मेरे बेटे के लिए मेरी उम्मीदें टूटने के बाद

30 दिसम्बर, 2025

चेन मो, चीन

मेरा जन्म एक बुद्धिजीवी परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता ने हमेशा मुझे सिखाया कि “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं,” “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज़ करता जाता है” और “भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो।” मैंने इन विचारों और सोच को अपने दिल में बिठा लिया और हमेशा उनके लिए कड़ी मेहनत की। मैं ज्ञान हासिल करके अपना भाग्य बदलना चाहती थी और मानती थी कि अगर मैं कॉलेज में चली गई तो मुझे एक सम्मानजनक नौकरी मिल जाएगी। मैं बिना मेहनत-मजदूरी किए दफ्तर में बैठ सकूँगी और लोग मुझे सम्मान की नजर से देखेंगे। लेकिन जैसा मैंने चाहा था वैसा नहीं हुआ और मेरा कॉलेज में दाखिला नहीं हुआ। बाद में, मैं एक सीमेंट उत्पाद कारखाने में कर्मचारी बन गई। शादी के बाद, मेरी सास मुझे तुच्छ समझती थी क्योंकि मैं एक साधारण कर्मचारी थी और वह अक्सर मेरे लिए मुश्किलें खड़ी करती थी। वह कहती थी कि मैं कुछ नहीं, बस एक घटिया कर्मचारी हूँ। जब मेरी सास ऐसे ताने भरती और अपमानजनक बातें कहती थी तो जवाब में एक शब्द भी कहने की मेरी हिम्मत नहीं होती थी और मुझे बहुत दुख होता था। मैंने फैसला किया कि मैं बच्चे को पालने के साथ-साथ पढ़ाई करूँगी, ताकि कॉलेज में दाखिला लेने के बाद मैं एक अधिकारी बन सकूँ और मेरी सास मुझे फिर कभी नीची नजर से न देखे।

1986 में, मैंने आखिरकार कॉलेज की प्रवेश परीक्षा दी और अपनी उम्मीद के मुताबिक एसोसिएट डिग्री हासिल की। स्नातक होने के बाद, मैं कारखाने में लौट आई और वहाँ एक अधिकारी बन गई। बाद में, मुझे फीड सब-प्लांट की निदेशक के रूप में पदोन्नत किया गया। मेरे सहपाठी और सहकर्मी सभी मेरी बहुत प्रशंसा करते थे, वे कहते थे कि मैं एक शक्तिशाली महिला हूँ और मेरे सभी रिश्तेदार और दोस्त मेरी तारीफ करते थे। जो कोई भी मुझे जानता था, जब भी मुझसे मिलता तो गर्मजोशी से मेरा अभिवादन करता। मेरी सास का रवैया भी पहले से बदल गया था और मुझसे बात करते समय उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। वह मेरी योग्यताओं को लेकर पड़ोसियों से मेरी बड़ाई भी करती थी। आखिरकार मैं सिर उठाकर जी सकती थी। मेरे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, रुतबा होने और न होने में कितना फर्क है! जब मैं दूसरों से मिली तारीफ का आनंद ले रही थी, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरी अभी भी एक जिम्मेदारी है : मुझे अपने बेटे को सही तरीके से विकसित करना था ताकि वह भी मेरी तरह ज्यादा ज्ञान हासिल करे और कॉलेज में दाखिला ले। फिर भविष्य में वह मुझसे आगे निकल जाएगा, सरकारी नौकरी कर पाएगा, शक्ति और रुतबा हासिल कर पाएगा, सबसे आगे निकल जाएगा और हमारे पूर्वजों का नाम रोशन करेगा। तब, उसकी माँ होने के नाते, मैं भी उसकी कामयाबी का आनंद ले सकूँगी। इसलिए जब मेरा बेटा मिडिल स्कूल में पहुँचा, तो मैंने अपनी जान-पहचान का इस्तेमाल करके उसे सबसे अच्छे स्थानीय स्कूल में दाखिला दिलाया; अक्सर उससे कहती थी कि मन लगाकर पढ़ाई करो और उसे सिखाया कि केवल कॉलेज में दाखिला लेकर ही उसे अच्छी नौकरी और उज्ज्वल भविष्य मिल सकता है। मेरे बेटे ने मुझे निराश नहीं किया और पढ़ाई में उसका प्रदर्शन हमेशा अपनी कक्षा में शीर्ष छह में रहता था। उसके कक्षा शिक्षक ने मुझसे कहा, “तुम्हें अपने बेटे को सही तरीके से विकसित करना होगा। वह बहुत होशियार है और उसमें सिंघुआ या पेकिंग विश्वविद्यालय में जाने की क्षमता है।” शिक्षक की यह बात सुनकर मैं बहुत खुश हुई और सोचने लगी, “मेरा बेटा होशियार है और उसके किसी शीर्ष विश्वविद्यालय में दाखिला लेने में कोई समस्या नहीं होगी। भविष्य में एक अच्छी नौकरी ढूँढ़ना तो उसके लिए बाएँ हाथ का खेल होगा।” मेरा करियर सफल था और मेरा बेटा स्कूल में बहुत अच्छा कर रहा था। इससे भविष्य के लिए मेरी उम्मीदें बढ़ गईं। लेकिन, इसके बाद जो हुआ वह पूरी तरह से अप्रत्याशित था।

