सत्य के अनुसरण ने मुझे बदल दिया

18 अक्टूबर, 2022

मई 2018 में मैंने सेना में भर्ती होने के लिए घर छोड़ा। सेना में जब नायक आदेश देता, तो निचले रैंक आज्ञाकारी ढंग से वही करते, जो उन्हें कहा जाता। निगरानी करते वक्त नायक हमें दनादन आदेश देतीं, जिन्हें मानना होता। मैं उनकी बेहद प्रशंसक थी। महिला सैनिकों की सर्वोच्च नायक के पास पैसा और ताकत थी। जब वह अपनी बेटी को सेना में लाई, तो सभी ने मुस्कराकर उसका अभिवादन किया। उच्च नेतृत्व अक्सर हमसे कहता कि हमें प्रेरित होना होगा, तभी हम उस जैसे बन सकते हैं। उस समय मैंने कसम खाई कि मैं नायक बनने की पूरी कोशिश करूँगी। मुझे लगता, हैसियत और तारीफ मिलना प्रतिष्ठा की बात होगी। तब से मैं खुद को अच्छा दिखाने की पूरी कोशिश करती, नायकों की हर बात का कड़ाई से पालन करती। मैंने नायकों के सामने बेहतरीन प्रदर्शन किया, और वे मुझे पसंद करने लगे। जल्दी ही उन्होंने मुझे यूनिट का प्रमुख बना दिया। मैं उत्साहित हो गई। पदोन्नति के बाद मैं अगुआओं के प्रति और आज्ञाकारी हो गई। मैं दैनिक कामों में आगे रहती और आलस न करती। जब मैं निचले रैंक के सैनिकों को सुस्त देखती, तो कड़ाई के साथ उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी देती। कुछ को यह पसंद न आता और वे पीठ पीछे मेरे बारे में गंदी बातें कहते। मुझे लगता कि उच्च पद पाने के लिए मुझे कड़ी मेहनत करनी होगी, ताकि निचले दर्जे के सैनिक मेरी बात सुनें। कड़ी मेहनत के चलते मुझे फिर पदोन्नत कर दस्ते की नायक बना दिया गया। मुझे यह सचमुच सम्मानजनक लगा। दस्ते का नायक बनने के बाद सैनिकों ने भी मेरी सुननी शुरू कर दी। पर दस्ते के नायक को भी श्रम करना होता है, जो थका देता है, तो मैंने सोचा, मुझे अगले रैंकों पर चढ़ते जाना है। उच्च पद से मेरे पास ज्यादा ताकत होगी और मुझे श्रम नहीं करना पड़ेगा। कितना अच्छा होगा! और उच्च पद पाने के लिए मैंने दृढ़तापूर्वक रोज कड़ी मेहनत की, और सैनिकों से करवाई। हम नायकों द्वारा सौंपा गया काम हमेशा समय से पहले पूरा कर देते। नायक मेरे काम से बहुत खुश थे, और जल्दी ही मुझे पदोन्नत कर पलटन-नायक बना दिया गया।

पलटन-नायक का पद बचाने के लिए मैंने सैनिकों को अपनी बात सुनने को मजबूर किया, ताकि हमारी पलटन दूसरों से पीछे न रहे। जब सैनिक मेरी न सुनते, तो मैं उन्हें सजा के तौर पर खड़ा रखती या दंड-बैठक करवाती। इसके बाद वे मेरी और ज्यादा सुनते। अब वे मेरे सामने सुस्त न रहते और मेरा बहुत सम्मान करते। मैं बहुत खुश थी। पर मुझ पर भी बहुत दबाव था, अगर मैं अच्छा काम न करती तो उच्च अधिकारी मुझे डांटते। आलोचना से बचने और तारीफ पाने के लिए मैं काम के दौरान हमेशा सैनिकों को कड़े लहजे में डांटती रहती। कुछ समय बाद वे मेरा मिजाज नापसंद कर मुझसे घृणा करने लगे। वे मेरे मुँह पर तो अच्छी बातें कहते, पर पीठ पीछे मेरे बारे में बुरी-बुरी बातें कहते। यह जानकर मैं बहुत असहज हो गई। साथ ही जब कभी हमारा काम पूरा न होता, तो मुझे नायकों की आलोचना सुननी पड़ती। तब मुझे लगता कि अगर मैं एक रैंक और ऊपर होती, तो शायद मुझे डांट न पड़ती और मैं इतने दबाव में न रहती। तब मुझे और लोगों का सम्मान भी मिलता। मैंने चुपचाप इस लक्ष्य के लिए काम करना शुरू कर दिया।

