बदहाली से उबरने की राह दिखाते हैं परमेश्वर के वचन

24 जनवरी, 2022

क्षीयोहे, चीन

मुझे याद है, वह 2003 की एक रात थी। कलीसिया की दो बहनें और मैं एक बैठक कर रहे थे, अचानक हमने दरवाज़े के बाहर एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनी, इसके तुरंत बाद दरवाज़े पर कुछ ठोकने और बहुत-से लोगों के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ी, "दरवाज़ा खोलो! तुम्हें घेर लिया गया है!" ज़ोर की आवाज़ के साथ दरवाज़ा झटके से खुल गया, फिर कोई दर्जन भर पुलिस अफसर अंदर घुस आये और हमें कोने में धकेल दिया। फिर, पुलिसवालों ने घर को डाकुओं की तरह खंगाल डाला, पूरा कमरा बिखर गया। उसी पल, हमने दरवाज़े के बाहर दो गोलियाँ चलने की आवाज़ सुनी। पुलिसवाले चीखे, "हमने उन्हें पकड़ लिया! तीन लोग हैं!" मैं इतना घबरा गयी कि कांपती ही रही। मैंने अपने हाथों को कंधों पर लपेटा और एक कुंडली जैसी सिकुड़ गयी। बाद में, पुलिस ने हमें हथकड़ी लगा दी। करीब आधे घंटे बाद, वे हमें आँगन में ले गये, जहां हमने 20 डरावने-से लगनेवाले पुलिस अफसर देखे। बिजली की छड़ी हाथ में लिये एक पुलिसवाला चिल्लाया, "सुनो, तुम सब! किसी को भी कोई आवाज़ करने की इजाज़त नहीं है! किसी ने भी शोर किया तो मैं उस पर ये छड़ी चलाऊँगा, तुम लोग मर भी जाओ तो भी ये गैरकानूनी नहीं है!" इसके बाद, उन लोगों ने हमें धक्के देकर एक पुलिस कार में ठूँस दिया। कार में घुसते ही दो पुलिसवालों ने मुझे अपने बीच दबा लिया। उनमें से एक ने मेरे पैरों को अपने पैरों में फंसा लिया और मेरे शरीर के ऊपरी हिस्से को अपनी बाँहों में लपेट लिया, साथ ही वह बोला, "आज अगर तेरा फ़ायदा न उठाऊँ तो मैं बेवकूफ हूँ!" उसने मुझे कस कर दबा रखा था और मैं आज़ाद होने के लिए हाथ-पैर मार रही थी, तभी एक दूसरा अफसर बोला, "छोड़ दो! चलो, अपना मिशन जल्द पूरा करो, ताकि हम उनके हवाले कर दें।" तब जाकर उसने मुझे छोड़ा। मैंने नहीं सोचा था कि प्रतिष्ठित माना जानेवाला पुलिसकर्मी ऐसा बदमाश हो सकता है। मुझे बहुत गुस्सा आया।

फिर, पुलिस हमें थाने ले गयी, हमें एक छोटे-से कमरे में बंद कर ताला लगा दिया, हम तीनों की हथकड़ी मेटल की कुर्सियों से जोड़ दी। एक पुलिस अफसर ने हमसे बार-बार पूछा कि कलीसिया का अगुआ कौन है और हम कहाँ रहते हैं। मुझे याद आया कि पहले किस तरह कई बार पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार करने की कोशिश की थी, मैं जानती थी कि अगर उन्हें मेरा नाम और पता मिल गया तो वे मुझे कभी भी जाने नहीं देंगे। मैंने यह भी याद किया कि बहन झाओ को पुलिस ने दो साल पहले कैसे गिरफ़्तार कर यातना दी थी, इससे मेरी घबराहट बहुत बढ़ गयी। मैंने सोचा, कहीं वे मुझे भी यातना न दें। क्या होगा अगर मैं बर्दाश्त न कर सकी? मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से रास्ता दिखाने के लिए प्रार्थना की। मैंने परमेश्वर के वचनों की कुछ पंक्तियों को याद किया, "और सभी चीजों में पहले परमेश्वर के परिवार के हितों का ध्यान रखना; परमेश्वर की जाँच को स्वीकार करना और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?')। हाँ, मुझे परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखना था। मुझे जो भी यातना सहनी पड़े, मैं अपने भाई-बहनों को धोखा नहीं दे सकती, मैं यहूदा नहीं बन सकती। मुझे अडिग रहकर परमेश्वर की गवाही देनी होगी। इसके बाद, उनके कुछ भी पूछने पर मैंने जवाब देने से इनकार कर दिया। अगली सुबह, राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड के डिप्टी चीफ ने झूठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, "हमने बहुत बड़ा जाल फैलाया था, आखिरकार तुझे पकड़ ही लिया। हर उस दिन जब हम तुझे पकड़ नहीं पाये, हमें सुकून नहीं मिला!" इसके बाद, उसने मेरी हथकड़ी खोल दी, मेरे कॉलर को ज़ोर से खींचा, और मौके का फायदा उठाकर उसने दो बार मेरी छातियों में उंगली चुभायी। मुझे बहुत गुस्सा आया। इस तरह खुले में ये पुलिसवाले यौन उत्पीड़न करने में लगे हुए थे। ये लुटेरों के सिवाय कुछ भी नहीं थे!