1995 की दूसरी छमाही से, मैंने जिस फीड सब-प्लांट का ठेका लिया था, वह मुनाफे से घाटे में चला गया। मैं इसे लेकर बेहद चिंतित थी। मुझे तपेदिक की गंभीर बीमारी भी हो गई और मैं इतनी कमजोर हो गई थी कि काम पर नहीं जा सकती थी, इसलिए मैंने समय से पहले ही अनुबंध समाप्त कर दिया और कारखाने ने मुझे वेतन नहीं दिया। उस समय, मेरे पति को नौकरी से निकाले हुए कई साल हो गए थे और उसे कभी कोई सही नौकरी नहीं मिल पाई थी। एक अपार्टमेंट खरीदने के बाद, हमारी बची-खुची जमा-पूँजी भी लगभग खत्म हो गई थी। मेरा बेटा हाई स्कूल जाने वाला था, जिसका खर्चा बहुत था। आमदनी के स्रोत के बिना, हम उसकी पढ़ाई का खर्च कैसे उठाते? बाद में, मेरे पति ने मुझे अपने साथ सड़क पर ठेला लगाकर सामान बेचने के लिए कहा। मैं बहुत पीड़ा में थी और सोचने लगी, “मैं एक कारखाने की इज्जतदार निदेशक सड़क पर सामान बेचने की नौबत तक आ गई हूँ। अगर कारखाने के मेरे सहकर्मियों या मुझे जानने वाले लोगों ने यह देख लिया तो मैं मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहूँगी!” लेकिन, फिर मैंने सोचा, “अभी भले ही मेरी इज्जत चली जाए, लेकिन जब मेरा बेटा विश्वविद्यालय से स्नातक होकर सफल हो जाएगा तो वह मेरे लिए सम्मान लाएगा। अपने बेटे की विश्वविद्यालय की पढ़ाई के लिए पैसे बचाने की खातिर, थोड़ी-बहुत इज्जत गँवाना और थोड़ा कष्ट सहना सार्थक है।”

अप्रैल 1998 में, मुझे सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार करने का सौभाग्य मिला। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण मानवजाति को बचाने का उसका अंतिम कार्य है और अगर लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं और उसका उद्धार स्वीकार नहीं करते हैं तो चाहे वे कितना भी ज्ञान हासिल कर लें या उनकी डिग्री या रुतबा कितना भी ऊँचा क्यों न हो, वे अंततः तबाह हो जाएँगे। लेकिन अपना भाग्य बदलने के लिए ज्ञान हासिल करने की सोच और विचार मुझमें बहुत गहराई तक समाए हुए थे और मैं अब भी उम्मीद करती थी कि मेरा बेटा सबसे आगे निकलेगा और हमारे पूर्वजों का नाम रोशन करेगा। अप्रत्याशित रूप से, जब मेरा बेटा हाई स्कूल के पहले साल में था, तो उसकी पढ़ाई में रुचि नहीं रही और वह सेना में शामिल होना चाहता था। मैं हैरान रह गई और सोचने लगी, “सैनिक होना एक मुश्किल काम है। उसमें भविष्य के विकास की क्या संभावना है? केवल विश्वविद्यालय में दाखिला लेकर और ऊँची डिग्री हासिल करके ही तुम्हें अच्छी नौकरी मिल सकती है। तभी तुम्हें एक वरिष्ठ, अच्छे वेतन वाला आधिकारिक पद पाने और ऊँचे रुतबे वाला व्यक्ति बनने का अवसर मिलेगा।” मैं अपने बेटे को उसकी मनमरजी बिल्कुल नहीं करने दे सकती थी। इसलिए, मैंने उसे प्यार से मनाने की कोशिश करते हुए कहा, “बेटा, तुम बहुत होशियार हो। सभी शिक्षकों ने कहा कि तुम सिंघुआ या पेकिंग विश्वविद्यालय जाने के लिए अच्छे उम्मीदवार हो। विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बस दो साल बाकी हैं। अगर तुम अभी स्कूल छोड़कर सेना में शामिल हो गए तो तुम जीवन भर पछताओगे। जब सैनिक सेना से बाहर निकलते हैं तो उन्हें चाहे कोई भी काम सौंपा जाए, उन्हें हमेशा कर्मचारी ही माना जाता है और विकास की कोई संभावना नहीं होती। तुम्हें अच्छी नौकरी तभी मिल सकती है जब तुम्हारे पास विश्वविद्यालय की डिग्री हो। कम से कम, तुम्हें दफ्तर की कोई पक्की नौकरी तो मिलेगी। अगर तुम कड़ी मेहनत करोगे तो तुम्हें पदोन्नति के कई अवसर मिलेंगे। तुम इस समाज में तभी पैर जमा सकते हो जब तुम्हारा करियर सफल हो और रुतबा हो। आजकल, समाज में प्रतिस्पर्धा इतनी कड़ी है और ज्ञान और डिग्री के बिना तुम एक निम्न स्तर के व्यक्ति होगे। मैं यह सब तुम्हारे भविष्य की खातिर कह रही हूँ।” बार-बार समझाने के बाद, वह अनिच्छा से ही सही, स्कूल जाता रहा। एक सुबह, मेरे पति ने देखा कि हमारा बेटा घर पर समय बरबाद कर रहा है, स्कूल नहीं जाना चाहता, तो उसने उसे पीटा। मेरा बेटा तुरंत घर से भाग गया और वह हमें उस शाम बहुत देर से मिला। मैं जानती थी कि मेरा बच्चा पढ़ना नहीं चाहता और सेना में शामिल होना चाहता है, लेकिन मैं उसे ऐसा करने नहीं दे सकती थी। मैंने उसे मनाने की हर संभव कोशिश की और आखिरकार, वह अनिच्छा से ही सही, स्कूल जाने के लिए तैयार हो गया। उस समय, मेरा बेटा हर दिन नाक-भौं चढ़ाए रहता था और हमसे बात नहीं करना चाहता था, लेकिन मैंने सोचा, “तुम अभी समझो या न समझो, जब तुम भविष्य में मशहूर और सफल हो जाओगे, तो तुम हमारे इस श्रमसाध्य इरादे को समझ जाओगे।” बाद में, उसका सचमुच विश्वविद्यालय में दाखिला हो गया और मैं बहुत खुश थी। मेरी बरसों की उम्मीद आखिरकार पूरी हुई। लेकिन, खुश होने के साथ-साथ, मैं उसे विश्वविद्यालय भेजने के खर्च को लेकर भी चिंतित थी। हमारे परिवार के पास उसे विश्वविद्यालय भेजने के लिए अतिरिक्त पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने अपने बेटे की ट्यूशन फीस चुकाने के लिए वह अपार्टमेंट बेच दिया जिसे खरीदने के लिए मैंने अपनी आधी जिंदगी मेहनत की थी और रहने के लिए एक सादा-सा अपार्टमेंट किराए पर ले लिया। जब मेरा बेटा स्नातक होने वाला था, तो मैंने किसी को 10,000 युआन देकर उसके लिए एक बैंक में नौकरी पक्की करवा दी। मैंने अपने बेटे के भविष्य के लिए सारी तैयारियाँ कर ली थीं और बस उसके डिग्री हासिल करने और बैंक में काम शुरू करने का इंतजार कर रही थी। लेकिन, एक और अप्रत्याशित घटना घटी।