आखिर एक दिन कप्तान ने खुश होकर मुझसे कहा कि सभी पलटन-नायकों में उसे मुझ पर ज्यादा भरोसा है, और जब वह कप्तान का पद छोड़ेगी, तो मैं उसकी जगह लूँगी। यह सुनकर मैं बेहद उत्साहित हुई। मुझे नहीं पता था कि उसका मुझ पर इतना भरोसा है। जल्दी ही मैंने कप्तान का पद संभाल लिया। अब ज्यादा से ज्यादा सैनिक मेरी सुनते और मैं जहाँ भी जाती, सम्मान पाती। मैं अब श्रम न करती और मेरे पास ज्यादा खाली समय रहता। कप्तान के पद से मिली श्रेष्ठता की भावना का मैं बहुत आनंद लेती। पर कुछ समय बाद मेरे साथ पलटन-नायक बने कुछ लोग मुझसे जलने लगे और मेरी अवज्ञा करने लगे। मुझे बहुत गुस्सा आया और बेइज्जती महसूस हुई, इसलिए मैंने उनसे अपनी बात मनवाने के तमाम तरीके आजमाए। लेकिन वे फिर भी नहीं माने। मुझे लगा कि मैं उन्हें काबू में नहीं रख पाऊँगी, पर अपनी हैसियत के लिए मुझे दृढ़ रहना था। मुझे लगा, ढेर सारी शक्तियों के साथ ऊँचा पद पाना इतना शानदार नहीं होता। जब मेरे मातहत मेरी न सुनते, तो मैं हमेशा उन्हें अनुशासित करती, और मेरा गुस्सा और बढ़ जाता। मुझे यह चिंता भी रहती कि उच्च अधिकारी कहेंगे कि मैं सैनिकों को संभाल नहीं पा रही, और शायद मुझे अक्षम समझें। शायद मेरा कप्तान का पद भी जाता रहे। यह बहुत तनावपूर्ण और थकाऊ था। मैं पद छोड़ना चाहती, पर फिर सोचती कि कितने सारे लोग कप्तान बनना चाहते होंगे और मेरा यहाँ तक पहुँचना आसान नहीं था, तो क्या इस्तीफा देना शर्मनाक नहीं होगा? मैं असहाय महसूस करती और तनाव सहते हुए जैसे-तैसे दिन गुजारती।

