मैं इतनी अहंकारी और दंभी क्यों बन गई

18 अक्टूबर, 2022

2017 में कलीसिया ने मुझे विदेशी नवागतों के सिंचन का काम सौंपा। विदेशी भाषा में महारत हासिल होने और पहले भी नवागतों का सिंचन कर चुकने के कारण मुझे यह काम ज्यादा मुश्किल नहीं लगा। मगर मैं जानती थी कि परमेश्वर के घर में सिर्फ विशेष कौशल होने से कर्तव्य नहीं निभाया जा सकता। इसके लिए सत्य समझकर सिद्धांतों के अनुसार काम करना भी जरूरी है। इसलिए, पहले मैं काफी विनम्र रही। समस्याएँ आने पर मैं हमेशा परमेश्वर से प्रार्थना करती और उस पर भरोसा रखती, जब मुझे कुछ समझ न आता, तो दूसरों से सलाह लेकर सत्य खोजती। कुछ समय बाद मुझे अपने काम में कुछ नतीजे मिले। सभाओं में नियमित न आने वाले कुछ नवागत सक्रिय रूप से आने लगे और अपना कर्तव्य निभाने लगे। मेरे सिखाए कुछ नवागत बाद में कलीसिया-अगुआ और समूह-अगुआ भी बने। इससे मुझे बहुत खुशी मिली, लगा मेरे पास इस काम के लिए कुछ प्रतिभा है। बाद में, मुश्किल होने पर सभी मुझसे बात करने आने लगे और अक्सर मेरे सुझाव मानने लगे। धीरे-धीरे मैं खुद को सराहने लगी। मुझे लगा, विदेशी भाषा और सिंचन-कार्य दोनों मामलों में समूह में मैं ही सबसे काबिल हूँ। जल्दी ही मुझे निरीक्षक बना दिया गया, जिससे मुझे लगा, मेरे पास असाधारण मानसिक क्षमता और काम करने की योग्यता है। अनजाने ही मैं अहंकारी बनती चली गई। मुझे हर समस्या बहुत आसान लगती, और मैं सीधे वह करती, जो मुझे अच्छा लगता। मैं न प्रार्थना करती, न सत्य खोजती, न दूसरों से सलाह लेती। एक बार हमारे काम में एक समस्या आई, तो मेरी साथी बहन ने कहा कि वह सिद्धांत खोजना चाहती है। मैंने हिकारत से उस बहन को घुड़कते हुए कहा, "यह मामूली समस्या है। थोड़ा विचार करोगी, तो आसानी से हल कर लोगी। सिद्धांत खोजना फालतू है, समझी?" इसके बाद वह मुझसे बहुत सँभलकर बात करने लगी। उस दौरान कुछ भाई-बहनों ने भी कहा कि मैं बहुत अहंकारी हूँ, पर मैंने जरा भी ध्यान नहीं दिया। मुझे लगता, मैं थोड़ी अहंकारी हूँ तो क्या, समस्या तो सबमें होती है। फिर, थोड़ी मानसिक क्षमता वाले इंसान में अहंकार कैसे नहीं होगा? मुझे यह कोई बड़ी समस्या नहीं लगी। एक बार, मैंने एक नवागत को समूह-अगुआ बनाना चाहा। मेरी अगुआ को लगा, उस नवागत को बहुत थोड़ा समय हुआ है, उसकी नींव नहीं बनी है, और वह ठीक से काम नहीं कर पाएगा। मैंने उनकी बात का बहुत विरोध किया और सोचा, "आप अगुआ जरूर हैं, पर आप नवागतों को मुझसे बेहतर नहीं समझतीं। अगर मैं आपकी तरह चिंता करने लगी, तो हम नवागतों का प्रशिक्षण कब पूरा करेंगे?" मैंने अगुआ के विचार ठुकराने के लिए हर तर्क का इस्तेमाल किया। इसके बाद, उस नवागत को सीधे समूह-अगुआ बना दिया गया। जल्दी ही उसे यह काम बहुत तनावपूर्ण लगने लगा, नकारात्मक होकर उसने अपना कर्तव्य लगभग छोड़ दिया। तब, मुझे भी बहुत दुख हुआ। अगुआ की सलाह न मानने पर पछतावा होने लगा। पर फिर मैंने सोचा, "कोई पूर्ण नहीं है, भटके बिना कौन अपना कर्तव्य निभा पाता है? मैं अगली बार बेहतर काम करूंगी।" बाद में मेरी अगुआ ने भी मुझे अहंकारी होने के कारण उजागर करके मेरा निपटान किया, और कहा कि इस तरह काम करना खतरनाक है। तब मुझे यह सुनकर थोड़ा बुरा लगा, क्योंकि मुझे खुद की समझ नहीं थी।