एक दिन, मेरे बेटे ने मुझे बताया कि उसने अपने अंतिम वर्ष में विश्वविद्यालय छोड़ दिया था। उसने अपनी ट्यूशन फीस नहीं चुकाई थी, इसलिए उसे डिग्री नहीं मिल सकती थी। यह खबर सुनकर, मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। क्या मैंने गलत सुना था? लेकिन, जब मैंने अपने बेटे का स्थिर भाव देखा तो मैं समझ गई कि यह सच है और मैं रोना बंद नहीं कर सकी। मैं रोते-रोते अपने बेटे से शिकायत करने और उसे डाँटने लगी। मैं इतनी गुस्से में थी कि मेरा पूरा शरीर कमजोर महसूस हो रहा था। मैंने सोचा, “मैंने उसे विश्वविद्यालय भेजने के लिए सुविधाएँ जुटाने की खातिर सालों तक कितनी मेहनत की है। मैंने तो बस यही उम्मीद की थी कि वह सफल होगा और उसकी माँ होने के नाते मेरा सिर गर्व से ऊँचा हो जाएगा। मुझे यकीन नहीं होता कि उसने ऐसा किया। अब से मैं लोगों का सामना कैसे करूँगी?” उस समय, मैं सचमुच बिजली का कोई नंगा तार पकड़कर यह सब खत्म कर देना चाहती थी। उस दौरान, न मुझसे खाना खाया जाता था, न ही मैं सो पाती थी। मेरा मन अपने बच्चे के भविष्य की चिंताओं से भरा हुआ था। मैंने सोचा, “भविष्य में मैं क्या करूँगी? मैंने उसकी पढ़ाई के लिए अपार्टमेंट बेच दिया है और अब हमारे पास रहने के लिए कोई स्थायी जगह भी नहीं है। आधी जिंदगी की मेहनत बरबाद हो गई!” जब मेरी पीड़ा चरम पर थी, तो मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे मेरी पीड़ा से बाहर निकाले।

तलाश के दौरान, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना : मनुष्य के भाग्य का नियंत्रण परमेश्वर के हाथों में है। “मनुष्य का भाग्य परमेश्वर के हाथों से नियंत्रित होता है। तुम स्वयं को नियंत्रित करने में असमर्थ हो : भले ही मनुष्य अपनी ओर से भाग-दौड़ करता रहे और व्यस्त रहे के बावजूद मनुष्य स्वयं को नियंत्रित करने में अक्षम रहता है। यदि तुम अपने भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि तुम अपने भाग्य को नियंत्रित कर सकते, तो क्या तुम्हें तब भी एक सृजित प्राणी कहा जाता? संक्षेप में, परमेश्वर चाहे जैसे भी कार्य करे, उसका समस्त कार्य केवल मनुष्य के वास्ते होता है। यह वैसा ही जैसे स्वर्ग और पृथ्वी और उन सभी चीज़ों को परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजित किया : परमेश्वर ने मनुष्य के लिए चंद्रमा, सूर्य और तारे बनाए, उसने मनुष्य के लिए जानवर और पेड़-पौधे, बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत ऋतु इत्यादि बनाए—ये सब मनुष्य के अस्तित्व के वास्ते ही बनाए गए थे। और इसलिए, परमेश्वर मनुष्य को चाहे जैसे भी ताड़ित करता हो या चाहे जैसे भी उसका न्याय करता हो, यह सब मनुष्य के उद्धार के वास्ते ही है। यद्यपि वह मनुष्य को उसकी दैहिक आशाओं से वंचित कर देता है, पर यह मनुष्य को शुद्ध करने के वास्ते है, और मनुष्य का शुद्धिकरण मनुष्य के अस्तित्व के लिए किया जाता है। मनुष्य की मंज़िल सृजनकर्ता के हाथ में है, तो मनुष्य स्वयं को नियंत्रित कैसे कर सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना)। मैंने इस भजन को बार-बार सुना। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते हुए, मैंने समझा कि परमेश्वर हर व्यक्ति के भाग्य पर संप्रभु है और उसी ने इसे नियत किया है। तुम चाहे कितनी भी कोशिश कर लो या कितना भी संघर्ष कर लो, तुम अपना भविष्य या भाग्य नहीं बदल सकते; दूसरों का भाग्य बदलना तो और भी असंभव है। मैंने अपने जीवन के पहले आधे हिस्से के बारे में सोचा। मैं और ज्यादा ज्ञान हासिल करके अपना भाग्य बदलना चाहती थी, लेकिन बाद में, कारखाने को घाटा हुआ और मैं बीमार पड़ गई। मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। यह सब सचमुच मेरे बस में नहीं था। मैंने बचपन से ही अपने बेटे को अपनी कथनी और करनी से सिखाया था, इस उम्मीद में कि वह मेरी इच्छानुसार विश्वविद्यालय जाएगा और एक अधिकारी बनेगा। इसे साकार करने के लिए मैंने आधी जिंदगी अपना खून-पसीना और आँसू एक