फिर वे मुझे डिटेंशन हाउस ले गये, मेरी सहमति के बिना मेरा वीडियो बनाया, और बोले कि वे मेरा नाम बदनाम करने के लिए इसे टीवी पर प्रसारित करेंगे। मैंने सोचा, "मैं सिर्फ परमेश्वर में विश्वास रखती हूँ, परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए सभाओं में जाती हूँ, और परमेश्वर की गवाही देने के लिए सुसमाचार फैलाती हूँ। मैंने कोई भी गैरकानूनी काम या अपराध नहीं किया है। यह सच कि वे मुझे इस तरह सताकर मेरा तिरस्कार करना चाहते हैं, वाकई घिनौना काम है!" मैंने उनसे शांत मन से कहा, "जो भी करना है, कीजिए!" जब उन्होंने देखा कि उनकी चाल नहीं चली, तो उन्होंने मुझे हथकड़ी पहनाकर पैरों में 5 किलो वज़न की बेड़ियाँ लगा दीं, फिर उन्होंने पूछताछ के लिए ले जाने को मुझे एक कार में ठूंस दिया। बेड़ियां भारी होने के कारण मैं अपनी एड़ियों के बल ही चल पा रही थी। हर कदम मुश्किल था, कुछ ही कदमों के बाद मेरे पैरों की चमड़ी छिलने लगी। मेरे कार में घुसने के बाद उन्होंने मेरे सिर पर एक काला टोपा डाल दिया, ताकि मैं देख न सकूँ, मुझे दो अफसरों के बीच बिठाया गया। मैं थोड़ा डर गयी, मैंने सोचा, "इन पुलिसवालों में इंसानियत है ही नहीं। मुझे नहीं पता ये मुझे यातना देने के लिए कैसे भयानक तरीके इस्तेमाल करना चाहते हैं। क्या मैं ये सब बर्दाश्त कर पाऊँगी?" मैंने फ़ौरन परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मुझे आस्था दो। भले ही मुझे कैसी भी यातना सहनी पड़े, मैं तुम्हें संतुष्ट करने के लिए गवाही देना चाहती हूँ। मर भी जाऊं, तो भी मैं तुम्हें धोखा नहीं दूंगी।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने परमेश्वर के कुछ वचनों को याद किया, "विश्वास एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है: जो लोग घृणास्पद ढंग से जीवन से चिपके रहते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो आत्म बलिदान करने को तैयार रहते हैं, वे बिना किसी फ़िक्र के, मज़बूती से कदम रखते हुए उसे पार कर सकते हैं। अगर मनुष्य कायरता और भय के विचार रखते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान ने उन्हें मूर्ख बनाया है क्योंकि उसे इस बात का डर है कि हम विश्वास का पुल पार कर परमेश्वर में प्रवेश कर जायेंगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 6')। परमेश्वर के वचनों पर सोच-विचार करके मैं समझ सकी। मेरे अंदर दब्बू और डरनेवाली सोच थी, जिससे मैं शैतान की चाल में फंस रही थी, मैंने समझ लिया कि मुझमें परमेश्वर के प्रति सच्ची आस्था नहीं है। परमेश्वर की संप्रभुता तय करती है कि मैं जियूँगी या मरूँगी, अडिग रहने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए, मुझे अपने जीवन को दाँव पर लगाकर, परमेश्वर पर भरोसा करना होगा।

इसके बाद, वे मुझे बहुत दूर किसी जगह ले गये। मेरे कमरे में घुसने के बाद, उन्होंने मेरा टोपा निकाल दिया और दिन भर खड़े रहने का आदेश दिया। शाम को, पुलिस कलीसिया के बारे में जानकारी पाने के लिए मुझ पर दबाव डालती रही। मुझे कुछ भी न बोलता देख, उन्होंने मुझे अपने हाथ ऊपर उठाकर बिना हिले खड़े रहने का आदेश दिया। जल्दी ही मेरी बाँहों में दर्द होने लगा, यकीन नहीं था कि ज़्यादा देर तक मैं सह पाऊँगी, मगर उन्होंने मुझे तब तक बाँहें नीचे नहीं लाने दीं, जब तक मैं पसीने से तर नहीं हो गयी, कांपने नहीं लगी, और अपनी बाँहों को बिल्कुल संभाल नहीं पायी। उन्होंने मुझे सुबह तक खड़े रहने पर मजबूर किया। मेरी टाँगों के सुन्न होकर सूज जाने तक मुझे खड़े रहना पड़ा।

