बाइबल स्टडीः क्या स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए केवल उद्धार की ही आवश्यकता है?

14 जुलाई, 2020

शेन क्विंगकिंग, दक्षिण कोरिया

बाइबल स्टडीः क्या स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए केवल उद्धार की ही आवश्यकता है

बहुत से लोग प्रभु के आगमन पर उसके द्वारा बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में आरोहित किए जाने की राह देख रहे हैं। आज तक, केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया ही खुलेआम गवाही देती रही है कि प्रभु यीशु लौट आया है, और वह लोगों को बचाने और शुद्ध करने के लिए परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य कर रहा है। इस ख़बर को सुनकर कुछ लोग उलझन में पड़ सकते हैं। वे इन पदों को पढ़ते हैं: "जो विश्‍वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्‍वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा" (मरकुस 16:16), "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है" (रोमियों 10:10), और इनका यह मतलब समझते हैं कि क्योंकि प्रभु यीशु को पूरी मानवजाति के पापों का प्रायश्चित करने के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया था, इसलिए वे जब तक प्रभु में विश्वास करते रहेंगे, बचा लिये जाएंगे, और एक बार जब उन्हें बचा लिया गया, तो वे सदा के लिए बच गए। उनका मानना है कि अगर वे प्रभु का नाम लेते रहेंगे और अंत तक उस पर कायम रहेंगे, तो प्रभु के लौटकर आने पर, अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण के कार्य को स्वीकार किये बिना ही वे लोग सीधे स्वर्ग के राज्य में आरोहित किये जा सकते हैं। क्या इस प्रकार का विश्वास सही है?

आइये हम विचार करते हैं: क्या प्रभु ने कभी कहा कि एक बार जब व्यक्ति को बचा लिया जाएगा तो वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? क्या बाइबल में ऐसा कहा गया है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर है, बिलकुल नहीं। प्रभु यीशु ने कहा था, "जो मुझ से, 'हे प्रभु! हे प्रभु!' कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है" (मत्ती 7:21)। परमेश्वर के वचन के आधार पर, हम जानते हैं कि केवल स्वर्गिक पिता की इच्छा पर चलने वाले ही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाएंगे। स्वर्गिक पिता की इच्छा पर चलने का मतलब है, चाहे जैसी भी परिस्थिति हो, परमेश्वर के वचन को अभ्यास में लाने में सक्षम होना, परमेश्वर के प्रति समर्पित होना और परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीने में सक्षम होना, और दोबारा कभी भी पाप न करना या परमेश्वर का विरोध नहीं करना। फिर भी हम आशा के विपरीत झूठ बोलना जारी रखते हैं और पाप करते रहते हैं, और प्रभु की शिक्षाओं को अभ्यास में लाने में भी असफल रहते हैं, तो क्या ऐसा व्यक्ति जो अभी भी पाप करने में सक्षम है और प्रभु का विरोध करता है, इस तरह से स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? दुर्भाग्य से, हमारा यह मानना कि "एक बार बच गए तो सदा के लिए बच गए" भ्रांतिपूर्ण है। जब परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने की महत्वपूर्ण बात आती है, तो हमें प्रभु के वचन का पालन करना चाहिए। हम इंसान की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार नहीं चल सकते! तो फिर धर्मग्रंथों में "उद्धार" का सही अर्थ क्या है? वास्तव में कोई व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में कैसे प्रवेश करता है? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर हम अब चर्चा करेंगे और साथ मिलकर छान-बीन करेंगे।

