अब मैं जानती हूँ कैसे अपनी बेटी से ठीक से पेश आना है

21 फ़रवरी, 2026

सु शिन, चीन

मेरे माता-पिता ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे और सिर्फ मेहनत-मजदूरी कर सकते थे, इसलिए उन्होंने मेरी और मेरे भाई की पढ़ाई को बहुत महत्व दिया और हमें स्कूल भेजने के लिए अपना पेट काटकर पैसा बचाया। मेरी माँ अक्सर कहती थीं कि उनके पिता ने उन्हें स्कूल नहीं जाने दिया, इसलिए एक गृहिणी बनकर जिंदगी बिताने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं था और वह हमसे कहती थीं कि कहीं हम भी उनकी तरह न बन जाएँ। हमें कॉलेज भेजने के लिए वह सब कुछ कुर्बान करने को तैयार थीं ताकि भविष्य में हमें एक अच्छी नौकरी मिल सके। मेरे भाई का दाखिला एक उच्चकोटि के हाई स्कूल में होने के बाद घर में हम यूँ तो थोड़ी सी आर्थिक तंगी में आ गए, फिर भी मेरे माता-पिता ने दूसरों से कहकर मेरे भाई के लिए तमाम तरह की अध्ययन सामग्री और पूरक सामग्री खरीदी। और जहाँ तक मेरी बात है, मैं कुछ ही नंबरों से हाई स्कूल में दाखिला लेने से चूक गई, इसलिए मेरे माता-पिता ने मुझे हाई स्कूल भेजने के लिए 7,000 युआन से ज्यादा खर्च किए। ग्रेजुएशन के बाद मैंने एक हुनर सीखा और एक छोटी सी दुकान खोल दी। अपने आस-पास सारी एक जैसी दुकानें देखकर मुझे बहुत ज्यादा दबाव महसूस हुआ। मुझे लगा कि बाजार में अपनी जगह बनाना वाकई आसान नहीं है। मुझे थोड़ा-बहुत समझ में आ गया कि मेरे माता-पिता हमारी शिक्षा का बीड़ा उठाने के लिए कड़ी मेहनत करने के इच्छुक क्यों थे। यह इसलिए था ताकि हम समाज में बेहतर जगह बना सकें। मैंने सोचा कि अगर मेरे बच्चे हुए तो मैं एक कर्तव्यनिष्ठ माँ बनूँगी, पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करूँगी और अपने बच्चों को अच्छी तरह से पढ़ाई करने के लिए विकसित करूँगी।

शादी के बाद मेरी एक बेटी हुई और मैंने सोचा, “मैं अपनी बेटी को शुरुआत में ही पीछे नहीं रहने दे सकती! जब मैंने उसे जन्म दिया है तो मुझे एक माँ के तौर पर अपना कर्तव्य पूरा करना ही होगा, उसका अच्छी तरह से विकास करना होगा, और उसके लिए रास्ता बनाने और उसके भविष्य की योजना बनाने की पूरी कोशिश करनी होगी। इसी तरह वह एक अच्छी नौकरी पा सकेगी और बुनियादी चीजों की चिंता किए बिना जीवन जी सकेगी। अगर मैं अभी से उसके भविष्य के लिए तैयारी नहीं करती तो यह एक माँ के तौर पर मेरा गैर-जिम्मेदार होना होगा।” इसलिए जब मेरी बच्ची बोलना सीख ही रही थी, मैं उसे कहानियाँ सुनाती, कालजयी कविताएँ पढ़कर सुनाती और उसे अक्षर पहचानना सिखाती थी और यहाँ तक कि उसे बच्चों के अंग्रेजी सीखने के कार्यक्रम भी दिखाती थी। मेरी बेटी ने जल्दी बोलना शुरू कर दिया था और छोटी उम्र से ही वह खुद कहानियों की किताबें पढ़ सकती थी। यह देखकर कि वह कितनी होशियार है, उसे ठीक तरह से विकसित करने में मेरा विश्वास बढ़ गया, मैं सोचती थी कि अगर वह सफल हो गई तो एक माँ के तौर पर वह मेरा मान बढ़ाएगी।

जब मेरी बेटी ने किंडरगार्टन जाना शुरू किया तो मुझे लगा कि बच्चे की बुद्धि के विकास के लिए शुरुआती शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए मैंने बहुत सोच-समझकर उसके लिए एक ऐसा किंडरगार्टन चुना जो मानसिक गणित सिखाने पर ध्यान देता था और यह पक्का करने के लिए कि मेरी बेटी सलीकेदार बने और उसका शारीरिक गठन सुंदर हो, मैंने पाँच साल की उम्र में उसे डांस क्लास में डाल दिया। जब वह प्राइमरी स्कूल जाना शुरू वाली थी तो मैंने उसके लिए सर्वश्रेष्ठ स्कूल ढूँढ़ने के लिए किसी से पूछा और यह सुनिश्चित किया कि उसे अच्छी योग्यता वाली एक ऐसी नियमित शिक्षक मिले जो उम्दा पढ़ाती हो। मैंने अपनी बेटी को स्कूल भेजने के लिए पैसे कमाने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। मैं सुबह से रात तक काम करती थी और अक्सर समय पर खाना भी नहीं खाती थी। कभी-कभी मैं दिन में एक बार ही खाना खाती थी। हर बार जब मेरी बेटी स्कूल से घर आती तो मैं उसे जल्दी से अपना होमवर्क खत्म करने के लिए कहती और फिर मैं उसे जाँचती थी और अगर मुझे एक भी गलती मिलती तो मैं उससे दंडस्वरूप दस और सवाल कराती थी। कभी-कभी अपनी बेटी के साथ सड़क पर चलते हुए हम लोगों को कूड़ा बीनते देखते थे और मैं चुपके से अपनी बेटी से कहती, “अगर तुम अच्छे से नहीं पढ़ोगी तो आखिरकार तुम्हें भी यही करना पड़ेगा। क्या तुम यही चाहती हो?” और वह बस अपना सिर हिला देती। बाद में मुझे पता चला कि मेरी बेटी को संगीत बहुत पसंद है और चाहे कोई भी गाना हो वह उसे सिर्फ दो बार सुनकर गा सकती थी। मैंने मन में सोचा, “उसकी आवाज अभी भी बच्चों जैसी है, इसलिए उसके लिए गायन सीखना शायद बहुत जल्दी होगा। पहले मैं उसे कोई वाद्य यंत्र सिखाती हूँ ताकि वह संगीत पढ़ना सीख सके। इस तरह अगर वह बाद में संगीत में आगे बढ़ना चाहेगी तो उसके लिए ज्यादा आसानी रहेगी।” इसलिए जब वह दूसरी कक्षा में थी, मैंने उसे गुझेंग वाद्ययंत्र सीखने की कक्षा में दाखिला दिला दिया। पहले तो जिज्ञासावश मेरी बेटी गुझेंग सीखने के लिए मान गई, लेकिन जब वह हर दिन गुझेंग के सामने बैठकर उँगलियाँ चलाने की विभिन्न तकनीकों का अभ्यास करती थी और एकरस धुनें बजाती थी तो वह अनिच्छुक हो गई। वह अक्सर मुँह फुला लेती थी, आँखों में आँसू भरकर मुझे देखती थी और कहती थी, “माँ, मैं अब और अभ्यास नहीं करना चाहती। मैं थोड़ी देर खेलना चाहती हूँ।” लेकिन मैं उसे अभ्यास करते रहने के लिए मनाती थी और मेरी बेटी के पास आँसू बहाते हुए अभ्यास जारी रखने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। यह देखकर मुझे भी बुरा लगता था कि उसे अपने साथ इतना अनुचित व्यवहार होता महसूस हो रहा है। खासकर जब मैंने देखा कि मेरी बेटी की सारी नाज़ुक उँगलियों के नाखूनों से जुड़ी खाल उधड़ी हुई है तो मेरा दिल टूट गया और मैं बेबस महसूस करने लगी। मैं भी चाहती थी कि अपनी बेटी को उन्मुक्त रूप से खेलने दूँ, लेकिन समाज तो व्यावहारिक सफलता पर ध्यान केंद्रित करता है और बहुत ही निष्ठुर है और मेरी बेटी अच्छी पढ़ाई या हुनर के बिना समाज में पैर कैसे जमा पाएगी? सारे बच्चे कड़ी मेहनत कर रहे थे और मैं अपनी बेटी को ढिलाई बरतने नहीं दे सकती थी। अगर