अगली सुबह, उन्होंने मेरी पूछताछ जारी रखी। उन्होंने करीब 10 सेंटीमीटर मोटी और 70 सेंटीमीटर लंबी छड़ी से बार-बार मेरे घुटनों के पीछे वाले हिस्से पर वार किया, जब तक मैं उकडूँ नहीं हो गयी, मेरे इस मुद्रा में आने पर, उन्होंने मेरी टाँगों के मोड़ में वह छड़ी जबरन घुसा दी, फिर मेरे हाथों को छड़ी के पीछे से पैरों के सामने लाकर हथकड़ी लगा दी। मेरा दम घुट रहा था, साँस लेने में तकलीफ हो रही थी, मेरे कंधों की पेशियाँ तो जैसे चटखने को हो रही थीं, मेरी पिंडलियाँ इतनी सख्त हो गयी थीं, जैसे टूटने ही वाली हों, मुझे इतना दर्द हो रहा था कि मैं काँपती ही रही। करीब तीन मिनट बाद, मैं खुद को संभाल नहीं पायी, आजू-बाजू डोलने लगी, फिर धम्म की आवाज़ के साथ पीठ के बल ज़मीन पर गिर पड़ी। एक अफसर ने पास आकर एक हाथ से लकड़ी की छड़ी को दबाया और दूसरे हाथ से मेरे कंधों को झटक दिया, दूसरे अफसर ने पीछे से आकर मेरे सिर को ऊपर खींचा, फिर उसने अपने पैर से मेरी पीठ के निचले हिस्से को ऊपर उठाकर मुझे उकडूँ होने पर मजबूर कर दिया। इस वक्त तक, मेरे पूरी शरीर में भयानक दर्द होने लगा था, मैं फिर से गिर गयी, उन्होंने मुझे दोबारा अपनी टाँगों पर खड़ा कर दिया। यह बार-बार की यातना करीब एक घंटे चली। तभी रुकी, जब वे हांफने लगे, उनका खूब पसीना बहने लगा। हथकड़ियों से मेरी कलाइयों की त्वचा बहुत छिल गयी, बेड़ियों से मेरे पैर छिल गये, खून रिसने लगा। मुझे इतना ज़्यादा दर्द हो रहा था कि मैं पसीने से तर हो गयी थी, जब यह नमकीन पसीना मेरे घावों तक पहुंचता तो लगता जैसे एक ब्लेड से मेरे टुकड़े किये जा रहे हों। लगा जैसे मेरी पीठ की नसों को खींच कर अलग कर दिया गया है, मेरे कंधे अपनी जगह से खिसक गये हैं, मुझे तानकर इतना फैला दिया गया कि मैं फट ही जाऊँ। उस वक्त मैं हांफ रही थी, मुझे नहीं पता था कि अगले मिनट या फिर अगले सेकंड मैं ज़िंदा रहूँगी या नहीं, मौत का खतरा गहराई तक परेशान कर रहा था, अपने मन में, मैं परमेश्वर को पुकारे बिना नहीं रह सकी, "हे परमेश्वर! मुझे बचाओ, मुझे बचाओ!" फिर मैंने परमेश्वर के वचनों को याद किया, "जब लोग अपने जीवन का त्याग करने के लिए तैयार होते हैं, तो हर चीज तुच्छ हो जाती है, और कोई उन्हें हरा नहीं सकता। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 36')। परमेश्वर के वचन ने मेरे मन में उजाला भर दिया। मुझसे परमेश्वर को धोखा दिलवाने के लिए पुलिस मेरे शरीर को नष्ट कर देना चाहती थी। यह शैतान की चालों में से एक थी, और मैं उसमें फंस नहीं सकती थी। मुझे कैसी भी यातना दी जाए, मेरी जान चली जाए, तो भी मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना है, अडिग रहना है, परमेश्वर की गवाही देनी है, और शैतान को नीचा दिखाना है। यह विचार मन में आते ही, मेरा दर्द कम हो गया, मुझे उतनी पीड़ा या दुख भी महसूस नहीं हुआ। इसके बाद, एक अफसर ने मुझे खड़े होने का आदेश दिया, और बोला, "अगर तू हामी नहीं भरेगी, तो हम तुझे खड़ी ही रखेंगे। देखते हैं, तू कब तक ज़िद पकड़े रहती है!" इसलिए मुझे अंधेरा होने तक खड़े रखा गया। उस शाम, जब मैं टॉयलेट गयी, तो बेड़ियों के कारण मेरे पाँव सूजे हुए थे, मेरे घावों से पीप और खून रिस रहा था। मैं थोड़ा-थोड़ा करके पाँव सरका पा रही थी, थोड़ा-सा भी सरकाने पर दर्द होता था। 30 मीटर आगे जाकर लौटने में मुझे करीब एक घंटा लग गया था, मेरे पीछे खून की लकीर खिंच गयी थी। उस रात, मैं अपने हाथों से सूजी हुई टाँगों को लगातार रगड़ती रही। मैं न उन्हें फैला सकती थी, न ही अंदर खींच सकती थी, ज़रा भी आराम नहीं था। मगर जिस बात का सुकून मुझे मिला, वह यह था कि परमेश्वर के वचन के मार्गदर्शन से मैंने परमेश्वर को धोखा नहीं दिया।

