पति के बीमार पड़ने के बाद मैंने जो सबक सीखे

20 अप्रैल, 2026

लिन जिंग, चीन

अगस्त 2001 में, एक बहन ने मुझे गवाही दी कि परमेश्वर सत्य व्यक्त करने और अपना न्याय का कार्य करने के लिए दूसरी बार देहधारी हुआ है, मानवजाति के भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध और परिवर्तित कर रहा है और अंततः लोगों को अद्भुत राज्य में ला रहा है। यह सुनकर मैं बहुत उत्साहित हो गई। कुछ समय की जाँच के बाद मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार कर लिया। उसके बाद मैं सक्रिय रूप से सभाओं में भाग लेती थी और अपना कर्तव्य निभाती थी। बाद में, मुझे कलीसिया में एक अगुआ के रूप में चुना गया। उस समय मेरा पति अक्सर मुझे परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने से रोकने की कोशिश करता था, लेकिन मैं बाधित नहीं हुई और मैंने अपने कर्तव्य में कभी रुकावट नहीं आने दी। मैं दिन भर कलीसिया में व्यस्त रहती थी। दिन में मैं सभाओं में भाग लेती थी, भाई-बहनों के जीवन प्रवेश की मुश्किलें हल करने के लिए उनके साथ संगति करती थी। शाम को, मैं नकारात्मक और कमजोर भाई-बहनों को सहारा देती थी। मेरे पति ने पहले ज्यादा पैसे नहीं कमाए थे, लेकिन अप्रत्याशित रूप से, उस दौरान उसकी अच्छी आमदनी हुई और हमारे परिवार को कुछ बचत करने में ज्यादा समय नहीं लगा। मैं बेहद खुश थी। मैंने मन में सोचा, “अब अपना कर्तव्य निभाने में मेरे पास परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष है और भविष्य में मैं राज्य में भी प्रवेश कर पाऊँगी। मुझे भविष्य में अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए, और परमेश्वर मेरे साथ अन्याय नहीं करेगा; वह मेरे परिवार के जीवन को बेहतर से बेहतर बनाने के लिए आशीष देगा।” लेकिन, जब मैं इस तरह की योजनाएँ बना ही रही थी, तो कुछ अप्रत्याशित हुआ।

कुछ समय बाद मेरा पति अपनी कमर के निचले हिस्से में निरंतर दर्द की शिकायत करने लगा, इसलिए वह जाँच के लिए अस्पताल गया। डॉक्टर ने कहा कि मेरे पति को हर्नियेटेड डिस्क है और उसकी रीढ़ की हड्डी में बोन स्पर है, और अगर हालत गंभीर हो गई, तो यह उसकी नसों पर दबाव डालेगा और उसे लकवा हो सकता है। उसे आगे काम न करने के लिए भी कहा गया और बताया गया कि उसे तुरंत इलाज की जरूरत है। यह सुनकर मैं चौंक गई। मैंने मन में सोचा, “हमारे नए बने घर पर बहुत सारा कर्ज चढ़ा है और अभी तक खिड़की-दरवाजे नहीं लगे हैं। हमारी बेटी विश्वविद्यालय में है और उसे भी पैसों की जरूरत है। मैं कलीसिया की अगुआ के तौर पर बहुत व्यस्त हूँ और मेरे पास पैसे कमाने का समय नहीं है। केवल हमारा 14 साल का बेटा सजावट का काम सीख रहा है, लेकिन वह छोटा है और अभी भी एक प्रशिक्षु है, हर महीने बहुत कम पैसे कमाता है। भविष्य में हम परिवार के गुज़ारे का खर्च कैसे चलाएँगे?” मुझे थोड़ी चिंता हुई। लेकिन, जब मैंने सोचा कि मैं दिन भर कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने में कितनी व्यस्त थी, तो मैंने सोचा कि परमेश्वर मेरे परिवार की मुश्किलों को नज़रअंदाज़ नहीं करेगा, और कि मेरे पति की बीमारी शायद कुछ समय आराम करने के बाद ठीक हो जाए। यह सोचकर मेरे दिल की चिंताएँ काफी घट गईं।

