सिर्फ़ शुद्ध लोग ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करते हैं

01 नवम्बर, 2020

प्रभु में विश्वास करते हुए मैं अक्सर सुनती थी कि वो हमें सिखाता है कि हम अपने पड़ोसियों से खुद के ही समान प्रेम करें, कि हमारा प्रेम परमेश्वर से आता है, हमें दूसरों के साथ-साथ अपने दुश्मनों से भी प्रेम करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर ने पहले हमसे प्रेम किया। और इब्रानियों 12:14 में कहा गया है, "सबसे मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा।" इससे मुझे मेरे जीवन का वो समय याद आ गया जब मैं और मेरी माँ भयंकर रूप से झगड़ते थे। मुझे मालूम था कि यह प्रभु की इच्छा के अनुरूप नहीं है मुझे तो उनके वचनों पर अमल करना चाहिए। बाद में, माँ से सहमत न होने पर, मैं खुद पर काबू कर उनकी बात सुनने की कोशिश करती। शांत रहकर सब्र से काम लेती। लेकिन कुछ समय बाद, गुस्से पर मेरा काबू न रहा। उनसे सहमत न होने पर मेरी उनसे बहस हो जाती। इसके अलावा, दुनिया के चलन मुझ पर हावी थे। टीवी और फिल्मों का तो मुझे जूनून था। कभी-कभी मैं खुद को बचाने के लिए या अपने फायदे के लिए झूठ भी बोलती थी। मैं पाप करने और उसे स्वीकारने के दुष्चक्र में फंस गयी थी, दोषी होने का एहसास हमेशा होता था। पर आदतों से छुटकारा पाना मुश्किल था। ये मुझे परेशान करता था। कभी-कभी मैं सोचती: "क्या मैं इस तरह पाप में जीते हुए, कभी भी स्वर्ग के राज्य में जा पाउंगी?" एक बार, मेरी माँ ने मुझसे कहा: "एक ईसाई होते हुए भी इतना गुस्सा!" उनकी यह बात सुन कर, मुझे और भी बुरा लगा। मैंने धीरज रखने की बहुत कोशिश की मगर प्रभु की शिक्षा पर अमल न कर पायी। क्या इन सब से प्रभु को ख़ुशी मिलेगी? क्या मैं कभी बदल पाऊंगी? जब मैंने अपने भाई-बहनों से इस समस्या के बारे में पूछा, तो कुछ ने कहा: "हमें खुद पर काबू करना सीखना चाहिए। परमेश्वर के करीब आकर हम सहनशील हो जाते हैं।" दूसरों ने कहा: "ऐसे उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं, लेकिन बदलाव ऊपर उठाते हैं। जितना हम खुद को बदलते हैं, उतने ही बेहतर बनते हैं। इस बात पर शक नहीं करना। प्रभु का उद्धार पूर्ण है। उसका अनुग्रह हमें स्वर्ग के राज्य में ले जाएगा।" उनकी बातें सुनकर भी मुझे रास्ता नहीं मिला। मैं मदद के लिए प्रभु से प्रार्थना ही कर सकती थी।