तीसरे दिन सुबह, एक महिला पुलिस आकर मेरे सामने पालथी मोड़कर बैठ गयी, और मनाने के लहज़े में बोलने लगी, "तू भूखी है क्या? कुछ खाने को लाऊँ?" मैंने सोचा, "तू तो मुर्गी के घर में तोहफा लाने वाली एक मादा नेवला है—तू नेकनीयत नहीं है। तू नर्म और सख्त दोनों तरीकों से, मुझसे भाई-बहनों और परमेश्वर को धोखा दिलाने की कोशिश कर रही है। मगर तू मुझे बेवकूफ नहीं बना सकेगी।" मैंने उसे अनदेखा कर दिया, तो उसने सीधे पूछ लिया, "कुछ ऐसा है जो तू उन लोगों को नहीं बताना चाहती, तो मुझे बता सकती है। क्यों नहीं सच बता कर जल्दी यहाँ से निकल लेती? तू कलीसिया की अगुआ है क्या? तेरी ज़िम्मेदारी क्या है? तू किन लोगों के संपर्क में है? उनके नाम क्या हैं?" मैंने जवाब नहीं दिया, तो उसने मुझे गुस्से से लात मारी और चली गयी। थोड़ी देर बाद, मुख्य पुलिस अफसर ने नाराज़ होकर कहा, "ये अगर नहीं बताती, तो इससे भी वही बर्ताव करो।" उन्होंने मुझे यातना देने का वही तरीका फिर इस्तेमाल किया। जब भी मैं गिर पड़ती, मुख्य पुलिस अफसर हँसते हुए कहता, "यह मुद्रा अच्छी है, इस मुद्रा में ये मुझे अच्छी लगती है। फिर से कर!" मुझे दोबारा ऊपर उठाया गया, मैं फिर से गिर पड़ी। हर बार मेरे गिरते ही, वे लोग ज़ोर का ठहाका लगाते। उनके इस तरह मेरा मज़ाक बनाने और मखौल उड़ाने से मैं गुस्से से जल उठती। शैतान मुझे जितनी यातना देता, उतना ही साफ़ मैं उसका भद्दा चेहरा देख पाती, उससे नफ़रत करती और उसे छोड़ देती। मेरे मुँह से उन्हें कलीसिया की कोई भी जानकारी नहीं मिल पायेगी। मेरे पूरे शरीर में सूजन और पैरों में कमज़ोरी के कारण, कभी-कभी मेरा संतुलन बिगड़ जाता, मैं खुद को संभाल नहीं पाती, और तुरंत गिर पड़ती, इससे मेरा सिर और कंधे ज़ोर से फर्श पर टकरा जाते, फिर दो पुलिस अफसर मिलकर मेरा सिर पकड़कर उठा देते, एक और अफसर लकड़ी की छड़ी पर दबा कर कदम रखता, जिससे लगता कि मेरी सारी मांसपेशियाँ एक ही झटके से बाहर निकल जाएंगी, मेरे हाथ-पैर मेरे शरीर से खींच लिये जाएंगे, मेरा सिर दर्द से फटने वाला था, मुझमें चीखने की शक्ति भी नहीं थी, मेरे माथे से पसीने की बड़ी-बड़ी बूँदें टपक रही थीं। उन्होंने मुझे करीब एक घंटे तक ऐसी यातना दी, थककर चूर होने और पसीना बहाने तक वे नहीं रुके। मैं ऊपर देखते हुए पीठ के बल गिर पड़ी। लगा मानो आसमान चक्कर खा रहा हो, लगातार कांपती रही। मैं नमकीन पसीने में इतना नहा चुकी थी कि अपनी आँखें भी नहीं खोल सकी, मेरे पेट में इतनी मतली हो रही थी कि मुझे उल्टी-सी लग रही थी, मुझे लगा मैं मरने ही वाली हूँ। मैं मन-ही-मन रोते हुए परमेश्वर को पुकारे बिना नहीं रह सकी, "हे परमेश्वर! मैं इसे और देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकती। मेरा जीना या मरना तुम्हारे हाथ में है, लेकिन यहूदा बनने और शैतान के षड्यंत्र को कामयाब होने देने से बेहतर होगा मैं मर जाऊँ। विनती करती हूँ, मुझे रास्ता दिखाओ!" उस पल, परमेश्वर ने अपने वचनों को याद करने में मेरी मदद करके मुझे प्रबुद्ध किया, "तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : 'क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।' तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से कोई भी इनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज, तुम उनकी सच्ची महत्ता से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे, और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, और इसीलिए, इस देश में, परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को इस प्रकार अपमान और अत्याचार का शिकार बनाया जाता है, और परिणामस्वरूप, ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में, पूरे किए जाते हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?')। परमेश्वर के वचनों ने मुझे समझाया कि कम्युनिस्ट पार्टी के दानवी शासन वाले इस देश में परमेश्वर पर विश्वास रखने और उसका अनुसरण करने का अर्थ है कि यकीनन हमें बहुत नीचा दिखाया जाएगा और यातना सहनी होगी, लेकिन परमेश्वर, शैतान के दमन का प्रयोग, विजेताओं का एक समूह बनाने के लिए करता है, और इस तरह शैतान को हरा देता है। मैं फिलहाल कम्युनिस्ट पार्टी के उत्पीड़न का अनुभव कर रही थी। अब मेरे पास शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही देने का मौक़ा था, जो कि एक शानदार और मेरे सम्मान की भी बात है, इसलिए मुझे परमेश्वर की गवाही देनी है और शैतान को नीचा दिखाना है। परमेश्वर के वचन के मार्गदर्शन में मेरे पास आस्था और शक्ति थी, मैं अपने दिल में, शैतान से यह घोषणा कर सकी थी, "तू दुष्ट दानव है, मैंने ठान ली है, तू मुझे कैसी भी यातना दे, मैं तेरे आगे कभी समर्पण नहीं करूँगी। मैं अपने जीवन की कसम खाती हूँ कि परमेश्वर के साथ खड़ी रहूँगी!"

इसके बाद, जब पुलिस ने देखा कि मैं अब भी हाँ नहीं कर रही हूँ, तो वे यातना के औज़ार बाहर निकालकर मुझ पर चिल्ला पड़े, "चल, खड़ी हो जा! देखता हूँ तू कब तक ज़िद पर अड़ी रहती है। यह घिसाई की लड़ाई है, मुझे शक है कि तू जीत पायेगी!" बड़ी मुश्किल से खड़े होने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था, लेकिन मेरे पैर सूजे हुए और बहुत दर्द भरे थे, मैं अपने-आप खड़ी नहीं हो सकी, इसलिए मुझे दीवार का सहारा लेना पड़ा। उस दोपहर, एक पुलिस अफसर ने मुझसे कहा, "ज़्यादातर लोग ऐसी यातना के एक दौर के बाद टूट जाते हैं। तू बहुत सख्त है। टाँगों की ऐसी हालत होने के बावजूद तू अभी भी बोल नहीं रही है। मुझे नहीं पता तुझे ऐसी मज़बूती कहाँ से मिल रही है।" मुझे पता था कि यह शक्ति मुझे परमेश्वर ने दी थी, मैंने मन-ही-मन परमेश्वर का धन्यवाद किया। बाद में, उसने फिर से धमकी दी, "मैंने अपने समय में बहुत-से लोगों को तोड़ा है। क्या तू वाकई मुझसे लड़ना चाहती है? तूने हामी नहीं भरी, तो भी हम तुझे 8 या 10 साल की सज़ा दिलवा सकते हैं, यहाँ के लोगों से मैं तुझे पिटवा सकता हूँ, तुझे नीचा दिखा सकता हूँ, हो सकता है तुझे मरवा भी दूं!" मैंने मन में सोचा, "सब-कुछ परमेश्वर के हाथ में है, मेरी ज़िंदगी और मौत का आख़िरी फैसला परमेश्वर के हाथ में है। भले ही आप मुझे 8-10 साल की सज़ा दिलवा दें, भले ही पिटवा-पिटवा कर मेरी जान ले लें, मैं कभी भी परमेश्वर को धोखा नहीं दूँगी।" जब उसने मेरा मौन देखा, तो गुस्से से अपनी जांघ पर थाप लगाया, पैरों से ज़मीन को कुचला, और बोला, "तुझसे निपटने में मैंने कितने दिन पहले ही गँवा दिये हैं। अगर सब लोग तेरे जैसे हों, तो मेरा काम करना मुश्किल हो जाएगा!" मैं बहुत खुश थी, क्योंकि मैंने देखा कि शैतान शक्तिहीन था, और वह परमेश्वर को कभी नहीं हरा सकता। मैं परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकी, "परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी अन्य शक्ति से जीत सकती है; इससे भी अधिक, यह किसी भी शक्ति से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसकी जीवन शक्ति को किसी भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है')। उस दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों के अधिकार और सामर्थ्य का खुद अनुभव किया। इन तीन दिनों में खाने-पीने की बात तो दूर रही, मैं सो भी नहीं पायी, मुझे बहुत क्रूर यातना दी गयी, मगर मैं अब तक टिकी रह सकी थी। यह पूरी तरह से परमेश्वर की दी हुई शक्ति के कारण था। अब मुझमें शैतान के सामने परमेश्वर की गवाही देने का और अधिक आत्मविश्वास था।