कर दिया, लेकिन उसने मेरी इच्छानुसार काम नहीं किया और अंत में उसे विश्वविद्यालय की डिग्री भी नहीं मिली। इन तथ्यों से मुझे एहसास हुआ कि मेरे बेटे का भविष्य और भाग्य अच्छा होगा या नहीं, यह मेरे नियंत्रण में नहीं है। मैं चाहे कितना भी संघर्ष करूँ या कितना भी त्याग करूँ, सब व्यर्थ है। क्योंकि मैं बस एक तुच्छ सृजित प्राणी हूँ, परमेश्वर मेरे और मेरे बेटे के भाग्य पर संप्रभु है और उसी ने इसे नियत किया है। मैं तो अपना भाग्य भी नियंत्रित नहीं कर सकती, फिर भी मैं अपने बेटे के भविष्य और भाग्य को नियंत्रित करना चाहती थी। मैं कितनी अज्ञानी और घमंडी थी! मेरे इतने दर्द में होने की वजह यह थी कि मुझे परमेश्वर की संप्रभुता की बिल्कुल भी समझ नहीं थी और मैं उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकती थी। जब मैं यह समझ गई, तो मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और अपने बेटे के बारे में शिकायत करना बंद करने के लिए तैयार थी। अगर वह एक साधारण जीवन जीता है, तो यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसके विधान के कारण है और मुझे उसे परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और जो हो रहा है, उसे होने देना चाहिए।

बाद में मैं सोचती रही : जब मेरे बेटे को डिग्री नहीं मिली तो मैं इतने दर्द में क्यों थी? मैंने ज्ञान और डिग्रियों को इतना महत्व क्यों दिया? इसकी जड़ क्या थी? मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कुछ लोग सोचते हैं कि ज्ञान इस दुनिया की अनमोल चीज है, और उनके पास जितना अधिक ज्ञान होगा, उतना ही बड़ा उनका रुतबा होगा और वे उतने ही उच्च श्रेणी के होंगे, उतने ही अधिक प्रतिष्ठित और सुसंस्कृत होंगे, इसलिए ज्ञान के बिना उनका काम नहीं चलने वाला। कुछ लोग सोचते हैं कि अगर तुम कड़ी मेहनत से पढ़-लिखकर अपना ज्ञान बढ़ाओगे तो तुम्हारे पास सब कुछ होगा। तुम्हारे पास रुतबा, पैसा, अच्छी नौकरी और अच्छा भविष्य होगा; वे मानते हैं कि ज्ञान के बिना इस दुनिया में रहना असंभव है। अगर किसी के पास कोई ज्ञान नहीं होता तो हर कोई उसे हेय दृष्टि से देखता है। उसके साथ भेदभाव होता है और कोई भी उसके साथ जुड़ने को तैयार नहीं होता है; ज्ञान रहित लोग समाज के सबसे निचले तबके में ही जी सकते हैं। इस प्रकार वे ज्ञान की पूजा करते हैं और इसे अत्यंत उच्च और महत्वपूर्ण मानते हैं—यहाँ तक कि सत्य से भी अधिक। ... तुम इसे जैसे भी देखो, यह मानवीय विचारों और दृष्टिकोणों का एक पहलू है। एक पुरानी कहावत है : ‘दस हजार किताबें पढ़ लोगे तो दस हजार मील यात्रा कर लोगे।’ लेकिन इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि तुम जितना ज्यादा पढ़ोगे, उतने ही ज्यादा जानकार और संपन्न बनोगे। तुम्हें सभी तबकों से बहुत इज्जत मिलेगी और तुम्हारा रुतबा बढ़ेगा। इस प्रकार के विचार हर कोई अपने दिल में रखता है। अगर कोई व्यक्ति अपनी अभागी पारिवारिक परिस्थिति के कारण कॉलेज का डिप्लोमा नहीं ले पाता तो उसे जीवन भर इस बात का पछतावा रहेगा, और वह यह दृढ़ संकल्प लेगा कि उसके बच्चे और पोते-पोतियाँ ज्यादा पढ़ाई करें, विश्वविद्यालय की डिग्री लें और यहाँ तक कि विदेश जाकर पढ़ें। यह हर किसी के ज्ञान की प्यास है और यह भी कि वे इसे कैसा मानते, देखते और सँभालते हैं। इसीलिए कई माता-पिता अपने बच्चों की परवरिश के लिए मेहनत और खर्च करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते, इस पर परिवार की दौलत भी लुटा देते हैं, और यह सब इसलिए ताकि उनके बच्चे खूब पढ़ें। और कुछ माता-पिता अपने बच्चों को अनुशासित करने के लिए किस हद तक जाते हैं? एक रात में केवल तीन घंटे सोने की इजाजत देना, लगातार जबरन पढ़ाई-लिखाई करवाना, या प्राचीन मिसालों की नकल कर और उनके बाल छत से बाँधकर उन्हें पूरी तरह नींद से वंचित करना। इस प्रकार के किस्से, ये त्रासदियाँ पुराने जमाने से लेकर अब तक हमेशा घटती रही हैं, और ये ज्ञान के लिए मानवजाति की प्यास और उसकी पूजा के दुष्परिणाम हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास का मार्ग)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे दिल को छू लिया। मैं “अन्य अनुसरण छोटे हैं, किताबें उन सबसे श्रेष्ठ हैं,” “दस हजार किताबें पढ़ लोगे तो दस हजार मील यात्रा कर लोगे” और “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है” जैसी शैतानी सोच और विचारों से बँधी हुई थी और खास तौर से ज्ञान की पूजा करती थी। मेरा मानना था कि ज्ञान से एक