फिर, संयोग से, मैं कुछ भाई-बहनों से ऑनलाइन मिली। हम अक्सर बाइबल पढ़ने के लिए मिला करते थे। उनकी संगति बहुत ही दिलचस्प और गहरी समझ वाली होती थी। उनसे मिलकर मैंने बहुत कुछ सीखा। एक दिन किसी सभा में, भाई लिन ने प्रभु की वापसी के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि प्रभु लौटकर आयेगा तो नए काम करेगा, फिर हमें बाइबल के कुछ पद भेजे। इब्रानियों 9:28 में कहा गया है, "वैसे ही मसीह भी बहुतों के पापों को उठा लेने के लिये एक बार बलिदान हुआ; और जो लोग उसकी बाट जोहते हैं उनके उद्धार के लिये दूसरी बार बिना पाप उठाए हुए दिखाई देगा।" 1 पतरस 1:5 में कहा गया है, "जिनकी रक्षा परमेश्‍वर की सामर्थ्य से विश्‍वास के द्वारा उस उद्धार के लिये, जो आनेवाले समय में प्रगट होनेवाली है, की जाती है।" और "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। भाई लिन ने कहा : "ये पद बताते हैं कि किस तरह प्रभु दूसरी बार प्रकट होगा, और किस तरह हमें अंत के दिनों में उसका उद्धार पाना चाहिए। वे बताते हैं कि किस तरह परमेश्वर के घर से न्याय की शुरुआत होगी—अंत के दिनों के न्याय की। वे समझाते हैं कि कैसे प्रभु लौटकर आने पर न्याय का कार्य करेगा, पाप से मुक्त और शुद्ध करके हमें बचाएगा।" भाई लिन की बातें बाइबल के हिसाब से थीं, लेकिन मैं उलझन में थी। प्रभु ने तो हमें तभी पाप से छुटकारा दिला दिया था जब उन्हें सलीब पर चढ़ाया गया था। परमेश्वर का उद्धार पूरा हो गया था। फिर क्यों प्रभु न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करने के लिए वापस आएगा? मैंने अपनी उलझन के बारे में उन्हें बताया।

भाई लिन ने मुझे दो पद दिखाये। "मनुष्य के पाप देहधारी परमेश्वर के माध्यम से क्षमा किए गए थे, परंतु इसका अर्थ यह नहीं था कि मनुष्य के भीतर कोई पाप नहीं रह गया था। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए जा सकते हैं, परंतु मनुष्य इस समस्या को हल करने में पूरी तरह असमर्थ रहा है कि वह आगे कैसे पाप न करे और कैसे उसका भ्रष्ट पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया और रूपांतरित किया जा सकता है। मनुष्य के पाप क्षमा कर दिए गए थे और ऐसा परमेश्वर के सलीब पर चढ़ने के कार्य की वजह से हुआ था, परंतु मनुष्य अपने पुराने, भ्रष्ट शैतानी स्वभाव में जीता रहा। इसलिए मनुष्य को उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूरी तरह से बचाया जाना आवश्यक है, ताकि उसका पापी स्वभाव पूरी तरह से मिटाया जा सके और वह फिर कभी विकसित न हो पाए, जिससे मनुष्य का स्वभाव रूपांतरित होने में सक्षम हो सके। इसके लिए मनुष्य को जीवन में उन्नति के मार्ग को समझना होगा, जीवन के मार्ग को समझना होगा, और अपने स्वभाव को परिवर्तित करने के मार्ग को समझना होगा। साथ ही, इसके लिए मनुष्य को इस मार्ग के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता होगी, ताकि उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल सके और वह प्रकाश की चमक में जी सके, ताकि वह जो कुछ भी करे, वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हो, ताकि वह अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को दूर कर सके और शैतान के अंधकार के प्रभाव को तोड़कर आज़ाद हो सके, और इसके परिणामस्वरूप पाप से पूरी तरह से ऊपर उठ सके। केवल तभी मनुष्य पूर्ण उद्धार प्राप्त करेगा। ... इसलिए, उस चरण का कार्य पूरा हो जाने के बाद भी न्याय और ताड़ना का कार्य बाकी रह गया था। यह चरण वचन के माध्यम से मनुष्य को शुद्ध बनाने और उसके परिणामस्वरूप उसे अनुसरण हेतु एक मार्ग प्रदान करने के लिए है। यह चरण फलदायक या अर्थपूर्ण न होता, यदि यह दुष्टात्माओं को निकालने के साथ जारी रहता, क्योंकि यह मनुष्य की पापपूर्ण प्रकृति को दूर करने में असफल रहता और मनुष्य केवल अपने पापों की क्षमा पर आकर रुक जाता। पापबलि के माध्यम से मनुष्य के पाप क्षमा किए गए हैं, क्योंकि सलीब पर चढ़ने का कार्य पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर ने शैतान को जीत लिया है। किंतु मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव अभी भी उसके भीतर बना रहने के कारण वह अभी भी पाप कर सकता है और परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकता है, और परमेश्वर ने मानवजाति को प्राप्त नहीं किया है। इसीलिए कार्य के इस चरण में परमेश्वर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को प्रकट करने के लिए वचन का उपयोग करता है और उससे सही मार्ग के अनुसार अभ्यास करवाता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')। "तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अंत के दिनों में उतरेगा, परन्तु वास्तव में वह कैसे उतरेगा? तुम लोगों जैसा पापी, जिसे परमेश्वर के द्वारा अभी-अभी छुड़ाया गया है, और जो परिवर्तित नहीं किया गया है, या सिद्ध नहीं बनाया गया है, क्या तुम परमेश्वर के हृदय के अनुसार हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी पुराने अहम् वाले हो, यह सत्य है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और कि परमेश्वर द्वारा उद्धार की वजह से तुम्हें एक पापी के रूप में नहीं गिना जाता है, परन्तु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पापपूर्ण नहीं हो, और अशुद्ध नहीं हो। यदि तुम्हें बदला नहीं गया तो तुम संत जैसे कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धता से घिरे हुए हो, स्वार्थी और कुटिल हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ अवतरण चाहते हो—क्या तुम इतने भाग्यशाली हो सकते हो? तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो: तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परन्तु परिवर्तित नहीं किया गया है। तुम्हें परमेश्वर के हृदय के अनुसार होने के लिए, परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; यदि तुम्हें सिर्फ छुटकारा दिया जाता है, तो तुम पवित्रता को प्राप्त करने में असमर्थ होंगे। इस तरह से तुम परमेश्वर के आशीषों में साझेदारी के अयोग्य होंगे, क्योंकि तुमने मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य के एक कदम का सुअवसर खो दिया है, जो कि परिवर्तित करने और सिद्ध बनाने का मुख्य कदम है। और इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर उत्तराधिकार के रूप में पाने में असमर्थ हो" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में')।

