मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 42.जिन लोगों की परमेश्वर से हमेशा अपेक्षाएँ होती हैं, वे सबसे कम विवेकी होते हैं

यदि आप खुद को समझना चाहते हैं, तो आपको अपनी वास्तविक स्थिति को समझना चाहिए; अपनी स्थिति को समझने में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप अपने विचारों और अभिप्रायों को समझें। काल की हर अवधि में, लोगों के विचार एक प्रमुख चीज़ द्वारा नियंत्रित होते रहे हैं; यदि आप अपने विचारों को पकड़ सकते हैं, तो आप उनके पीछे की चीज़ों को भी पकड़ सकते हैं। कोई भी अपने विचारों और अभिप्रायों को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है। ये विचार और अभिप्राय कहाँ से आते हैं? उनके पीछे क्या इरादे हैं? ये विचार और अभिप्राय कैसे बनते हैं? वे किसके द्वारा नियंत्रित होते हैं? इन विचारों और अभिप्रायों की प्रकृति क्या है? आपके स्वभाव में परिवर्तन होने के बाद, आपके विचार और अभिप्राय, वे इच्छाएँ जिनका आपका हृदय पीछा करता है और इस अनुसरण में आपके दृष्टिकोण जो आपके परिवर्तित हिस्सों से पैदा हुए हैं, अलग होंगे। जो विचार और अभिप्राय उन चीजों से उत्पन्न होते हैं जिनमें आप परिवर्तित नहीं हुए हैं, वे चीजें जिन्हें आप स्पष्ट रूप से नहीं समझते हैं, और जिन चीज़ों को आपने सत्य के अनुभवों से नहीं बदला है - वे सब गंदी, मैली और बदसूरत होती हैं। आजकल जिन लोगों ने कई वर्षों से परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, उनमें इन मामलों की कुछ सूझ और समझ होती है। जिन लोगों ने थोड़े ही समय के लिए परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है वे अभी तक इन मामलों को नहीं समझते हैं; वे अभी भी अस्पष्ट हैं। वे नहीं जानते कि उनका दुर्बल स्थान कहाँ है और किस क्षेत्र में उनका गिर जाना आसान है! आप लोग अभी नहीं जानते कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं, और अन्य लोग कुछ हद तक इसे देख पाते हैं कि आप किस तरह के व्यक्ति हैं, पर इसे आप लोग नहीं भांप सकते। आप लोग अपने सामान्य विचारों या इरादों को स्पष्ट रूप से अलग नहीं कर सकते, और आप लोग स्पष्ट रूप से यह नहीं समझते कि इन मामलों का सार क्या है। जितनी अधिक गहराई से आप एक पहलू को समझते हैं, आप उस पहलू में उतना अधिक बदलेंगे; तो आप जो काम करेंगे वह सच्चाई के अनुसार होगा, आप परमेश्वर की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम होंगे, और परमेश्वर की इच्छा के करीब होंगे। केवल इस तरह से खोज कर आप परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। बहुत से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन वे अपने जीवन-स्वभाव को बदलने पर ध्यान नहीं देते; बल्कि, उनके प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण क्या है और वे परमेश्वर के दिल में एक स्थान रखते हैं या नहीं, वे इन्हीं बातों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे हमेशा अनुमान लगाते रहते हैं कि वे परमेश्वर की दृष्टि में किस प्रकार के व्यक्ति हैं और वे परमेश्वर के दिल में एक दर्जा रखते हैं या नहीं। बहुत से लोग इस तरह के होते हैं, और यदि वे परमेश्वर को देख भी लें, तो वे हमेशा यह देखेंगे कि परमेश्वर उनसे खुशी से बात कर रहे हैं या नाराज़गी से। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हमेशा दूसरों से पूछते हैं: “क्या परमेश्वर ने मेरी कठिनाइयों का उल्लेख किया है? मेरे प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है? क्या वे मेरे बारे में परवाह करते हैं?” और ऐसे लोग हैं जो और भी आश्चर्यजनक हैं, जो नई समस्याओं की खोज करते हैं: “आह, परमेश्वर ने मुझे एक कड़ी नज़र से देखा है, मुझे नहीं पता कि मैंने क्या गलत किया है।” लोग विशेष ध्यान देते हैं इन बातों की ओर। कुछ लोग कहते हैं: “हम एक ऐसे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं जिन्होंने देह धारण किया; अगर वे हमारी ओर ध्यान नहीं देते, तो क्या हमारा काम तमाम नहीं हो जाएगा?” इसका अंतर्निहित अर्थ यह है: यदि हम परमेश्वर के दिल में कोई दर्जा नहीं रखते तो हम किस लिए विश्वास रखते हैं? तो अब हम विश्वास नहीं करेंगे! क्या यह अनुचित नहीं है? क्या आप जानते हैं कि लोगों को परमेश्वर में क्यों विश्वास करना चाहिए? लोग हमेशा परमेश्वर के दिल में रहने के लिए एक जगह की तलाश में रहते हैं और वे कभी भी इस बात पर विचार नहीं करते हैं कि क्या परमेश्वर के लिए उनके दिल में एक जगह है, या खुद वे परमेश्वर से कैसा व्यवहार करते हैं। लोग बहुत अभिमानी और दम्भी हैं! यही वह जगह है जहां लोग सबसे अनुचित हैं, यहां तक ​​कि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस हद तक अविवेकी हैं कि जब वे परमेश्वर को अन्य लोगों के विषय में पूछते हुए पाते हैं, खुद उनके बारे में पूछे या उनके नाम का उल्लेख किये बगैर, या जब परमेश्वर अन्य लोगों के बारे में चिंतित होते हैं और खुद उनके बारे में चिंतित नहीं, या अन्य लोगों के लिए विचार व्यक्त करते हैं लेकिन उनके लिए नहीं, तो वे संतुष्ट नहीं होते और कहते हैं: “मैं अब और विश्वास नहीं कर सकता; इस प्रकार के परमेश्वर तो अधर्मी हैं और वे न्यायपूर्ण या उचित भी नहीं।” वे शिकायत करना शुरू करते हैं, जो लोगों के विवेक की एक समस्या है; वे अपनी सही मानसिकता में नहीं हैं। वे अक्सर कहते तो हैं: मैं परमेश्वर के इंतज़ामों के प्रति समर्पित रहूँगा, परमेश्वर के आयोजन के प्रति समर्पित। चाहे परमेश्वर मुझसे जैसा भी व्यवहार करें, मैं कभी भी शिकायत नहीं करूँगा; परमेश्वर मेरे साथ निपट सकते हैं, मेरी काट-छांट कर सकते हैं और मुझसे न्याय कर सकते हैं। लेकिन जब कोई मामले सचमुच उन पर आते हैं तो वे इस बात को नहीं बना सकते। क्या लोग इस तरह से तर्क करते हैं? लोग खुद को बहुत ऊंचा मानते हैं, और उन्हें लगता है कि वे असाधारण रूप से महत्वपूर्ण हैं। छंटाई और व्यवहार की क्या बात करें, कोई एक नज़र भी अगर सही नहीं दिखती, तो उन्हें लगता है कि कोई आशा ही नहीं बची है। “मैं ख़तम हो गया! मैं अब और विश्वास नहीं करूँगा! परमेश्वर मेरी ओर ध्यान नहीं देते, मुझे कोई उम्मीद नहीं है।” या आवाज़ का एक कड़क स्वर मात्र उनके दिल को चुभ जाता है और वे आशा खो देते हैं और फिर से हतोत्साहित हो जाते हैं, “परमेश्वर ने इस बार एक ऐसे स्वर में मुझसे बात की जो अच्छा नहीं था! शब्दों के भीतर शब्द हैं, शब्दों के भीतर कांटे हैं, और शब्दों के दूसरे अर्थ होते हैं। मुझे लगता है कि परमेश्वर में मेरे विश्वास का कोई महत्व नहीं है, परमेश्वर मेरी ओर ध्यान नहीं देते, इसलिए मेरे लिए अब और विश्वास करना असंभव है।” पिछले समय में कुछ लोगों ने सोचा है: “आप देख रहे हैं कि दूसरे कितने निश्चित हैं परमेश्वर के बारे में, और कैसे वे उन्हें इतना महत्वपूर्ण मानते हैं। अगर परमेश्वर की एक भी नज़र असामान्य थी, तो वे इस बात की जांच करेंगे कि परमेश्वर का इससे क्या तात्पर्य है। वे असाधारण रूप से परमेश्वर के प्रति वफादार हैं और वे उन्हें असाधारण रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं; यह वास्तव में धरती के परमेश्वर को स्वर्ग के परमेश्वर के रूप में मानना है। वे परमेश्वर की एक नज़र को भी असाधारण रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं।” क्या ऐसा है? कुछ लोग बहुत उलझन में हैं; वे कुछ भी स्पष्ट रूप से नहीं देखते हैं। लोगों का कद बहुत छोटा है, यह वास्तव में एक