसाय को एक निश्चित मुकाम पर ले जा सकते हैं। क्या सभी अविश्वासी इसी मार्ग पर नहीं चलते? जिन लोगों पर इस शैतानी प्रकृति का वर्चस्व है, वे अपने विश्वास में केवल पौलुस की तरह हो सकते हैं। वे सोचते हैं : 'मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर सब-कुछ छोड़ देना चाहिए; मुझे उसके समक्ष वफ़ादार होना चाहिए, और अंतत: मुझे निश्चित रूप से सबसे शानदार मुकुट और सबसे बड़ा आशीष मिलेगा।' यह वही रवैया है, जो उन सांसारिक लोगों का होता है, जो सांसारिक चीज़ें पाने की कोशिश करते हैं; वे बिलकुल भी अलग नहीं हैं, और उसी प्रकृति के अधीन हैं। जब लोगों की शैतानी प्रकृति इस प्रकार की होगी, तो दुनिया में वे ज्ञान, हैसियत, शिक्षा प्राप्त करने और भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करेंगे; यदि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे मुकुट और बड़े आशीष प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यदि परमेश्वर में विश्वास करते हुए लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो उनका इस मार्ग पर चलना निश्चित है; यह एक अडिग तथ्य है, यह एक प्राकृतिक नियम है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें')। मैं सोचती थी कि अपने कर्तव्य में मेरा लक्ष्य परमेश्वर को संतुष्ट करना है, लेकिन वचन पढ़ने के बाद, मैंने समझ लिया कि दरअसल मैं गलत थी। लगता था मैं अपने काम के प्रति जोशीली हूँ, लेकिन मैंने सत्य पाने या परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश नहीं की। मैं चाहती थी कि मुझे उसके आशीष और अच्छी मंजिल मिले, मैं सोचती थी कि अगर मैं अपना काम कर दूँ और कीमत चुका दूँ, कड़ी मेहनत करूँ और ज्यादा कष्ट झेलूँ, तो परमेश्वर स्वीकृति देगा, और मुझे अच्छी मंजिल मिलेगी। उसके आशीषों के लिए, मैंने खाना और सोना तक टाल दिया, समय बचाने के लिए भक्ति-कार्य और परमेश्वर के वचन पढ़ने में ढिलाई की। मैं चाहती थी कि मेहनत के बदले में मुझे भविष्य में एक सुंदर मंजिल मिले, मानो एक कर्मचारी अपने मालिक के लिए काम कर रहा हो। यह किसी मालिक से वेतन पाने के लिए मेहनत करने जैसा है। अपने काम में मैं परमेश्वर से सौदेबाजी कर रही थी, उसे धोखा दे रही थी। वो चाहता है कि हम अपना कर्तव्य दिल से निभाएं, सौदेबाजी या माँग न करें, मगर मैं उससे सौदा करने की कोशिश कर रही थी, अपनी मेहनत के बदले स्वर्ग का टिकट चाहती थी। पौलुस का भी यही प्रयास था। पौलुस सिर्फ काम पर ध्यान लगाता था, ताज पहनना चाहता था, पुरस्कृत होना चाहता था, लेकिन उसने सत्य का अनुसरण नहीं किया, खुद को बदलना तो दूर, उसने परमेश्वर के वचनों को गंभीरता से नहीं लिया। वह उसके विरोध की राह पर था। मैं भी वैसी ही थी—मैंने काम में बड़ी मेहनत की, परमेश्वर से बहुत-से आशीषों की आशा की, ताकि मुझे बेहतर मंजिल मिल सके। मैं समझ गई कि मैं सत्य का अनुसरण नहीं करती थी, या उससे सच में प्रेम नहीं करती थी, तो मुझे परमेश्वर की स्वीकृति कैसे मिल सकती है? परमेश्वर के वचनों को पढ़े बिना, मैं अपनी भ्रष्टता नहीं जानती, न ये जानती कि मैंने उसके मार्ग से मुँह फेर लिया है। बाद में, मैंने अगुआओं के गलत मार्ग पर चलने के परिणामों के बारे में सोचा, और मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अगुआओं और कार्यकर्ताओं की श्रेणी के लोगों के उद्भव के पीछे क्या कारण है और उनका उद्भव कैसे हुआ? एक विराट स्तर पर, परमेश्वर के कार्य