भाई लिन ने संगति की: "प्रभु यीशु ने हमें शैतान के अधिकार क्षेत्र से छुटकारा दिलाया। हम अपने पापों से मुक्त तो हो गए थे, मगर पापरहित नहीं हुए थे, न ऐसा था कि हम अब न तो पाप करेंगे, न परमेश्वर का विरोध। अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने छुटकारा दिलाया और क्षमा दी, उसने इंसान को शुद्ध करके बदलने का कार्य नहीं किया, जो परमेश्वर अंत के दिनों में करता है। भले ही प्रभु में हमारी आस्था से हमारे पाप माफ़ हो जाते हैं, मगर हमारी पापी प्रकृति और शैतानी स्वभाव गहराई तक समाया है। हम घमंडी, कुटिल, चालाक, दुष्ट, और सत्य से घृणा करने वाले हैं, हम पाप करने, प्रभु की अवज्ञा और उसका विरोध करने से खुद को रोक नहीं सकते। हम झूठ बोलते हैं और अपने फायदे के लिए गलत व्यवहार करते हैं। एक दूसरे से सहमत ना होने पर गुस्सा करते और झगड़ते हैं। दुनिया के चलन को मानते और पापमय सुखों का लालच करते हैं। कठिन समय में हम परमेश्वर को दोष देते हैं, उससे दूर हो जाते हैं और उसे धोखा देते हैं। परमेश्वर कहते हैं, 'इसलिये तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूँ' (लैव्यव्यवस्था 11:45)। अगर हम शुद्ध और पवित्र नहीं हैं, तो हम परमेश्वर से नहीं मिल सकते। हमारे जैसे पापी और परमेश्वर के विरोधी, उसके राज्य में कैसे प्रवेश कर सकते हैं? इसीलिए प्रभु ने वापस आने का वादा किया है, ताकि वह सत्य व्यक्त करके न्याय और शुद्धिकरण का कार्य कर सके, हमें और सत्य प्रदान करके हमेशा के लिए बचा सके, पाप से मुक्त कर सके और हमें परमेश्वर के राज्य में ले जा सके।"