शर्मनाक प्रदर्शन है। लोगों का विवेक इतना दोषपूर्ण है, और उनके पास परमेश्वर से बहुत-सी अपेक्षाएँ हैं, जो अत्यधिक ज्यादा हैं; उनके पास कोई विवेक नहीं है। लोगों ने हमेशा चाहा है कि परमेश्वर इस तरह से और उस तरह से काम करें। वे पूरी तरह से परमेश्वर के पास समर्पित होने या उनकी पूजा करने में सक्षम नहीं हैं। बल्कि, वे अपने स्वयं की झक के मुताबिक अपने अनुचित अनुरोधों के साथ आगे आते हैं; वे परमेश्वर से अनुरोध करते हैं कि वे (परमेश्वर) बहुत सहिष्णु बनें, किसी चीज के बारे में गुस्सा न करें, हमेशा अपने चेहरे पर मुस्कुराहट रखते हुए उन लोगों की निगहबानी करें, और जब परमेश्वर उन्हें देखें, तो उनके लिए प्रबंध करें और उनके साथ संवाद करें। कोई भी समय हो, परमेश्वर हमेशा बात करें, हमेशा अपने गुस्से को रोकें और उन लोगों के प्रति अच्छा भाव दिखाएँ। लोगों की बहुत अधिक अपेक्षाएँ हैं और कई मामलों के बारे में वे झंझट करते हैं। आप लोगों को इन मामलों पर विचार करना चाहिए। क्या मानवीय विवेक दोषपूर्ण नहीं है? न केवल लोग परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था के प्रति पूरी तरह से समर्पण करने और परमेश्वर से सब कुछ स्वीकार कर लेने में असमर्थ हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे परमेश्वर पर अपनी कुछ अतिरिक्त आवश्यकताओं को लागू करते हैं। अगर लोगों की आवश्यकताएँ इन प्रकार की हैं, तो लोग परमेश्वर के प्रति वफ़ादार कैसे हो सकते हैं? वे परमेश्वर की व्यवस्था के सामने कैसे समर्पण कर सकते हैं? यदि लोगों की आवश्यकताएँ इन प्रकार की हैं, तो वे परमेश्वर से कैसे प्रेम कर सकते हैं? सभी लोगों की अपेक्षाएँ हैं कि कैसे परमेश्वर को उनसे प्रेम करना चाहिए, उन्हें बर्दाश्त करना, उनकी निगरानी करना, उनका सरंक्षण करना और उनके लिए परवाह करनी चाहिए, लेकिन उनके पास परमेश्वर को कैसे प्रेम करें, परमेश्वर के बारे में कैसे सोचें, परमेश्वर का कैसे ख्याल करें, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करें, कैसे उन्हें अपने दिल में रखें, और कैसे परमेश्वर की पूजा करें – इसकी कोई आवश्यकता नहीं दिखती है। क्या इन बातों का लोगों के दिल में अस्तित्व है? ये चीजें हैं जो लोगों को करनी चाहिए, तो लोग इन चीजों में मेहनत से आगे क्यों नहीं बढ़ते? कुछ लोग एक समय के लिए उत्साहित होते हैं, लेकिन यह स्थायी नहीं होता; अगर उन्हें थोड़ा झटका लगता है, तो इससे उनकी आशा टूट सकती है और शिकायत हो सकती है। लोगों की बहुत सारी कठिनाइयाँ हैं और बहुत कम लोग हैं जो सच्चाई की तलाश करते हैं और परमेश्वर को प्रेम करते और उन्हें संतुष्ट करते हैं। लोग बस अनुचित हैं और वे अपने स्थानों पर ठीक से खड़े नहीं हैं। इसके अलावा, वे स्वयं को असाधारण रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं: “परमेश्वर हमें अपनी आंख का तारा मानते हैं, उन्होंने मानव जाति को मुक्त करने के लिए अपने एकमात्र पुत्र को क्रूस पर चढ़ाये जाने की अनुमति देने में संकोच नहीं किया; हम बहुत मूल्यवान हैं, परमेश्वर ने हमें वापस लाने के लिए एक उच्च कीमत चुकाई; हम सभी की परमेश्वर के हृदय में एक जगह है, उनका दिल इतना बड़ा है। उनके सारे बच्चे और उनके लोग उनके दिल में एक स्थान रखते हैं, और हम साधारण व्यक्ति नहीं हैं।” लोग खुद को इतना बड़ा मानते हैं, वे सोचते हैं कि वे कितने अच्छे हैं। दरअसल, मूल रूप से इस तरह के कुछ नेता थे, जिन्होंने पदोन्नति के बाद दर्जा हासिल कर यह सोचा था कि: “परमेश्वर मुझे पसंद करते हैं और उन्होंने मुझे एक नेता बनने की अनुमति दी है। मैं ईमानदारी से चलकर परमेश्वर के लिए काम करूँगा और परमेश्वर ने मेरी ओर ध्यान दिया है।” वे अविश्वसनीय रूप से संतुष्ट थे, और