बाद में, बहन यी और मैंने साथ मिलकर कलीसिया के काम का निरीक्षण किया। वह अपने काम में अधिक सतर्क और गंभीर थी, और सत्य के सिद्धांत खोजने पर ध्यान देती थी। जब हम चर्चा करके काम के बारे में फैसला लेते थे, तो वह फैसला लेने से पहले बार-बार चीजों की छानबीन और पुष्टि करती थी। लेकिन मुझे वह पर्याप्त कुशल नहीं लगती थी, इसलिए मैं उसका तिरस्कार करने लगी। इसके बाद मैंने कई फैसले अकेले ही ले लिए, उसे बिलकुल भी गंभीरता से नहीं लिया। एक बार, कलीसिया को कुछ चीजें खरीदनी थीं, और चूँकि इसमें भेंटें खर्च करनी पड़तीं, इसलिए मेरी अगुआ ने बार-बार मुझे अपनी साथी से चर्चा करने के लिए कहा। मैंने इसका वादा तो कर लिया, लेकिन सोचा, "यह इतना भी मुश्किल नहीं, मैं यह काम पहले भी कर चुकी हूँ। मैं इसे अकेले कर सकती हूँ। मुझे अपनी साथी की क्या जरूरत?" जब मेरी साथी ने मेरी खरीद की जानकारी मांगने के लिए मुझे संदेश भेजा, तो मैंने बिना सोचे-समझे कह दिया कि मैंने व्यवस्था कर ली है, तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं। नतीजतन, मैंने जो चीजें खरीदीं, वे अच्छी नहीं निकलीं, और इससे भेंटों की बर्बादी हुई। तब, मैं बहुत घबरा गई। मुझे एहसास हुआ कि भेंटें बर्बाद करना बहुत बड़ा अपराध है। क्या परमेश्वर मुझे कभी माफ करेगा? लगा, जैसे मेरे दिल पर कोई भारी पत्थर आ पड़ा हो, मुझे साँस लेना दूभर हो गया। मैं अक्सर अकेले में रोती, और मेरा हर दिन बहुत निराशा और पीड़ा में बीतता। मेरी हालत बदतर होने लगी, कर्तव्य निभाना मुश्किल हो गया, और मैं समस्याएँ समझ न पाती।

बाद में, अगुआ ने मेरे साथ संगति की और मुझे उजागर करके मेरा निपटान किया, उन्होंने कहा कि मेरा स्वभाव बहुत अहंकारी और दंभी है, मैं मनमर्जी से काम करती हूँ, मैं दूसरों के साथ सहयोग नहीं करती, उनके सुझाव नहीं मानती, इसलिए मैं निरीक्षक बनने लायक नहीं हूँ। बर्खास्त किए जाने पर मैं बहुत दुखी हुई। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "परमेश्वर, मैं नहीं जानती कि मैं इतना कैसे गिर गई। मैं जानती हूँ, मेरी बर्खास्तगी के पीछे तुम्हारी इच्छा है, पर मैं अपनी विफलता की जड़ नहीं जानती। कृपया मुझे प्रबुद्ध करके आत्मचिंतन करने में मेरी मदद करो।" पूजा-पाठ के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का एक वीडियो देखा। "कुछ लोग अपने कर्तव्‍य का पालन करते हुए कभी सत्‍य की तलाश नहीं करते। वे, अपनी कल्‍पनाओं के अनुसार आचरण करते हुए, महज़ वही करते हैं जो उन्‍हें अच्‍छा लगता है, वे हमेशा स्‍वेच्‍छाचारी और उतावले बने रहते हैं, और वे बस सत्य का अभ्यास करने के मार्ग पर नहीं चलते। 'स्‍वेच्‍छाचारी और उतावला' होने का क्‍या अर्थ है? इसका मतलब है कि जब तुम्‍हारा किसी समस्‍या से सामना हो, तो किसी विचार-प्रक्रिया या खोज-प्रक्रिया के बगै़र, उस तरह का आचरण करना जो तुम्हारे हिसाब से ठीक बैठता हो। किसी और का कहा हुआ कुछ भी तुम्हारे दिल को नहीं छू सकता, न तुम्हारे दिमाग को बदल सकता है। यहाँ तक कि अपने साथ सत्य की संगति किए जाने पर भी तुम उसे स्वीकार नहीं कर सकते, तुम अपनी ही राय पर अड़े रहते हो, जब दूसरे लोग कुछ भी सही कहते हैं, तब तुम नहीं सुनते, खुद को ही सही मानते हो और अपने ही विचारों से चिपके रहते हो। भले ही तुम्हारी सोच सही हो, तुम्हें दूसरे लोगों की राय पर भी ध्यान देना चाहिए, है न? और अगर तुम ऐसा बिलकुल नहीं करते, तो क्या यह अत्यधिक दंभी होना नहीं है? जो लोग अत्यधिक दंभी और स्वच्छंद होते हैं, उनके लिए सत्य को स्वीकार करना आसान नहीं होता। ... यदि तुम्हारा रवैया हठपूर्वक आग्रह करना, सत्य को नकारना, औरों के सुझाव न मानना, सत्य न खोजना, केवल अपने आपमें में विश्वास रखना और मनमर्जी करना है—यदि यह तुम्हारा रवैया है और तुम्हें इस बात की परवाह नहीं है कि परमेश्वर क्या करता है या क्या अपेक्षा करता है, तो परमेश्वर की प्रतिक्रिया क्या होगी? वह तुम पर ध्यान नहीं देता। वह तुम्हें दरकिनार कर देता है। क्या तुम हठधर्मी नहीं हो? क्या तुम अहंकारी नहीं हो? क्या तुम हमेशा खुद को ही सही नहीं मानते हो? यदि तुममें आज्ञाकारिता नहीं है, यदि तुम कभी खोज नहीं करते, यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से बंद है और परमेश्वर का विरोधी