मैंने उनसे कहा : "आपने जो कहा वह सही है। हम हमेशा पाप करके उसे स्वीकारते हैं, प्रभु में आस्था रखकर भी हम पाप से मुक्त नहीं हैं। पर एक बात है, मेरे कुछ ईसाई दोस्त बहुत पवित्रता से जीते हैं। वे कभी नहीं झगड़ते, और अपने दुश्मनों से भी प्रेम करते हैं। उनमें से कुछ शादीशुदा ज़िंदगी की परेशानियों से जूझ रहे थे, मगर प्रभु में विश्वास करने के बाद उनके रिश्ते सुधार गए। उनमें से कुछ को तो बहुत गुस्सा आता था, मगर प्रभु में उनके विश्वास ने उन्हें सहनशील और धैर्यवान बनाया। ईमानदारी से प्रभु में विश्वास रखने वाले में बदलाव ज़रूर आते हैं। अगर यह बदलाव जारी रहा, तो क्या वे पाप से मुक्त और शुद्ध नहीं हो जाएंगे?"

भाई लिन ने मेरे सवाल का सब्र से जवाब दिया: "प्रभु में विश्वास रखने के बाद बहुत से लोग बदल जाते हैं। वे दूसरों को कोसना और मारना बंद कर देते हैं, वे अधिक दयालु, धैर्यवान और सहनशील बन जाते हैं, क्रूस ढोते हैं, दान देते हैं और त्याग भी करते हैं। भले ही इससे लगे कि वे सचमुच प्रभु में विश्वास करते हैं, मगर क्या वे प्रभु के दिल के अनुसार हैं? क्या इसका यह मतलब है कि वे पाप से मुक्त हैं, शुद्ध हो चुके हैं?" फिर, भाई लिन ने मुझे दो अंश सुनाये। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "महज व्यवाहारिक बदलाव देर तक नहीं टिकते हैं; अगर लोगों के जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं होता है, तो देर-सबेर उनके पतित पक्ष स्वयं को दिखाएंगे। क्योंकि उनके व्यवहार में परिवर्तन का स्रोत उत्साह है। पवित्र आत्मा द्वारा उस समय किये गए कुछ कार्य का साथ पाकर, उनके लिए उत्साही बनना या अस्थायी दयालुता दिखाना बहुत आसान होता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, "एक अच्छा कर्म करना आसान है; मुश्किल तो यह है कि जीवन भर अच्छे कर्म किए जाएँ।" लोग आजीवन अच्छे कर्म करने में असमर्थ होते हैं। एक व्यक्ति का व्यवहार जीवन द्वारा निर्देशित होता है; जैसा भी उसका जीवन है, उसका व्यवहार भी वैसा ही होता है, और केवल जो स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है वही जीवन का, साथ ही व्यक्ति की प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। जो चीजें नकली हैं, वे टिक नहीं सकतीं। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार का गुण देने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को रूपांतरित करना, उन्हें नए लोगों के रूप में पुनर्जीवित करना है। इस प्रकार, परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, परीक्षण, और मनुष्य का परिशोधन, ये सभी उसके स्वभाव को बदलने के वास्ते हैं, ताकि वह परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और धर्मनिष्ठा पा सके, और परमेश्वर की सामान्य ढंग से उपासना कर सके। यही परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोग जो भी करते हैं, उसमें से कुछ पवित्र आत्मा द्वारा निर्देशित होता है, यह जीवन की अभिव्यक्ति नहीं है, और यह बात परमेश्वर को जानने के समान तो और भी नहीं है; चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, वह इसे साबित नहीं करता कि वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हैं, या वे सत्य का अभ्यास करते हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर')। "स्वभाव में रूपांतरण मुख्य रूप से एक व्यक्ति की प्रकृति में रूपांतरण को संदर्भित करता है। किसी व्यक्ति की प्रकृति को बाहरी व्यवहारों से नहीं देखा जा सकता; उसका सीधा संबंध लोगों के अस्तित्व के मूल्य और महत्व से है। अर्थात इसमें जीवन के बारे में व्यक्ति का दृष्टिकोण और उसके मूल्य, उसका सार और उसकी आत्मा के भीतर गहराई में स्थित चीज़ें शामिल हैं। अगर एक व्यक्ति सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, तो उसे इन पहलुओं में किसी परिवर्तन से नहीं गुज़रना होगा। केवल यदि लोगों ने परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह अनुभव किया है और पूरी तरह से सत्य में प्रवेश किया है, यदि उन्होंने अस्तित्व और जीवन पर अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदला है, यदि चीजों को वैसे ही देखा है जैसे परमेश्वर देखता है, और यदि वे पूरी तरह से अपने को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत और समर्पित करने में सक्षम हो गए हैं, तभी कहा जा सकता है कि उनके स्वभाव रूपांतरित हो गए हैं" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'स्वभाव बदलने के बारे में क्या जानना चाहिए')।