अगस्त 2020 में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। मैं रोज परमेश्वर के वचन पढ़ने और भाई-बहनों के साथ सभाओं में भाग लेने लगी। मैंने खुशी से इसका भरपूर आनंद लिया। एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा। "शैतान एक बहुत ही धूर्त किस्म का तरीका चुनता है, ऐसा तरीका जो मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक मेल खाता है; जो बिल्कुल भी क्रांतिकारी नहीं है, जिसके जरिये वह लोगों से अनजाने ही जीने का अपना मार्ग, जीने के अपने नियम स्वीकार करवाता है, और जीवन के लक्ष्य और जीवन में उनकी दिशा स्थापित करवाता है, और ऐसा करने से वे भी अनजाने ही जीवन में महत्‍वाकांक्षाएँ पालने लगते हैं। जीवन की ये महत्‍वाकांक्षाएँ चाहे जितनी भी ऊँची क्यों न प्रतीत होती हों, वे 'प्रसिद्धि' और 'लाभ' से अटूट रूप से जुड़ी होती हैं। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति—वास्तव में सभी लोग—जीवन में जिस भी चीज का अनुसरण करते हैं, वह केवल इन दो शब्दों : 'प्रसिद्धि' और 'लाभ' से जुड़ी होती है। लोग सोचते हैं कि एक बार उनके पास प्रसिद्धि और लाभ आ जाए, तो वे ऊँचे रुतबे और अपार धन-संपत्ति का आनंद लेने के लिए, और जीवन का आनंद लेने के लिए इन चीजों का लाभ उठा सकते हैं। उन्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ एक प्रकार की पूँजी है, जिसका उपयोग वे भोग-विलास का जीवन और देह का प्रचंड आनंद प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर, जिसके लिए मनुष्‍य इतना ललचाता है, लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीर, मन, वह सब जो उनके पास है, अपना भविष्य और अपनी नियति शैतान को सौंप देते हैं। वे एक पल की भी हिचकिचाहट के बगैर ऐसा करते हैं, और सौंपा गया अपना सब-कुछ वापस प्राप्त करने की आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान रहते हैं। लोग जब इस प्रकार शैतान की शरण ले लेते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं, तो क्या वे खुद पर कोई नियंत्रण बनाए रख सकते हैं? कदापि नहीं। वे पूरी तरह से शैतान द्वारा नियंत्रित होते हैं, सर्वथा दलदल में धँस जाते हैं और अपने आप को मुक्त कराने में असमर्थ रहते हैं" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों ने दिखाया कि लोगों का जीवन इतना तनावपूर्ण सिर्फ इसलिए है, क्योंकि उनका जीने का तरीका और उनका चुना हुआ मार्ग गलत है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद सभी भीड़ से अलग दिखने और सत्ता पाने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि हैसियत और सत्ता से उन्हें सम्मान और तारीफ मिलेगी, लोग उनकी बात सुनेंगे, और वे महिमा में रहेंगे। इसलिए सभी नाम, पैसा और हैसियत पाना चाहते हैं। मैं भी उसी रास्ते पर थी। सेना में जाकर मैं महिला सैनिकों में सबसे आगे रहना और दूसरों की तारीफ पाना चाहती थी। उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मैंने एक के बाद एक पदोन्नति पाई, पलटन-नायक और फिर कप्तान बनी। जब मैं रैंक में आगे बढ़ी और ज्यादा लोगों की प्रभारी हुई, मैं खराब ढंग से बोलने लगी, मुझे लोगों पर रोब गाँठना और उन्हें डांटना अच्छा लगने लगा। मैं सही होती या गलत, सैनिकों को सुनना पड़ता। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए, जब पलटन-नायक मेरी न सुनते, तो मैं उन्हें दबाने के लिए ताकत इस्तेमाल करती, और सभी तरीकों से सैनिकों को दंडित करती। मैं हमेशा उन पर हावी रहती और उनके लिए कोई हमदर्दी न रखती। धीरे-धीरे सैनिक मुझसे कटते गए और मुझसे बात भी न करना चाहते। मैंने देखा कि हैसियत पाकर मैं भयानक इंसान बन गई थी। कभी-कभी मैं किसी से मन की बात करना चाहती, पर न कर पाती। अधिकारी मुझसे नाराज न हों, इसलिए मैं उनकी चापलूसी करती और हर अपमान सहती। मेरे जीवन का हर दिन तनावपूर्ण था और मैं सच में इस्तीफा देना चाहती थी, पर हैसियत के फायदे सोचकर उसे छोड़ने को तैयार न होती। मैं नाम और फायदे की थकाऊ और दयनीय दलदल में फँस गई थी। तब मुझे महसूस हुआ, कि यह लोगों को भ्रष्ट कर चोट पहुँचाने का शैतान का एक तरीका है। हैसियत के पीछे भागने से लोगों की जंगली इच्छाएं बढ़ जाती हैं, जिससे वे अभिमानी होकर दूसरों की उपेक्षा करने लगते हैं, इसलिए उनके संबंध सामान्य नहीं रह पाते। आस्था प्राप्त करने से पहले मुझे हमेशा लगता था कि हैसियत के पीछे दौड़ना और दूसरों से ऊपर होने का मतलब महत्वाकांक्षी होना है। अब मैं समझी कि नाम और हैसियत के पीछे दौड़ना सही नहीं है। यह एहसास होने पर मैंने प्रार्थना की, और परमेश्वर से नाम और हैसियत के बंधनों से आजाद कराने को कहा।

फिर एक दिन मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट पर गई और एक नया भजन सुना, "मैं हूँ बस एक अदना सृजित प्राणी" :