है, तो परमेश्वर तुम्हारी तरफ कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर तुम पर ध्यान क्यों नहीं देता? जब तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए बंद है, तो क्या तुम परमेश्वर का प्रबोधन ग्रहण कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर की फटकार को महसूस कर सकते हो? लोग जब दुराग्रही होते हैं, जब उनकी शैतानी और बर्बर प्रकृति काम करने लगती है, तो वे परमेश्वर के किसी भी कार्य को महसूस नहीं कर पाते, उस सबका कोई फायदा नहीं होता—तो परमेश्वर बेकार का काम नहीं करता। यदि तुम्हारा रवैया ऐसा अड़ियल और विरोधी है, तो परमेश्वर तुमसे छिपा रहता है, परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता। अगर तुम इस हद तक अड़ियल और विरोधी हो और इतनी सीमित सोच वाले हो, तो परमेश्वर कभी भी तुममें कुछ भी जबरन नहीं करेगा, या तुम पर कुछ भी लादेगा नहीं, वह कभी भी तुम्हें बार-बार प्रेरित करने और प्रबुद्ध करने की कोशिश नहीं करेगा—परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता। वह इस प्रकार कार्य क्यों नहीं करता? मुख्यतः क्योंकि परमेश्वर ने तुममें एक खास तरह का स्वभाव देख लिया है, एक पाशविकता देखी है जो सत्य से ऊबती है और विवेक से परे है। तुम्हें क्या लगता है, जब किसी जंगली जानवर की पाशविकता काम कर रही हो, तो क्या लोग उसे काबू में कर सकते हैं? क्या उस पर चीखना-चिल्लाना किसी काम आता है? क्या तर्क करने या उसे सुकून देने से कोई लाभ है? क्या लोग उसके नजदीक भी जाने की हिम्मत कर सकते हैं? इसका वर्णन करने का एक अच्छा तरीका है : जंगली जानवर विवेक से परे है। जब लोगों की पशुता काम कर रही होती है और वे विवेक से परे हो जाते हैं, तो परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर उन पर कोई ध्यान नहीं देता। जब तुम विवेक से परे हो, तो परमेश्वर तुमसे और क्या कहेगा? और कुछ भी कहना बेकार है। जब परमेश्वर तुम पर ध्यान नहीं देता, तो तुम आशीष पाते हो या कष्ट उठाते हो? तुम्हें कोई लाभ मिलता है या नुकसान उठाते हो? निस्संदेह तुम्हें नुकसान होगा। और इसका कारण कौन है? (हम खुद।) तुम्हीं ने ये हालात पैदा किए। किसी ने तुम्हें यह सब करने के लिए मजबूर नहीं किया और फिर भी तुम परेशान हो। क्या यह मुसीबत तुमने खुद पैदा नहीं की है? परमेश्वर तुम पर कोई ध्यान नहीं देता, तुम परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तुम्हारे मन में अंधेरा होता है, तुम्हारा जीवन संकट में पड़ गया है—तुमने यह मुसीबत खुद बुलाई है, तुम इसी लायक हो!" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी हालत प्रकट कर दी, खासकर इन वचनों ने, "क्या तुम हठधर्मी नहीं हो? क्या तुम अहंकारी नहीं हो? क्या तुम हमेशा खुद को ही सही नहीं मानते हो? यदि तुममें आज्ञाकारिता नहीं है, यदि तुम कभी खोज नहीं करते, यदि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से बंद है और परमेश्वर का विरोधी है, तो परमेश्वर तुम्हारी तरफ कोई ध्यान नहीं देता।" "परमेश्वर तुम पर कोई ध्यान नहीं देता, तुम परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते, तुम्हारे मन में अंधेरा होता है, तुम्हारा जीवन संकट में पड़ गया है—तुमने यह मुसीबत खुद बुलाई है, तुम इसी लायक हो!" इसे पढ़कर मेरा दिल छलनी हो गया, लगा जैसे परमेश्वर मुझे रूबरू उजागर कर रहा हो। मैंने अपना कर्तव्य बहुत अहंकार और मनमाने ढंग से निभाया। चूँकि मुझे विदेशी भाषा आती थी और मैं इस काम में थोड़ी कुशल थी, इसलिए मुझे लगा, मैं बहुत काबिल और सक्षम हूँ। निरीक्षक चुने जाने पर मुझे लगा था, मैं बहुत काबिल हूँ, इसलिए मैंने दूसरों को नीचा समझा, उनका तिरस्कार किया, किसी को भी गंभीरता से नहीं लिया। जब मेरे काम