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परमेश्वर के नाम का महत्व: यदि परमेश्वर का नाम यहोवा है, तो उसे यीशु क्यों कहा जाता है?

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यहोवा परमेश्वर ने पुराने नियम में हमें स्पष्ट रूप से बताया है: “मैं ही यहोवा हूँ और मुझे छोड़ कोई उद्धारकर्ता नहीं” (यशायाह 43:11)। “यहोवा … सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा” (निर्गमन 3:15)। और फिर नये नियम में लिखा है: “किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें” (प्रेरितों 4:12)। “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है” (इब्रानियों 13:8)। पुराने नियम में यह कहा जाता है कि केवल यहोवा ही परमेश्वर का नाम है और वह सदा के लिए ऐसा ही रहेगाI हालांकि, नये नियम में यह कहा जाता है कि किसी को भी केवल यीशु के नाम से ही बचाया जा सकता हैI चूँकि व्यवस्था के युग में परमेश्वर का नाम हमेशा के लिए यहोवा रहना था, तो अनुग्रह के युग में परमेश्वर को यीशु क्यों कहा गया? हम बाइबल में उल्लिखित शब्द “युगानुयुग” को कैसे समझ सकते हैं? परमेश्वर के नामों के पीछे कौन से सत्य और रहस्य छिपे हैं? चलिए, अब हम इस बारे में संगति करते हैंI

यहोवा नाम यीशु क्यों बन गया?

बाइबल में यह स्पष्ट रूप से दर्ज़ है कि यहोवा का नाम हमेशा के लिए और पीढ़ी दर पीढ़ी रहेगाI लेकिन जब प्रभु यीशु अपना छुटकारे का कार्य करने के लिए आया, तो यहोवा नाम का उससे आगे उल्लेख नहीं किया गयाI सभी ने प्रभु यीशु के नाम से प्रार्थना की और उसे पुकारा, और उन्होंने यीशु का नाम पवित्र कियाI हमें ऐसा लगता है जैसे बाइबल के इन विभिन्न हिस्सों के बीच विरोधाभास है, लेकिन वास्तव में कोई विरोधाभास नहीं हैI ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर द्वारा बोले गए “पीढ़ी पीढ़ी में” और “युगानुयुग” शब्द, उस युग से सम्बन्धित कार्य के लिए बोले गए थेI जब तक उस विशेष युग में परमेश्वर का कार्य पूर्ण नहीं हुआ, तब तक उस युग में उसका नाम नहीं बदलेगा, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले सभी लोगों को परमेश्वर के उस युग के नाम को थामे रखना थाI केवल इसी तरह वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते थे और परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा में जीवन जी सकते थेI लेकिन जब परमेश्वर ने नया युग प्रारम्भ किया और नये कार्य की शुरुआत की, परमेश्वर का नाम भी इसके साथ ही बदल गयाI जब यह हुआ, तो केवल परमेश्वर के नये नाम को स्वीकार करने और उसके नये नाम से प्रार्थना करने से ही लोग परमेश्वर की स्वीकृति और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते थेI उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग में, परमेश्वर का नाम यहोवा था और यहोवा का नाम धारण करके और उसके द्वारा घोषित नियमों और आज्ञाओं पर टिके रहकर, लोग परमेश्वर का आशीर्वाद और दया प्राप्त कर सकते थेI हालांकि, जब प्रभु यीशु अपना कार्य करने के लिए आया, उसने अनुग्रह के युग की शुरुआत और व्यवस्था के युग का अंत किया, अगर लोग फिर भी यहोवा के नाम को धारण किये रहते और प्रभु यीशु के नाम को स्वीकार नहीं करते, तो उन्हें पवित्र आत्मा द्वारा नापसंद और अस्वीकार कर दिया जाता, और वे अन्धकार में जीवन जीतेI जिन लोगों ने यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकारा और यीशु के नाम से प्रार्थना की और उसे पुकारा, जैसे कि पतरस, मत्ती और सामरी स्त्री, उन्होंने पवित्र आत्मा का कार्य और प्रभु का उद्धार प्राप्त कियाI जाहिर है, परमेश्वर का नाम अपरिवर्तनीय नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर के कार्य में परिवर्तन के साथ परिवर्तित होता हैI