उज्ज्वल भविष्य मिलेगा, जहाँ तुम एक श्रेष्ठ व्यक्ति बन सकते हो और दूसरों से प्रशंसा पा सकते हो; तभी जीवन मूल्यवान होगा। मेरा मानना था कि ज्ञान या डिग्री के बिना, तुम्हें कड़ी मेहनत करनी होगी और निम्न जीवन स्तर का जीना होगा, तुम दूसरों की नजरों में तुच्छ समझे जाओगे और जीवन भर समाज में सबसे नीचे रहोगे, कभी आगे नहीं बढ़ पाओगे। मेरा मानना था कि ज्ञान से तुम सब कुछ पा सकते हो, इसलिए मैंने शादी करने और बच्चा होने के बाद भी ज्ञान हासिल करने की कोशिश नहीं छोड़ी। जब मैंने कॉलेज से स्नातक किया और कारखाने में लौटी, तो मैं तुरंत एक अधिकारी बन गई और फिर मुझे कदम-दर-कदम पदोन्नत किया गया, महत्वपूर्ण भूमिकाएँ सौंपी गईं। जल्द ही, हम तीन लोगों का परिवार एक बड़े अपार्टमेंट में रहने लगा और हर कोई मुझे ईर्ष्या से देखता और आगे बढ़कर मेरा अभिवादन करता; कारखाने के सभी कर्मचारी मेरा बहुत सम्मान करते थे। मुझे वह शोहरत और लाभ मिला जो मैं चाहती थी और मेरा मानना था कि यह सब उस ज्ञान से मिला जो मैंने कड़ी मेहनत से पढ़ाई करके और डिग्री हासिल करके पाया था। इसलिए, मुझे और भी यकीन हो गया कि ज्ञान किसी का भाग्य बदल सकता है और मैंने उम्मीद की कि मेरा बेटा भविष्य में एक ऊँची डिग्री पाकर सफल और मशहूर होगा, ताकि मैं उसकी कामयाबी का आनंद ले सकूँ। जब मेरे बेटे ने मुझसे कहा कि वह सेना में शामिल होना चाहता है, तो मैंने उससे यह नहीं पूछा कि वह वास्तव में क्या सोचता है। इसके बजाय, मैंने बस यह मान लिया कि सेना में शामिल होने के बाद उसके भविष्य की कोई संभावना नहीं होगी, इसलिए मैंने उसे विश्वविद्यालय जाने के लिए मजबूर किया। अपने बेटे को विश्वविद्यालय में दाखिला दिलाने के लिए, मैंने वह अपार्टमेंट बेच दिया जिसे खरीदने के लिए मैंने आधी जिंदगी मेहनत की थी। जब मुझे पता चला कि मेरे बेटे ने अपने अंतिम वर्ष की ट्यूशन फीस नहीं चुकाई और उसे विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं मिलेगी, तो मेरी उम्मीदें पूरी तरह से टूट गईं और मैं पूरी तरह से हताश हो गई। मेरा मन किया कि सब कुछ खत्म कर दूँ। मैं सचमुच शोहरत और लाभ के पीछे अंधी हो गई थी! दरअसल, हर किसी का भाग्य परमेश्वर के हाथों में होता है और इसे केवल ज्ञान हासिल करके नहीं बदला जा सकता। मैंने अपने पड़ोसी, अनुभाग प्रमुख वांग के बारे में सोचा, जिसके पास ज्यादा शिक्षा नहीं है, लेकिन अब वह कार्मिक ब्यूरो में एक अनुभाग प्रमुख है; दूसरी ओर, मेरी एक सहपाठी का पेकिंग विश्वविद्यालय में दाखिला हुआ था, लेकिन स्नातक होने के कई सालों बाद भी उसे कोई उपयुक्त नौकरी नहीं मिली। आजकल, हर जगह ऐसे विश्वविद्यालय स्नातक हैं जिनके पास कोई नौकरी नहीं है और यहाँ तक कि कई स्नातकोत्तरों को भी कोई औपचारिक नौकरी नहीं मिल पाती है। यह स्पष्ट है कि “ज्ञान तुम्हारा भाग्य बदल सकता है” यह विचार गलत है और पूरी तरह से निराधार है। यह सत्य के विपरीत है। भले ही मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी, लेकिन मैं सत्य नहीं समझती थी और मुझमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं थी। मैंने ज्ञान, शोहरत और लाभ को किसी भी चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण माना और मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि ये वे तरीके हैं जिनसे शैतान लोगों को बहकाता और निगल जाता है। परमेश्वर के वचनों से मिले प्रकाशन की बदौलत, आखिरकार मुझे होश आया। मैंने चुपचाप अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, तेरे वचनों की आपूर्ति और प्रबुद्धता के लिए तेरा धन्यवाद, जिसने मुझे शैतान की सोच और विचारों का भेद पहचानने में सक्षम बनाया। मैं अब इन सोच और विचारों से बँधकर नहीं रहना चाहती। सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने में मेरी अगुआई कर।”