1 हे परमेश्वर, चाहे मेरी हैसियत हो या न हो, अब मैं स्वयं को समझती हूँ। यदि मेरी हैसियत ऊँची है तो यह तेरे उत्कर्ष के कारण है, और यदि यह निम्न है तो यह तेरे आदेश के कारण है। सब-कुछ तेरे हाथों में है। मेरे पास न तो कोई विकल्प हैं न ही कोई शिकायत है। तूने निश्चित किया कि मुझे इस देश में और इन लोगों के बीच पैदा होना है, और मुझे पूरी तरह से तेरे प्रभुत्व के अधीन आज्ञाकारी होना चाहिए क्योंकि सब-कुछ उसी के भीतर है जो तूने निश्चित किया है।

2 मैं हैसियत पर ध्यान नहीं देती हूँ; आखिरकार, मैं मात्र एक प्राणी ही तो हूँ। यदि तू मुझे अथाह गड्ढे में, आग और गंधक की झील में डालता है, तो मैं एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ। यदि तू मेरा उपयोग करता है, तो मैं एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण बनाता है, मैं तब भी एक प्राणी हूँ। यदि तू मुझे पूर्ण नहीं बनाता, तब भी मैं तुझ से प्यार करती हूँ क्योंकि मैं सृष्टि के एक प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ।

3 मैं सृष्टि के परमेश्वर द्वारा रचित एक सूक्ष्म प्राणी से अधिक कुछ नहीं हूँ, सृजित मनुष्यों में से सिर्फ एक हूँ। तूने ही मुझे बनाया है, और अब तूने एक बार फिर मुझे अपने हाथों में अपनी दया पर रखा है। मैं तेरा उपकरण और तेरी विषमता होने के लिए तैयार हूँ क्योंकि सब-कुछ वही है जो तूने निश्चित किया है। कोई इसे बदल नहीं सकता। सभी चीजें और सभी घटनाएँ तेरे हाथों में हैं।

— मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ

भजन सुनकर मुझे लगा कि गीत के बोल वाकई अनूठे हैं। मैंने जाना कि हैसियत होना या न होना परमेश्वर तय करता है, सब उसके हाथ में है, मुझे उसके पीछे नहीं भागना चाहिए। मैं कप्तान हूँ, पर परमेश्वर के सामने मैं बिना हैसियत की एक तुच्छ प्राणी हूँ। मुझे दूसरों को बाधित नहीं करना चाहिए। यह सोचकर कि किस तरह मैं सैनिकों पर दबाव डालती थी, मुझे अपराध-बोध हुआ। मैं हैसियत छोड़कर उनके साथ मिलजुलकर रहना चाहती थी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर मदद मांगी। धीरे-धीरे मैंने अहं त्यागकर उनसे संवाद करने की कोशिश की, और उन्हें बेरहमी से डांटना बंद कर दिया। जब मैंने परमेश्वर के वचन असली जीवन में लागू किए, तो मुझे काफी शांति मिली।

फिर एक सुबह हमारी बैठक हुई। मेरी मातहत एक पलटन-नायक ने गिनती कर यह नहीं देखा कि उसकी पलटन से हर कोई वहाँ है या नहीं। हमारी यूनिट के लोग सभी यूनिटों में लेट-लतीफ और धीमे थे। मुझे चिंता हुई कि उच्च अधिकारियों को लगेगा कि मेरा प्रबंधन-कौशल खराब है, और सैनिक भी पता नहीं, क्या सोचेंगे। बैठक के बाद मैंने उससे गुस्से से पूछा, "अभी तुम कहाँ थी? तुमने छुट्टी क्यों नहीं माँगी? तुम्हारी पलटन में कोई गिनती नहीं कर रहा था। हमारी पूरी यूनिट तुमने बाधित कर दी है।" पर उसने सुने बगैर तुरंत बात काट दी। हमारी बहस शुरू हो गई। तभी ड्रिलमास्टर आई और पूछा कि हम बहस क्यों कर रहे हैं। हमने अपने-अपने पक्ष रखे, सुनकर उसने कहा, उसे नहीं पता, क्या किया जाए, कौन गलत है। यह सुनकर मैं भड़क गई और सोचा कि उसने न केवल मेरी नहीं सुनी, बल्कि मुझे काट भी दिया, क्या इसका मतलब यह नहीं कि वह गलत है? मैं उससे वरिष्ठ भी हूँ, इसलिए उसे मेरी सुननी चाहिए थी। क्या ड्रिलमास्टर को यह पता न चलना कि कौन सही है कौन गलत, बेतुका नहीं है? मैं नाराजगी से दरवाजा पटककर बाहर निकल गई। बैरक में लौटी, तो अपने साथ हुए अन्याय की सोचकर मेरे आँसू निकल पड़े। कमांडर को हमारे विवाद का पता चला, तो उसने पलटन-नायक से कहा, "वह तुम्हारी कप्तान है, वह जो कहती है वह सही है और तुम्हें उसकी बात सुननी चाहिए।" पलटन-नायक फिर भी बहस करती रही, तो कमांडर ने गुस्से से उसे फटकार लगाई, "हमारी कंपनी में कप्तान को तुम्हें निर्देश देने का हक है और अगर तुम नहीं सुनती, तो तुम गलत हो।" कमांडर को यह कहते सुनकर मुझे अपनी भावनाओं का गुबार निकलता हुआ लगा। मैं बहुत खुश हुई, लगा कि मेरी इज्जत बढ़ गई।