"उद्धार" का सही अर्थ

हम सभी जानते हैं कि व्यवस्था के युग के अंत में, मानवजाति शैतान के द्वारा अधिक से अधिक भ्रष्ट बनाई जा रही थी। इस्राएल के लोग अक्सर व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का उल्लंघन करते और अधिक से अधिक पाप किया करते थे—इतना कि त्याग की कोई भी मात्रा पर्याप्त नहीं थी, वे सभी व्यवस्था द्वारा दंडित किये जाने और मौत की सज़ा दिये जाने के ख़तरे का सामना कर रहे थे। मानवजाति को मौत के ख़तरे से बचाने के लिए, परमेश्वर छुटकारे का कार्य करने, मनुष्य के लिए क्रूस पर चढ़ाए जाने, पूरी मानवजाति के लिए पापबलि बनने, और मनुष्य के पापों को अभी और सदा के लिए क्षमा करने देह धारण करके प्रभु यीशु के रूप में पृथ्वी पर आया। तभी से, जो व्यक्ति प्रभु यीशु में विश्वास करता है, प्रभु के सामने अपने पापों को स्वीकार करके पश्चाताप करता है, उसके पापों को माफ़ कर दिया जाएगा और वह प्रभु यीशु द्वारा दिये गए सभी आशीषों और अनुग्रहों का आनंद लेगा। व्यवस्था के अधीन रहने वालों के लिए, यह "उद्धार" था। इसीलिए, प्रभु यीशु ने जिस "उद्धार" की बात कही है वह हमारी कल्पना जैसी नहीं है, कि हम जब तक प्रभु यीशु में विश्वास करते रहेंगे, हमें अभी और सदा के लिए बचा लिया जाएगा; बल्कि, इसका मतलब यह है कि जो लोग पाप करते हैं उनको अब व्यवस्था द्वारा कभी दंडित नहीं किया जाएगा और न ही मौत की सज़ा दी जाएगी, और मनुष्य के पापों को क्षमा कर दिया जाएगा। आइये सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के एक अंश पर नज़र डालते हैं: "यद्यपि मनुष्य को छुटकारा दिया गया है और उसके पापों को क्षमा किया गया है, फिर भी इसे केवल इतना ही माना जा सकता है कि परमेश्वर मनुष्य के अपराधों का स्मरण नहीं करता है और मनुष्य के अपराधों के अनुसार मनुष्य से व्यवहार नहीं करता है। हालाँकि, जब मनुष्य जो देह में रहता है, जिसे पाप से मुक्त नहीं किया गया है, वह भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को अंतहीन रूप से प्रकट करते हुए, केवल पाप करता रह सकता है। यही वह जीवन है जो मनुष्य जीता है, पाप और क्षमा का एक अंतहीन चक्र। अधिकांश मनुष्य दिन में सिर्फ इसलिए पाप करते हैं ताकि शाम को स्वीकार कर सकें। इस प्रकार, भले ही पापबलि मनुष्य के लिए सदैव प्रभावी है, फिर भी यह मनुष्य को पाप से बचाने में समर्थ नहीं होगी। उद्धार का केवल आधा कार्य ही पूरा किया गया है, क्योंकि मनुष्य में अभी भी भ्रष्ट स्वभाव है। ... मनुष्य के लिए अपने पापों के प्रति अवगत होना आसान नहीं है; मनुष्य अपनी स्वयं की गहराई से जमी हुई प्रकृति को पहचानने में असमर्थ है। केवल वचन के न्याय के माध्यम से ही इन प्रभावों को प्राप्त किया जा सकता है। केवल इस प्रकार से ही मनुष्य को उस स्थिति से आगे धीरे-धीरे बदला जा सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (4)')।