पलक झपकते ही एक साल से ज्यादा समय बीत गया। मेरा पति इलाज के लिए लगातार औषधीय प्लास्टर लगाता रहा, लेकिन उसकी बीमारी में कोई सुधार नहीं हुआ, और डॉक्टरों के पास भी कोई असरदार इलाज नहीं था। मेरा दिल बड़ा बेचैन था। मैं यह सोचे बिना नहीं रह सकी, “मेरे पति की बीमारी कब ठीक होगी? अगर मैं अपना कर्तव्य निभाने में इतनी व्यस्त नहीं होती, तो मैं परिवार की मदद के लिए कुछ पैसे कमा सकती थी। लेकिन मैं दिन भर कलीसिया के कार्य में व्यस्त रहती हूँ और थोड़ा-सा भी पैसा कमाने के लिए मेरे पास कोई समय नहीं है। परमेश्वर मेरे परिवार की रक्षा क्यों नहीं करता? मेरे पति की बीमारी ठीक क्यों नहीं हो रही है? घर में अपने सामने इन सारी मुश्किलों के होते हुए मैं अपना दिल पूरी तरह से अपने कर्तव्य में कैसे लगा सकती हूँ?” मैं जितना इस बारे में सोचती, उतनी ही परेशान हो जाती। मेरे दिल को ऐसा महसूस होता था मानो यह चिंता से जल रहा है। कभी-कभी, मैं सच में इसे और बर्दाश्त नहीं कर पाती थी और छिपकर रोती थी। मैं जानती थी कि मुझे परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करनी चाहिए, लेकिन मैं अपनी भावनाओं पर काबू ही नहीं रख पाती थी और दिन भर पीड़ा और यंत्रणा में जीती थी। खासकर, जब मैंने देखा कि जिस बहन के साथ मैं सहयोग कर रही थी, उसका पति पैसा कमाने में बहुत अच्छा है, और वह एक आरामदायक जीवन जीती है और पैसे से बाधित नहीं है, तो मुझे लगा कि यह अन्यायपूर्ण है। मैंने अपने दिल में असंतुलन महसूस किया। मैंने सोचा, “मैं अपना कर्तव्य निभाने में उससे ज़्यादा सक्रिय हूँ, तो मेरा परिवार इस हाल में क्यों है? परमेश्वर क्यों उन पर अनुग्रह करता है, लेकिन मुझ पर नहीं? क्या परमेश्वर मुझे नापसंद करता है? मैं इस तरह कीमत चुकाती और खुद को खपाती हूँ, फिर भी परमेश्वर मेरे परिवार को आशीष नहीं देता, तो मैं इतनी सक्रिय क्यों बनी रहूँ?” लेकिन, फिर मैंने सोचा, “क्या परमेश्वर मेरी परीक्षा ले रहा है? अगर मैं सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाती रहूँ, तो शायद परमेश्वर मेरी लगन देखकर मेरे परिवार को आशीष देगा। अगर मैं अपना कर्तव्य लापरवाही से करती हूँ, तो भविष्य में अगर परमेश्वर ने मुझे नज़रअंदाज़ कर दिया तो मैं क्या करूँगी?” इसलिए, मैंने खुद से कहा कि मैं लापरवाह नहीं हो सकती हूँ और मुझे अपना कर्तव्य उचित ढंग से निभाना है। मैंने अपना कर्तव्य निभाते हुए दिन भर व्यस्त रहना जारी रखा। लेकिन, कुछ समय बाद भी मेरे पति की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ था, और मेरे परिवार की समस्याएँ तब भी हल नहीं हुई थीं। मेरा दिल और भी भ्रमित और व्यथित हो गया और मुझे लगा जैसे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है। मेरा दिल कड़वाहट से भर गया था। एक संगति में मैंने अपनी घरेलू मुश्किलों का उल्लेख किया। चेहरे पर दुख लिए, मैंने शिकायत की, “तुम सब तो जैसे स्वर्ग में हो, पर मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मुझे इतनी पीड़ा दी जा रही है कि मैं नरक में हूँ।” बहन ने यह कहते हुए मेरी सख्ती से काट-छाँट की, “क्या तुम यह शिकायत नहीं कर रही हो कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है?” बहन के शब्दों ने मेरे दिल को झकझोर दिया। क्या मैं परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं कर रही थी? मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “तुम्हारी हर शिकायत एक दाग छोड़ जाती है, और यह ऐसा पाप है जो धोया नहीं जा सकता!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सत्य प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है)। समस्या की गंभीरता का एहसास कर मैंने तुरंत अपना सिर झुका दिया और बोलना बंद कर दिया। जब मैं घर पहुँची तो मैंने घुटने टेके और रोते-रोते प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि जब मेरे परिवार पर मुश्किलें आती हैं तो मुझे शिकायत नहीं करनी चाहिए, लेकिन मैं नहीं जानती कि तुम्हारा इरादा क्या है या इसका अनुभव कैसे करना है। परमेश्वर, तुम मुझे प्रबुद्ध करो और मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं तुम्हारे कार्य को जान सकूँ और तुम्हारे इरादे को समझ सकूँ।”