परिणामस्वरूप, समय के अंतराल में, उनके असली रंगों का पता तब चला जब उन्होंने कुछ बुरी चीजें कीं। उन्हें घर वापस भेज दिया गया था, और उन्होंने अपने सिर लटकाकर कहा, “आह, परमेश्वर ने मुझे हटा दिया है, मैं बर्बाद हो रहा हूँ, बेहतर होगा कि मैं जल्दी से घर लौट जाऊँ।” अगर उनकी बदसूरत अभिव्यक्तियों का पता चला और उनसे निपटा गया तो वे और नकारात्मक हो गए और अब आगे विश्वास नहीं कर सके। अंत में, उन्होंने सोचा कि “इस दुनिया में मैं किसके करीब हूँ? मेरी माँ और मेरे पिता के अलावा, कोई भी मेरे करीब नहीं है, परमेश्वर ऐसा कुछ भी नहीं करते जो मेरी अपेक्षाओं को पूरा करे, उनके पास कोई पारस्परिक प्रेम या भावना नहीं है। ऐसा कहा जाता है कि परमेश्वर लोगों की कमजोरियों के साथ सहानुभूति करते हैं, तो मुझे इतने छोटे अपराध के कारण क्यों हटा दिया गया?” परिणामस्वरूप, वे निराश हो गए और वे विश्वास नहीं करना चाहते थे। लोगों को स्वयं से तो बहुत ज्यादा अपेक्षा नहीं होती है, लेकिन उन्हें दूसरों से बहुत अपेक्षा होती है। दूसरों को उनके साथ धैर्यवान और सहनशील होना चाहिए, उन्हें पसंद करना चाहिए, उन्हें चीज़ें उपलब्ध करानी चाहिए, उन्हें देख कर मुस्कुराना, उनके साथ उदार रहना चाहिए और उनकी बातें मान लेनी चाहिए। उन्हें कई तरीकों से उनका ध्यान रखना चाहिए, और वे उनसे सख्त नहीं हो सकते हैं, उन्हें भड़का नहीं सकते हैं, या कुछ भी ऐसा नहीं कर सकते हैं जो वे पसंद न करें। मनुष्य के विवेक में कितनी कमी है! लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें कहाँ रहना चाहिए, उन्हें क्या करना चाहिए, उन्हें क्या हासिल करना चाहिए, उनके दृष्टिकोण क्या होने चाहिए, परमेश्वर की सेवा में उन्हें किस स्थिति या पद में खड़े होना चाहिए, और किस स्थान पर उन्हें स्थित होना चाहिए। थोड़ी-सी पदवी पाकर लोग खुद को बहुत बड़ा मानने लगते हैं, और वैसे पद के बिना भी लोग खुद को काफी उच्च मानते हैं। लोग खुद को कभी नहीं समझते हैं। यदि आप लोग अपने-अपने विश्वास को जारी रख सकते हैं, कभी भी शिकायत नहीं करते, और सामान्य रूप से अपने कर्तव्यों को पूरा करते हैं, चाहे आपसे कुछ भी कहा जाए, चाहे आपके साथ कितनी भी कड़ाई से व्यवहार किया जाए और आपको कितना भी अनदेखा किया जाए, तो आप एक परिपक्व और अनुभवी व्यक्ति होंगे, और आप के पास वास्तव में कुछ कद और सामान्य विवेक होगा। आप परमेश्वर से चीजों की अपेक्षा नहीं करेंगे, आपके पास अत्यधिक इच्छा नहीं होगी, और आप उन चीज़ों के आधार पर जिन्हें आप पसंद करते हैं, दूसरों से या परमेश्वर से उनके लिए अनुरोध नहीं करेंगे। इससे पता चलता है कि आपके पास एक हद तक एक व्यक्ति की अनुरूपता है। वर्तमान में आप लोगों की बहुत अधिक आवश्यकताएँ हैं और वे बहुत ज्यादा हैं। आपके कई इरादे साबित करते हैं कि आप सही स्थिति में खड़े नहीं हैं, आपका पद बहुत ऊँचा है, और आपने खुद को अत्यधिक आदरणीय मान लिया है मानो कि आप परमेश्वर से बहुत कम न हों। इसलिए आप से व्यवहार करना मुश्किल है, और यह वास्तव में शैतान की प्रकृति है। यदि ऐसी स्थितियाँ हैं जो आपके भीतर मौजूद हैं, तो आप निश्चित रूप से अधिक बार नकारात्मक हो जाएंगे, आप बहुत कम बार सामान्य होंगे और आपकी प्रगति धीमी हो जाएगी। अन्य लोगों की कम कठिनाइयाँ हैं और वे इतना नहीं सोचते, इसलिए वे जल्दी से प्रवेश करते हैं। वे सरल हैं और इस तरह से कई कठिनाइयों में नहीं पड़ते हैं; लेकिन आप बहुत ज्यादा सोचते हैं, आपका मन और आपकी भावनाएँ भारी हैं और आप बहुत अधिक चीज़ों पर ध्यान देते हैं और परमेश्वर से आपकी बहुत अधिक अपेक्षाएँ हैं। इस प्रकार आपको अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और आपके लिए अधिक बाधाएं होती हैं। इस