हम जब प्रभु में विश्वास करते हैं, तो भले ही हम उद्धार का उपहार प्राप्त कर लें और हमारे पाप माफ़ कर दिये जाएं, हमें पाप के बंधनों से मुक्ति नहीं मिलती और हम पाप में जीवित रहना जारी रखते हैं। इसके कुछ उदाहरण ये हैं: हम अत्यधिक अहंकारी हो सकते हैं, किसी भी सामूहिक परिस्थिति में आख़िरी फ़ैसला खुद लेना चाहते हैं और अन्य लोगों को अपनी कही बात पर चलते हुए देखना चाहते हैं, और अगर कोई हमारी कही गई बात पर नहीं चलता है, तो हम क्रोधित हो सकते हैं और उन्हें चेतावनी देते हैं, उससे भी अधिक गंभीर मामलों में, हम उन्हें दंडित कर सकते हैं या उनके साथ किसी तरह से गलत व्यवहार कर सकते हैं। हम अत्यधिक स्वार्थी हो सकते हैं और सब कुछ स्वार्थ के सिद्धांत पर कर सकते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर के साथ अपनी आस्था के मामले में उससे लेन-देन करने की भी कोशिश कर सकते हैं; जब चीज़ें शांत होती हैं और सुचारू रूप से चल रही होती हैं, तो हम परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, लेकिन जब बाधाओं और असफलताओं का सामना करना पड़ता है, तो हम गलतफहमियों से भर जाते हैं और उसके बारे में शिकायत करने लगते हैं, और इस हद तक चले जाते हैं कि उसे धोखा देने लगते हैं और उसे छोड़ देते हैं। हम अत्यधिक कपटी हो सकते हैं, ताकि जब कभी हमारे अपने निजी स्वार्थ शामिल हों, तो हम झूठ बोलने और बेईमानी करने लगते हैं। हम लगातार पाप में कैसे जी रहे हैं, इसके ये कुछ उदाहरण हैं। बाइबल में कहा गया है, "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हाँ, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा" (इब्रानियों 10:26-27)। "जो कोई पाप करता है वह पाप का दास है। दास सदा घर में नहीं रहता; पुत्र सदा रहता है" (यूहन्ना 8:34-35)। परमेश्वर पवित्र है। सच्चे मार्ग को जान लेने के बाद भी, हम पाप करने और परमेश्वर का विरोध करने में सक्षम हैं। यानी हम पाप के दास हैं, और परमेश्वर द्वारा सराहना के पात्र नहीं हो सकते। बाइबल का कहना है, "उस पवित्रता के खोजी हो जिसके बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा" (इब्रानियों 12:14)। अगर किसी व्यक्ति को पापों से शुद्ध नहीं किया गया है, वह अक्सर पाप करता और परमेश्वर का विरोध करता है, तो क्या ऐसा व्यक्ति सदा के लिए बचाया जा सकता है? क्या ऐसा व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लायक़ हो सकता है? यह बिल्कुल स्पष्ट है कि ऐसा नहीं हो सकता। हम जब अपने पापों से पूरी तरह शुद्ध कर दिये जाएंगे, उसके बाद ही हम पवित्र हो सकते हैं और तभी हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। अब कुछ लोग पूछ सकते हैं: हम किस प्रकार से शुद्ध हो जाएं ताकि स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें?

हम कैसे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं और कैसे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकते हैं?

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है, "यद्यपि यीशु ने मनुष्यों के बीच अधिक कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और वह मनुष्य की पाप-बलि बना; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से छुटकारा नहीं दिलाया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह से बचाने के लिए यीशु को न केवल पाप-बलि बनने और मनुष्य के पाप वहन करने की आवश्यकता थी, बल्कि मनुष्य को उसके शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए स्वभाव से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करने की आवश्यकता थी। और इसलिए, अब जबकि मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिया गया है, परमेश्वर मनुष्य को नए युग में ले जाने के लिए वापस देह में लौट आया है, और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया है। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले गया है" ("वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना')। इससे हम समझ सकते हैं कि मनुष्य के अंदर गहरी जड़ जमा चुके शैतानी स्वभाव को ठीक करने और मनुष्य को पाप के बंधनों से पूरी तरह मुक्त करने के लिए, प्रभु का अंत के दिनों में लौटकर आना आवश्यक है, ताकि वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को पूरा करे, और मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिये सत्य को व्यक्त करे। दरअसल, प्रभु ने काफ़ी पहले इसकी भविष्यवाणी कर दी है, जैसा कि बाइबल में कहा गया हैः "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। "जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:48)। "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)।

आज, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य के आधार पर, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को पूरा कर रहा है, वह मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिये सभी सत्यों को व्यक्त कर रहा है, ताकि मनुष्य की पापी प्रकृति को अभी और सदा के लिये ठीक किया जा सके और उसे पाप के बंधनों से मुक्त किया जा सके, यहाँ तक कि अंत में उसे परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिया जाए और स्वर्ग के राज्य में ले जाया जाए। अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय का कार्य इन भविष्यवाणियों को पूरा करता है। ऐसे सभी लोग जो अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करेंगे, उन्हें परमेश्वर का शुद्धिकरण और उद्धार प्राप्त होगा। ऐसे सभी लोगों को बड़ी तबाहियों के आगमन से पहले विजयी बनाए जाने का अवसर मिलेगा, परमेश्वर के साथ गौरवान्वित किया जाएगा, और स्वर्ग के राज्य में आरोहित किया जाएगा। तो सर्वशक्तिमान परमेश्वर कैसे लोगों का न्याय करता है और कैसे उन्हें शुद्ध करके पाप के बंधनों से मुक्त करता है?