में कोई समस्या आई, मैंने शायद ही कभी दूसरों से चर्चा की, और जो चाहा, वही किया। जब मेरे भाई-बहन अलग सुझाव देते, तो मैं उन्हें परमेश्वर की देन न समझती। बल्कि मेरा रवैया कुछ ऐसा रहता, "तुम्हें इसकी बेहतर समझ है या मुझे?" दूसरों की बात सही होने पर भी मैं उसे स्वीकार न करती। मैं तरह-तरह के बहाने बनाकर उनका विरोध करती, उन्हें ठुकरा देती, उनका खंडन करती। नतीजतन सारा काम मेरे तरीके से होने लगा, और भाई-बहन बेबस महसूस करने लगे। उन्हें हमेशा चिंता रहती कि मैं क्या सोचूंगी, वे मेरे साथ सामान्य रूप से न रह पाते। फिर भी, मैंने आत्मचिंतन नहीं किया। जब मैं कलीसिया के कार्य की प्रभारी थी, मैंने सिद्धांतों के बिना मनमाने ढंग से काम किया, जिससे सारी भेंटें बर्बाद हो गईं। मेरा स्वभाव बहुत अहंकारी था। दूसरे कुछ भी कहते, मैं उनकी बात न सुनती। मैं एक अड़ियल गधे जैसी नासमझ थी। मेरा बर्ताव और रवैया परमेश्वर के लिए घृणास्पद था, और मुझे पवित्र आत्मा का कार्य नहीं मिल पाया। मेरा हर काम परेशानी और बाधा खड़ी कर रहा था। अपने कुकर्म का एहसास होने पर मैंने खुद को थप्पड़ मारना चाहा। इतनी दंभी होने पर मुझे खुद से नफरत हो गई। मैंने दूसरों की सलाह क्यों नहीं सुनी? अब नतीजे आ चुके थे, और पछताना बेकार था।

बाद में, मैंने अपनी समस्याओं पर चिंतन करना शुरू कर दिया। अपनी खोज में मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े, जिनसे मैं खुद को बेहतर समझ पाई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अहंकारी और आत्म-तुष्ट होना लोगों का एकदम स्पष्ट शैतानी स्वभाव है, और अगर वे सत्य नहीं स्वीकारते, तो उन्हें शुद्ध करने का कोई तरीका नहीं है। जो लोग अहंकारी और आत्म-तुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे मानते हैं कि वे सही हैं, वे जो भी सोचते हैं, बोलते हैं और जो उनकी राय होती है, उनमें उन्हें हमेशा यही लगता है कि उनका दृष्टिकोण और उनकी सोच सही है, कोई और अगर कुछ कहता है तो वह उनकी बात जितना अच्छा या सही नहीं होता। वे अपनी राय पर अड़े रहते हैं, किसी और की नहीं सुनते; भले ही दूसरे जो कह रहे हों, वह सही हो, सत्य के अनुरूप हो, पर वे उसे स्वीकार नहीं करते, वे केवल सुनने का दिखावा करते हैं, लेकिन कुछ ग्रहण नहीं करते हैं। जब काम करने का समय आता है, तो वे अपने तरीके से ही चलते हैं; वे खुद को सही और न्यायसंगत मानते हैं। तुम सही हो सकते हो, न्यायसंगत हो सकते हो या हो सकता है कि तुम बिना समस्या के सही काम कर रहे हो, लेकिन तुम्हारा कौन-सा स्वभाव प्रकट हो रहा है? क्या यह अहंकार और आत्म-तुष्टि नहीं है? अगर तुम अहंकार और आत्म-तुष्टि वाला यह स्वभाव नहीं त्याग पाते, तो क्या इससे तुम्हारे काम पर असर पड़ेगा? क्या यह सत्य पर अमल करने की तुम्हारी क्षमता को प्रभावित करेगा? अगर तुम इस तरह का अभिमानी और आत्म-तुष्ट स्वभाव दूर नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हें आगे चलकर बड़ी असफलताओं का सामना करना पड़ सकता है? निस्संदेह तुम्हें करना पड़ेगा, ऐसा होना अपरिहार्य है। क्या परमेश्वर लोगों में इन चीजों को प्रकट होते हुए देख सकता है? हाँ, बहुत अच्छी तरह देख सकता है; परमेश्वर न केवल मनुष्य के अंतर्मन की निगरानी करता है, बल्कि मनुष्य के हर शब्द और काम पर उसकी नजर रहती है। जब परमेश्वर इन चीजों को तुम्हारे अंदर प्रकट होते देखता है, तो वह क्या कहेगा? परमेश्वर कहेगा, 'तुम जिद्दी हो! जब तुम अपनी गलती को न जानते हुए अपनी बात पर अड़े रहते हो, तो समझ आता है, लेकिन अपनी गलती अच्छी तरह जानते हुए भी अगर तुम अपनी बात पर अड़े रहते हो और पश्चात्ताप नहीं करते, तो तुम अड़ियल और मूर्ख इंसान हो और तुम मुसीबत में हो। चाहे कोई भी सलाह दे, तुम नकारात्मक