वह बाद में निचले दर्जे का इंसान नहीं बनना चाहती है तो उसे अभी कड़ी मेहनत करनी होगी और मुझे उस पर कड़ा नियंत्रण रखना होगा और जिम्मेदारी लेनी होगी। मैं बस यह उम्मीद करती थी कि एक माँ के रूप में मेरे श्रमसाध्य इरादों को मेरी बेटी समझ सके। बाद में मैं अक्सर अपनी बेटी से कहती थी, “समाज में अब कड़ी प्रतिस्पर्धा है और अगर तुम्हारी पढ़ाई अच्छी नहीं है और तुम्हारे पास कोई विशेष हुनर नहीं है तो तुम्हें बस निचले दर्जे के इंसान के रूप में हेय दृष्टि से देखा जाएगा। माँ चाहती है कि तुम गुझेंग सीखो ताकि भविष्य में तुम्हारे पास नौकरी के और अधिक विकल्प हों। हो सकता है तुम अभी मुझे न समझो, लेकिन जब तुम बड़ी हो जाओगी तो समझ जाओगी।” मेरी बेटी ने बेबसी से कहा, “माँ, क्या तुम मुझे तंग करना बंद कर सकती हो? मुझे अपनी मर्जी से कुछ भी चुनने का मौका नहीं मिलता। मुझे बस तुम्हारी हर बात माननी पड़ती है।” अपनी बेटी को इस तरह देखकर मैं कभी-कभी खुद से पूछती, “क्या यह करना सच में सही चीज है?” उस समय मुझे पहले ही परमेश्वर मिल चुका था और एक बहन ने मेरे साथ संगति भी की, उसने बताया कि हमें अपने बच्चों से बहुत ज्यादा माँगें नहीं करनी चाहिए और बस माता-पिता के तौर पर अपनी भूमिका निभानी चाहिए और जहाँ तक यह सवाल है कि हमारे बच्चे सफल होंगे या उनका करियर अच्छा होगा, यह माता-पिता पर निर्भर नहीं है और यह सब परमेश्वर के विधान का हिस्सा है और हमें सब कुछ परमेश्वर को सौंप देना चाहिए। मुझे लगता था कि समाज में इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के रहते अगर किसी व्यक्ति के पास अच्छी पढ़ाई या खास प्रतिभा नहीं है तो उसके लिए अपनी जगह बनाना वाकई बहुत मुश्किल है! मेरी बेटी काफी प्रतिभाशाली थी और अगर मैंने उसे सही ढंग से विकसित न किया तो वह बड़ी होने पर क्या मुझे एक माँ के तौर पर गैर-जिम्मेदार होने के लिए दोष नहीं देगी? मैंने बहन की सलाह को गंभीरता से नहीं लिया और मैं अपनी योजना के अनुसार अपनी बेटी को विकसित करती रही।

जब मेरी बेटी गुझेंग सीख रही थी, मैंने उसे अंग्रेजी और लेखन जैसी दूसरी कक्षाओं में भी दाखिला दिला दिया। सप्ताहांत और छुट्टियाँ मेरी बेटी के लिए सबसे व्यस्त समय होता था और हर दिन ऐसा लगता था जैसे वह एक जगह से दूसरी जगह भाग रही हो—एक क्लास खत्म करके फिर जल्दी से दूसरी क्लास में जाती थी। हर बार जब मेरी बेटी नीचे बच्चों को खेलते हुए देखती तो वह उन्हें हसरत और ईर्ष्या से देखती थी और वह कहती थी, “माँ, मैं भी दूसरे बच्चों की तरह बाहर जाकर खेलना चाहती हूँ। क्या हमें इतवार को छुट्टी नहीं मिलनी चाहिए? जबकि मैं अभी स्कूल के दिनों से भी ज्यादा व्यस्त हूँ। मैं कब खुद को थकाना बंद कर सकती हूँ और जो चाहे वो कर सकती हूँ?” मैंने बेबसी से कहा, “मैं जानती हूँ कि तुम थक चुकी हो और तुम सुस्ताना और मजे करना चाहती हो, लेकिन जब तुम खेल रही होगी तो दूसरे बच्चे कड़ी मेहनत कर रहे होंगे और तुम काफी पीछे छूट सकती हो। अगर तुम एक अच्छा भविष्य चाहती हो तो तुम्हें अभी कड़ी मेहनत करने की जरूरत है। तुम अभी भी छोटी हो और इसलिए तुम नहीं समझती कि समाज में कितनी कड़ी प्रतिस्पर्धा है। जब तुम बड़ी हो जाओगी तो समझ जाओगी।” मैंने उसे पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित करने के लिए हर तरह के तरीके अपनाए। मेरी बेटी ने मेरी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए कड़ी मेहनत की और उसकी रचना स्थानीय अखबार में छपी। उसने गुझेंग अच्छे से सीख लिया और वह अक्सर प्रतियोगिताओं में प्रस्तुति देती और भाग लेती थी और वह अक्सर डांस शो में भी प्रस्तुति देती थी। मैं अपनी बेटी की सफलताओं से संतुष्ट महसूस करती थी और मानती थी कि मेरे प्रयास उचित साबित हुए। मुझे लगा कि अगर मेरी बेटी का भविष्य अच्छा रहा तो मैं एक माँ के तौर पर अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर चुकी हूँगी।

बाद में मेरी बेटी ने मिडिल स्कूल में दाखिला लिया, और मैंने उसके लिए एक ऐसी होम-रूम टीचर ढूँढ़ी जिसका बच्चों को अगली कक्षा में भेजने का रिकॉर्ड अच्छा था। मेरी बेटी की पढ़ाई में देरी न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए मैंने स्कूल में उसकी उन सभी सहपाठियों की गुपचुप जाँच की जिनके साथ वह मेलजोल रखती थी, मुझे डर था कि कम पढ़ने वाले साथियों के साथ जुड़ने से उसकी सिखलाई पर असर पड़ेगा। मेरी बेटी अक्सर मुझसे शिकायत करती, “मैं पिंजरे में बंद एक चिड़िया की तरह हूँ। मेरे पास बिल्कुल भी आजादी नहीं है। मैं हर दिन बस स्कूल से घर और घर से अतिरिक्त कक्षाओं में जाती रहती हूँ। मैं बस पढ़ती रहती हूँ, पढ़ती रहती हूँ, पढ़ती रहती हूँ। माँ, क्या तुम जानती हो कि यह कैसा लगता है? मैं आज़ाद होना चाहती हूँ। मुझसे ज्यादा आजादी तो हमारे एक्वेरियम की मछलियों को है। कम से कम वे उस बड़े से टैंक में आज़ादी से तैर तो सकती हैं। मेरे पास तो उतनी भी जगह नहीं है।” हर बार जब मेरी बेटी इस तरह शिकायत करती, तो मैं बेबस महसूस करती। मैं जानती थी कि वह नाखुश है, लेकिन समाज में इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते मैं भला और क्या कर सकती थी? मैं बस उसे धैर्यपूर्वक समझाने की कोशिश कर सकती थी, “ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें आज़ादी नहीं देना चाहती; बात बस इतनी है कि अगर तुम अभी मेहनत नहीं करोगी, तो ज़िंदगी में आगे कैसे बढ़ोगी? तुमने अभी तक समाज में कदम नहीं रखा है, इसलिए तुम नहीं समझती कि मुकाबला कितना कड़ा है। मैं इस दौर से गुज़र चुकी हूँ, और मैं यह तुम्हारी भलाई के लिए ही कर रही हूँ।” हर बार जब मेरी बेटी यह सुनती, तो वह बस चुप रहती। धीरे-धीरे, मैंने देखा कि मेरी बेटी कम बोलने लगी है और जब वह स्कूल से घर आती थी तो खुद को अपने कमरे में बंद कर लेती थी। मैंने सोचा कि शायद वह किशोरावस्था के विद्रोही दौर से गुज़र रही है, और यह समय के साथ गुजर जाएगा।