तरह के व्यक्ति को अंदर प्रवेश करने में कठिनाई होती है। पर कुछ लोग एक समान तरीके से खोज करेंगे चाहे कोई उनके साथ कैसे भी व्यवहार करे; वे बिल्कुल भी प्रभावित नहीं होते। उनके दिल बहुत खुले हैं, इसलिए वे कई कठिनाइयों से ग्रस्त नहीं होंगे; वे सामान्य रूप में प्रवेश करेंगे और उनके लिए उतने अवरोध नहीं होंगे। आप इतने सारे मामलों के बारे में झंझट करते हैं; आज आपको यह बात बुरी लग गई और कल वो। कोई आपको बुरी नज़र से देख सकता है, आपको छोटा समझ सकता है या आपको अनदेखा कर सकता है, या परमेश्वर एक ऐसा वचन कह सकते हैं जो आपको भड़काता है, आप को परेशान कर सकता है, आपको चोट पहुंचा सकता है, आपके आत्मसम्मान को आहत कर सकता है, आपके दिल में सुई चुभा सकता है, या आप जब भोजन करते हों तब हो सकता है आपके साथ सम्मानपूर्वक पेश न आया जाए, या कोई अच्छी चीज़ आप के बदले किसी और को दी जा सकती है। आप बहुत ज्यादा सोचते हैं, आपका दिल बहुत जटिल है, आप बहुत अनुचित हैं, आपकी आन्तरिक सच्चाई बहुत कम है, और आप बहुत मुश्किल हैं और आपसे व्यवहार करना बहुत कठिन है। आपके अन्दर बहुत कमियां हैं; आपको कितना सच समझना होगा और आपको परिवर्तित होने के लिए कितनी देर तक परिशोधन करना होगा? आप बहुत सारी चीजों में लिपटे हैं, आपके विचार असाधारण रूप से जटिल और भारी हैं। इस प्रकार के व्यक्ति को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा और उसे अधिक आँसू बहाने होंगे। इस प्रकार के व्यक्ति के साथ मिलना और सहयोग करना आसान नहीं है। आप लोग इन बातों पर अक्सर संवाद करते हैं और कुछ लोग कहते हैं: “मैं इस तरह के मामले में फिसल गया, और मुझे कुछ कठिनाइयों का सामना करने के बाद समझ में आया।” ज्यादातर लोगों को इस तरह का अनुभव है। इस समझ तक पहुंचने में कई साल लग सकते हैं; यह समझ और परिवर्तन बहुत पीड़ा और परिशोधन के अत्यधिक दर्द के बाद आ सकते हैं। यह बहुत दयनीय है! लोगों के विश्वास में कितने दोष हैं! परमेश्वर में उनका विश्वास करना उनके लिए कितना मुश्किल है! आज भी, हर किसी के अंदर कई दोष हैं। परमेश्वर से आपकी आवश्यकताओं की मात्रा आपके अंदर की अशुद्धियों की मात्रा ही है। ये अशुद्धियां साबित करती हैं कि लोगों के विवेक के साथ कोई समस्या है। वे लोगों की प्रकृति का एक खुलासा भी है। आपको यह समझने में सक्षम होना चाहिए कि लोगों के पास परमेश्वर के प्रति कौन-कौन से अनुरोध उचित हैं और कौन से अनुचित। आपको यह स्पष्ट होना चाहिए कि लोगों को कहाँ खड़ा होना है और उनके पास क्या विवेक होना चाहिए। कुछ लोग इस तरह से हैं, और उनके दिल हमेशा इन बातों को थामे रहते हैं: परमेश्वर किसके प्रति अच्छे हैं और किसके प्रति अच्छे नहीं हैं, या वे किससे नाराज़ हैं। अगर उन्हें पता चलता है कि वे उनके साथ खुश नहीं हैं, या यदि वे अपने बारे में कोई भी बात सुनते हैं, तो वे इसे जाने नहीं देंगे, और चाहे आप उन्हें यह कैसे भी समझाएँ, इसका कोई फायदा नहीं होगा, और वे एक लंबे समय तक दोबारा आने में सक्षम नहीं होंगे। वे तुरंत खुद के बारे में निष्कर्ष पर पहुँच जाएंगे और उनके प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण क्या हैं, यह तय करने के लिए एक ही बात को पकड़ लेंगे। चाहे आप कुछ भी कहें उन्हें यह बताने के लिए कि उन्हें सामान्य रूप से कैसे खोज करनी चाहिए या आगे कैसे आगे बढ़ना चाहिए, वे नहीं समझेंगे कि जो कहा जा रहा है वह उनके लिए है; उन्हें लगेगा कि उन्हें धोखा दिया जा रहा है। यह देखा जा सकता है कि लोग परमेश्वर के न्यायपरायण स्वभाव को ज़रा-सा भी नहीं समझते; वे यही नहीं समझ पाते हैं कि बदलने की एक प्रक्रिया है और लोगों के प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण बदलेगा। यदि