और विरोधी दृष्टिकोण अपनाकर प्रतिक्रिया देते हो और जरा-भी सत्य नहीं स्वीकारते—अगर तुम्हारे मन में केवल विरोध, संकीर्णता और अस्वीकृति भरी है—तो तुम बेहूदे हो, बेतुके मूर्ख हो! तुमसे निपटना बहुत मुश्किल है।' तुममें ऐसा क्या है जिससे निपटना इतना मुश्किल है? तुम्हारे बारे में कठिनाई यह है कि तुम्हारा व्यवहार चीजों को करने का गलत तरीका या गलत प्रकार का आचरण नहीं है, बल्कि वह एक खास तरह के स्वभाव को उजागर करता है। वह किस तरह के स्वभाव को उजागर करता है? तुम सत्य से ऊब गए हो और सत्य से नफरत करते हो। जब तुम सत्य से नफरत करने वाले के रूप में परिभाषित कर दिए जाते हो, तो परमेश्वर की नजर में तुम संकट में हो; परमेश्वर तुम्हें ठुकरा देता है, तुम पर कोई ध्यान नहीं देता। ... जो व्यक्ति सत्य से करता है, वह अपने हृदय में परमेश्वर से नफरत करता है। मैं यह क्यों कहता हूँ कि वह परमेश्वर से नफरत करता है? क्या इस व्यक्ति ने परमेश्वर को कोसा? क्या उसने उसके सम्मुख उसका विरोध किया? क्या उसने पीठ पीछे उसकी आलोचना या निंदा की? जरूरी नहीं है। तो ऐसा क्यों कहा जाता है कि इस तरह के स्वभाव—सत्य के प्रति घृणा के स्वभाव—का प्रकटीकरण परमेश्वर से नफरत करना है? यह तिल का ताड़ बनाना नहीं है; यह तथ्य है। जैसे पाखंडी फरीसियों ने प्रभु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया क्योंकि उन्हें सत्य से नफरत थी, जब ऐसा होता है, तो उसके परिणाम भयानक होते हैं। अर्थात्, जब किसी व्यक्ति का स्वभाव सत्य से ऊबने और सत्य के प्रति शत्रुता रखने वाला होता है, तो वह किसी भी समय और किसी भी स्थान पर इस प्रकार के स्वभाव को प्रकट करने में सक्षम होता है, और अगर वह इस पर निर्भर रहने की स्थिति में जीता रहता है, तो वह परमेश्वर का विरोध करेगा या नहीं? जब सत्य से जुड़ा कोई मुद्दा उसके सामने आता है, जिसमें उसके द्वारा चुने जाने वाले विकल्प शामिल हों, तब अगर वह सत्य स्वीकार न कर पाए, बल्कि अपने भ्रष्ट स्वभाव पर निर्भर रहने की स्थिति में जीता रहे, तो वह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का विरोध करेगा और उसके साथ विश्वासघात करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इस प्रकार का भ्रष्ट स्वभाव कुछ और नहीं, बल्कि एक ऐसा स्वभाव है, जो परमेश्वर और सत्य से नफरत करता है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़कर समझ आया कि मेरा स्वभाव तो अहंकारी था ही, मैं सत्य से भी ऊब चुकी थी, और सत्य और परमेश्वर से नफरत करती थी। बहुत-से भाई-बहनों ने मुझे सलाह दी, मेरी अगुआ ने काट-छाँट कर मेरा निपटान किया, पर मैंने किसी की नहीं सुनी और आत्मचिंतन भी नहीं किया। परमेश्वर ने कई बार तथ्यों की मदद से मुझे झूठा साबित किया और दिखाया कि मैं कितनी गलत थी। मैंने कार्य बाधित करने के सिवाय कुछ नहीं किया, फिर भी मैंने आत्मचिंतन नहीं किया और मनमानी करती रही। कभी-कभी जब मेरे भाई-बहन मुझे सलाह देते, तो मुझे वह सही और सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप लगती, फिर भी मैं उन्हें न मानकर ठुकरा देती, मैं बेहद अड़ियल थी। क्या यह सत्य से ऊबने और नफरत करने वाला शैतानी स्वभाव नहीं था? परमेश्वर कहते हैं, "जब तुम सत्य से नफरत करने वाले के रूप में परिभाषित कर दिए जाते हो, तो परमेश्वर की नजर में तुम संकट में हो।" "जो व्यक्ति सत्य से करता है, वह अपने हृदय में परमेश्वर से नफरत करता है।" इसने मुझे और परेशान कर दिया। परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और पवित्र है, और हमारे प्रति परमेश्वर का रवैया सत्य और परमेश्वर के प्रति हमारे रवैये पर निर्भर करता है। सत्य परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, पर मैंने सत्य से ऊबने और