चौथे दिन सुबह, पुलिस ने मुझे दोनों हाथ सीधे फैलाकर घोड़ी की मुद्रा में रहने का आदेश दिया, फिर उन्होंने मेरे हाथों के पीछे वाले हिस्से के साथ एक लकड़ी का छड़ लगा दिया। थोड़ी ही देर में, मेरे न संभाल सकने के कारण लकड़ी का छड़ फर्श पर गिर गया। उन्होंने उसे उठाकर मेरे हाथों और घुटने के जोड़ों पर बेरहमी से पीटा। हर ठोकर ने मुझे चीरने वाला दर्द दिया, फिर उन्होंने मुझे दोबारा घोड़ी की मुद्रा में आने को कहा। लेकिन कई दिनों से लगातार यातना दिये जाने के कारण मेरी टाँगें सूजी हुई थीं, बहुत दर्द हो रहा था, इसलिए जल्दी ही मेरे पैरों ने जवाब दे दिया, मैं धम्म से फर्श पर गिर पड़ी। उन्होंने मुझे फिर ऊपर उठाया और जान-बूझकर छोड़ दिया, मैं फर्श पर बैठने की मुद्रा में वापस गिर पड़ी। कई बार गिरने के बाद, मेरे नितंब इतनी बुरी तरह घायल हो गये कि उन पर हाथ लगते ही ज़बरदस्त दर्द होता और मेरा पूरा शरीर पसीने से तर हो जाता। उन्होंने इस तरह एक घंटे और मुझे यातना दी। इसके बाद, उन्होंने मुझे फर्श पर बैठने का आदेश दिया, मुझे पिलाने के लिए नमकीन पानी का एक बड़ा कटोरा ले आये। मैंने पीने से इनकार कर दिया, तो एक पुलिसवाले ने एक हाथ से मेरे सिर को पीछे दबा कर रखा, और दूसरे हाथ से जबरन मेरा मुँह खोल दिया, एक दूसरे पुलिसवाले ने मेरे गाल खींचे और नमकीन पानी मेरे मुँह में डाल दिया। नमकीन पानी कड़वा और कसैला था, गले से उतरते ही लगा जैसे मेरे पेट में आग लग गयी है, मुझे इतनी तकलीफ हुई कि मैंने रोना चाहा। मेरा दर्द देखकर वे क्रूर ढंग से बोले, "जानती है, हमने तुझे नमकीन पानी क्यों पिलाया है? क्योंकि तूने बहुत दिन से कुछ खाया नहीं, तेरे शरीर में पानी नहीं है, पिटाई से तू मर भी सकती है, इसलिए हमने तुझे नमकीन पानी दिया है।" उनकी यह बात सुनकर, मुझे एहसास हुआ कि वे मुझे थोड़ी-थोड़ी यातना देकर मार डालना चाहते थे। मैंने सोचा, वे मेरे मन जाने तक यातना दें, इससे अच्छा मैं खुद क्यों न किसी दीवार पर सिर ठोक-ठोककर अपनी जान दे दूँ, लेकिन मुझमें खड़े हो सकने की भी ताकत नहीं बची थी। मुझे लगा, हालत बहुत खराब है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। मैं नहीं जानती अब पुलिस मुझे कौन-सी यातना देगी, लेकिन मैं अपना जीवन आपके हवाले कर दूँगी। मैं विनती करती हूँ, मेरे साथ ही रहना।" प्रार्थना करने के बाद मैंने परमेश्वर के वचन की एक पंक्ति को याद किया, "कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता, और किसी का भी अपनी नियति पर नियंत्रण नहीं है, क्योंकि केवल वही, जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, ऐसा करने में सक्षम है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है')। सच है, परमेश्वर ही सब मनुष्यों के भाग्य पर नियंत्रण करता है। सबके जीवन और मृत्यु को परमेश्वर ने पहले से निर्धारित कर रखा है। इस मामले में कोई दखल नहीं दे सकता, न ही हम अपने लिए कोई फैसला कर सकते हैं। मेरे जीवन और मृत्यु का निर्धारण परमेश्वर ने कर रखा है, पुलिस ने नहीं, इसलिए मैंने अपना जीवन परमेश्वर के हाथों सौंपना चाहा, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन करना चाहा। ऐसा सोचने के बाद, अब मुझे उतनी हताशा महसूस नहीं हुई, और मेरे दिल में बड़े लाल अजगर के प्रति भयंकर गुस्सा भर गया। ये दानव ऐसे नीच तरीके इस्तेमाल करके मुझसे जबरन परमेश्वर को धोखा दिलवाना चाहते हैं, मैं उनकी चाल को कामयाब नहीं होने दे सकती। मुझे पहले ही इतनी यातना दी चुकी है, मैं अपने भाई-बहनों को यह भुगतने नहीं दे सकती।