के लिए उनकी आवश्यकता है, जबकि अपेक्षाकृत छोटे स्तर पर, कलीसिया के कार्य के लिए उनकी आवश्यकता है, परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए उनकी आवश्यकता है। ... उनके और अन्य लोगों के कर्तव्यों में जो अंतर है, वह उनके एक विशिष्ट गुण से जुड़ा हुआ मामला है। यह विशिष्ट गुण क्या है? अगुआई के कार्य को विशिष्ट रूप से दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए, किसी कलीसिया में कितने भी लोग हों, अगुआ ही मुखिया होता है। तो यह अगुआ सदस्यों के बीच क्या भूमिका निभाता है? (वह अगुआई करता है।) वह कलीसिया में मौजूद सभी चुने हुए लोगों की अगुआई करता है। संपूर्ण कलीसिया पर उसका क्या प्रभाव होता है? अगर यह अगुआ गलत रास्ते पर चलता है, तो कलीसिया में मौजूद चुने हुए लोगों पर इसका बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा : वे सभी अगुआ के पीछे-पीछे गलत रास्ते पर चले जाएंगे। यह वैसा ही है, जैसे पौलुस ने अपने द्वारा स्थापित कलीसियाओं और उन लोगों की अगुआई की थी, जिनके बीच उसने सुसमाचार फैलाया था और धर्म-परिवर्तन किया था; जब पौलुस भटक गया, तो उसकी अगुआई वाली कलीसियाएँ और लोग भी भटक गए। जब अगुआ भटक जाते हैं, तो केवल अगुआ ही प्रभावित नहीं होते; उनकी अगुआई के दायरे में आने वाले सभी भाई-बहन भी प्रभावित होते हैं" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों का दिल जीतना चाहते हैं')। परमेश्वर के वचनों ने मेरा ध्यान इस ओर खींचा कि एक अगुआ जिस मार्ग पर चलता है वो सचमुच अहम है। सत्य के प्रति मेरे रवैये, मेरे मार्ग, और मेरे काम करने के तरीके का दूसरों के प्रवेश पर सीधा प्रभाव पड़ता है। मैं गलत रास्ता लूँ, तो दूसरों को भी वही रास्ता दिखाऊंगी। एक अगुआ के रूप में, मैं सत्य के अनुसरण में भाई-बहनों के मार्गदर्शन के लिए जिम्मेदार थी, मगर इसके बजाय मेरा ध्यान काम पर केंद्रित था। मैंने सत्य नहीं खोजा, परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े, खुद को उससे दूर कर लिया। अपने ही जीवन-प्रवेश पर मेरा ध्यान नहीं था, तो मैं सत्य के अनुसरण में, दूसरों को राह कैसे दिखाती? मैं उन्हें पौलुस के रास्ते पर ही ले जाती, अगर वे सत्य का अनुसरण न करने के कारण आखिरकार हटा दिए जाएँ, तो यह मेरा दुष्कर्म होगा, मैं उनका उद्धार का मौका बरबाद कर दूँगी। इस तरह का कार्य नेकी करना नहीं, बल्कि दुराचार होगा, परमेश्वर के विरुद्ध काम करना होगा! मुझे यह भी एहसास हुआ कि दूसरों को सतही काम करने की राह दिखाना, परमेश्वर और सत्य से खुद को दूर कर लेना, कितना खतरनाक है। परमेश्वर के वचनों ने मेरी भ्रष्टता प्रकट की, और मुझे प्रयास का सही मार्ग और एक अगुआ की जिम्मेदारियाँ दिखाईं। मैं जान गई कि मुझे परमेश्वर के ज्यादा वचन पढ़ने, सत्य खोजने और अपनी भ्रष्टता ख़त्म करने पर ध्यान देगा होगा। फिर मैं गलत राह पर नहीं चलूँगी।

बाद में मैंने वचनों के कुछ और अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "पतरस और पौलुस की मंज़िलों को, उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात के अनुसार आँका गया था कि परमेश्वर के सृजित प्राणियों के रूप में वे अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सकते थे या नहीं; उनकी मंजिलें उससे निर्धारित हुई थीं जिसकी उन्होंने शुरुआत से खोज की थी, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना कार्य किया था, या अन्य लोगों का आँकलन