परमेश्वर के प्रति आपका रवैया नहीं बदलता, तो क्या आपके प्रति उनका रवैया बदल सकता है? यदि आप बदलते हैं, तो वे आपके प्रति अपने व्यवहार को बदलेंगे। यदि आप नहीं बदलते, तो वे भी नहीं बदलेंगे। ऐसे लोग भी हैं जो अभी भी उन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं समझते हैं जिन्हें परमेश्वर बहुत नापसंद करते हैं और उन चीज़ों को जो उन्हें बहुत पसंद हैं, न ही वे आनंद, क्रोध, दुःख और खुशी की उनकी भावनाओं को समझते हैं। “परमेश्वर सर्वशक्तिमान और ज्ञानवान हैं; वे इतने ज्ञानी है कि लोग स्पष्ट रूप से इसे जान ही नहीं पाते हैं।” लोगों को लगता है कि वे स्पष्ट रूप से समझने में असमर्थ हैं। लोगों के साथ बस यही मुश्किल है। लोग उनसे कही गई नेक और भली सलाह को याद नहीं रखते; अगर एक कठोर शब्द उनसे कहा जाता है, या यदि उनसे छंटाई, निपटने और न्याय करने के बारे में बातें कही जाती हैं तो वे बातें उनके दिल को चुभ जाती हैं। तो लोग सकारात्मक मार्गदर्शन को गंभीरता से क्यों नहीं लेते? वे आकुल और नकारात्मक क्यों हो जाते हैं, और वे निर्णय और छंटाई और निपटने के कुछ शब्दों को सुनने के बाद फिर क्यों नहीं उठ पाते हैं? अंत में, वे लंबे समय के लिए विचार करने के बाद लौट सकते हैं; और वे केवल सुखदायक शब्दों के एक वाक्यांश की मदद से ही वास्तविकता के प्रति जाग जायेंगे। दिलासा के इन शब्दों के बिना, वे नहीं उठेंगे। जब लोग अनुभव करना शुरू करते हैं, तो उन्हें बहुत गलतफहमी और मिथ्या धारणा होती हैं; लोग हमेशा सोचते हैं कि वे सही हैं, और वे अन्य लोगों की बात नहीं सुनेंगे, चाहे वे जो कुछ भी कहें। तीन से पांच साल का अनुभव करने के बाद, वे धीरे-धीरे समझना और स्पष्ट रूप से देखना शुरू करते हैं, और वे महसूस करेंगे कि उनसे निपटना बहुत मुश्किल रहा है, जैसे कि वे अंततः सयाने हो गए हों। बहुत से अनुभव वाले लोग परमेश्वर को समझते हैं और उनके पास थोड़ी ही गलत धारणाएं होती हैं। वे अब शिकायत नहीं करते हैं और वे सामान्य रूप से परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू करते हैं। अतीत में उनके कद के मुकाबले में, वे अब अधिक सयाने महसूस करते हैं। अतीत में, वे छोटे बच्चों की तरह अक्सर गुस्सैल और नकारात्मक थे, परमेश्वर से खुद को दूर करते हुए, अक्सर मन में शिकायत और संदेह रखते थे। अब प्रगति हुई है और उनकी स्थिति पहले की तुलना में अधिक स्थिर है। यह सच्चाई को समझने का नतीजा है और यह सत्य का प्रभाव है जो लोगों पर पड़ता है। इसका अर्थ यह है कि जब तक लोग सत्य को समझते हैं, तब तक वे किसी भी कठिनाइयों का समाधान कर सकते हैं; जब तक लोग सत्य को स्वीकार करने में सक्षम होते हैं, वे किसी भी कठिनाई को हल कर सकते हैं। मुख्य रूप से इसका सम्बन्ध लोगों के अनुभवों और समय से होता है, और यह एक प्रक्रिया का रूप लेता है। अब काम करने के लिए आप लोगों के उपयोग करने का मतलब यह नहीं है कि आप लोगों कद बहुत बड़ा है; आप लोगों में औसत लोगों की तुलना में केवल थोड़े-से बेहतर गुण हैं, आप उनसे थोड़ी-सी अधिक तलाश करते हैं और उनकी तुलना में थोडा अधिक विकासशील मूल्य रखते हैं; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप लोग परमेश्वर के समक्ष समर्पण करने में समर्थ हैं और परमेश्वर के आयोजन को स्वीकार करने में सक्षम हैं, और इसका यह मतलब नहीं है कि आप लोगों ने अपने भविष्य की संभावनाओं और आशाओं को छोड़ ही दिया है। लोग अभी भी इस तरह से विवेकपूर्ण तर्क नहीं करते; आप सभी के पास कुछ नकारात्मक पहलू हैं और आपके काम में कुछ दिक्कतें हैं। ऐसा लगता है कि आप लोग अपनी गलतियों की भरपाई करने की कोशिश कर रहे हैं, आप खुश नहीं हैं और काम करने को तैयार नहीं हैं, और आप लोग उस बिंदु