भाई लिन ने कहा : "व्यवहार में बदलाव का मतलब ये नहीं कि व्यक्ति का जीवन स्वभाव बदल चुका है, या वह परमेश्वर का आज्ञाकारी और वफ़ादार है। प्रभु पर विश्वास करने वाले बहुत से लोग अच्छे कर्म करते हैं। वे दान देते हैं, गरीबों की मदद करते हैं और त्याग भी करते हैं। मगर मुसीबत में, वे परमेश्वर की शिकायत करते हैं। उसे ठुकराते और धोखा देते हैं। क्या यह परमेश्वर की सच्ची आज्ञाकारिता है? बहुत से पादरी और एल्डर प्रेम के बारे में बातें करते हैं, मगर उनकी आशीष और प्रार्थना सिर्फ कलीसिया को दान देने वालों के लिए है। क्या यह सच्चा प्रेम है? कुछ लोग विनम्र और धैर्यवान दिखते हैं, मगर उनकी प्रकृति अभिमानी और दंभी होती है। बाइबल की व्याख्या कर वे खुद की बड़ाई करते और लोगों को उलझाते हैं। वे कलीसिया में सत्ता की होड़ करते हैं। कलीसिया के पैसों का गबन तक करते हैं। कुछ पादरी विश्वासियों की मदद करने, सहारा देने और अच्छा व्यवहार करने का ढोंग करते हैं, मगर कलीसिया को वीरान देख जब विश्वासियों की आत्माएं सूख जाती हैं, उनकी आस्था ठंडी पड़ जाती है, तब वे उनकी परेशानियों को हल नहीं कर पाते। वे विश्वासियों को दूसरों की सुनने और उस कलीसिया को तलाशने से भी रोकते हैं जिसमें पवित्र आत्मा का कार्य है। उन्हें उनके जीवन का कोई खयाल नहीं होता। क्या ये पाखंड नहीं है? फरीसी भी दूसरों से प्रेम का दिखावा करते थे और सेवा में समर्पित दिखते थे। मगर प्रभु यीशु के आने पर उन्होंने उसके कार्य की जांच नहीं की। उन्होंने उसका विरोध किया, निंदा की और उसे फंसाया। यीशु को क्रूस पर चढ़ाने के लिए उन्होंने रोमनों से सांठ-गांठ भी की। इससे यह साबित होता है कि ऊपर से अच्छा व्यवहार करना सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर को जानना या उसके प्रति समर्पित होना नहीं है। जब तक हमारी शैतानी प्रकृति ठीक नहीं होती, हम परमेश्वर विरोधी और धोखेबाज़ ही रहेंगे। लेकिन जो अपने स्वभाव में बदलाव कर लेते हैं ऐसा नहीं होते। क्योंकि उनकी पापी प्रकृति और शैतानी स्वभाव का समाधान हो गया है। चाहे वे जिस हालात में हों या जिस भी परीक्षण का सामना करें, वे परमेश्वर के विरुद्ध कभी नहीं जाएंगे। वे उनके प्रति समर्पण करने और वफ़ादारी दिखाने में सक्षम हैं। बल्कि विनम्रता और धैर्य का अभ्यास करते हैं, और एकदूसरे के प्रति सैद्धांतिक प्रेम दिखाते हैं न कि बस ऊपरी या उलझन भरा प्रेम। उनके कर्म परमेश्वर के वचनों पर आधारित होते हैं। इससे पता चलता है कि उनका स्वभाव बदल गया है। अब हम सबको यह समझ आ जाना चाहिए कि सिर्फ अच्छे कर्म से हमें पापों से मुक्ति और उद्धार नहीं मिल पाएगा। हमें अपने भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करके बदलना होगा। अगर हम अपनी पापी प्रकृति से पूरी तरह छुटकारा पाना और परमेश्वर को जानना चाहते हैं, तो हमें उसके प्रति समर्पित होकर उससे प्रेम करना, और प्रभु के लौटने पर उसके न्याय-कार्य को स्वीकारना होगा। हम परमेश्वर के राज्य में तभी जा पाएंगे, जब हमारा भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो जाएगा।"