“युगानुयुग” का अर्थ है परमेश्वर का सार और स्वभाव कभी नहीं बदलेगा, यह नहीं कि उसका नाम कभी नहीं बदलेगा

शायद अभी भी कुछ लोग भ्रमित महसूस कर रहे होंगे, यह सोचकर कि परमेश्वर का नाम कैसे बदल सकता है, जब बाइबल में कहा गया है “यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक–सा है।” अब हम बाइबल में लिखे शब्द “युगानुयुग” को कैसे समझें, इस बारे में संगति करेंगेI दरअसल, “युगानुयुग” का मतलब है कि परमेश्वर का सार और स्वभाव कभी नहीं बदलेगा; लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उसका नाम कभी नहीं बदलेगाI परमेश्वर के वचन कहते हैं: “ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि परमेश्वर अपरिवर्तशील है। यह सही है, किन्तु यह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अपरिवर्तनशीलता का संकेत करता है। उसके नाम और कार्य में परिवर्तन से यह साबित नहीं होता है कि उसका सार बदल गया है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और यह कभी नहीं बदलेगा… यदि परमेश्वर का कार्य कभी नहीं बदला था, तो क्या वह मानवजाति को आज के दिन तक ला सकता था? यदि परमेश्वर अपरिवर्तशील है, तो ऐसा क्यों है कि उसने पहले ही दो युगों का कार्य कर लिया है? …परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य एक युग में नहीं रुक सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर का नाम नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है, जो कि इस बात का प्रतीक है कि कैसे परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर बढ़ रहा है” (“परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)”)। “परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और कभी भी शैतान नहीं बनेगा; शैतान हमेशा शैतान रहेगा, और कभी भी परमेश्वर नहीं बनेगा। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता, और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। उसका कार्य, हालाँकि, हमेशा आगे प्रगति कर रहा है और हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने प्राणियों को अपनी नई इच्छा और नए स्वभाव को देखने की अनुमति देता है” (“परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)”)।

परमेश्वर सदा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता, उसका कार्य हमेशा आगे बढ़ता है, और उसका कार्य बदलते ही उसका नाम बदल जाता हैI लेकिन इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि परमेश्वर का कार्य या नाम कैसे बदलता है, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा, और उसका स्वभाव और सार कभी नहीं बदलेगाI व्यवस्था के युग में परमेश्वर का नाम यहोवा था, और अनुग्रह के युग में उसका नाम यीशु था, लेकिन इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि उसका नाम कैसे बदलता है, यह हमेशा केवल मानवजाति को बचाने के लिए ही बदलता हैI परमेश्वर का मानवजाति का प्रबंधन करने का उद्देश्य और उसका सार कभी नहीं बदलता—वह हमेशा एकमात्र परमेश्वर है जो अपना कार्य करता हैI हालांकि, तब फरीसी यह समझने में विफल रहे कि परमेश्वर का नाम युगों के बदलाव और परमेश्वर के कार्य के परिवर्तन के साथ बदलता है, और वे इस कथन “केवल यहोवा परमेश्वर है और यहोवा के अलावा कोई उद्धारकर्ता नहीं है” से चिपके रहेI उनका विश्वास था कि केवल यहोवा उनका परमेश्वर, उनका उद्धारकर्ता था, और इसलिए, आखिरकार, जब परमेश्वर यीशु नाम का उपयोग करते हुए अपना छुटकारे का कार्य करने के लिए आया, तो उन्होंने यह जानने की कोशिश नहीं की, कि प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, या जो कार्य प्रभु यीशु ने किया वह स्वयं परमेश्वर का कार्य था या नहीं, बल्कि इसके बजाय वे अपनी अभिमानी प्रकृति पर भरोसा करके, हठपूर्वक अपनी गलत धारणाओं से चिपके रहे, यह विश्वास करते हुए कि अगर किसी को मसीहा नहीं कहा जाता है, तो वह सम्भवतः परमेश्वर नहीं हो सकताI और इसलिए, उन्होंने पागलपन में प्रभु यीशु की निंदा और उसका विरोध किया, और आखिरकार उसे सूली पर चढ़ा दियाI ऐसा करके, उन्होंने जघन्य पाप किया, और इसलिए उन्हें परमेश्वर द्वारा शाप दिया गया और दण्डित किया गयाI फरीसियों की विफलता के सबक से हम देख सकते हैं कि यदि हम विभिन्न युगों में परमेश्वर द्वारा अपना नाम बदलने के महत्व को समझने में विफल रहते हैं, और परमेश्वर के सार को नकारते हैं और केवल इसलिए इस बात से इनकार करते हैं कि यह सब कार्य एक ही परमेश्वर का है क्योंकि परमेश्वर एक नया काम करता है और एक नया नाम रखता है, तब हम परमेश्वर का विरोध करने और ऐसे काम करने के आदी बन जायेंगे जो परमेश्वर के स्वभाव को अपमानित करता हैI