नफरत करने वाला स्वभाव दिखाया। क्या यह परमेश्वर से नफरत करना नहीं था? किसी इंसान का भ्रष्ट स्वभाव चाहे जैसा भी हो, अगर वह सत्य को स्वीकार पाता है, तो सब-कुछ ठीक किया जा सकता है, उसके पास बदलने और परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का पूरा मौका रहता है। लेकिन अगर इंसान की प्रकृति का सार सत्य से ऊबने और नफरत करने वाला है, तो वह परमेश्वर का शत्रु है। परमेश्वर के शत्रु कैसे बचाए जा सकते हैं? मुझे वे मसीह-विरोधी याद आए, जिन्हें कलीसिया से निकाल दिया गया था। वे सत्य से नफरत करते और उसे ठुकराते थे, जिससे आखिर में उन्हें बेनकाब कर त्याग दिया गया।

मैं बहुत डर गई, और इसके बाद काफी समय तक खुद को दोष देती रही। जब भी मैं काम में पहुँचाए नुकसान को याद करती, तो मेरे दिल में छुरियां चल जातीं, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "परमेश्वर, यह विफलता मेरे लिए बहुत दर्दनाक है, पर ऐसी विफलता के बिना, मुझे अपने भ्रष्ट स्वभाव की गंभीरता का पता न चलता, और मैं कभी न जान पाती कि मैं खतरे के कगार पर खड़ी थी। मैं अब अपने भ्रष्ट स्वभाव के साथ जीना नहीं चाहती। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो, ताकि मैं सत्य को स्वीकारने वाली और भविष्य में अपने कर्तव्य में सत्य पर अमल करने वाली इंसान बन पाऊं।"

बाद में, मैं अक्सर सोचती, "मैं इतनी अहंकारी क्यों हूँ? यह भ्रष्ट स्वभाव मैं कैसे ठीक करूं?" पूजा-पाठ के दौरान मुझे परमेश्वर के वचनों के दो अंश दिखे, जिन्होंने अचानक ही मुझे प्रबुद्ध कर दिया। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "जो लोग प्रतिभाशाली और विशेष गुण-सम्पन्न होते हैं, वे खुद को बहुत चतुर समझते हैं, उन्हें लगता है कि वे सब कुछ समझते हैं—लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि प्रतिभा और विशेष गुण सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते, इन चीजों का सत्य से कोई संबंध नहीं होता। जिन लोगों का व्यवहार प्रतिभा और विशेष गुणों से निर्धारित होता है, वे अक्सर सत्य के विपरीत चलते हैं—लेकिन उन्हें यह दिखता ही नहीं, वे फिर भी सोचते हैं, 'देखो, मैं कितना होशियार हूँ; मैंने इतने चतुराई भरे विकल्प चुने हैं! इतने बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय! तुम लोगों में से कोई भी मेरी बराबरी नहीं कर सकता।' वे सदैव आत्मुग्धता और आत्म-प्रशंसा की मनःस्थिति में रहते हैं। उनके लिए अपने हृदय को शांत कर पाना और यह सोच पाना कठिन होता है कि परमेश्वर उनसे क्या चाहता है, सत्य क्या है और सत्य के सिद्धांत क्या हैं। उनके लिए सत्य में समझना कठिन होता है, भले ही वे कर्तव्य निभाएँ, पर वे सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, और इसलिए उनका सत्य की वास्तविकता में प्रवेश कर पाना भी बहुत मुश्किल होता है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, वह वास्तव में क्या है, जिस पर लोग जीने के लिए निर्भर हैं?)। "तुम लोग क्या कहते हो, क्या किसी के लिए अपने कर्तव्य को ठीक से पूरा करना मुश्किल होता है? वास्तव में, ऐसा नहीं है; लोगों को केवल विनम्रता का एक भाव रखने में सक्षम होना होगा, थोड़ी समझ रखनी होगी और एक उपयुक्त स्थिति अपनानी होगी। चाहे तुम कितने भी शिक्षित हो, चाहे तुमने कोई भी पुरस्कार जीते हों, या तुम्हारी कितनी भी उपलब्धियाँ हों, और तुम्हारा रुतबा और दर्जा कितना भी ऊँचा हो, तुम्हें इन सभी चीजों को छोड़ देना चाहिए, तुम्हें अपनी ऊँची गद्दी से उतर जाना चाहिए—इन सबका कोई मोल नहीं है। चाहे वे महिमामयी चीजें कितनी भी महान हों, परमेश्वर के घर में वे सत्य से बड़ी नहीं हो सकती हैं; क्योंकि ऐसी सतही चीजें सत्य नहीं हैं, और उसकी जगह नहीं ले