लेकिन एक दिन परमेश्वर के ये वचन पढने से मुझे यह समझने में मदद मिली। परमेश्वर के वचन कहते हैं, "एक बार जब मनुष्य को हैसियत मिल जाती है, तो उसे अकसर अपनी मन:स्थिति पर नियंत्रण पाने में कठिनाई महसूस होगी, और इसलिए वह अपना असंतोष व्यक्त करने और अपनी भावनाएँ प्रकट करने के लिए अवसरों का इस्तेमाल करने में आनंद लेता है; वह अकसर बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के क्रोध से आगबबूला हो जाता है, ताकि वह अपनी योग्यता दिखा सके और दूसरे जान सकें कि उसकी हैसियत और पहचान साधारण लोगों से अलग है। निस्संदेह, बिना किसी हैसियत वाले भ्रष्ट लोग भी अकसर नियंत्रण खो देते हैं। उनका क्रोध अकसर उनके निजी हितों को नुकसान पहुँचने के कारण होता है। अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए वे बार-बार अपनी भावनाएँ जाहिर करते हैं और अपना अहंकारी स्वभाव दिखाता है। मनुष्य पाप के अस्तित्व का बचाव और समर्थन करने के लिए क्रोध से आगबबूला हो जाता है, अपनी भावनाएँ जाहिर करता है, और इन्हीं तरीकों से मनुष्य अपना असंतोष व्यक्त करता है; वे अशुद्धताओं, कुचक्रों और साजिशों से, मनुष्य की भ्रष्टता और बुराई से, और अन्य किसी भी चीज़ से बढ़कर, मनुष्य की निरंकुश महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब भरे हैं। ... मनुष्य का क्रोध निकालना दुष्ट शक्तियों के लिए बच निकलने का मार्ग है, और देहयुक्त मनुष्य के अनियंत्रित और रोके न जा सकने वाले बुरे आचरण की अभिव्यक्ति है" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। "कई प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव हैं जो शैतान के स्वभाव में शामिल हैं, लेकिन जो सबसे स्पष्ट और सबसे अलग है, वह एक अहंकारी स्वभाव है। अहंकार मनुष्‍य के भ्रष्‍ट स्‍वभाव की जड़ है। लोग जितने ज्‍़यादा अहंकारी होते हैं, उतने ही ज्यादा अविवेकी होते हैं, और वे जितने ज्यादा अविवेकी होते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्‍वर का प्रतिरोध किए जाने की संभावना होती है। यह समस्‍या कितनी गम्‍भीर है? अहंकारी स्‍वभाव के लोग न केवल बाकी सभी को अपने से नीचा मानते हैं, बल्कि, सबसे बुरा यह है कि वे परमेश्‍वर को भी हेय दृष्टि से देखते हैं, और उनके दिलों में परमेश्वर का कोई भय नहीं होता। भले ही लोग परमेश्‍वर में विश्‍वास करते और उसका अनुसरण करते दिखायी दें, तब भी वे उसे परमेश्‍वर क़तई नहीं मानते। उन्‍हें हमेशा लगता है कि उनके पास सत्‍य है और वे अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं। यही अहंकारी स्वभाव का सार और जड़ है और इसका स्रोत शैतान में है। इसलिए, अहंकार की समस्‍या का समाधान अनिवार्य है। यह भावना कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ—एक तुच्‍छ मसला है। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि एक व्‍यक्ति का अहंकारी स्‍वभाव उसको परमेश्‍वर के प्रति, उसके विधान और उसकी व्‍यवस्‍था के प्रति समर्पण करने से रोकता है; इस तरह का व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर सत्‍ता स्‍थापित करने की ख़ातिर परमेश्‍वर से होड़ करने की ओर प्रवृत्‍त होता है। इस तरह का व्‍यक्ति परमेश्‍वर में तनिक भी श्रद्धा नहीं रखता, परमेश्‍वर से प्रेम करना या उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है। जो लोग अहंकारी और दंभी होते हैं, खास तौर से वे, जो इतने घमंडी होते हैं कि अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं, वे परमेश्वर पर अपने विश्वास में उसके प्रति समर्पित नहीं हो पाते, यहाँ तक कि बढ़-बढ़कर खुद के लिए गवाही देते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और उन्हें परमेश्वर का बिलकुल भी भय नहीं होता" (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन एकदम स्पष्ट हैं। हैसियत पाकर लोग बेकाबू और अभिमानी हो जाते हैं। वे अक्सर झुंझला जाते हैं, हैसियत बचाने के लिए लोगों को डांटते हैं और अधिकार जताते हैं। यह अभिमानी स्वभाव के काबू में होना है। जब मैं सेना में गई थी, तो मेरा लक्ष्य अधिकारी बनकर दूसरों का सम्मान पाना था। पद और सत्ता हासिल करके मुझे लगा, कि मेरे शब्दों में अधिकार है और मुझे वरीयता मिलती है। मैं कप्तान हूँ, तो मेरे पास पलटन-नायकों और सैनिकों को नियंत्रित करने की ताकत है। उन्हें मेरी सुननी चाहिए, और अगर वे ऐसा न करते तो मैं उन्हें डांटकर उनकी औकात दिखा देती। मैं बहुत अहंकारी थी। जब पलटन-नायक ने समय पर गिनती न कर हमारी यूनिट की प्रगति रोकी, तो मैं उस पर गुस्सा हुई, उसने मेरी बात नहीं सुनी और मुझे टोका। मुझे लगा, जैसे वह मुझे कुछ नहीं समझती, उसने मुझे नीचा दिखाया और सबके सामने मेरी बेइज्जती की। इससे मुझे हंगामा करने, उस पर भड़कने और असंतोष जताने का बहाना मिल गया। यह सैनिकों को भी चेतावनी थी कि उन्हें आज्ञाकारी होना होगा। मेरे विचार से, मैं कप्तान थी और वह पलटन-नायक, इसलिए उसे मेरी सुननी चाहिए। जब उसने ऐसा नहीं किया और मेरा खंडन भी किया, तो मुझे उसे डांटकर दिखाना पड़ा कि क्या सही है। मैं बहुत अभिमानी और बेकाबू थी। हैसियत मिलने के बाद, जब कोई मेरी न सुनता, तो मैं भड़क जाती, अपने पद का इस्तेमाल कर उन्हें दबाती और उनसे अपना मनचाहा करवाती। नतीजतन, कोई मुझसे कुछ वास्ता नहीं रखना चाहता था। मैं विश्वासी थी, पर बदली नहीं थी। मैं बहुत अभिमानी और अमानवीय थी, इसलिए लोग मुझसे घृणा करते और बचते थे, परमेश्वर को भी यह नापसंद था।