विभिन्न युगों में परमेश्वर को विभिन्न नामों से क्यों पुकारा जाता है, और परमेश्वर के नाम का क्या महत्व है?

परमेश्वर का नाम वास्तव में उसके मानवजाति को बचाने के कार्य के कारण उत्पन्न होता हैI मानवजाति को बचाने में, परमेश्वर विभिन्न कार्य करता है और अपने कार्य की जरूरत और युग की निर्भरता के अनुसार विभिन्न स्वभाव अभिव्यक्त करता है, और इसके साथ ही उसका नाम बदलता हैI इसे दूसरी तरह से कहा जाए तो, एक नाम एक युग को दर्शाता है, और यह परमेश्वर के एक चरण के कार्य और उसके उस युग में अभिव्यक्त स्वभाव को दर्शाता है; परमेश्वर युगों को बदलने और स्थानान्तरण करने के लिए अपने नाम का उपयोग करता हैI जैसे कि परमेश्वर के वचन कहते हैं: “ऐसा क्यों है कि यहोवा और यीशु एक ही हैं, फिर भी उन्हें भिन्न-भिन्न युगों में भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया जाता है? क्या यह इसलिए नहीं कि उनके कार्य के युग भिन्न-भिन्न हैं? क्या केवल एक ही नाम परमेश्वर का उसकी संपूर्णता में प्रतिनिधित्व कर सकता है? इस तरह, भिन्न युग में परमेश्वर को भिन्न नाम के द्वारा अवश्य बुलाया जाना चाहिए, उसे युग को परिवर्तित करने और युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए नाम का उपयोग अवश्य करना चाहिए, क्योंकि कोई भी एक नाम पूरी तरह से स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है और प्रत्येक नाम केवल एक निश्चित युग के दौरान परमेश्वर के स्वभाव के अस्थायी पहलू का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है; और प्रत्येक नाम को केवल उसके कार्य का प्रतिनिधित्व ही करना है। इसलिए, समस्त युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए परमेश्वर अपने स्वभाव के अनुकूल किसी भी नाम को चुन सकता है” (“परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)”)। “एक विशेष शब्द या नाम परमेश्वर का उसकी समग्रता में प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। तो क्या परमेश्वर एक निश्चित नाम धारण कर सकता है? परमेश्वर इतना महान और पवित्र है, तो तुम उसे प्रत्येक नए युग में अपना नाम बदलने की अनुमति क्यों नहीं देते हो? वैसे तो, प्रत्येक युग में जिसमें परमेश्वर स्वयं अपना कार्य करता है, वह एक नाम का उपयोग करता है, जो उसके द्वारा किए गए कार्य की समस्त विशेषताओं को सारगर्भित रूप से व्यक्त करने के लिए युग के अनुकूल होता है। वह उस युग के अपने स्वभाव का प्रतिनिधित्व करने के लिए इस विशेष नाम, एक नाम जो अस्थायी महत्व से सम्पन्न है, का उपयोग करता है। परमेश्वर अपने स्वयं के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए मनुष्य की भाषा का उपयोग करता है। …तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से परमेश्वर का कोई नाम नहीं था। उसने केवल एक, या दो या कई नाम धारण किए क्योंकि उसके पास करने के लिए काम था और उसे मानव जाति का प्रबंधन करना था” (“परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)”)।