अप्रत्याशित रूप से एक दिन जब वह मिडिल स्कूल के तीसरे साल में थी तो बस कुछ ही शब्दों के बाद हमारी बातचीत पूरी तरह से टूट गई। मैंने अपनी बेटी को कभी-कभी फोन पर लगा देखा तो उससे कहा, “अभी तुम्हारी कक्षाएँ इतनी व्यस्त हैं और हाई स्कूल की प्रवेश परीक्षाएँ भी करीब हैं। तुम्हें फोन पर कम रहना चाहिए!” मेरी बेटी ने कहा, “मैं बस बीच में फुर्सत के दौरान थोड़ी देर के लिए इसे देख रही हूँ।” मैंने आगे कहा, “फोन देखने से तुम्हारा क्या भला होगा! यह बस तुम्हारी पढ़ाई में रुकावट डाल रहा है!” वह थोड़ी देर चुप रही, फिर अचानक रोते हुए मुझ पर चिल्लाई, “मुझे तुम्हारी हर बात क्यों सुननी पड़ती है? क्या तुमने कभी इस बारे में सोचा है? क्या तुमने मुझे बचपन से लेकर अब तक कभी आजादी दी है? तुम मेरे पूरे जीवन में हर चीज को नियंत्रित और अपने हिसाब से मोड़ती रही हो। मेरा स्कूल तुमने चुना, मेरे प्राइमरी और मिडिल स्कूल की होम-रूम टीचर तुमने चुनीं, तुमने मुझे डांस, गुझेंग, लेखन, अंग्रेजी और तमाम तरह की दूसरी शिक्षणेत्तर कक्षाओं में डाला और मुझे तुम्हारी हर बात सुननी पड़ती है! क्या तुमने कभी मेरी भावनाओं के बारे में सोचा है? क्या तुम सच में मुझसे प्यार भी करती हो? मैं तुम्हें देखना नहीं चाहती।” उस रात मेरी बेटी घर से भाग गई। उस पल मैं लगभग टूट ही गई थी। मैं बस समझ नहीं पा रही थी; मैंने उसके लिए जो कुछ भी किया, क्या वह सब उसकी भलाई के लिए नहीं था? मेरी बेटी मेरे दिल की बात क्यों नहीं समझती? मैं इस चिंता में पागल हो रही थी कि कहीं उसके साथ कुछ हो न जाए, इसलिए मैंने जल्दी से उसकी करीबी सहपाठियों को फोन करके उसका ठिकाना पूछा। उन सबने कहा कि उन्हें नहीं पता। मेरा दिल हलक में आ गया। वह कहाँ जा सकती है? कहीं उसने कोई गलत कदम तो नहीं उठा लिया? अगर उसे कुछ हो गया तो मैं अकेले कैसे जिऊँगी? मैं बेबस होकर रो पड़ी और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर! मेरी बच्ची गुस्से में है और घर से भाग गई है और मुझे डर है कि उसके साथ कुछ हो जाएगा। परमेश्वर, कृपया मेरे दिल को शांत रखने में मेरी रक्षा करो। मैं जानती हूँ कि यह स्थिति तुम्हारी अनुमति से आई है, लेकिन मैं नहीं समझ पा रही हूँ कि मुझे इससे क्या सबक सीखना चाहिए। कृपया मेरा मार्गदर्शन करो कि मैं तुम्हारा इरादा समझ सकूँ।”

तीन-चार दिन बाद मेरी बेटी ने खबर भेजी कि वह घर नहीं आना चाहती है और वह सबसे ज्यादा मुझसे ही नहीं मिलना चाहती है। यह सुनकर मुझे लगा जैसे मेरे दिल में छुरा घोंप दिया गया हो और मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैं हमेशा खुद को एक जिम्मेदार और कर्तव्यनिष्ठ माँ मानती थी और जब से मेरी बेटी पैदा हुई थी, मैंने उसके लिए सब कुछ योजनाबद्ध किया था, मैं चाहती थी कि वह बिना किसी समस्या के बड़ी हो और भविष्य में एक अच्छी नौकरी करे। लेकिन उसके लिए सब कुछ कर चुकने के बाद मुझे बदले में उससे बस यही मिला कि वह मुझसे दूर चली गई है और नफरत करने लगी है। मुझे लगा कि मैं एक माँ के तौर पर पूरी तरह से असफल हो गई हूँ। मैं अक्सर अकेले में छिपकर रोती थी और अपने सबसे बेबस पलों में अपनी आंतरिक पीड़ा और उलझन परमेश्वर को सुनाती थी। उसी पल मैंने परमेश्वर के नवीनतम वचन पढ़े, जिसमें वह मानव जीवन के छह महत्वपूर्ण पड़ावों के बारे में संगति करता है और तुरंत ही उन्होंने मेरे दिल की गाँठ खोल दी। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जन्म देने और बच्चे के पालन-पोषण के अलावा बच्चे के जीवन में माता-पिता का उत्तरदायित्व उसके बड़ा होने के लिए बाहर से महज एक परिवेश प्रदान करना है और बस इतना ही होता है क्योंकि सृष्टिकर्ता के पूर्वनियत करने के अलावा किसी भी चीज का उस व्यक्ति के भाग्य से कोई सम्बन्ध नहीं होता। किसी व्यक्ति का भविष्य कैसा होगा, इसे कोई नियन्त्रित नहीं कर सकता; इसे बहुत पहले ही पूर्वनियत किया जा चुका होता है, किसी के भाग्य को उसके माता-पिता भी नहीं बदल सकते। जहाँ तक भाग्य की बात है, हर कोई स्वतन्त्र है और हर किसी का अपना भाग्य है। इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके भाग्य को बिल्कुल भी नहीं रोक सकते और जब उस भूमिका की बात आती है जो किसी के भी माता-पिता जीवन में निभाते हैं तो उसमें जरा-सा भी योगदान नहीं दे सकते हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि व्यक्ति का जन्म चाहे जिस परिवार में होना पूर्वनियत हो और वह चाहे जिस परिवेश में बड़ा हो, वे जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने के लिए मात्र पूर्वशर्तें होती हैं। वे किसी भी तरह से किसी व्यक्ति के भाग्य को या उस प्रकार की नियति को निर्धारित नहीं करते जिसमें रहकर कोई व्यक्ति अपने ध्येय को पूरा करता है। और इसलिए किसी के भी माता-पिता जीवन में उसके ध्येय को पूरा करने में उसकी सहायता नहीं कर सकते और इसी तरह किसी के भी रिश्तेदार जीवन में उसकी भूमिका अच्छे से निभाने में उसकी सहायता नहीं कर सकते। कोई किस प्रकार अपने ध्येय को पूरा करता है और वह किस प्रकार के जीने के परिवेश में अपनी भूमिका निभाता है, यह पूरी तरह से जीवन में उसके भाग्य द्वारा निर्धारित होता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी वस्तुपरक स्थितियाँ किसी व्यक्ति के ध्येय को, जो सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनियत है, प्रभावित नहीं कर सकतीं। सभी लोग अपने-अपने परिवेश में जिसमें वे बड़े होते हैं, परिपक्व होते हैं; तब क्रमशः धीरे-धीरे, अपने रास्तों पर चल पड़ते हैं, और सृष्टिकर्ता द्वारा नियोजित उस नियति को पूरा करते हैं। वे स्वाभाविक रूप से, अनायास ही मानवजाति के विशाल समुद्र में प्रवेश करते हैं और जीवन में अपनी भूमिका ग्रहण करते हैं, जहाँ वे सृष्टिकर्ता के पूर्वनियत करने की खातिर उसकी संप्रभुता की खातिर सृजित प्राणियों के रूप में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करना शुरू करते हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “जब कोई अपने माता-पिता को छोड़कर स्वावलंबी हो जाता है, तो जिन सामाजिक स्थितियों का वह सामना करता है, और उसके लिए उपलब्ध कार्य व जीवनवृत्ति का प्रकार, दोनों भाग्य द्वारा आदेशित होते हैं और उनका उसके माता-पिता से कोई लेना देना नहीं होता। कुछ लोग महाविद्यालय में अच्छे मुख्य विषय चुनते हैं और अंत में स्नातक की पढ़ाई पूरी करके एक संतोषजनक