क्या था। और इसलिए, परमेश्वर के सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम के पथ की खोज करना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों की खोज करना, और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता का ऐसा ही पथ मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही परमेश्वर के सृजित प्राणी के मूल प्रकटन का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण व्यक्तिगत असंयमी माँगों और विवेकहीन लालसाओं से कलंकित है, तो प्राप्त किया गया प्रभाव मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन नहीं होगा। यह पुनः प्राप्ति के कार्य के विपरीत है। यह निस्संदेह पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इसलिए यह साबित करता है कि इस प्रकार का अनुसरण परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है। उस अनुसरण का भला क्या महत्व है जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है')। "मैं प्रत्येक व्यक्ति की मंजिल उसकी आयु, वरिष्ठता और उसके द्वारा सही गई पीड़ा की मात्रा के आधार पर तय नहीं करता, और जिस सीमा तक वे दया के पात्र होते हैं, उसके आधार पर तो बिलकुल भी तय नहीं करता, बल्कि इस बात के अनुसार तय करता हूँ कि उनके पास सत्य है या नहीं। इसके अतिरक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि जो लोग परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण नहीं करते, वे सब दंडित किए जाएँगे। यह एक अडिग तथ्य है। इसलिए, जो लोग दंडित किए जाते हैं, वे सब इस तरह परमेश्वर की धार्मिकता के कारण और अपने अनगिनत बुरे कार्यों के प्रतिफल के रूप में दंडित किए जाते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो')। इससे मुझे समझने में मदद मिली कि परमेश्वर हमारे योगदान, हमारे कर्तव्य और दुखों के आधार पर हमारा परिणाम तय नहीं करता। उसने कभी नहीं कहा कि वह हमारे काम के आधार पर आशीष देता है, या हमारी कड़ी मेहनत हमें एक अच्छी मंजिल तक पहुँचा सकती है। मगर मेरी सोच थी कि अगर मैं कड़ी मेहनत करूँ, अपना कर्तव्य निभाऊँ और ज्यादा योगदान करूँ, तो मुझे परमेश्वर की स्वीकृति और एक अच्छी मंजिल मिलेगी। इसलिए मैं जोश के साथ कलीसिया के कार्य करती, दूसरों की समस्याएँ सुलझाती, अपने काम के लिए कष्ट झेलने को पूरी तरह तैयार रहती। लेकिन परमेश्वर के वचनों से समझ आया कि मेरा नजरिया गलत था, वह हमारा परिणाम इस आधार पर तय करता है क्या हम सत्य का अनुसरण करते हैं, और खुद को बदल पाए हैं या नहीं। जैसे कि पौलुस ने किया—उसने कड़ी मेहनत की, बहुत काम किया, कष्ट झेले, अनेक कलीसियाएं स्थापित कीं। लोगों को लगता है उसने बहुत योगदान किया, मगर वह पुरस्कृत होने, और ताज पाने की इच्छा से प्रेरित था, इसलिए उसकी कड़ी मेहनत को परमेश्वर की स्वीकृति नहीं मिली। परमेश्वर ने उसे हटा दिया, क्योंकि उसने अपना स्वभाव नहीं बदला। हालांकि पतरस ने बहुत सारा काम नहीं किया था, पर उसने परमेश्वर के वचनों के आधार पर सत्य खोजा और आत्मचिंतन किया। उसने उसके वचनों पर अमल कर अपना स्वभाव बदला। उसका प्रयास परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप था। मैं नहीं जानती थी कि लोगों के परिणाम तय करने का परमेश्वर का मानक क्या है, बल्कि आस्था में मेरी अपनी धारणाएं थीं। मेरी सोच थी कि कड़ी मेहनत मुझे परमेश्वर के राज्य में पहुँचा देगी, मेरी आकांक्षा थी कि मेरे मामूली काम से