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान अर्जित करना पुस्तकें पढ़ने या कुछ ऐसी चीजें सीखने से अधिक कुछ नहीं है, जिन्हें वे पहले से नहीं जानते, ताकि समय से पीछे न रह जाएँ या संसार द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। ज्ञान केवल इसलिए अर्जित किया जाता है, ताकि वे भोजन जुटा सकें, अपना भविष्य बना सकें या बुनियादी आवश्यकताएँ पूरी कर सकें। क्या कोई ऐसा व्यक्ति है, जो मात्र मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए, और मात्र भोजन की समस्या हल करने के लिए एक दशक तक कठिन परिश्रम से अध्ययन करेगा? नहीं, ऐसा कोई नहीं है। तो फिर व्‍यक्ति इतने वर्षों तक ये कठिनाइयाँ क्‍यों सहन करता है? प्रसिद्धि और लाभ के लिए। प्रसिद्धि और लाभ आगे उसका इंतजार कर रहे हैं, उसे इशारे से बुला रहे हैं, और वह मानता है कि केवल अपने परिश्रम, कठिनाइयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है, जो उसे प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त करने की ओर ले जाएगा। ऐसे व्यक्ति को अपने भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनंद के लिए और एक बेहतर जिंदगी प्राप्त करने के लिए ये कठिनाइयाँ सहनी ही होंगी(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। “मनुष्य को मजबूती से अपने नियंत्रण में रखने के लिए शैतान किस चीज का उपयोग करता है? (प्रसिद्धि और लाभ का।) शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और वे अपना हर फैसला या निर्णय प्रसिद्धि और लाभ की खातिर लेते हैं। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उनमें उन्हें तोड़ देने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस होता है। जैसे-जैसे वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम घिसटते हुए आगे बढ़ते हैं, वे अनजाने में ही ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है। अब शैतान की करतूतें देखते हुए क्या उसके धूर्त इरादे एकदम घृणास्पद नहीं हैं? शायद आज भी तुम शैतान की धूर्त मंशाओं की असलियत नहीं देख पाते हो क्योंकि तुम्हें लगता है कि प्रसिद्धि और लाभ के बिना जीवन का कोई अर्थ नहीं होगा और लोग अब आगे का मार्ग नहीं देख पाएँगे, अपने लक्ष्य नहीं देख पाएँगे और उनका भविष्य अंधकारमय, धुँधला और प्रकाशरहित हो जाएगा। परंतु धीरे-धीरे तुम सब लोग एक दिन समझ जाओगे कि प्रसिद्धि और लाभ ऐसी भार-भरकम बेड़ियाँ हैं जिन्हें शैतान मनुष्य पर डाल देता है। जब वह दिन आएगा, तुम पूरी तरह से शैतान के नियंत्रण का प्रतिरोध करोगे और उन बेड़ियों का प्रतिरोध करोगे जिन्हें शैतान तुम्हारे लिए लाता है। जब तुम उन सभी चीजों से खुद को मुक्त करना चाहोगे जिन्हें शैतान ने तुम्हारे मन में बैठा दिया है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और उस सबसे सच में नफरत करोगे जो शैतान तुम्हारे लिए लाया है। तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम होगा और तड़प होगी(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचन कितने व्यावहारिक हैं। लोगों के ज्ञान के पीछे भागने का कारण शोहरत और लाभ पाना है। शोहरत और लाभ पाने के लिए लोग कड़ी मेहनत करते हैं और कठिनाइयाँ सहते हैं और इसके लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं। शैतान लोगों को बहकाने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है और उन्हें नियंत्रित करने के लिए शोहरत और लाभ का उपयोग करता है, ताकि वे अनजाने में ही उसके द्वारा भ्रष्ट हो जाएँ। मैं बिल्कुल ऐसी ही थी। मेरे पिता ने मुझे बचपन से सिखाया कि अधिक ज्ञान प्राप्त करने से मैं एक श्रेष्ठ व्यक्ति बनूँगी; ज्ञान के बिना, मैं केवल एक निम्न स्तर की इंसान हो सकती थी और मेहनत-मजदूरी ही कर सकती थी। शिक्षकों ने भी हमें ऊँची आकांक्षाएँ रखना और सबसे आगे निकलकर अपने पूर्वजों का नाम रोशन करना सिखाया। अनजाने में ही, मैंने इन सोच और विचारों को स्वीकार कर लिया। शोहरत, लाभ और रुतबा पाने के लिए, मैं कोई भी कठिनाई सहने और कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थी। मैंने न केवल खुद इन चीजों का अनुसरण किया, बल्कि अपने बेटे को भी उनका अनुसरण करने के लिए मजबूर किया। जब मुझे पता चला कि मेरे बेटे को डिग्री नहीं मिल सकती, तो मेरे सपने अचानक टूट गए और मैं इतनी पीड़ा में थी कि मरकर भी इससे बचना चाहती थी। मैं शैतान द्वारा मुझमें डाले गए शोहरत और लाभ का अनुसरण करने के विचारों से नियंत्रित थी। इससे न केवल मुझे बहुत पीड़ा हुई, बल्कि इसने मेरे बेटे को मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से नुकसान पहुँचाया। शैतान ने मुझ पर शोहरत और लाभ की अदृश्य बेड़ियाँ डाल दीं, जिससे मैं लगातार शोहरत और लाभ के लिए लड़ती और कड़ी मेहनत करती रही। शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाने के बावजूद, मुझमें इससे मुक्त होने की कोई क्षमता नहीं थी। मैंने परमेश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने मुझे बचाने के लिए इस परिवेश का इंतजाम किया, जिसने मुझे सत्य खोजने के लिए उसके पास आने, लोगों को नुकसान पहुँचाने के शैतान के तरीकों का भेद पहचानने और यह एहसास करने में सक्षम बनाया कि शोहरत और लाभ का अनुसरण करना जीवन का सही मार्ग नहीं है : यह मुझे केवल परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने और उससे बहुत दूर करने की ओर ले जा सकता है। मैं अब शोहरत और लाभ का अनुसरण नहीं कर सकती थी। मुझे एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में ठीक से खड़ा होना था और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना था।