नौकरी पाते हैं, और अपने जीवन की यात्रा में पहली विजयी छलांग लगाते हैं। कुछ लोग कई प्रकार के कौशल सीखकर उनमें महारत हासिल कर लेते हैं, लेकिन फिर भी कोई अनुकूल नौकरी और पद नहीं ढूँढ़ पाते, करियर की तो बात ही छोड़ दो; अपनी जीवन यात्रा के आरम्भ में ही वे अपने आपको हर एक मोड़ पर कुंठित, परेशानियों से घिरा, अपने भविष्य को निराशाजनक और अपने जीवन को अनिश्चित पाते हैं। कुछ लोग बहुत लगन से अध्ययन करने में जुट जाते हैं, फिर भी उच्च शिक्षा पाने के अपने सभी अवसरों से बाल-बाल चूक जाते हैं; उन्हें लगता है कि उनके भाग्य में सफलता पाना लिखा ही नहीं है, उन्हें अपनी जीवन यात्रा में सबसे पहली आकांक्षा ही शून्य में विलीन होती लगती है। ये न जानते हुए कि आगे का मार्ग निर्बाध है या पथरीला, उन्हें पहली बार महसूस होता है कि मनुष्य की नियति कितने उतार-चढ़ावों से भरी हुई है, इसलिए वे जीवन को आशा और भय से देखते हैं। कुछ लोग, बहुत अधिक शिक्षित न होने के बावजूद, पुस्तकें लिखते हैं और बहुत प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं; कुछ, यद्यपि पूरी तरह से अशिक्षित होते हैं, फिर भी व्यवसाय में पैसा कमाकर सुखी जीवन गुज़ारते हैं। ... योग्यता, बौद्धिक स्तर, और संकल्प-शक्ति में भिन्नताओं के बावजूद, भाग्य के सामने सभी लोग एक समान हैं, जो महान और तुच्छ, ऊँचे और नीचे, तथा उत्कृष्ट और निकृष्ट के बीच कोई भेद नहीं करता। कोई किस व्यवसाय को अपनाता है, कोई आजीविका के लिए क्या करता है, और कोई जीवन में कितनी धन-सम्पत्ति संचित करता है, यह उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभा, उसके प्रयासों या उसकी महत्वाकांक्षाओं से तय नहीं होता, बल्कि सृजनकर्ता द्वारा पूर्व निर्धारित होता है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि माता-पिता की जिम्मेदारियों में अपने बच्चों को जन्म देना और पालना-पोसना शामिल है। लेकिन जहाँ तक उनके बच्चों के भाग्य, करियर या उनके गरीब या अमीर बनने का सवाल है, ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें माता-पिता बदल सकते हैं। परमेश्वर ने किसी व्यक्ति के लिए जो भाग्य तय किया है वैसा ही होता है और इसे कोई नहीं बदल सकता। मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझती थी और मुझे लगता था कि चूँकि समाज में इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा है, इसलिए समाज में अपनी जगह बनाने के लिए व्यक्ति के पास शिक्षा या कोई हुनर होना ही चाहिए, वरना उसे एक मुश्किल जीवन जीना पड़ेगा और अगर मैंने अपनी बेटी को सही ढंग से विकसित न किया तो मैंने एक माँ के तौर पर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं की होगी। चूँकि मैं इस गलत नजरिए पर कायम रही, मैंने बहुत छोटी उम्र में ही उसके भविष्य की योजना बनाना शुरू कर दिया। मैंने उसके लिए सबसे अच्छा किंडरगार्टन चुना और उसे विभिन्न हुनरों की कक्षाओं में दाखिला दिलाया और जब दूसरे बच्चे बाहर खेल रहे होते थे तो मेरी बेटी एक कक्षा से दूसरी कक्षा के बीच भाग-दौड़ कर रही होती थी। छोटी उम्र में ही उसे बेड़ियों में जकड़ दिया गया था और वह हर दिन एक रोबोट की तरह जीती थी। उसे उस योजना के अनुसार कदम-दर-कदम आगे धकेला जा रहा था जो मैंने उसके लिए तय की थी और इससे उसने अपने बचपन की वह खुशी खो दी जो उसे मिलनी चाहिए थी। चूँकि मैं पैसे कमाने के लिए सुबह से शाम तक काम करती थी, एक लंबे अरसे से मेरे भोजन का समय तय नहीं था, इसलिए इससे पेट की समस्याएँ हो गईं। मैंने न केवल चुपचाप सहा, बल्कि अपनी बेटी को घर से भागने पर भी मजबूर कर दिया। यह सब परमेश्वर की संप्रभुता को न समझ पाने की मेरी नाकामी के कारण हुआ। यूँ तो मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी, लेकिन मैं उसकी संप्रभुता में सिर्फ जुबानी तौर पर विश्वास करती थी, हकीकत में मैं परमेश्वर के वचनों में सच्चे ढंग से विश्वास नहीं करती थी और मैं परमेश्वर की जरूरतों के अनुसार लोगों या चीजों को नहीं देखती थी या काम और आचरण नहीं करती थी, जिससे मैं और मेरी बेटी दोनों ही तन-मन दोनों से थक गईं और पीड़ा सहने लगीं। मैंने कभी इस बात पर चिंतन नहीं किया कि अपनी बेटी को शिक्षित करने का मेरा तरीका वास्तव में सही था कि नहीं। क्या यह सच में मेरे बच्चे का भविष्य बदल सकता है? जब मैंने पीछे मुड़कर सोचा तो स्कूल में मेरे ग्रेड बहुत ज्यादा खराब नहीं थे और मुझे लगा कि मैं एक शिक्षक प्रशिक्षण विश्वविद्यालय में जा सकती हूँ और भविष्य में एक पक्की नौकरी पा सकती हूँ, लेकिन अप्रत्याशित रूप से मैं अपनी कॉलेज प्रवेश परीक्षा में असफल रही और मुझे कहीं भी दाखिला नहीं मिला। स्नातक होने के बाद मैंने एक हुनर सीख लिया और मैंने मूल रूप से एक कपड़ा कारखाना खोलने की योजना बनाई थी, लेकिन कपड़ा उद्योग अच्छा नहीं चल रहा था, इसलिए मुझे अपना करियर बदलना पड़ा और मैंने एक हेयर सैलून खोला। मैं विस्तार करने के बारे में सोच रही थी, लेकिन कई कारणों से मैंने यह विचार छोड़ दिया। कदम-दर-कदम मैं वहाँ पहुँची जहाँ मैं हूँ और इसमें से कुछ भी मेरी योजनाओं के अनुसार नहीं हुआ था। मैं खुद अपना भाग्य तक नहीं बदल पाई तो मैं अपनी बेटी का भाग्य कैसे बदल सकती थी? मेरी बेटी का भाग्य उसके जन्म के समय परमेश्वर द्वारा पहले ही तय किया जा चुका था और भविष्य में उसके पास किस तरह की नौकरी होगी और क्या वह एक अच्छा जीवन जिएगी, यह सब परमेश्वर द्वारा तय किया जा चुका था। मैं चाहे कितनी भी अच्छी योजना बनाऊँ या उसे कितने ही समग्र रूप से विकसित और शिक्षित करूँ, मैं उसके भाग्य को नहीं बदल सकती हूँ। मैं परमेश्वर की संप्रभुता या उसके विधान को नहीं पहचानती थी और सोचती थी कि मैं अपनी बेटी को विकसित और शिक्षित करने के अपने प्रयास के जरिए उसका भाग्य बदल सकती हूँ। मैं सचमुच दयनीय और अज्ञानी थी। मैं अपनी बेटी के लिए जो कुछ भी करती थी वह सब सतह पर सही लगता था और मैं उसके भविष्य के लिए योजनाएँ बना रही थी, लेकिन वास्तव में मैं जो कर रही थी वह किसी माता या पिता की जिम्मेदारियों से परे की चीज थी। मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के विरोध में काम कर रही थी!

फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कोई व्यक्ति हर दिन कहाँ जाएगा, क्या करेगा, किस व्यक्ति या चीज से उसका सामना होगा, वह क्या कहेगा और उसके साथ क्या होगा—क्या लोग इनमें से किसी चीज की भविष्यवाणी कर सकते हैं? कहा जा सकता है कि लोग न केवल इन सभी घटनाओं का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते, बल्कि उससे भी अधिक, वे इस बात पर नियंत्रण नहीं कर सकते कि ये चीजें किस प्रकार विकसित होंगी। लोगों के दैनिक जीवन में ऐसी अप्रत्याशित घटनाएँ हर समय घटती हैं; ये आम घटनाएँ हैं। इन ‘दैनिक जीवन के तुच्छ मामलों’ की घटनाएँ और उनके विकास के साधन और नियमितता मानव जाति को लगातार याद दिलाते हैं कि कुछ भी संयोग से नहीं होता है और प्रत्येक घटना के विकास की प्रक्रिया और प्रत्येक घटना की अपरिहार्यता मनुष्य की इच्छा से बदली नहीं जा सकती। हर घटना का घटित होना सृष्टिकर्ता की ओर से मानवजाति को एक चेतावनी होती है और वह यह सन्देश भी देती है कि मनुष्य अपने भाग्य को खुद नियन्त्रित नहीं कर सकते। साथ ही, यह अपने भाग्य को अपने हाथों में लेने की मानवजाति की व्यर्थ महत्वाकांक्षा और इच्छा का खंडन भी है। यह खंडन एक जोरदार तमाचे जैसा है जो मानवजाति पर बार-बार पड़ता है और यह लोगों को यह आत्मचिंतन करने के लिए बाध्य करता है कि वास्तव में वो कौन है जो उनके भाग्य पर संप्रभुता रखता है और इसे नियन्त्रित करता है। और चूँकि उनकी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ लगातार धराशायी होती हैं और बिखर जाती हैं, इसलिए लोग अनजाने में भाग्य की व्यवस्था के अनुरूप ढलने और वास्तविकता, स्वर्ग की इच्छा और सृष्टिकर्ता की संप्रभुता स्वीकारने से नहीं बच सकते(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “मनुष्य की त्रासदी यह नहीं है कि वह सुखी जीवन के पीछे भागता है और न ही यह है कि वह प्रसिद्धि और लाभ का पीछा करता है या वह धुंध में अपनी नियति के खिलाफ संघर्ष करता है, बल्कि यह है कि सृष्टिकर्ता का अस्तित्व देख लेने के बाद भी, यह सच्चाई जान लेने के बाद भी कि सृष्टिकर्ता मानव की नियति पर संप्रभु है, वह गलत मार्ग से लौट नहीं पाता है, वह कीचड़ से अपने पैर बाहर नहीं निकाल पाता है, बल्कि अपना दिल कठोर बना लेता है और अपनी गलतियों पर अड़ा रहता है। लेशमात्र भी पछतावे के बिना, वह कीचड़ में लगातार हाथ पैर मारना, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के विरोध में अवज्ञतापूर्ण ढंग से स्पर्धा करना अधिक पसंद करता है, और दुखद अंत तक प्रतिरोध करता रहता है। जब वह टूटकर बिखर जाता है और उसका रक्त बह रहा होता है तब जाकर वह अंततः हार मान लेने और वापस मुड़ने का निर्णय लेता है। यही मनुष्य की असली त्रासदी है। इसलिए मैं कहता हूँ, जो लोग समर्पण करना चुनते हैं वे बुद्धिमान हैं, जबकि जो संघर्ष करने और बचकर भागने का चुनाव करते हैं, वे वस्तुतः मूर्ख और जिद्दी होते हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैंने खुद पर चिंतना करना शुरू कर दिया। पीछे मुड़कर यह देखने पर कि मैंने कैसे अपनी बेटी को विकसित किया, मैं हमेशा यह मानती थी कि अगर मैंने अपनी बेटी के भविष्य की योजना बना ली और उस योजना को क्रियान्वित कर लिया तो वह अपने करियर में जरूर सफल होगी। परमेश्वर को खोजने के बाद भाई-बहनों ने मेरे साथ संगति की कि एक बच्चे का भविष्य परमेश्वर द्वारा नियत होता है, माता-पिता इसे नियंत्रित नहीं कर सकते और हमें परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए। लेकिन मैं अभी भी अपने ही नजरिए पर अड़ी रही, यह मानती रही कि मेरी बेटी का अपने करियर में सफल होना उसकी कड़ी मेहनत पर निर्भर है। संसार के लोग परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास नहीं करते और उन्हें लगता है कि व्यक्ति का भाग्य उसके अपने हाथ में होता है। वे मानते हैं कि केवल कठिनाई सहकर व्यक्ति दूसरों से ऊपर उठ सकता है और वे सृष्टिकर्ता के विधान और संप्रभुता का आँख मूँदकर प्रतिरोध करते हैं। भले ही मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी, मैं मानव भाग्य पर उसकी संप्रभुता में विश्वास नहीं करती थी और मेरा नजरिया बिल्कुल वही था जैसा अविश्वासियों का होता है, मैं अपनी बेटी का भाग्य मानवीय प्रयास से बदलना चाह रही थी। मैं किस तरह से एक विश्वासी थी? मेरे विचार छद्म-विश्वासियों जैसे ही थे। मैं सचमुच परमेश्वर के सामने जीने के लायक नहीं थी! मैं अच्छी तरह से जानती थी कि परमेश्वर सारी सृष्टि का प्रभु है और हर चीज पर संप्रभु है और नियंत्रण रखता है, लेकिन अपनी स्वार्थी इच्छाओं की खातिर, मैं हठपूर्वक परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त होना और अपनी बेटी का भविष्य बदलना चाहती थी। यह मेरे लिए भी और मेरी बेटी के लिए भी काफी पीड़ा और क्षति लेकर आया और यही नहीं, यह परमेश्वर के विधान का प्रतिरोध करना था। यह एहसास होने पर मैं अब और परमेश्वर की संप्रभुता का प्रतिरोध नहीं करना चाहती थी और मैं अपनी बेटी को परमेश्वर के हाथों में सौंपने को तैयार हो गई; चाहे वह अपनी पढ़ाई में अच्छा करती है या खराब, मैं समर्पण करने की इच्छुक रहूँगी। प्रार्थना करने के बाद मुझे अपने दिल में और अधिक शांति महसूस हुई।

कुछ ही समय बाद मेरी बेटी लौट आई। उसने कहा कि वह एक रेस्टोरेंट में काम कर रही है। यह देखकर कि मेरी बेटी का वजन कम हो गया है, मैंने दुखी होकर पूछा, “क्या तुम फिर से चली जाओगी?” मेरी बेटी ने सिसकियाँ भरते हुए सिर हिलाया। मैंने अपने आँसू रोकने के लिए खुद पर काबू रखा और कहा, “बाहर कितना मुश्किल है। तुम घर वापस क्यों नहीं आ जाती?” मेरी बेटी ने रोते हुए कहा, “यहाँ मेरे पास कोई आजादी नहीं है।” मेरी बेटी का जवाब मेरी देह को चाकू की तरह चीर रहा था और मुझे ऐसा लगा कि मेरा दिल टूट रहा है। क्या इस सब का कारण यह नहीं था कि मैं उस पर चीजें थोपती थी? मैंने अपनी बच्ची को उसकी आजादी और खुशी से वंचित रखा, इस हद तक कि वह बाहर जाकर दुख सहना पसंद कर लेगी लेकिन घर नहीं लौटेगी। मैं किस तरह से एक कर्तव्यनिष्ठ माँ थी? मैं अब और अपने आँसू नहीं रोक सकी और अपनी बेटी को गले लगाकर फूट-फूट कर रोने लगी। मेरी बेटी भी फूट-फूट कर रोई और मैंने कहा, “मैं गलत थी। मैं एक अच्छी माँ नहीं थी; मुझे तुम पर इतना दबाव नहीं डालना चाहिए था। मैंने तुम्हें घर पर तुम्हारी सारी आजादी से वंचित कर दिया और मैंने तुम्हें इतना अधिक दर्द दिया। कृपया घर आ जाओ। मैं तुम्हें वे सारी चीजें पढ़ने के लिए अब और मजबूर नहीं करूँगी जो तुम पढ़ रही हो।” मेरी बेटी के वापस आने के बाद मैंने उसे पहले की तरह पढ़ाई के लिए मजबूर नहीं किया। मैंने उसे स्वाभाविक रूप से विकसित होने दिया और मैंने उसकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों और दैनिक जीवन की देखभाल पर ज़्यादा ध्यान दिया और मैंने उसके साथ आस्था के बारे में बात की। धीरे-धीरे, मेरी बेटी ज़्यादा बोलने लगी और बहुत ज़्यादा खुशमिजाज़ हो गई, और घर हँसी से भर गया। एक दिन मेरी बेटी ने कहा, “माँ, तुम बदल गई हो; तुम मुझे पढ़ाई करने के लिए पहले की तरह मजबूर नहीं करती हो।” मैंने कहा, “मुझमें यह छोटा सा बदलाव परमेश्वर के वचन के मार्गदर्शन के कारण है। परमेश्वर के वचनों से मुझे यह समझ में आ चुका है कि मेरी जिम्मेदारी तुम्हें स्वस्थ रूप से पालना-पोसना और वैचारिक रूप से उचित शिक्षा प्रदान करना है। भविष्य में तुम पढ़ाई में सफल होगी या समाज में अपनी जगह बना पाओगी, यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और तय किया गया है। पहले तुम पर दबाव डालना मेरी गलती थी। इसने हम दोनों को इतनी अधिक पीड़ा दी, लेकिन चिंता मत करो, मैं तुम पर फिर से दबाव नहीं डालूँगी।” मैं और मेरी बेटी दोनों ही रो पड़ीं। बाद में मेरी बेटी ने एक व्यावसायिक स्कूल में दाखिला ले लिया और वह परीक्षाओं में हमेशा अव्वल छात्रों में शामिल रही। वह लगभग हर रात मुझे फोन करती, उस दिन स्कूल में घटित हर चीज मुझे बताती थी और हमारा रिश्ता दोस्तों जैसा हो गया। मैंने अपने दिल में सचमुच महसूस किया कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना कितना अच्छा है!