इन दानवों ने न सिर्फ मेरे साथ खेलकर मुझे यातना दी, उन्होंने मेरा अपमान भी किया। रात में, एक पुलिस अफसर मेरे पास आया, मेरा चेहरा छूने के लिए उसने हाथ आगे बढ़ाया और ऐसा करते हुए उसने मेरे कानों में अश्लील बातें फुसफुसायीं। मुझे इतना गुस्सा आया कि मैंने उसके चेहरे पर थूक दिया, इसके बाद उसने डरावने ढंग से मुझे इतनी ज़ोर से थप्पड़ मारा कि मुझे दिन में तारे दिखने लगे और कान बजने लगे। उसने क्रूर आवाज़ में कहा, "हमारे पास अभी भी तेरे लिए यातनाओं की लंबी सूची है। हम तुझे यहाँ मार भी डालें, तो भी कोई नहीं जान पायेगा। देखती जा, तुझे भर-भर के यातना देंगे!" उस रात, मैं ज़मीन पर पड़ी रही, सरक नहीं पा रही थी, मैंने टॉयलेट जाना चाहा। उन्होंने मुझे अपने-आप उठने को कहा। अपनी पूरी ताकत लगाकर मैं धीरे-धीरे खुद को उठा सकी, लेकिन एक कदम आगे रखते ही मैं लुढ़क गयी। और कोई चारा न होने के कारण, एक महिला अफसर मुझे घसीटकर बाथरूम ले गयी। वहां थोड़ी देर में ही मैं बेहोश हो गयी। जब मुझे होश आया, तो मैं कमरे में थी। मैंने देखा मेरी टाँगें सूजी हुई और चमकीली थीं, हथकड़ियाँ, बेड़ियां शरीर में अंदर तक धंसी हुई थीं। घावों से पीप और खून रिस रहा था, दर्द इतना ज़्यादा था कि मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैंने यातनाओं की उस सूची के बारे में सोचा जिसका ज़िक्र वो पुलिस अफसर कर रहा था, मुझे थोड़ा डर लगा, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! मैं नहीं जानती ये दानव मुझे आगे कैसी यातनाएँ देना चाहते हैं, अब सच में मैं ऐसी यातना नहीं सह सकूँगी। मुझे रास्ता दिखाओ, मुझे आस्था और शक्ति दो। मैं तुम्हारी गवाही देना चाहती हूँ, शैतान को नीचा दिखाना चाहती हूँ।" प्रार्थना करने के बाद, मैंने वो कष्ट याद किये, जो मानवजाति को बचाने के लिए दो बार देहधारी हुए परमेश्वर ने सहे थे। अनुग्रह के युग में, मानवजाति को छुटकारा दिलाने प्रभु यीशु आया, तो उसका मखौल उड़ाया गया, उसे नीचा दिखाया गया, और सैनिकों ने उसे कोड़े मारे, फिर उसे काँटों का ताज पहनाया गया, और आखिरकार सूली पर चढ़ा दिया गया। आज, परमेश्वर देहधारी होकर चीन में वापस लौटा है, यहाँ उसे कम्युनिस्ट पार्टी का उत्पीड़न और उसका पीछा सहना पडा है, धार्मिक दुनिया का अंधाधुंध विरोध और निंदा सहनी पड़ी है। इसके बावजूद, परमेश्वर चुपचाप ये सब सहता है, और मानवजाति को बचाने के लिए सत्य व्यक्त करता है। मैंने परमेश्वर के वचनों के एक और अंश को याद किया, "मानवजाति के कार्य के लिए परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुज़ारी हैं। गहन ऊँचाई से लेकर अनंत गहराई तक, जीते-जागते नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वह मनुष्य के साथ अपने दिन गुज़ारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच अपनी फटेहाली की शिकायत नहीं की है, अपनी अवज्ञा के लिए कभी भी मनुष्य को तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपने कार्य को करते हुए सबसे बड़ा अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का अंग कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही आराम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने का अन्याय झेला है, मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से 'नरक' और 'अधोलोक' में, शेर की माँद में, प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है?" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (9)')। हाँ। परमेश्वर निष्छल है, भ्रष्ट इंसान को बचाने के लिए उसने बहुत अत्याचार सहे हैं, उसे बहुत नीचा दिखाया गया है। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत महान और बहुत नि:स्वार्थ है! अब, मैं अपने उद्धार के लिए परमेश्वर और सत्य का अनुसरण कर रही हूँ, तो मेरे थोड़े-से कष्टों से क्या फर्क पड़ता है? इस कष्ट के जरिये, परमेश्वर ने मेरी इच्छा को संवारा और मेरी आस्था को पूर्ण किया, मैंने यह भी अनुभव किया कि परमेश्वर के वचन ही लोगों के जीवन की शक्ति हैं। मैं इस कष्ट का अनुभव कर पायी, यह परमेश्वर की कृपा और उसका वरदान है। मैंने मन-ही-मन एक भजन गाया, "परमेश्वर मेरा सहारा है, क्यों डरूं? अंत तक शैतान के साथ लड़ूँगा। परमेश्वर हमें उठाता है, इसलिए सब कुछ पीछे छोड़ो, मसीह के लिए गवाही देने के लिए लड़ो। परमेश्वर मेरा सहारा है, क्यों डरूं? अंत तक शैतान के साथ लड़ूँगा। परमेश्वर हमें उठाता है, इसलिए सब कुछ पीछे छोड़ो, मसीह के लिए गवाही देने के लिए लड़ो। परमेश्वर पृथ्वी पर अपनी इच्छा निश्चित ही पूरी करेगा। मैं उसे अपना प्यार, वफ़ादारी, समर्पण दूँगा। जब वह महिमा में आएगा, तो मैं उसकी वापसी का स्वागत करूंगा, जब मसीह का राज्य साकार होगा, मैं उससे फिर से मिलूंगा" ("मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ" में ' राज्य')। यह भजन गाने के बाद, मुझमें एक नया जोश आ गया। पुलिस मुझे कैसी भी यातना दे, मैं अडिग रहूँगी, गवाही दूंगी, और शैतान को नीचा दिखाऊंगी!