बाद में, मैंने अपनी बहन को अपनी दशा के बारे में बताया और उसने मेरे लिए परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ निकाला : “पहली बात, माँ-बाप अपने बच्चों के संबंध में जो शर्तें रखते हैं और जिस तरह के तरीके अपनाते हैं, वे सही हैं या गलत? (वे गलत हैं।) आखिर जब बात माँ-बाप के अपने बच्चों के प्रति ऐसे तरीके अपनाने की आती है, तो इसमें समस्या की जड़ कहाँ है? क्या यह माँ-बाप की अपने बच्चों से की गई अपेक्षाएँ नहीं हैं? (बिल्कुल हैं।) माँ-बाप की व्यक्तिपरक चेतना के भीतर, वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए कई चीजों की परिकल्पना करते हैं, उनके लिए योजना बनाते हैं और उन्हें निर्धारित करते हैं, और इसलिए, उनकी ऐसी अपेक्षाएँ होती हैं। ... उनके माँ-बाप अपने बच्चों पर पूरी तरह से एक बालिग व्यक्ति के नजरिये से चीजों को देखने के साथ-साथ संसार के मामलों में किसी बालिग व्यक्ति के विचारों, परिप्रेक्ष्यों और प्राथमिकताओं के आधार पर उम्मीदें लगा रहे हैं। क्या यह व्यक्तिपरक सोच नहीं है? (बिल्कुल है।) शिष्ट शब्दों में कहें, तो इसे व्यक्तिपरक कहना सही होगा, पर यह वाकई में क्या है? इस व्यक्तिपरकता की दूसरी व्याख्या क्या है? क्या यह स्वार्थ नहीं है? क्या यह जबरदस्ती नहीं है? (बिल्कुल है।) तुम्हें अमुक-अमुक नौकरी और अमुक-अमुक करियर पसंद है, तुम्हें अपनी पहचान बनाना, आलीशान जीवन जीना, एक अधिकारी के रूप में काम करना या समाज में अमीर आदमी बनना पसंद है, तो तुम अपने बच्चों से भी ये चीजें कराते हो, उन्हें भी ऐसे व्यक्ति बनाते हो, और इसी मार्ग पर चलाते हो—पर क्या वे भविष्य में उस माहौल में रहना और उस काम में शामिल होना पसंद करेंगे? क्या वे इसके लिए उपयुक्त हैं? उनकी नियति क्या है? उनको लेकर परमेश्वर की व्यवस्थाएँ और फैसले क्या हैं? क्या तुम्हें ये बातें पता हैं? कुछ लोग कहते हैं : ‘मुझे उन चीजों की परवाह नहीं है, मायने रखती हैं वे चीजें जो मुझे, उनके माँ-बाप होने के नाते पसंद हैं। मैं अपनी पसंद के आधार पर उनसे उम्मीदें लगाऊँगा।’ क्या यह बहुत स्वार्थी बनना नहीं है? (बिल्कुल है।) यह बहुत स्वार्थी बनना है! शिष्ट भाषा में कहें, तो यह बहुत ही व्यक्तिपरक है, इसे सभी फैसले खुद लेना कहेंगे, पर वास्तव में यह है क्या? यह बहुत स्वार्थी होना है! ये माँ-बाप अपने बच्चों की काबिलियत या प्रतिभाओं पर विचार नहीं करते, वे उन व्यवस्थाओं की परवाह नहीं करते जो परमेश्वर ने हरेक व्यक्ति के भाग्य और जीवन के लिए बनाई हैं। वे इन चीजों पर विचार नहीं करते हैं, वे बस अपनी मनमर्जी से अपनी पसंद, इरादों और योजनाओं को अपने बच्चों पर थोपते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे अचानक होश आ गया। अतीत में, मैंने सोचा था कि मैं जो कुछ भी कर रही थी, वह मेरे बेटे के भविष्य और भाग्य की खातिर था। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से, मैं आखिरकार समझ गई कि मेरे क्रियाकलापों के पीछे का इरादा हमेशा शोहरत, लाभ और रुतबे की अपनी इच्छा को तृप्त करना था। क्योंकि मुझे शक्ति और रुतबा पसंद था और मैं एक अधिकारी बनना चाहती थी ताकि दूसरे मुझे सम्मान की नजर से देखें, इसलिए मैंने अपनी पसंद और इच्छाएँ अपने बेटे पर थोप दीं। मैंने उम्मीद की कि वह भविष्य में कड़ी मेहनत से पढ़ाई करेगा और सबसे अलग दिखेगा, एक ऊँचा आधिकारिक पद और अच्छा वेतन पाएगा ताकि मैं उसकी कामयाबी का आनंद ले सकूँ। मैंने जो कुछ भी किया था, वह मेरी अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं की खातिर था और मैंने अपने बेटे की पसंद और इच्छाओं पर बिल्कुल भी विचार नहीं किया था। जब मेरे बेटे ने कहा कि वह विश्वविद्यालय नहीं जाना चाहता और सेना में शामिल होना चाहता है, तो मैंने उसे ऐसा न करने के लिए मनाने की पूरी कोशिश की और उसकी इच्छाओं के विरुद्ध उसे विश्वविद्यालय जाने के लिए मजबूर किया। इसमें मेरा लक्ष्य उसे एक आधिकारिक करियर का अनुसरण करवाना और शक्ति और रुतबा हासिल