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और परमेश्वर के इरादों की कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी लोगों के लिए शोधन बेहद कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शोधन के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है और मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ स्पष्ट करता है, और अधिक प्रबुद्धता, अधिक व्यावहारिक काट-छाँट प्रदान करता है; तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से मनुष्य अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान प्राप्त करता है, और उसे परमेश्वर के इरादों की और अधिक समझ प्राप्त होती है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के लिए अधिक सच्चा और अधिक शुद्ध प्रेम प्राप्त होता है। शोधन का कार्य क्रियान्वित करने में परमेश्वर के लक्ष्य ऐसे होते हैं। परमेश्वर द्वारा मनुष्य में किए जाने वाले समस्त कार्य के अपने लक्ष्य और महत्व होते हैं; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना होता है। बल्कि इसका अर्थ है शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना और उसके जीने के संपूर्ण तरीके को बदलना। शोधन मनुष्य की व्यावहारिक परीक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण का एक रूप है; केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम अपना अंतर्निहित कार्य कर सकता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करते ही मेरा दिल रोशन हो गया। परमेश्वर चाहे किन्हीं भी परिवेशों की व्यवस्था करे, उसका लक्ष्य हमें हटाना नहीं होता है, बल्कि हमारे भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध और रूपांतरित करना होता है और उसके स्वभाव और उसके कार्य को समझने में हमारी मदद करना होता है। जब हम परमेश्वर को जान जाते हैं, तो हम उसके कार्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं। तब मुझे एहसास हुआ कि इतने लंबे समय तक मेरे पति के कमर दर्द से परेशान रहने के पीछे परमेश्वर का इरादा यह था कि मैं सत्य खोजूँ और इससे सबक सीखूँ, ताकि मेरे भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध और रूपांतरित किया जा सके। मैंने उस समय के बारे में सोचा जब मैंने शुरुआत में परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार किया था। मैं जानती थी कि अंत के दिनों में, परमेश्वर अपना न्याय और शुद्धिकरण का कार्य करता है, लेकिन मैं तब भी अनुग्रह के युग की तरह अनुग्रह और आशीष पाने का अनुसरण करती रही, चाहती थी कि परमेश्वर मेरे पति की बीमारी को ठीक कर दे। जब इसमें फिर भी सुधार नहीं हुआ, तो मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत की और मैं नकारात्मकता और गलतफहमी में जीती रही। यह सारी पीड़ा मैंने खुद ही मोल ली थी। यह सब परमेश्वर के कार्य के बारे में मेरी समझ की कमी के कारण हुआ था, और क्योंकि मैं परमेश्वर में अपने विश्वास में गलत मार्ग पर चल रही थी। जब मैं यह समझ गई तो मेरे दिल में पीड़ा काफी कम हो गई।