पांचवें दिन भी, पुलिस मुझे घोड़ी की मुद्रा में खड़ी करती रही। मेरी टाँगें और पैर इतने सूज गये थे कि अब मैं खड़ी नहीं हो सकी, इसलिए बहुत-से अफसर मुझे घेरकर अपने बीच इधर-से-उधर धक्के देते रहे। उनमें से कुछ ने मौके का फायदा उठाकर मेरे शरीर को यहाँ-वहाँ छुआ-दबाया। मुझे चक्कर आ रहे थे, सब कुछ धुंधला लग रहा था, आँखें नहीं खोल पा रही थी, फिर भी यातना जारी रही। शाम को करीब 7 बजे, एक पुलिसवाले ने मेरे सामने बैठकर, अपना जूता उतारा, बदबूदार पैर मेरे मुंह के सामने रखा, और अश्लील बातें बोलने लगा। मैंने उसके अश्लील बोल सुने, उसकी बेशर्म और दुष्ट शक्ल को देखा, और गुस्से से तमतमा गयी। मुझे इन दुष्ट दानवों से नफ़रत हो गयी! शाम को करीब 9 बजे, मुझे नींद आने लगी। पुलिसवाले विजयी आवाज़ में बोले, "आखिरकार तेरी आँख लग रही है! तू सोना चाहती है, मगर हम सोने नहीं देंगे! हम तेरे टूटने तक तुझे जगाये रखेंगे! देखें तो सही, तू कब तक टिकती है!" कई पुलिस अफसरों ने बारी-बारी से मुझ पर नज़र रखी। जैसे ही मैं आँखें बंदकर सोने को होती, वे चमड़े की चाबुक से मेज़ को ठोकते, लकड़ी की छड़ से मेरी सूजी हुई, चमकती टाँगों को पीटते, मेरे बाल खींचते, या मेरे पैरों पर कूदते, और हर बार मुझे अचानक जगा देते। कभी-कभी वे मेरी बेड़ियों पर लात मारते, मेरी बेड़ियाँ पके हुए घावों को छूतीं, और मैं दर्द से काँप जाती। आखिरकार, मुझे भयानक सिरदर्द हो गया, लगा जैसे कमरा ही घूम रहा है। मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया, मैं ज़मीन पर गिर पड़ी और बेहोश हो गयी। जागने के बाद, मुझे कुछ-कुछ लगा जैसे डॉक्टर कह रहा हो, "इसने ऐसा क्या अपराध कर डाला कि आपने उसे इतनी बुरी तरह से यातना दी? इतने दिनों तक सोने या खाने न देना? यह सिर्फ क्रूरता है! हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ पहले से ही इसके शरीर में धंसी हुई हैं। अब ये इन्हें और नहीं लगा सकती, वरना मर जाएगी।" डॉक्टर के जाने के बाद, पुलिस ने बदलकर मुझे ढाई किलो की बेड़ियाँ पहना दीं, कुछ दवाइयां भी दीं, तब जाकर मुझे होश आया। मैं जानती थी कि मैं बच पायी तो सिर्फ इसलिए कि परमेश्वर सामर्थ्यवान है, और वह चुपचाप मेरी रक्षा कर रहा था। मेरा जीवन परमेश्वर के हाथों में था, उसकी अनुमति के बिना, शैतान ने मुझे जो भी यातना दी हो, वह मेरी जान नहीं ले सका। इससे परमेश्वर में मेरी आस्था और ज़्यादा बढ़ गयी, मैंने फैसला किया कि जब तक मेरी साँस चलेगी, मैं कभी भी शैतान के आगे नहीं झुकूंगी।