मैंने एक बहन को अपने अनुभव सुनाए, तो उसने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा, जिसने मुझे अभ्यास का मार्ग दिया। "एक प्राणी के रूप में, मनुष्य को अपनी स्थिति बनाए रखनी चाहिए, और कर्तव्यनिष्ठा से व्यवहार करना चाहिए। सृष्टिकर्ता द्वारा तुम्हें जो सौंपा गया है, उसकी कर्तव्यपरायणता से रक्षा करो। अनुचित कार्य मत करो, न ही ऐसे कार्य करो जो तुम्हारी क्षमता के दायरे से बाहर हों या जो परमेश्वर के लिए घृणित हों। महान, अतिमानव या दूसरों से ऊँचा बनने की कोशिश मत करो, न ही परमेश्वर बनने की कोशिश करो। लोगों को ऐसा बनने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। महान या अतिमानव बनने की कोशिश करना बेतुका है। परमेश्वर बनने की कोशिश करना तो और भी ज्यादा शर्मनाक है; यह घृणित और निंदनीय है। जो प्रशंसनीय है, और जो प्राणियों को किसी भी चीज से ज्यादा करना चाहिए, वह है एक सच्चा प्राणी बनना; यही एकमात्र लक्ष्य है जिसका सभी लोगों को अनुसरण करना चाहिए" (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं समझ गई कि ऊँचा होने, लोगों की प्रशंसा और सम्मान हासिल करने की कोशिश शर्मनाक है। हमें अपनी सीमा में रहकर जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए। परमेश्वर हमसे यही चाहता है। मैं ताकतवर अधिकारी बनकर दूसरों पर हावी होने और उन्हें अपनी बात सुनने को मजबूर करने की कोशिश कर रही थी। इससे परमेश्वर घृणा करता है। अगर मैं पश्चात्ताप न कर नाम और हैसियत के पीछे दौड़ती रहती, तो मैं किसी अविश्वासी की तरह ही होती। अविश्वासी पैसे, प्रतिष्ठा और हैसियत के पीछे भागते हैं। वे इनके लिए आपस में झगड़ते और हत्या कर देते हैं। विश्वासी होकर मुझे अविश्वासी के मार्ग पर नहीं रहना चाहिए। मुझे सत्य का अनुसरण कर सृजित प्राणी की जगह लेनी चाहिए। यह सोचकर मैंने संकल्प लिया, मैं सत्य का अनुसरण कर परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करने को तैयार हूँ। मुझे दूसरों के साथ बराबरी का सुलूक करना चाहिए और एक कप्तान के नजरिए से दूसरों को आदेश देना बंद करना चाहिए। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, मैं नाम और हैसियत के पीछे भागना और अभिमानी स्वभाव से जीना बंद करना चाहती हूँ। कृपया सत्य का अभ्यास करने में मेरा मार्गदर्शन करो।"