बाद में मैंने परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़े और मुझे यह थोड़ी सी विवेकशीलता मिली कि क्या अपनी बेटी से मेरी उम्मीदें विवेकपूर्ण थीं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी माँ-बाप अपने बच्चों से कुछ अपेक्षाएँ रखते हैं। चाहे वे बड़ी हों या छोटी, अल्पकालिक हों या दीर्घकालिक, ये अपेक्षाएँ एक रवैया हैं जो माँ-बाप का अपने बच्चों के आचरण, उनके क्रियाकलापों, जीवन या उनके बच्चे उनसे कैसे पेश आते हैं, के प्रति होता है। वे एक तरह की विशिष्ट माँग भी हैं। ये विशिष्ट शर्तें, उनके बच्चों के परिप्रेक्ष्य से, ऐसी चीजें हैं जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, क्योंकि पारंपरिक धारणाओं के आधार पर, बच्चे अपने माँ-बाप के आदेशों के खिलाफ नहीं जा सकते—अगर वे ऐसा करते हैं तो वे संतानोचित दायित्व नहीं निभाते। इस वजह से, बहुत-से लोग इस मामले को लेकर बहुत बड़ा और भारी बोझ उठाते हैं। तो, क्या लोगों को यह नहीं समझना चाहिए कि माँ-बाप अपने बच्चों से जो विशिष्ट अपेक्षाएँ रखते हैं, वे उचित हैं या नहीं, और उनके माँ-बाप को ये अपेक्षाएँ रखनी भी चाहिए या नहीं, साथ ही इनमें से कौन-सी अपेक्षाएँ उचित हैं, कौन-सी अनुचित हैं, कौन-सी जायज हैं और कौन-सी बाध्यकारी और नाजायज हैं? इसके अलावा, माँ-बाप की अपेक्षाओं के प्रति क्या रुख रखना चाहिए, उन्हें कैसे स्वीकारना या ठुकराना है, और इन अपेक्षाओं को देखने और इनके प्रति रुख अपनाते समय क्या रवैया और परिप्रेक्ष्य होना चाहिए, जब इनकी बात आती है, तो कुछ ऐसे सत्य सिद्धांत हैं जिन्हें लोगों को समझना और पालन करना चाहिए। जब इन चीजों का समाधान नहीं होता, तो माँ-बाप अक्सर इस तरह का बोझ उठाते हुए चलते हैं, यह सोचकर कि अपने बच्चों और संतानों के लिए अपेक्षाएँ रखना उनकी जिम्मेदारी और दायित्व है, और स्वाभाविक रूप से, वे ऐसी चीजें हैं जो उनके पास होनी ही चाहिए। वे सोचते हैं कि अगर वे अपने बच्चों से कोई अपेक्षाएँ न रखें, तो यह उनकी संतानों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों या दायित्वों को पूरा न करने के समान होगा, और माँ-बाप को जो करना चाहिए वह न करने के बराबर होगा। वे सोचते हैं कि इससे वे बुरे माँ-बाप बन जाएँगे, ऐसे माँ-बाप जो अपनी जिम्मेदारियाँ नहीं निभाते हैं। इसलिए, जब अपने बच्चों से की गई अपेक्षाओं की बात आती है, तो लोग अनजाने में ही अपने बच्चों के लिए विभिन्न माँगें निर्धारित कर लेते हैं। अलग-अलग समय और परिस्थितियों में विभिन्न बच्चों के लिए उनकी अलग-अलग माँगें होती हैं। क्योंकि जब बात अपने बच्चों की आती है तो माँ-बाप इस तरह का दृष्टिकोण रखते और बोझ उठाते हैं, इसलिए माँ-बाप इन अलिखित नियमों के अनुसार वे काम करते हैं जो उन्हें करने चाहिए, फिर चाहे वे सही हों या गलत। माँ-बाप इन तरीकों को एक प्रकार का दायित्व और एक प्रकार की जिम्मेदारी मानते हुए अपने बच्चों से माँग करते हैं, और साथ ही, इन्हें अपने बच्चों पर थोपते हैं, और इन्हें हासिल करने को उन्हें मजबूर करते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। “अपने बच्चों से माता-पिता की अपेक्षाएँ चाहे जितनी भी बड़ी क्यों न हों, और माता-पिता अपने बच्चों से अपनी अपेक्षाओं को चाहे जितना भी सही और उचित मानते हों, अगर ये अपेक्षाएँ इस सत्य के विरुद्ध हों कि मानव नियति पर परमेश्वर की संप्रभुता है, तो ये ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोगों को जाने देना चाहिए। कहा जा सकता है कि यह एक नकारात्मक चीज भी है; यह न उचित है न सकारात्मक। यह माता-पिता की जिम्मेदारियों के विरुद्ध और उन जिम्मेदारियों के दायरे से बाहर है, और ये अपेक्षाएँ और माँगें अवास्तविक हैं, जो मनुष्यता के विपरीत हैं। ... कुछ असामान्य क्रियाकलाप और आचरण और साथ ही कुछ चरम बर्ताव, जो माता-पिता अपने नाबालिग बच्चों के साथ करते हैं, जिससे उनके बच्चों पर तरह-तरह के नकारात्मक प्रभाव और दबाव पड़ते हैं, और छोटे बच्चों की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक खुशहाली बरबाद हो जाती है। ये चीजें संकेत देती हैं कि उनके माता-पिता की करनी अनुपयुक्त और अनुचित है। ये ऐसे विचार और कर्म हैं जिन्हें सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों को जाने देना चाहिए, क्योंकि मनुष्यता के नजरिये से यह किसी बच्चे की शारीरिक और मानसिक खुशहाली को बरबाद कर देने का एक क्रूर और अमानवीय तरीका है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर उजागर करता है कि जब माता-पिता अपने बच्चों से अपनी अनुचित अपेक्षाओं और माँगों को ऐसे कर्तव्यों और दायित्वों के रूप में देखते हैं जिन्हें उन्हें अपने बच्चों के लिए पूरा करना ही चाहिए, और फिर वे बच्चों को उन्हें पूरा करने के लिए मजबूर करते हैं, तो यह बच्चों को नुकसान पहुँचाता है और उन्हें बर्बाद कर देता है। मैंने खुद पर विचार किया। बचपन से ही मैंने देखा था कि मेरे माता-पिता ने यह पक्का करने के लिए कितना त्याग किया कि भविष्य में हमारी अच्छी नौकरी लगे, और मैं सचमुच अपने माता-पिता की प्रशंसा करती थी और सोचती थी कि वे कर्तव्यनिष्ठ हैं, और मैंने सोचा कि जब मेरे बच्चे होंगे, तो मैं भी अपने माता-पिता की तरह ही करूँगी, और मैं एक ज़िम्मेदार और अच्छी माँ बनूँगी। मेरी बेटी के जन्म के बाद, मुझे लगा कि चूँकि मेरी बेटी इतनी छोटी है, वह सामाजिक प्रतिस्पर्धा की कठोर हकीकत और क्रूरता के बारे में नहीं जानती है और चूँकि मैं इस दौर से गुजर चुकी हूँ, मुझे उसके भविष्य की योजना बनानी होगी और उसके लिए आगे का रास्ता बनाना होगा और भले ही इसमें कुछ पीड़ा सहनी पड़े या थकना पड़े, मुझे पेट काटकर पैसे बचाने होंगे और उसे शिक्षित और विकसित करने के लिए सब कुछ करना होगा ताकि वह बहुमुखी प्रतिभा वाली बन सके और उसका भविष्य उज्ज्वल हो। मुझे लगा कि एक माँ के तौर पर यह मेरी जिम्मेदारी और दायित्व है। मैंने अपनी बेटी को शिक्षित और विकसित करने की अपनी योजना का पालन किया, उसे विभिन्न शिक्षणेत्तर कक्षाओं में दाखिला दिलाया और यहाँ तक कि उसकी पढ़ाई में देरी न हो, इसके लिए मैंने सहपाठियों के साथ उसके मेलजोल की भी गुपचुप ढंग से जाँच की। मैं अक्सर उसे अपने अनुभव से सलाह देती थी, और जब मेरी बेटी थकने और आज़ादी न होने की शिकायत करती, तब भी मैं उसे इस अस्थायी कठिनाई से पार पाने के लिए मनाने और फुसलाने की कोशिश करती। मैंने कभी नहीं सोचा कि इसमें कुछ गलत है। मेरा मानना था कि यह मैं उसकी भलाई के लिए कर रही हूँ और उसके प्रति जिम्मेदारी बरत रही हूँ। यहाँ तक कि जब मेरे भाई-बहन मेरे साथ संगति करते, तब भी मैं पुनर्विचार नहीं करती थी और मैंने अपनी बेटी की भावनाओं के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा। मैंने यह नहीं सोचा कि वह एक बच्ची है या इस उम्र में उसे क्या चाहिए और मैंने बस अपनी उम्मीदें उस पर थोप दीं, उसके छोटे से दिल और दिमाग पर भारी दबाव, बंधन और दर्द डाला। इसमें मैं एक माँ के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों या दायित्वों को पूरा नहीं कर रही थी और मेरे क्रियाकलाप पूरी तरह से अविवेकपूर्ण मानवीय अपेक्षाओं पर आधारित थे। मैंने अपनी सभी अपेक्षाओं को एक माँ की जिम्मेदारी माना और अपनी बेटी को घर से भागने की हद तक मजबूर कर दिया। मेरी तथाकथित “जिम्मेदारी” हम दोनों माँ-बेटी के लिए ही दर्द लेकर आई!