सकती हैं। तुम्हें यह मसला स्पष्ट होना चाहिए। यदि तुम कहते हो, 'मैं बहुत गुणी हूँ, मेरे पास एक बहुत तेज दिमाग है, मेरे पास त्वरित सजगता है, मैं शीघ्रता से सीखता हूँ, और मेरी याददाश्त बहुत अच्छी है, इसलिए मैं अंतिम निर्णय लेने योग्य हूँ।' यदि तुम हमेशा इन चीजों को पूंजी के रूप में उपयोग करते हो, उन्हें कीमती और सकारात्मक मानते हो, तो यह परेशानी वाली बात है; अगर तुम्हारा दिल है इन चीजों के कब्जे में है, अगर इन चीजों ने तुम्हारे दिल में जड़ें जमा ली हैं, तो तुम्हारे लिए सत्य स्वीकारना मुश्किल हो जाएगा—और इसके परिणाम की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस प्रकार, सबसे पहले तुम उन चीजों का त्याग करो, उन्हें नकारो जो तुम्हें प्रिय हैं, जो तुम्हें अच्छी लगती हैं और जो तुम्हारे लिए बेशकीमती हैं। वे बातें सत्य नहीं हैं; बल्कि, वे तुम्हें सत्य में प्रवेश करने से रोक सकती हैं" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्‍य का समुचित निर्वहन क्‍या है?)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि मेरे अहंकारी होने और सत्य न स्वीकारने की एक और वजह यह थी कि मैं हमेशा अपनी खूबियों के सहारे जीती थी। चूँकि मुझे विदेशी भाषा आती थी और काम का थोड़ा अनुभव था, कहने को मानसिक काबिलियत थी, और मैं काम की कुछ समस्याएँ भी दूर कर लेती थी, इसलिए मैंने इन खूबियों को पूंजी समझ लिया, कभी सत्य के सिद्धांत और परमेश्वर की इच्छा नहीं खोजी, भाई-बहनों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया और उनके सुझावों पर कभी ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी खूबियाँ सबसे ऊपर रखीं, आत्म-प्रशंसा में लिप्त रही, और अहंकारी बन गई, मुझे खुद पर अंधा विश्वास था, मानो मैं कभी गलत नहीं हो सकती, पर बार-बार यही साबित हुआ कि मेरे विचार सत्य के सिद्धांतों के अनुरूप बिल्कुल नहीं थे। वे सब गलत थे। वहीं, कुछ भाई-बहन साधारण-से दिखते थे, उनके पास खूबियाँ भी नहीं थीं, लेकिन वे अपने कर्तव्य में विनम्रता से सत्य के सिद्धांत खोज पाते थे, उनमें परमेश्वर का मार्गदर्शन देखा जा सकता था, और वे अपने कर्तव्य में अच्छे नतीजे हासिल कर पाए। इन तथ्यों से मैंने जाना कि खूबियाँ होने का मतलब सत्य की समझ होना नहीं है। अगर हम सत्य के सिद्धांत खोजे बिना ही अपना कर्तव्य निभाते हैं, और सिर्फ अपनी खूबियों के सहारे जीते हैं, तो हम अधिक से अधिक अहंकारी बनते जाते हैं, अपनी मानवता और समझ खो देते हैं और परमेश्वर का विरोध करने लगते हैं। अहंकारी स्वभाव को पूरी तरह ठीक करने के लिए, हमें इस पूंजी को त्यागना होगा, और अहं त्यागकर सत्य की खोज करनी होगी।

इसके बाद, मैंने इस तरह अभ्यास करने पर ध्यान दिया, पर जब कोई समस्या सामने आती और मुझे भाई-बहनों की मदद की जरूरत होती, तो मेरे अंदर अब भी संघर्ष छिड़ जाता। मुझे अपने विचार बहुत सही लगते और दूसरों से चर्चा करना बेकार लगता। मुझे चिंता होती कि अगर मैं आसान-सी समस्या भी खुद हल नहीं कर पाई, तो दूसरे मेरे बारे में बुरा सोचेंगे, पर जब मुझे वे अपराध याद आए, जो मैंने खुद पर अत्यधिक भरोसा करने के कारण किए थे, तो मुझे थोड़ा डर लगा, और अब अपने विचारों से चिपके रहने की हिम्मत नहीं हुई। मैं अहं त्यागने और सबके साथ इसकी चर्चा करने में सक्षम रही। जल्दी ही भाई-बहनों ने देखा कि मैं खुद को थोड़ा समझ गई हूँ और कुछ बदल भी गई हूँ, तो मुझे दोबारा कलीसिया-अगुआ चुन लिया गया। एक बार, कलीसिया में एक सुसमाचार-उपयाजक की कमी थी। मैंने देखा कि बहन ली आगे बढ़कर सुसमाचार साझा करती और सभाओं में सक्रियता से संगति करती है, इसलिए मैंने दिल में फैसला कर लिया कि बहन ली ही सही पसंद होगी। तब, मेरी साथी बहन ने मुझे याद दिलाया कि कलीसिया