मुझे सुंदर मंजिल मिलेगी। उस प्रयास का परमेश्वर से कुछ लेना-देना नहीं था। मैं उसे संतुष्ट करने के लिए शुद्ध दिल से सत्य का अनुसरण नहीं कर रही थी, इस प्रकार के प्रयास से मेरी आस्था बेमानी हो गई। मैं व्यस्त दिखती तो थी, पर मैंने अपना भ्रष्ट स्वभाव नहीं बदला। मैं अभी भी अहंकार, लालच, गर्व, ईर्ष्या और चालबाजी में डूबी हुई थी। शैतानी भ्रष्टता में डूबा मुझ जैसा इंसान अच्छी मंजिल कैसे पा सकता था? अपने काम में, मैं आत्मचिंतन या परमेश्वर की इच्छा जानने की कोशिश नहीं करती थी। मैं वह नहीं करती थी जिसकी उसे अपेक्षा थी, तो मेरा काम परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे हो सकता था? उसके वचनों के न्याय और ताड़ना से, मैं अपने प्रयास के गलत तरीके समझ पाई। इसके बिना, मैं आँखें बंद करके कपट और सौदेबाजी करते हुए मेहनत करती रहती, इस तरह मैं परमेश्वर का विरोध कर आखिरकार दंडित होती। सत्य के अनुसरण की महत्ता समझने के बाद, मैं अपने गलत प्रयास से दूर होने लगी, अब मैं ऐसी बेकार की मेहनत करते हुए जीना नहीं चाहती थी।

इसके बाद, मैं चाहे जितनी भी व्यस्त रहूँ, हर दिन परमेश्वर के वचनों को जरूर खाती-पीती, अपने कर्तव्य के जरिए उसके वचनों का अनुभव करने की कोशिश करती। समस्याओं से जूझते वक्त, मैं सत्य के सिद्धांत खोजती, दूसरों की समस्याओं से निपटने के लिए सत्य पर संगति करती। परमेश्वर के वचनों पर अमल करके, मैं उलझनों में कम पड़ती, काम में सही दिशा मिलती। पहले जब मैं व्यस्त रहती थी, तो मुझे फिक्र होती कि मैंने तेजी से या अच्छे से काम न किया तो इससे मेरी मंजिल पर असर पड़ेगा, लेकिन अब बहुत काम आ जाने पर भी मैं नहीं घबराती। अब मैं पहले परमेश्वर की अपेक्षा समझने के लिए सत्य के सिद्धांत खोजती हूँ, उसके साथ इस तरह सहयोग कर मैं उसका मार्गदर्शन समझ पाती हूँ, मुझे ज्यादा बेहतर परिणाम हासिल होने लगे हैं। एक बार मैंने देखा कि भाई-बहन अपने काम में थोड़े निष्क्रिय हैं, तो मुझे बड़ी हताशा हुई, गुस्सा आया। मैंने उनके साथ बहुत समय तक संगति की मगर कोई लाभ नहीं हुआ। उनमें से कुछ अभी भी बहुत निष्क्रिय थे, और इससे हमारी तरक्की रुक गई थी। इसलिए मैंने परमेश्वर के सामने यह जानने के लिए प्रार्थना की, कि मैं गुस्सा क्यों होती हूँ, मुझे किस बात से प्रेरणा मिलती है। परमेश्वर के वचन से मुझे समझ आया कि मैं ऐसा इसलिए महसूस कर रही थी क्योंकि मुझे लगता था कि अच्छे परिणाम न पाने से मेरी छवि खराब होगी, और शायद मेरा पद छिन जाएगा। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि यह मेरी भ्रष्टता थी। मुझे सत्य के लिए देह-सुख त्यागना होगा। मेरी शोहरत और रुतबा बेकार थे। लोग मेरे बारे में चाहे जो सोचें, मेरे पास अगुआई का काम हो न हो, मुझे अपना कर्तव्य निभाना था। बस यही बात मायने रखती थी। इसलिए मैंने उन लोगों के निष्क्रिय होने के कारण का पता लगाया, और जानना चाहा कि काम के प्रति उनका क्या रवैया था। हमने परमेश्वर के वचन साथ में पढ़े, और संगति के जरिए सबका हाल धीरे-धीरे बेहतर होने लगा, और वे ज्यादा हासिल करने लगे। इस अनुभव ने मुझे दिखाया कि सत्य की खोज करना ही सच्चे विश्वास और परमेश्वर का अनुसरण करने का रास्ता है। मैं सिर्फ काम करके संतुष्ट नहीं हो सकती, बल्कि मुझे परमेश्वर के वचन पढ़ने होंगे, उसके कार्य का अनुभव कर स्वभाव में बदलाव लाना होगा। परमेश्वर का धन्यवाद!

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