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन कहते हैं, "अंत के दिनों में मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों की चीर-फाड़ करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर का आज्ञापालन किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मनुष्यता का जीवन जीना चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धिमत्ता और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर का तिरस्कार करता है, इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर केवल कुछ वचनों के माध्यम से मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है, उससे निपटता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर करने, निपटने और काट-छाँट करने की इन विधियों को साधारण वचनों से नहीं, बल्कि उस सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसका मनुष्य में सर्वथा अभाव है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति समर्पण के लिए पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है')।

इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के खिलाफ़ मनुष्य के विद्रोह और विरोध करने के शैतानी स्वभाव को आँकने और प्रकट करने के लिए परमेश्वर कई सत्यों का उपयोग करता है। हम जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के न्याय का अनुभव करते हैं, तो हम व्यक्तिगत तौर पर अनुभव करते हैं कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी अपमान को सहन नहीं करता। परमेश्वर का हर एक वचन हमारे हृदय में प्रवेश करता है और भ्रष्टाचार की सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों के साथ-साथ गलत इरादों और विचारों, ख़राब प्रवृत्तियों, और हमारे मन की गहराइयों में मौजूद इच्छाओं और कल्पनाओं को प्रकट कर देता है। साथ ही, यह इन चीज़ों के पीछे के शैतानी स्वभाव को भी प्रकट कर देता है, और इस प्रकार हमें शर्म से अपमानित और गहरे पछतावे का एहसास कराता है, ताकि हम परमेश्वर के सामने गिर पड़ें और उससे सही मायनों में पश्चाताप करें। इस बीच, परमेश्वर हमें अभ्यास के रास्ते भी दिखाता है, जैसे कि हमें परमेश्वर के प्रति आस्था में किस प्रकार का दृष्टिकोण रखना है, ईमानदार व्यक्ति कैसे बनना है, परमेश्वर का उत्कर्ष कैसे करना है और उसकी गवाही कैसे देनी है, मसीह विरोधी रास्ते पर चलने से कैसे बचना है, परमेश्वर के प्रति सच्चे आज्ञापालन और सच्चे प्रेम को कैसे हासिल करना है, इत्यादि। हम जब परमेश्वर के न्याय के कार्य का अनुभव कर लेंगे और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने लगेंगे, केवल तभी हम एक सामान्य व्यक्ति की तरह जीवन व्यतीत कर सकते हैं। यह पूरी तरह से परमेश्वर के न्याय का नतीजा है।

आज, न्याय का अनुभव कर चुके, सर्शक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के बहुत से भाई-बहनों की सभी प्रकार की अनुभव आधारित गवाहियाँ इंटरनेट पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इन असली अनुभवों और गवाहियों से, यह देखा जा सकता है कि अंत के दिनों में परमेश्वर जो ताड़ना और न्याय का कार्य करता है केवल उसी का अनुभव करके हम परमेश्वर द्वारा शुद्ध किये और पूरी तरह प्राप्त किये जा सकते हैं—हमारे लिए स्वर्ग के राज्य में पहुँचने का केवल यही एक रास्ता है। फ़िलहाल, पूरी दुनिया में बहुत से लोग जो सही मायनों में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों द्वारा बताए गए तरीकों से स्वर्ग के राज्य में जाने का मार्ग पाया है और उसके पास लौट चुके हैं। अगर हम "एक बार बच गए तो सदा के लिए बच गए" की धारणा से चिपके रहेंगे और अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करेंगे, तो हमारा भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध और परिवर्तित नहीं होगा, और इसीलिए, हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का अवसर कभी नहीं मिलेगा। तो, तुम अभी भी किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो?

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