मैं भाई लिन की बातों से सहमत थी। मैंने उनसे कहा: "आपने जो दो अंश पढ़े, वे बहुत ही अच्छे थे। इंसान के अच्छे बर्ताव का मतलब ये नहीं कि वो पापी या परमेश्वर विरोधी नहीं रह गया, और ना ही ये है कि वो शुद्ध है और राज्य में प्रवेश के योग्य है। अगर प्रभु हमें बचाने वापस नहीं आया, तो हम खुद को कभी पाप से मुक्त नहीं कर पायेंगे। प्रभु लौटने पर इंसान को शुद्ध करने के लिए न्याय का कार्य कैसे करेगा?"

भाई लिन ने मुस्कुराते हुए कहा : "बाइबल में इस बात को लेकर कई भविष्यवाणियाँ मौजूद हैं, जैसे कि 'मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा' (यूहन्ना 16:12-13)। 'यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया हूँ। जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा' (यूहन्ना 12:47-48)। इन पदों का अर्थ यह है कि प्रभु सत्य व्यक्त करने और भ्रष्ट इंसानों का न्याय करने के लिए वापस आएगा।" वो यह सब कैसे करेगा, इसके लिए भाई लिन ने मुझे एक और अंश दिखाया। "अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे की समझ पैदा करने और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता का सत्य उसके सामने लाने का काम करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त कराता है, जो उसकी समझ से परे हैं। यह मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार तथा अपनी भ्रष्टता की जड़ों को जानने-पहचानने और साथ ही अपनी कुरूपता को खोजने का अवसर देता है। ये सभी परिणाम न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में उन सभी के लिए परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है, जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