उसके बाद मैंने रोज उनसे मिलना-जुलना और उनकी चिंता करना शुरू कर दिया। जब वे कुछ गलत करतीं और नायक चाहती कि मैं उन्हें अनुशासित करूँ, तो मैं पहले की तरह उन्हें न डांटती और हैसियत बनाए रखने के लिए उन पर रोब न झाड़ती, बल्कि उनसे जुड़कर उनकी गलती बताती और उन्हें अगली बार बेहतर करने का मौका देती। इस तरह से काम करने के कुछ समय बाद, दस्ते और पलटन के नायकों और सैनिकों के साथ मेरे संबंध अच्छे हो गए। कुछ सैनिकों ने मुझे बताया कि पहले मेरा मिजाज अजीब होता था, वे मुझसे डरते और हमेशा चिंता किया करते कि मैं उन्हें डांटूंगी। लेकिन अब मैं काफी बेहतर हूँ और उनकी परवाह करती हूँ। उन्हें मुझसे बातचीत करना अच्छा लगता है। यह सुनकर मैंने परमेश्वर को धन्यवाद दिया और उनसे कहा, "क्या तुम्हें पता है, मुझमें यह बदलाव कैसे आया? मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे बदल दिया और मेरे बदलाव का यही कारण है। परमेश्वर के पास जाने से पहले मैं हैसियत के पीछे भागती थी। पद बनाए रखने के लिए हमेशा तुम लोगों को डांटती थी। आस्था पाने और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने जाना कि लोगों को घमंड में आकर डांटना सही नहीं है, यह भ्रष्ट स्वभाव का एक रूप है, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए। जो बदलाव मैंने अनुभव किया, वह मैं खुद ला कर सकती थी। यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर में आस्था के कारण है—उसके वचनों ने मुझे बदल दिया।" उन्हें शायद ही यकीन हुआ होगा। मैं उनसे सुसमाचार साझा करती रही, और कुछ सैनिकों के चेहरों पर मुसकराहट आ गई। वे परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को खोजने में रुचि लेने लगे। उसके बाद कुछ नायकों और सैनिकों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। हमने इकट्ठे होकर परमेश्वर के वचन खाए-पिए, साथ आगे बढ़े, सुसमाचार साझा किया और गवाही दी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!

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