तक नहीं पहुंचे हैं कि चाहे परमेश्वर किसी भी तरह से भी मुझसे व्यवहार करें, मैं अपनी आँखों को बंद कर दूंगा और काम करूँगा, बस परमेश्वर की इच्छा और परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुसार काम करूँगा। क्या आप इसे हासिल कर सकते हैं? लोग इस तरह से नहीं सोचते! हर कोई तलाश करना चाहता है: परमेश्वर का मेरे प्रति कैसा रवैया है? क्या वे सचमुच मुझे इस्तेमाल कर रहे हैं या केवल मेरी सेवा का उपयोग कर रहे हैं? हर किसी का पता लगाने का इरादा है; क्या आप यह कहने की हिम्मत करते हैं कि आपके पास ऐसा कोई इरादा नहीं है? हर कोई करता है, लेकिन कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं करता। यह तथ्य कि आप यह कहने की हिम्मत नहीं करते हैं, इस बात को साबित करता है कि आप किसी और बात के द्वारा नियंत्रित होते हैं: इस बात का कोई फ़ायदा नहीं है, यह मेरी प्रकृति है और यह बदल नहीं सकती। हालांकि, मैं क्या कर सकता हूँ या नहीं कर सकता के विषय में, जब तक मुझे समझ में आ रहा है, तब तक मेरा काम बन गया है। जब तक मैं बुरी चीजें नहीं करता, तब तक मैं ठीक हूं। मेरी अपेक्षाएँ उतनी अधिक नहीं हैं। आप खुद को बस न्यूनतम तक सीमित करते हैं और अंत में, आप कोई प्रगति नहीं करते हैं। जब आप काम करते हैं, तो आप लापरवाही से काम करते हैं, और आखिरकार, कई बार लोगों के साथ संवाद करने के बाद, आप लोग थोड़ा समझते हैं और थोड़ा विवेक आता है। इस्तेमाल किया जाना या न किया जाना और आप के प्रति परमेश्वर के दृष्टिकोण–-ये महत्वपूर्ण चीजें नहीं हैं। मुख्य बात का सम्बन्ध है आपके व्यक्तिपरक परिश्रम से, आप बदल सकते हैं या नहीं उससे, और आपके द्वारा चुने गए पथ से। ये सबसे महत्वपूर्ण चीजें हैं। इसका कोई फायदा नहीं होता जब आपके प्रति परमेश्वर का व्यवहार तो अच्छा हो लेकिन आप स्वयं में परिवर्तन नहीं करते हैं। जब उनका रवैया आपके लिए अच्छा हो, लेकिन कुछ बातों में आप उलझ जाते हैं और आपका पतन हो जाता है, तो इसका कोई लाभ नहीं होता। क्या मुददे की बात अभी भी उस पथ से सम्बंधित नहीं, जिसे आप लेते हैं? अतीत में, शाप, नफरत और घृणा के शब्द आपसे कहे गए हैं, लेकिन आज आप बदल गए हैं, इसलिए उसके बाद से आपके प्रति परमेश्वर का रुख भी बदल गया है। लोग हमेशा भयभीत और असुरक्षित महसूस करते हैं। यह साबित करता है कि वे अभी भी परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते। अब जब यह मामला स्पष्ट है, क्या इस तरह की घटना फिर भी बाद में होगी यदि कुछ बात आप पर आ जाती है? क्या आप लोगों को मनुष्यों की आन्तरिक प्रकृतियों और मानवीय सूझबूझ के प्रत्येक पहलू के बारे में कुछ समझ है? क्या आप लोगों को एक मोटा अनुमान है? अतीत में, कुछ लोगों को कुछ बुरी चीजों के लिए निष्कासित कर दिया गया है और कलीसिया ने उन्हें खारिज कर दिया है। वे वर्षों भटकते हैं, और फिर वे वापस आते हैं। यह अच्छा है कि वे पूरी तरह से भाग नहीं गए हैं; चूंकि वे पूरी तरह से भाग नहीं गए हैं, उनके पास मौका और बचाए जाने की आशा है। यदि वे दूर भाग जाते और विश्वास नहीं करते, और अविश्वासियों की तरह बन गए होते, तो पूरी तरह से उनका काम तमाम हो जाता। अगर वे वापस मुड़ सकते हैं, तो उनके लिए आशा है। यह दुर्लभ और अनमोल है। चाहे परमेश्वर लोगों के साथ कैसे भी काम करें और चाहे लोगों के साथ कैसा भी व्यवहार करें, लोगों से घृणा करें, या लोगों को नापसंद करें, अगर कोई ऐसा समय आता है, जब लोग फिर से बदल सकते हैं, तो मुझे विशेष चैन मिलेगा; इसका मतलब यह है कि लोगों के मन में अभी भी उस हद तक तो परमेश्वर हैं, मानव ने विवेक पूरी तरह से नहीं खोया है, पूरी तरह से मानवता नहीं खोई है, अभी भी वे परमेश्वर में विश्वास करने का इरादा