भाई लिन ने कहा : "अंत के दिनों में, प्रभु यीशु सत्य व्यक्त करने के साथ-साथ इंसान का न्याय करके उसे शुद्ध करेगा। इस सत्य का हमारे बाहरी आचरण जैसे धूम्रपान, शराब पीना, झगड़ना, आदि से लेना-देना नहीं है, ये हमारे शैतानी स्वभाव और हमारी प्रकृति के सार को प्रकट करने के लिए, हमारे गुमराह विचारों और इरादों का विश्लेषण करने के लिए हैं। परमेश्वर के वचन जो ख़ुलासा करते हैं, उससे हम समझ सकते हैं कि शैतान ने हमें कितना भ्रष्ट कर दिया है, हम अहंकार, कपट, क्रूरता और दुष्टता जैसे शैतानी स्वभाव से भरे हुए हैं। अपनी अहंकारी प्रकृति के प्रभाव में, हम हमेशा सभी चीज़ों को अपने वश में करना चाहते हैं, खुद को सबसे ऊंचे पद पर देखना चाहते हैं। हम परमेश्वर के लिए मेहनत और त्याग, सिर्फ अनुग्रह और आशीष पाने के लिए करते हैं। मुसीबत में, उसे दोषी देते, उसका विरोध करते हैं। परमेश्वर के वचन हमारा न्याय करके हमें दिखाते हैं कि हममें सामान्य इंसान की समझ और विवेक नहीं है। हम शैतान द्वारा अपनी भ्रष्टता की सच्चाई को देखकर, खुद से घृणा करते और कोसते हैं, फिर दिल से पश्चाताप करते हैं। इस बीच, परमेश्वर के वचनों का न्याय और प्रकाशन हमें बताता है कि परमेश्वर कैसे लोगों को पसंद करता और आशीष देता है, किनसे नफ़रत करता है और शाप देता है। हम अनुभव करते हैं कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अपमान नहीं किया जा सकता और हमारे दिल में परमेश्वर के लिये श्रद्धा उमड़ती है। एक बार जब हमारा नज़रिया बदलने लगता है, तो कुछ भी होने पर हम परमेश्वर की इच्छा को समझकर उसके वचनों का अभ्यास कर सकते हैं। धीरे-धीरे, हम अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभाव से दूर होने लगेंगे और परमेश्वर पर पूरी श्रद्धा रखकर उसे समर्पित हो सकेंगे। इस तरह हमारी पापी प्रकृति की समस्या जड़ से ख़त्म हो जाएगी।"

मैंने महसूस किया कि भाई लिन ने जो कुछ पढ़ा वह किसी आम इंसान का कथन नहीं हो सकता। तो मैंने उनसे पूछा कि ये बातें किसने कहीं। उन्होंने बताया : "यह अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने कहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया प्रभु यीशु है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर पहले ही लाखों वचन व्यक्त कर चुका है, जिन्हें वचन देह में प्रकट होता है में संकलित किया गया है। सभी धर्मों के सत्य से प्रेम और सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करने वाले, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की वाणी सुनकर उसके सामने लौट चुके हैं। वे उसके वचनों के न्याय का अनुभव कर रहे हैं और अब उनके जीवन स्वभाव में भी कुछ बदलाव आया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट पर बहुत से भाई-बहनों की गवाहियां मौजूद हैं।" यह सुनकर मैं चौंक गयी। मैंने कहा : "ये वचन अलग इसलिए लगते हैं क्योंकि ये परमेश्वर के वचन हैं! मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं प्रभु की वापसी का स्वागत कर पाऊँगी। मैं सच में धन्य हूँ!" बाद में, मैंने फिर ऑनलाइन जाकर, उन लोगों की कई गवाहियां देखीं जिनका परमेश्वर के वचनों द्वारा न्याय किया गया था और जिनके भ्रष्ट स्वभाव बदल गए थे, जैसे कि "अंततः मैं एक मनुष्य की तरह थोड़ा जीवन व्यतीत करता हूँ," "न्याय प्रकाश है," "मुझे अंत के दिनों के मसीह का न्याय कैसे मिला," "परमेश्वर के न्याय ने मुझे शुद्ध किया।" मैंने महसूस किया कि कैसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य लोगों को शुद्ध करके बदल सकते हैं, मैंने जाना कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर सचमुच लौटकर आया प्रभु यीशु है! मैंने उत्सुकता से परमेश्वर के नये कार्य को स्वीकार कर लिया। मेरा दिल परमेश्वर के प्रति आभार से भर गया। मैंने परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने भाई-बहनों द्वारा मुझे सुसमाचार सुनवाया, मुझे उसकी वाणी सुनने का सम्मान और अपने पापों को शुद्ध करने का मार्ग मिला!

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