आइये, अब परमेश्वर के यहोवा नाम लेने के महत्व को देखेंI परमेश्वर के वचन कहते हैं: ““यहोवा” वह नाम है जिसे मैंने इस्राएल में अपने कार्य के दौरान अपनाया था, और इसका अर्थ है इस्राएलियों (परमेश्वर के चुने हुए लोग) का परमेश्वर जो मनुष्य पर दया कर सकता है, मनुष्य को शाप दे सकता है, और मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता है। इसका अर्थ है वह परमेश्वर जिसके पास बड़ी सामर्थ्य है और जो बुद्धि से भरपूर है। …यहोवा का नाम इस्राएल के लोगों के लिए एक विशेष नाम है जो व्यवस्था के अधीन जीये थे। …”यहोवा” व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है, और यह उस परमेश्वर के लिए सम्मानसूचक है जिसकी आराधना इस्राएल के लोगों के द्वारा की जाती है” (“उद्धारकर्त्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है”)। “यहोवा” वह नाम है जिसे परमेश्वर ने तब अपनाया जब उसने व्यवस्था के युग में अपना कार्य किया, और यह परमेश्वर के प्रतापी, क्रोधी, श्राप देने वाले और दयालु स्वभाव को दर्शाता हैI उस समय लोग यह नहीं जानते थे कि परमेश्वर की आराधना कैसे करें, न ही वे यह जानते थे कि पृथ्वी पर जीवन कैसे गुज़ारेंI भले ही उन्होंने ऐसे काम किये थे जो परमेश्वर की नज़रों में बुरे थे, लेकिन वे इससे पूरी तरह अनजान थे, और इसलिए परमेश्वर ने, मूसा के जरिये, पृथ्वी पर मानवजाति को उनके जीवन में मार्गदर्शन देने के लिए नियमों और आज्ञाओं की घोषणा कीI उसकी अपेक्षा थी कि मनुष्य नियमों और आज्ञाओं का सख्ती से पालन करे, और उसने उन्हें बताया कि परमेश्वर की आराधना कैसे करें, और जानें कि क्या अच्छा था और क्या पापमय थाI अगर लोग नियमों और आज्ञाओं पर कायम रहते, तो वे यहोवा का अनुग्रह और आशीर्वाद प्राप्त करने में समर्थ होते; अगर वे नियमों और आज्ञाओं का उल्लंघन करते, तो वे दिव्य अग्नि द्वारा नष्ट कर दिए जाते या पत्थरों द्वारा मौत के घाट उतार दिए जातेI यहोवा के मार्गदर्शन में, इज़राइल के आम लोगों ने नियमों का सम्मान किया और यहोवा का नाम ऊँचा किया, और वे कई हज़ार सालों तक लगातार परमेश्वर की कृपा और मार्गदर्शन पाते रहेI

अनुग्रह के युग में, परमेश्वर का नाम बदलकर यीशु हो गया, और यहाँ इसका अत्यंत महत्त्व भी हैI परमेश्वर के वचन कहते हैं: ““यीशु” इम्मानुएल है, और इसका मतलब है वह पाप बलि जो प्रेम से परिपूर्ण है, करुणा से भरपूर है, और मनुष्य को छुटकारा देता है। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और वह अनुग्रह के युग का प्रतिनिधित्व करता है, …अनुग्रह के युग के लोगों के पुनर्जीवित किए जाने और बचाए जाने हेतु अनुमति देने के लिए यीशु का नाम विद्यमान था, और यीशु का नाम पूरी मानवजाति के उद्धार के लिए एक विशेष नाम है” (“उद्धारकर्त्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है”)I व्यवस्था के युग के अंत में, मानवजाति शैतान द्वारा अधिकाधिक भ्रष्ट बन गईI वे अब नियमों पर कायम नहीं रहे, अब कोई पाप-बलि ऐसी नहीं थी, जो वे दे सकते थे और जो उनके पापों के लिए पर्याप्त होती और उनको किसी भी समय नियमों द्वारा दण्डित किये जाने और मौत की सजा पाने का खतरा थाI मनुष्य के पापों को मिटाने और उसे जीते रहने के काबिल बनाने के लिए, परमेश्वर ने मनुष्य के पुत्र के रूप में दुनिया में अवतार लिया, उसने छुटकारे के चरण का कार्य करने के लिए और प्रेम और दया को प्राथमिकता देने के स्वभाव को व्यक्त करने के लिए यीशु नाम लियाI प्रभु यीशु को मानवजाति के लिए सूली पर चढ़ाया गया था, इस प्रकार उसने मानवजाति के पापों को खुद पर ले लिया और मानवजाति के लिए पाप-बलि बन गयाI जब तक हम प्रभु यीशु को हमारे उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, और प्रभु यीशु के नाम पर प्रार्थना करते, उसे स्वीकार करते और पश्चाताप करते हैं, तब तक हमारे पाप माफ़ किये जाते हैं, हमारी आत्मायें शांत और सहज बनती हैं, और हम प्रभु द्वारा प्रदान किये गए अनुग्रह और आशीर्वाद का आनन्द लेने में सक्षम होते हैंI

इससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के प्रत्येक नाम उस विशेष युग में परमेश्वर के किये गये कार्य और उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव का प्रतिनिधित्व करते हैंI जब परमेश्वर मानवजाति की जरूरतों के अनुसार नया कार्य करता है, तो परमेश्वर का नाम उसके साथ बदल जाता है और उसके नये नाम को स्वीकार करके ही हम परमेश्वर के आगे के उद्धार को प्राप्त कर सकते हैंI उदाहरण के लिए, अनुग्रह के युग में, यदि परमेश्वर यहोवा के नाम से आता, यीशु के नहीं, तो परमेश्वर का कार्य व्यवस्था के युग में अटका रहताI लोग प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार नहीं कर पाते, और उस समय के इज़राइली व्यवस्थाओं के उल्लंघन के लिए परमेश्वर द्वारा दण्डित और शापित किये गए होतेI

अब अंत के दिनों की समाप्ति है, और सभी भाई-बहन ईमानदारी से प्रभु यीशु के दूसरे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, और वे प्रभु द्वारा उन्हें ऊपर ले जाने और उनका स्वर्ग के राज्य में अभिनंदन किये जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैंI प्रभु यीशु ने हमें स्पष्ट रूप से कहा है: “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। और प्रकाशित वाक्य के अध्याय 2 और 3 में, यह भविष्यवाणी कई बार की गई है कि: “जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।” और पतरस के पहले पत्र के अध्याय 1 की आयत 5 कहती है: “जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्‍वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है।” इन आयतों से, हम देख सकते हैं कि जब प्रभु अंत के दिनों में लौटता है तो उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ है, और कि वह हमें सभी सत्य समझाने और अंतिम दिनों के परमेश्वर के उद्धार को प्राप्त करवाने में समर्थ होगाI इसलिए, जब प्रभु अंत के दिनों में अपना कार्य करने के लिए लौटता और प्रकट होता है, उसका कार्य तो बदल जाएगा, लेकिन क्या उसका नाम भी बदल जाएगा? जब वह वापस लौटेगा, क्या तब भी उसे यीशु कहा जाएगा? प्रकाशितवाक्य में यह भविष्यवाणी की गई है कि: “जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है, और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा” (प्रकाशितवाक्य 3:12)। धर्मग्रन्थ के इस अंश में कहा गया है कि जब परमेश्वर अंत के दिनों में लौटेगा तो उसका एक नया नाम होगा और, यह देखते हुए कि उसका एक नया नाम होगा, तो उसे अब यीशु नहीं कहा जाएगाI इसके लिए हमें एक परमेश्वर-भीरु हृदय की आवश्यकता होती है, और जब परमेश्वर अपना नया कार्य करने के लिए आता है तो उसका एक नया नाम होता है, हमें खुले दिमाग से खोजना चाहिए और ईमानदारी से अध्ययन करना चाहिए, हमें अपनी गलत धारणाओं और कल्पनाओं से परमेश्वर के नाम को परिसीमित नहीं करना चाहिएI केवल इसी तरह हमारे पास प्रभु की वापसी का स्वागत करने का मौका होगाI

आइये, हम परमेश्वर की प्रबुद्धता और मागदर्शन के लिए उसे धन्यवाद दें, और वे सभी भाई-बहन जो परमेश्वर के प्रकटन के लिए तरस रहे हैं, प्रभु से पुनः जल्द ही मिलेंगे!

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