करवाना था ताकि मुझे भी प्रतिष्ठा मिले। ऊपर से देखने पर, मैंने जो कुछ भी किया, वह मेरे बेटे के भविष्य और भाग्य की खातिर था। मैंने अपने बेटे को विकसित करने में अपना सब कुछ लगा दिया। लेकिन असल में यह सब रुतबे की मेरी अपनी इच्छा को तृप्त करने के लिए था, मैं अपने बेटे के माध्यम से और ज्यादा लोगों का सम्मान और प्रशंसा पाना चाहती थी और एक बेहतर भौतिक जीवन का आनंद लेना चाहती थी। अब मैं साफ-साफ देख चुकी थी कि मैंने जो कुछ भी किया था, वह मेरे बेटे की भलाई के लिए बिल्कुल नहीं था। यह सब मेरी अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए था। मेरी प्रकृति बहुत स्वार्थी, नीच और घिनौनी थी! मेरा बेटा दरअसल सरकारी नौकरी करना ही नहीं चाहता था। उसने एक बार मुझसे कहा था, “माँ, मैं कोई अधिकारी बनने वाला इंसान नहीं हूँ। अगर तुम इस समाज में अफसरशाही में पैर जमाना चाहती हो, तो तुम्हें शराब पीना, अच्छा खाना खाना, चापलूसी करना और धोखा देना आना चाहिए। तुम्हारे पास सही पारिवारिक पृष्ठभूमि और अच्छी जान-पहचान भी होनी चाहिए, साथ ही क्रूर और घटिया भी होना चाहिए। मुझमें इनमें से कुछ भी नहीं है। बस एक साधारण इंसान बने रहना ही अच्छा है।” पीछे मुड़कर सोचती हूँ तो मेरे बेटे ने जो कहा था, वह बहुत सच था। मैंने अपनी सबसे बड़ी बहन के बेटे के बारे में सोचा, जो उद्योग और वाणिज्य ब्यूरो का उप निदेशक है। उसने एक बार मुझसे कहा था, “एक बार जब तुम अफसरशाही में आ जाते हो, तो तुम अपने नियंत्रण में नहीं रहते। लोग एक-दूसरे के खिलाफ साजिशें और षडयंत्र रचते हैं और तुम किसी को अपने मन की बात नहीं बता सकते या किसी के बहुत करीब नहीं जा सकते। तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारी कौन-सी बात किसी को नाराज कर देगी। हो सकता है कि तुम दूसरों को नुकसान न पहुँचाना चाहो, लेकिन वे फिर भी तुम्हारी पीठ में छुरा घोंप देंगे। तुम्हें लोगों के हाव-भाव देखकर अपना जीवन जीना पड़ता है। अफसरशाही में जीवन बहुत थकाऊ है!” अधिकारी बनना कोई अच्छी बात नहीं है। अफसरशाही एक ऐसा कीचड़ है, जिसमें अगर मेरा बेटा मेरी इच्छानुसार चला गया होता, तो करीब दस साल बाद वह न चाहते हुए भी हर तरह की बुरी आदतों से सन जाता। वह धूर्त और धोखेबाज बन जाता, शोहरत और लाभ के पीछे भागता, दूसरों से प्रतिस्पर्धा करता और शायद कुछ बुरी चीजें भी कर बैठता। तब, वह एक सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन नहीं जी पाता। इससे उसके तन और मन को बहुत नुकसान और अंतहीन पीड़ा होती। मेरा बेटा अधिकारी नहीं बनना चाहता था और बस एक साधारण इंसान बनना चाहता था। क्या यह अच्छी बात नहीं है? अब उसके पास एक औपचारिक नौकरी है और उसकी महीने की तनख्वाह से उसके परिवार का गुजारा चल जाता है। वह मेरे परमेश्वर में विश्वास का विरोध नहीं करता और जब कलीसिया को किसी काम में उसकी मदद की जरूरत होती है तो वह बहुत खुशी-खुशी हाथ बँटाता है। यही बहुत अच्छा है।

इस अनुभव के बाद, मुझे और भी ज्यादा एहसास हो रहा है कि परमेश्वर ही इस बात का संप्रभु है और वही यह नियत करता है कि हर व्यक्ति किस तरह का काम करेगा और वह अपनी आजीविका कैसे चलाएगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर ने तय किया है कि कोई आदमी एक साधारण श्रमिक होगा, और इस जीवन में, वह बस अपना पेट भरने और तन ढंकने के लिए थोड़ी-बहुत मजदूरी कमा पाएगा, पर उसके माँ-बाप उस पर एक बड़ी हस्ती, धनी व्यक्ति, और उच्च अधिकारी बनने का दबाव डालते हैं, उसके बालिग होने से पहले उसके भविष्य के लिए योजना बनाने और चीजें व्यवस्थित करने लगते हैं, कई तरह की तथाकथित कीमतें चुकाते हैं, उसके जीवन और भविष्य को काबू करने की कोशिश करते हैं। क्या यह बेवकूफी नहीं है? (बिल्कुल है।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (18))। परमेश्वर के वचनों के इस अंश ने मुझे एहसास दिलाया कि मैं केवल मूर्ख नहीं थी : मैं तो निपट और निहायत बेवकूफ थी! मैंने जो भी कष्ट सहा था, वह मेरी अपनी गलती थी। जब मैंने अपने बेटे के लिए अपनी उम्मीदें छोड़ दीं, भाग्य से लड़ना बंद कर दिया, शोहरत और लाभ के अनुसरण के मार्ग पर चलना छोड़ दिया और एक सृजित प्राणी की स्थिति में खड़ी होकर सकारात्मक और समर्पित रवैये से परमेश्वर की संप्रभुता को स्वीकार करने, उसका सामना करने और उसका अनुभव करने में सक्षम हुई, तो मैंने देखा कि परमेश्वर की व्यवस्थाएँ अद्भुत हैं। परमेश्वर का धन्यवाद!

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