का उपयाजक चुनना मामूली बात नहीं है, इसमें मुझे अपनी अगुआ की मदद लेनी चाहिए। अपनी बहन की झिझक देखकर मैंने सोचा, "बहन ली हमेशा सक्रिय होकर सुसमाचार साझा करती रही है। उससे बेहतर और कौन उम्मीदवार हो सकता है? इसके अलावा, यह तरक्की उसके लिए अभ्यास का मौका होगी, अगर वह सही न हुई तो उसका तबादला कर देंगे। मुझे अगुआ की सलाह की क्या जरूरत है?" प्रतिरोधी होते ही मुझे परमेश्वर के वचन याद आए, "भले ही तुम्हारी सोच सही हो, तुम्हें दूसरे लोगों की राय पर भी ध्यान देना चाहिए, है न? और अगर तुम ऐसा बिलकुल नहीं करते, तो क्या यह अत्यधिक दंभी होना नहीं है?" हाँ, अगर मेरी बहन आश्वस्त नहीं, तो मुझे सत्य खोजना चाहिए। पूजा-पाठ के दौरान मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े, "जब तुम्हारे पास कोई विचार या राय हो, तब अगर तुम आँख मूँदकर दावा करते हो कि वह सही है और यही किया जाना चाहिए, तो तुम अहंकारी और आत्म-तुष्ट हो रहे हो। अगर तुम्हारे पास कोई विचार या राय है जो तुम्हें सही लगती है, लेकिन तुम्हें अपने आप पर पूरा भरोसा नहीं है, और तुम खोज और संगति से इस बात को सुनिश्चित कर सकते हो, तो यह आत्म-तुष्ट होना नहीं है। कार्यान्वयन से पहले सभी की सहमति और अनुमोदन प्राप्त करना कार्य करने का तर्कसंगत तरीका है" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अक्सर परमेश्वर के सामने जीने से ही उसके साथ एक सामान्य संबंध बनाया जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा, कि जब हमें लगे कि हम सही हैं, तब भी हमें अहं त्यागकर सत्य खोजना चाहिए। इस रवैये के साथ ही हमें पवित्र आत्मा का प्रबोधन मिल सकता है और हम अपने कर्तव्य में बेहतर बन सकते हैं। अगर हम अहंकार में सिर्फ अपनी सुनेंगे और दूसरों की चेतावनी की अनदेखी करेंगे, अगर हम अहं त्यागकर सत्य नहीं खोजेंगे, तो हमें पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन नहीं मिलेगा। यह सोचकर मेरे दिल का प्रतिरोध धीरे-धीरे खत्म हो गया। इसके बाद, मैंने प्रार्थना की, और यह मामला परमेश्वर पर छोड़कर उससे मार्गदर्शन करने को कहा। काश, बहन ली के सही न होने का तथ्य दिखाने के लिए परमेश्वर लोगों और चीजों को ऊंचा उठाता। उसी समय, मैंने लोगों को चुनकर उन्हें तरक्की देने के सिद्धांत भी खोजे। कुछ दिन बाद मुझे बहन ली के एक परिचित से पता चला कि बहन ली भले ही बहुत सक्रिय दिखती है, पर वो यह सब दिखावे के लिए करती है, समस्या आने पर अक्सर आलस और धूर्तता दिखाती है, लापरवाही करती है और पीछे हट जाती है, इसीलिए अभी तक जीवन-प्रवेश नहीं कर पाई है। सिद्धांतों के अनुसार, वह सुसमाचार-उपयाजक बनने लायक नहीं थी। यह सुनकर मुझे खुशी हुई कि मैं अपनी सोच पर अड़ी नहीं रही। वरना गलत इंसान को चुनने से सुसमाचार-कार्य में रुकावट जरूर आती। यह वाकई परमेश्वर की सुरक्षा थी। मैं परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन की बहुत आभारी थी। मैंने जाना कि सत्य का अभ्यास करके और दूसरों की सलाह मानकर ही मैं अपने कर्तव्य में समस्याओं और भटकावों से बच सकी थी और मेरे दिल को भी सुकून था। मुझे अपने अतीत के अहंकार को याद करके बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है। परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के बिना, और गंभीर काट-छाँट, निपटान, दंड और अनुशासन के बिना, मैं कभी आत्मचिंतन न कर पाती, कभी अहं त्यागकर दूसरों की सलाह न मान पाती। अब कोई समस्या आने पर मैं शांत मन से भाई-बहनों के साथ चर्चा करके सत्य खोज पाती हूँ। यह छोटा-सा बदलाव परमेश्वर के वचनों और कार्य का परिणाम है। मैं तहेदिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ।

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