रखते हैं, और कबूल कर परमेश्वर तक लौटने का इरादा रखते हैं। चाहे कोई भी भाग जाएँ, यदि वे वापस आते हैं, और यह परिवार अभी भी उनके दिलों में है, तो मैं थोड़ा भावुक होकर कुछ सांत्वना पाऊँगा; हालांकि, जो लोग कभी वापस नहीं लौटते हैं, वे दयनीय हैं। यदि वे वापस आकर परमेश्वर पर नेकी से विश्वास करना शुरू कर सकते हैं, तो मेरा दिल विशेष रूप से संतुष्टि से भर जाएगा। वे वापस आने में सक्षम थे, और ऐसा लगता है जैसे वे मुझे भूले नहीं हैं और वापस आ गए हैं। उनके पास ऐसे दिल और मन हैं। उस समय जब हम मिलेंगे, मैं द्रवित हो जाऊँगा; जब आप छोड़ गए थे, आप निश्चित रूप से नकारात्मक थे और आपकी स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन अब आप लौट आये हैं, जो साबित करता है कि आप अभी भी परमेश्वर में विश्वास रखते हैं। हालांकि, यह अभी भी अज्ञात है कि क्या आप आगे बढ़ना जारी रखने में सक्षम हैं, क्योंकि लोग बहुत तेज़ी से बदलते हैं। अनुग्रह के युग में, यीशु में लोगों के लिए रहम और अनुग्रह थे। यदि एक सौ में से एक भेड़ खो जाए, तो वे निन्यानबे को छोड़कर एक को खोजेंगे। यह मुहावरा एक यांत्रिक अभ्यास का वर्णन नहीं करता है, यह एक नियम नहीं है, लेकिन यह दर्शाता है मानव जाति के प्रति परमेश्वर के मंसूबे, मानव जाति को बचाने के लिए परमेश्वर का तत्काल इरादा, और मानव जाति के लिए परमेश्वर का गहरा प्रेम। यह एक प्रथा नहीं है, लेकिन यह उनका स्वभाव है और उनकी मानसिकता है। इसलिए, कुछ लोग एक साल या आधे साल के लिए छोड़ देते हैं, या उनके पास कई कमजोरियाँ और कई गलत धारणाएँ होती हैं। इसके बाद, यदि वे वास्तविकता के प्रति जाग उठते हैं और समझ प्राप्त करने में सक्षम होते हैं, तो वे लौट आते हैं और सही रास्ते पर वापस आ जाते हैं, तो मुझे विशेष रूप से शान्ति होगी और इसमें खुशी होगी। आज के इस संसार और विषयासक्ति तथा बुराई के युग में खड़े रहने के लिए सक्षम हो पाना, परमेश्वर को स्वीकार करने में सक्षम हो पाना, और सही रास्ते पर वापस लौट आने में सक्षम होना ऐसी चीजें हैं जो वास्तव में चैन प्रदान करती हैं और रोमांचक हैं। यदि आप बच्चों को पालते-पोसते हैं, चाहे वे आपकी अपनी संतान हों या न हों, तो आपको कैसा लगेगा अगर उन्होंने आपको स्वीकार नहीं किया और भाग गए हों? क्या आपका दिल उनको त्याग देने से हमेशा इनकार नहीं करेगा और क्या आप हमेशा नहीं सोचेंगे: मेरा बेटा कब वापस आएगा? मैं उसे देखना चाहता हूँ। मैंने हमेशा उसे मेरे पुत्र के रूप में रखा है; मैंने उसे बड़ा किया और उससे प्यार किया है। आपने हमेशा इस तरह से सोचा है और उस आने वाले दिन का इंतज़ार किया है। हर किसी की ऐसी ही मानसिकता है। आजकल लोगों का कद छोटा है, लेकिन एक दिन वे समझ जाएंगे, बशर्ते ऐसा न हो कि विश्वास करने का उनका कोई इरादा ही न हो और उन्हें परमेश्वर के रूप में ही न मानें। आजकल लोगों के कद को देखते हुए, बड़ी समस्याओं के बारे में निपटने के अलावा, उन्हें नियमित रूप से पर्यवेक्षण और थोड़ी निगरानी की भी आवश्यकता है, और वे पूरी तरह अकेले नहीं छोड़े जा सकते हैं; यह सही होगा जब आप लोगों को इसके बारे में चिंता ही न करनी पड़े। जैसा कि आप लोगों का कद है, आपको हमेशा पर्यवेक्षण और दूसरों के द्वारा संचालित होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। अगर आपके काम करने के लिए अभी भी दूसरों को आपकी देखरेख और निगरानी करनी होगी, तो इसे उचित ठहराना कठिन है और यह साबित करता है कि आपमें बहुत कमियाँ हैं और आपका कद बहुत छोटा है। सच्चाई के बिना और छोटे कद के साथ, आप परमेश्वर को आश्वस्त या संतुष्ट नहीं कर सकते। आपके पास थोड़ी इच्छा-शक्ति और संकल्प होने चाहिए ताकि मुझे चिंता करने की ज़रूरत न पड़े।