मैं छठे दिन तक टिकी रही, फिर मैं खुद को रोक नहीं सकी और मुझे लगातार नींद आती रही, हर बार कोई एक पुलिसवाला मेरे पैर की उँगलियों पर जोर से पैर दे मारता, मेरे हाथों के पीछे चिकोटी काटता, या मेरे गालों पर ज़ोर से थप्पड़ मार देता। दोपहर में, पुलिस मुझसे कलीसिया की जानकारी मांगती रही। उस वक्त, वास्तविकता पर मेरी पकड़ ढीली होती जा रही थी, मुझे डर लगा कि कहीं अनजाने ही दुविधा की हालत में, मैं कलीसिया की जानकारी न दे डालूँ, इसलिए मैंने फ़ौरन परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! यातना के कारण मेरा दिमाग़ नहीं चल रहा है। विनती करती हूँ, मेरी रक्षा करो, मेरे मन को साफ करो, ताकि कुछ भी हो जाए, मैं अपने भाई-बहनों के साथ धोखा न करूँ।" मेरी प्रार्थना सुनने के लिए मैंने परमेश्वर का आभार माना। हालांकि मुझे छह दिन और पांच रात तक खाये, पिये, सोये बिना यातना दी गयी, मेरा मन अभी भी बहुत साफ था, पुलिसवालों ने मुझे जैसी भी यातना दी हो, मैंने उन्हें कुछ भी नहीं बताया। बाद में, मुख्य पुलिस अफसर मेरी लिखी हुई सुसमाचार के लक्ष्यों की एक सूची लाकर मुझसे पूछताछ करने लगा, दूसरे साथियों के नाम पूछने लगा। मैं इन दानवों की यातना बहुत झेल चुकी थी, यही यातना मैं अपने दूसरे भाई-बहनों को नहीं झेलने देना चाहती थी, इसलिए उसकी नज़र बचाकर मैंने सूची झपट ली, और मुँह में डाल कर निगल लिया। दोनों पुलिस अफसर भयानक गुस्से से चीख पड़े। वे फ़ौरन मेरे पास आये, मेरे मुंह पर ज़ोर से चिकोटी काटी, और चेहरे पर ज़बरदस्त थप्पड़ जड़ दिया, इतने जोर से मारा कि मेरे मुँह के कोने से खून निकलने लगा, मेरा सिर चकराने लगा। उनमें से एक ने मेरे गालों और ठुड्डी को जकड़ लिया, दूसरे ने जबरन मेरा मुँह खोला, और उसके अंदर उंगली घुमाकर बाहर सूची निकालने की कोशिश करने लगा। उसने ऐसी ज़बरदस्ती की कि मेरा गला अंदर से छिल गया, उसके कारण मुझे अभी भी फैरिंजाइटिस है। इतनी बार पूछताछ करने के बावजूद उन्हें कलीसिया की कोई जानकारी नहीं मिल पायी थी, इसलिए पुलिस ने मुझे वापस डिटेंशन हाउस ले जाने का फैसला किया। डिटेंशन हाउस में पुलिस ने देखा कि मैं बहुत बुरी तरह से ज़ख़्मी हूँ, कहीं मैं वहां रहते हुए मर न जाऊँ, इस डर से उन्होंने ज़िम्मेदारी लेने और मुझे वहां रखने से इनकार कर दिया, इस कारण से उनके पास मुझे अस्पताल ले जाकर ऑक्सीजन पर रखने के सिवाय कोई चारा नहीं था। अस्पताल के बरामदों में, बहुत-से लोग मुझे देखकर मेरी हालत पर चर्चा करने आते। पुलिसवाले मेरी ओर इशारा करके कहते, "यह परमेश्वर में विश्वास रखती है, अच्छी तरह से देख लो। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास रखोगे, तो तुम्हारा भी यही हाल होगा।" मैं उनकी बात काटने के लिए कुछ कहना चाहती थी, मगर बोल सकने की हालत में नहीं थी। मैंने सोचा, "आप सब दुष्ट हैं, आप लोगों को धोखा देने के लिए झूठ फैलाते हैं।" इसके बाद, पुलिस मुझे वापस डिटेंशन हाउस ले गयी, जहां मैं दो बार और बेहोश हो गयी।

अक्तूबर के आख़िरी दिनों में, जब पुलिस हमें डिटेंशन सेंटर ला रही थी, तो मैं बहन ली से मिली, जिसे मेरे ही साथ गिरफ़्तार किया गया था। देखा कि वह बहुत दुबली हो गयी है, वह डगमगाते हुए चल पा रही है, मानो किसी भी पल हवा उसे उड़ा ले जाएगी, मैं अपनी आँखों से बहती आंसुओं की धार को नहीं रोक सकी। जब हम डिटेंशन सेंटर पहुँचे, तो मैंने बहन ली के हाथों और पैरों में, नीली और बैंगनी खरोंचें देखीं। उसने बताया कि पुलिस ने उसे पीटा, लातें मारीं, कई दिनों तक उसे खाने-पीने नहीं दिया, दूसरी बहन तो गिरफ़्तार होते ही बीमार पड़ गयी थी। वह अपनी खाने की प्लेट भी नीचे नहीं रख पा रही थी, यातना के कारण वह इतनी पतली हो गयी थी कि उसे पहचानना मुश्किल था। यह बताते हुए बहन ली रो पड़ी। मैंने इन दानवों से दिल की गहराई से नफ़रत की!

आखिर में, कम्युनिस्ट पार्टी ने मुझ पर "शी जियाओ संगठन में भाग लेने" का आरोप लगाया, और मुझे कड़ी मेहनत वाली पुन:शिक्षा की एक साल नौ महीने की सज़ा सुना दी। बुरी तरह यातना दिये जाने के कारण मेरे शरीर में हर जगह ज़ख्म थे, लकवा मार गया था और मैं चल नहीं पा रही थी, इसलिए लेबर कैंप ने मुझे वहां रखने से इनकार कर दिया। चार महीने बाद, मेरे पति ने 12,000 युआन खर्च कर मेरी जमानत करवायी, और मेरी सज़ा लेबर कैंप से बाहर ही दी गयी। जब मेरे पति मुझे लेने आये, तो मैं इतनी ज़ख़्मी थी कि चल नहीं पायी। उन्हें मुझे हाथों में उठाकर कार तक ले जाना पड़ा। घर लौटने के बाद, डॉक्टर ने जांच करके बताया कि मेरी रीढ़ की हड्डी के दो लंबर खंड अपनी जगह से सरक गये थे। मैं खुद का ख्याल नहीं रख पा रही थी। मैं बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी। मुझे लगा बाकी ज़िंदगी बिस्तर पर पड़े-पड़े ही कटनी होगी। उम्मीद नहीं थी, पर एक साल बाद, मेरा शरीर धीरे-धीरे ठीक हो गया, मैं दोबारा अपने कर्तव्य निभाने लायक हो गयी। मैंने अपने लिए परमेश्वर का प्रेम और उद्धार देखा, मैंने अपने दिल की गहराई से परमेश्वर का धन्यवाद किया! अभी भी, पुलिसवाले मुझ पर लगातार नज़रें गड़ाये रहते हैं, हो सकता है मुझे फिर से गिरफ़्तार कर लिया जाए, लेकिन मैंने परमेश्वर के वचन के अधिकार और सामर्थ्य को समझ लिया, मैं आस्था के जरिये परमेश्वर पर भरोसा करने और अपने कर्तव्यों को भरसक निभाने को तैयार हूँ, ताकि मैं परमेश्वर के प्रेम की कीमत चुका सकूँ।

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