एक दिन मेरी साझेदार बहन ने मुझसे पूछा, “तुम हमेशा यह सोचती थी कि अपनी बेटी को विकसित करना एक माँ की जिम्मेदारी निभाना है, लेकिन तुमने उसे कभी वह नहीं करने दिया जो उसे पसंद था, बल्कि तुमने उससे यह माँग की कि वह तुम्हारी उम्मीदों पर खरा उतरे। क्या इसके पीछे किसी तरह का भ्रष्ट स्वभाव नहीं है?” मैं यह सवाल लेकर परमेश्वर के सामने प्रार्थना में गई और मैंने उसके वचन पढ़े : “माँ-बाप की ये अपेक्षाएँ किस चीज पर आधारित हैं? वे कहाँ से आती हैं? वे समाज और संसार से आती हैं। माँ-बाप की इन सभी अपेक्षाओं का उद्देश्य बच्चों को इस संसार और समाज के अनुकूल होने में सक्षम बनाना है, ताकि वे संसार या समाज द्वारा निकाले जाने से बच सकें और समाज में अपना पैर जमाते हुए एक सुरक्षित नौकरी, एक स्थिर परिवार और एक स्थिर भविष्य पा सकें; इसलिए, माँ-बाप अपने बच्चों से विभिन्न व्यक्तिपरक अपेक्षाएँ रखते हैं। उदाहरण के लिए, अभी कंप्यूटर इंजीनियर बनना काफी फैशन में है। कुछ लोग कहते हैं : ‘मेरा बच्चा भविष्य में कंप्यूटर इंजीनियर बनेगा। कंप्यूटर इंजीनियरिंग करके और पूरे दिन कंप्यूटर लेकर घूमते हुए, इस क्षेत्र में वे बहुत सारे पैसे कमा सकते हैं। इससे मेरा भी नाम रौशन होगा!’ इन परिस्थितियों में, जहाँ बच्चों को किसी भी चीज का कोई अंदाजा नहीं होता, उनके माँ-बाप उनका भविष्य तय कर देते हैं। क्या यह गलत नहीं है? (गलत है।) उनके माँ-बाप अपने बच्चों पर पूरी तरह से एक बालिग व्यक्ति के नजरिये से चीजों को देखने के साथ-साथ संसार के मामलों में किसी बालिग व्यक्ति के विचारों, परिप्रेक्ष्यों और प्राथमिकताओं के आधार पर उम्मीदें लगा रहे हैं। क्या यह व्यक्तिपरक सोच नहीं है? (बिल्कुल है।) शिष्ट शब्दों में कहें, तो इसे व्यक्तिपरक कहना सही होगा, पर यह वाकई में क्या है? इस व्यक्तिपरकता की दूसरी व्याख्या क्या है? क्या यह स्वार्थ नहीं है? क्या यह जबरदस्ती नहीं है? (बिल्कुल है।) तुम्हें अमुक-अमुक नौकरी और अमुक-अमुक करियर पसंद है, तुम्हें अपनी पहचान बनाना, आलीशान जीवन जीना, एक अधिकारी के रूप में काम करना या समाज में अमीर आदमी बनना पसंद है, तो तुम अपने बच्चों से भी ये चीजें कराते हो, उन्हें भी ऐसे व्यक्ति बनाते हो, और इसी मार्ग पर चलाते हो—पर क्या वे भविष्य में उस माहौल में रहना और उस काम में शामिल होना पसंद करेंगे? क्या वे इसके लिए उपयुक्त हैं? उनकी नियति क्या है? उनको लेकर परमेश्वर की व्यवस्थाएँ और फैसले क्या हैं? क्या तुम्हें ये बातें पता हैं? कुछ लोग कहते हैं : ‘मुझे उन चीजों की परवाह नहीं है, मायने रखती हैं वे चीजें जो मुझे, उनके माँ-बाप होने के नाते पसंद हैं। मैं अपनी पसंद के आधार पर उनसे उम्मीदें लगाऊँगा।’ क्या यह बहुत स्वार्थी बनना नहीं है? (बिल्कुल है।) यह बहुत स्वार्थी बनना है! शिष्ट भाषा में कहें, तो यह बहुत ही व्यक्तिपरक है, इसे सभी फैसले खुद लेना कहेंगे, पर वास्तव में यह है क्या? यह बहुत स्वार्थी होना है! ये माँ-बाप अपने बच्चों की काबिलियत या प्रतिभाओं पर विचार नहीं करते, वे उन व्यवस्थाओं की परवाह नहीं करते जो परमेश्वर ने हरेक व्यक्ति के भाग्य और जीवन के लिए बनाई हैं। वे इन चीजों पर विचार नहीं करते हैं, वे बस अपनी मनमर्जी से अपनी पसंद, इरादों और योजनाओं को अपने बच्चों पर थोपते हैं। कुछ लोग कहते हैं : ‘मुझे अपने बच्चों से ये चीजें करवानी ही होंगी। वे उन चीजों को समझने के लिए अभी बहुत छोटे हैं, और जब तक वे उन्हें समझेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।’ क्या ऐसा ही है? (नहीं।) अगर सचमुच बहुत देर हो जाती है, तो यह उनका भाग्य है, यह उनके माँ-बाप की जिम्मेदारी नहीं है। अगर तुम अपना ज्ञान अपने बच्चों पर थोपोगे, तो क्या वे उन्हें सिर्फ इसलिए जल्दी समझ लेंगे क्योंकि तुम उन्हें समझते हो? (नहीं।) माँ-बाप अपने बच्चों को कैसे शिक्षित करते हैं और वे बच्चे कब यह समझने लगते हैं कि उन्हें जीवन में किस प्रकार का मार्ग चुनना है, किस प्रकार का करियर चुनना है और उनका जीवन कैसा होगा, इन चीजों के बीच कोई संबंध नहीं है। उनके अपने मार्ग, अपनी रफ्तार और अपने नियम हैं। ... तुम अपने बच्चों पर शुरू से ही यह दबाव बना रहे हो ताकि उन्हें भविष्य में कम कष्ट सहना पड़े, और ऐसा करने में उन्हें उसी उम्र से उस दबाव को सहना होगा जहाँ उन्हें अभी कुछ समझ भी नहीं आता—ऐसा करके, क्या तुम बच्चों को नुकसान नहीं पहुँचा रहे हो? क्या तुम सचमुच उनके भले के लिए ऐसा कर रहे हो? उनका इन बातों को न समझना ही बेहतर है, इस तरह वे कुछ बरस सहज, सुखी, शुद्ध और सरल ढंग से जी सकेंगे। अगर वे उन चीजों को जल्दी समझ लें, तो क्या यह एक वरदान होगा या दुर्भाग्य? (यह दुर्भाग्य होगा।) हाँ, यह दुर्भाग्य ही होगा(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि माता-पिता की अपने बच्चों से अविवेकपूर्ण अपेक्षाएँ बुरे रुझानों और समाज से प्रभावित होती हैं और ये सभी चीजें शैतान से हैं। ठीक मेरे मामले की तरह, मेरे पास अल्प शिक्षा थी और कोई खास हुनर नहीं था और मैं समाज में अपने प्रयासों से बमुश्किल गुजर-बसर कर पाती थी, जबकि ज़्यादा पढ़े-लिखे या खास हुनर वाले लोगों को कम दुख उठाना पड़ता है, और वे अपने दिमाग का इस्तेमाल करके और बोलकर ही बुनियादी ज़रूरतों की चिंता किए बिना जीवन जी सकते हैं। मैं ऐसे भ्रामक और कपटी शैतानी फलसफों से प्रभावित थी, जैसे, “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं,” “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है” और “जो लोग अपने दिमाग से परिश्रम करते हैं वे दूसरों पर शासन करते हैं, और जो अपने हाथों से परिश्रम करते हैं, वे दूसरों के द्वारा शासित होते हैं।” मुझे लगता था कि केवल ज्ञान और खास हुनर ही किसी का भाग्य बदल सकते हैं और एक अच्छा जीवन दे सकते हैं, इसलिए अपने अनुभव के साथ मैंने अपनी छोटी सी बेटी के लिए योजनाएँ बनाने का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया, उसे ज्ञान और हुनर सीखने के लिए मजबूर किया, इस बात पर जरा भी विचार नहीं किया कि क्या ये वे चीजें हैं जो मेरी बेटी को पसंद हैं। मैं सिर्फ़ अपनी बेटी को एक प्रतिभाशाली और असाधारण व्यक्ति के रूप में विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही थी। शैतान लोगों को गुमराह करने के लिए इन फलसफों का इस्तेमाल करता है, जिससे मैं गलती से यह मान बैठी कि केवल ज्ञान ही किसी का भाग्य बदल सकता है, और मैं बस यही सोचती रहती थी कि अपनी बेटी का भाग्य बदलने के लिए उसे कैसे विकसित करूँ। पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे एहसास हुआ कि मैंने जो किया उसका कोई वास्तविक मतलब नहीं था, कि परमेश्वर ने पहले ही तय कर दिया है कि मेरी बेटी क्या बनेगी, और इसे कोई नहीं बदल सकता। मुझे शैतान के भ्रष्ट तरीकों या दुर्भावनापूर्ण इरादों को लेकर कोई विवेकशीलता नहीं थी और मैंने मनमाने ढंग से अपनी बेटी को मजबूर किया कि वह मेरी इच्छा के अनुसार कार्य करे। नतीजतन, मेरी बेटी ने इतनी कम उम्र में इतना अधिक दबाव और दर्द सहा और उसका किसी समय का मासूम और बेफिक्र बचपन मेरे स्वार्थ के कारण चौपट हो गया। क्या मैं अपनी बच्ची को नुकसान नहीं पहुँचा रही थी? सतह पर, ऐसा लग रहा था कि मैं अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोच रही हूँ, लेकिन असल में, मैं अपनी पसंद और इच्छाएँ उस पर थोप रही थी, यह सब मेरी अपनी स्वार्थी इच्छाओं और खुद को गौरवान्वित करने के लिए था। मैं सचमुच स्वार्थी थी! मैं यह सोचने की हिम्मत भी नहीं कर सकती—अगर परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन न होता तो अपनी बेटी को इसी तरह बाँधकर और दबाकर रखे रहने पर उसके साथ क्या होता? यह एहसास होने पर मैंने परमेश्वर का तहेदिल से धन्यवाद किया कि उसने मुझे प्रबुद्ध किया और मार्गदर्शन दिया, मुझे अपनी भ्रष्ट प्रकृति को थोड़ा और समझने की अनुमति दी।

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “माँ-बाप की अपने बच्चों से की जाने वाली अपेक्षाओं के सार का गहन-विश्लेषण करके हम देख सकते हैं कि ये अपेक्षाएँ स्वार्थपूर्ण हैं, ये मानवता के विरुद्ध हैं और इनका माँ-बाप की जिम्मेदारियों से कोई लेना-देना नहीं है। जब माँ-बाप अपने बच्चों पर तमाम तरह की अपेक्षाएँ और माँगें थोपते हैं तो वे उन पर बहुत ही ज्यादा अतिरिक्त दबाव डाल देते हैं—यह उनके द्वारा अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं है। तो वे कौन-सी जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को निभानी चाहिए? उन्हें कम से कम अपने बच्चों को ऐसे ईमानदार लोग होना सिखाना चाहिए जो सत्य बोलते हों और ईमानदार ढंग से चीजें करते हों और उन्हें दयालु होना और खराब चीजें न करना सिखाना चाहिए, उन्हें एक सकारात्मक दिशा में मार्गदर्शन देना चाहिए। ये उनकी सबसे बुनियादी जिम्मेदारियाँ हैं। इसके अलावा उन्हें अपने बच्चों की काबिलियत और परिस्थितियों के अनुसार उनका मार्गदर्शन व्यावहारिक ज्ञान, कौशल आदि के अध्ययन में करना चाहिए। अगर माता-पिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सत्य को समझते हैं तो उन्हें अपने बच्चों से परमेश्वर के वचन पढ़वाने चाहिए और सत्य स्वीकार कराना चाहिए ताकि वे सृष्टिकर्ता को जान सकें और यह समझ सकें कि लोग परमेश्वर द्वारा रचे गए हैं और परमेश्वर इस ब्रह्मांड में विद्यमान है; उन्हें परमेश्वर से प्रार्थना करने और परमेश्वर के वचन खाने-पीने में अपने बच्चों का मार्गदर्शन करना चाहिए ताकि वे कुछ सत्यों को समझ सकें, ताकि जब वे बड़े हों तो वे परमेश्वर में विश्वास कर लें, परमेश्वर का अनुसरण करें और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभा सकें, न कि सांसारिक प्रवृत्तियों का पीछा करें, विभिन्न जटिल अंतरवैयक्तिक संबंधों में फँस जाएँ और इस संसार की विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों से बहकाए, भ्रष्ट या नष्ट किए जाएँ। वास्तव में यही वे जिम्मेदारियाँ हैं जो माता-पिता को पूरी करनी चाहिए। माता-पिता के रूप में उन्हें ये जिम्मेदारियाँ निभानी चाहिए कि वे अपने बच्चों के बालिग होने से पहले उन्हें सकारात्मक मार्गदर्शन और उपयुक्त सहायता प्रदान करें, साथ ही उनके दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के संबंध में उनकी शारीरिक देखभाल भी समय पर करें(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे अभ्यास का एक मार्ग दिखाया और अब मैं जान गई कि अपने बच्चों के साथ कैसे ठीक से पेश आना है। माता-पिता को अलग-अलग उम्र में बच्चे की ज़रूरतों के अनुसार उचित परवरिश और शिक्षा देनी चाहिए। जब बच्चे छोटे होते हैं, तो उन्हें अपने माता-पिता से यह सीखने की ज़रूरत होती है कि कैसे आचरण करें, कैसे सामान्य इंसानी सोच रखें, कैसे एक दयालु इंसान बनें, और माता-पिता को उनके स्वास्थ्य का भी अच्छा ध्यान रखना चाहिए, ताकि वे स्वस्थ रूप से वयस्क हो सकें। माता-पिता को उन पर गलत विचार नहीं थोपने चाहिए, न ही उन पर दबाव और बोझ डालना चाहिए। और जब संभव हो, तो वे उन्हें बता सकते हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को कैसे बनाया, वह लोगों की अगुआई करने और उन्हें बचाने के लिए कैसे काम करता है, और वे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने के लिए मार्गदर्शन दे सकते हैं, और उन्हें सकारात्मक दिशा और मदद प्रदान कर सकते हैं। यह भी एक माता-पिता की जिम्मेदारी और दायित्व है। अब मेरी बेटी अपनी विशेषज्ञता से जुड़े क्षेत्र में काम नहीं कर रही है और मेरी बड़ी बहन ने कहा कि मैं अपनी बेटी को उसकी विशेषज्ञता पर आधारित नौकरी ढूँढ़ने के लिए मनाऊँ, लेकिन मैं जानती हूँ कि मेरी बेटी जो भी नौकरी करेगी, वह परमेश्वर ने पहले ही तय कर दी है। मैं अपनी बेटी को सलाह दे सकती हूँ, लेकिन वह अपनी इच्छानुसार चुनने के लिए स्वतंत्र है। फिर मैंने अपने विचार उसके साथ साझा किए। मेरी बेटी ने कहा, “मुझे अपनी मौजूदा नौकरी पसंद है।” मैंने कहा, “तुम ऐसा कह रही हो तो मैं तुम्हारी पसंद का सम्मान करती हूँ।” उसके साथ यह बातचीत बहुत सहज थी और इसमें कोई ज़बरदस्ती या दबाव नहीं था। मैंने अनुभव किया कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना सचमुच मुक्तिदायक है। मार्गदर्शन के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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