बाद में मैंने परमेश्वर द्वारा उन लोगों के प्रकाशन के बारे में सोचा जो उसे एक हरफनमौला छुरी और एक अक्षय पात्र मानकर उसके साथ पेश आते हैं, इसलिए मैंने परमेश्वर के वचनों के उस अंश को पढ़ने के लिए ढूँढ़ा। परमेश्वर कहता है : “चूँकि आज के लोगों में अय्यूब जैसी मानवता नहीं है, तो उनका प्रकृति सार, और परमेश्वर के प्रति उनकी मनोवृत्ति क्या है? क्या वे परमेश्वर का भय मानते हैं? क्या वे बुराई से दूर रहते हैं? वे जो परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते हैं उनके बारे में केवल तीन शब्दों में बताया जा सकता है : ‘परमेश्वर के शत्रु।’ तुम लोग ये तीन शब्द अक़्सर कहते हो, किंतु उनका वास्तविक अर्थ तुम लोगों ने कभी नहीं जाना है। ‘परमेश्वर के शत्रु’ शब्दों का एक सारगर्भित पक्ष है : वे यह नहीं कह रहे हैं कि परमेश्वर मनुष्य को शत्रु के रूप में देखता है, बल्कि यह कि मनुष्य परमेश्वर को शत्रु के रूप में देखता है। पहला, जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ करते हैं, तब उनमें से किसके पास अपने लक्ष्य, इरादे और महत्वाकांक्षाएँ नहीं होती हैं? उनका एक भाग भले ही परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करता है और परमेश्वर के अस्तित्व को देख चुका होता है, फिर भी वे इरादे परमेश्वर में उनके विश्वास में अब भी समाए होते हैं और परमेश्वर में विश्वास करने में उनका अंतिम लक्ष्य आशीष पाना और उससे अपनी मनचाही चीजें प्राप्त करना होता है। लोगों के जीवन अनुभवों में, वे प्रायः मन ही मन सोचते हैं : ‘मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका का त्याग कर दिया है, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे हिसाब करना चाहिए और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ खपाया है, मैं बहुत दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत कष्ट सहा है—क्या परमेश्वर ने इस दौरान मेरे प्रदर्शन के बदले में मुझसे कोई वादा किया है? क्या उसने मेरे अच्छे कर्म याद रखे हैं? मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? ...’ अपने हृदय में प्रत्येक व्यक्ति बार-बार ऐसे जोड़-तोड़ करता है और परमेश्वर से चीजों की माँग करते हुए लगातार प्रेरणाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और लेन-देन की मानसिकता रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है और परमेश्वर के बारे में साजिशें रचता रहता है, अपने परिणाम के लिए परमेश्वर के साथ लगातार ‘मामले पर बहस’ करता रहता है और परमेश्वर से बयान माँगने और यह देखने की कोशिश करता है कि परमेश्वर उसे वह चीज देगा या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर को परमेश्वर नहीं मानता। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत चीजों की माँग की है और हर कदम पर उस पर दबाव डालते हुए, एक इंच दिए जाने पर एक मील लेने की कोशिश की है। परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परीक्षण आने पर या अपने आप को किन्हीं खास स्थितियों में पाने पर अक्सर कमजोर, नकारात्मक होते हैं और अपने कार्य में ढिलाई करते हैं और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक सर्व-उपयोगी उपकरण माना है और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और वादे माँगना उसका जन्मजात अधिकार और दायित्व है, जबकि मनुष्य की रक्षा, परवाह और उसकी आपूर्ति करना परमेश्वर की जिम्मेदारियाँ हैं जो परमेश्वर को पूरी करनी चाहिए। ऐसी है ‘परमेश्वर में विश्वास’ के तीन शब्दों की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। “तुम यह आशा करते हो कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था के मार्ग में कोई भी मुश्किल या क्लेश या लेशमात्र भी पीड़ा नहीं होगी। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो और तुम जीवन को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने विलासितापूर्ण विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि शरीर से प्यार करते हैं, क्या वे सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बारे में शिकायत करनी है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा विलासितापूर्ण हैं? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन ने मुझे मेरे दिल तक बेध दिया। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद मैं उसके काफी अनुग्रह और आशीषों का आनंद ले चुकी थी और अपना कर्तव्य निभाने में अत्यंत प्रेरित थी। मेरा मानना था कि अगर मैं अपना कर्तव्य उचित ढंग से निभाऊँगी तो परमेश्वर मुझ पर भरपूर अनुग्रह करेगा, मुझे आपदाओं और दुर्भाग्य से बचाएगा, और मेरे परिवार को सुरक्षित और स्वस्थ रखेगा। मैं इन गलत इरादों के साथ अपना कर्तव्य निभा रही थी। शुरू में, जब मेरे पति को हर्नियेटेड डिस्क हुआ और डॉक्टर ने कहा कि अगर यह गंभीर हो गया, तो उसे लकवा मार जाएगा, तो मेरा मानना था कि अगर मैं सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाऊँगी तो परमेश्वर मेरे साथ अन्याय नहीं करेगा और मेरे पति की बीमारी ठीक होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए, अपना कर्तव्य निभाने का मेरा उत्साह कम नहीं हुआ। लेकिन, जब मेरे पति की हालत में फिर भी सुधार नहीं हुआ और मेरे परिवार को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा, जबकि मेरे आस-पास के भाई-बहन एक बेहतर और आरामदायक जीवन जी रहे थे, तो मैंने महसूस किया कि यह अन्यायपूर्ण है और शिकायत की कि परमेश्वर मुझे आशीष नहीं देता है और मैं अब पहले की तरह अपना कर्तव्य निभाने में सक्रिय नहीं रही। बाद में, मुझे यह चिंता होने लगी कि परमेश्वर अपने प्रति मेरी वफादारी को परख रहा है और अगर मैं अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाह रही, तो मुझे परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष नहीं मिलेगा और इसलिए मेरे पास अपना कर्तव्य निभाते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। कुछ समय बाद, मेरे पति की हालत में फिर भी सुधार नहीं हुआ था, और मेरे जीवन की मुश्किलें हल नहीं हुई थीं। मैंने अपने दिल में परमेश्वर के बारे में और भी अधिक शिकायत की और यहाँ तक कि परमेश्वर के प्रति अपना असंतोष बहनों के सामने भी व्यक्त किया, यह शिकायत की कि परमेश्वर मेरे प्रति धार्मिक नहीं है। परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की मेरी कोशिश की कुरूपता पूरी तरह से उजागर हो गई थी, और मैं पूरी तरह से बेनकाब हो चुकी थी! अपने पति की बीमारी के वर्षों के दौरान मैंने सत्य की खोज नहीं की थी। इसके बजाय, मैं लगातार नकारात्मकता में जीती रही, परमेश्वर के बारे में शिकायत करती और उसे गलत समझती रही। यूँ तो मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन मैं केवल परमेश्वर के आशीषों के बदले उसके साथ सौदेबाजी करने की कोशिश कर रही थी, उसे एक अक्षय पात्र, एक हरफनमौला छुरी मान रही थी। अतीत में, मैंने सोचा था कि मैं अपना कर्तव्य निभाने में काफी सक्रिय थी। मैंने अपने पति के बीमार होने पर भी अपने कर्तव्य की कभी उपेक्षा नहीं की, और मैंने अपने काम में कुछ परिणाम भी हासिल किए। नतीजतन, मैंने खुद को एक ऐसा व्यक्ति करार दिया जो “परमेश्वर के प्रति वफादार” थी और जो “सचमुच उस पर विश्वास” करती थी। मुझमें आत्म-जागरूकता की पूरी तरह से कमी थी! जो परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो पूरे दिल और मन से अपना कर्तव्य अच्छे से निभाते हैं, और परमेश्वर उन्हें आशीष दे या न दे, वे बिल्कुल भी शिकायत नहीं करते। उदाहरण के लिए अय्यूब को ही ले लो। चाहे परमेश्वर ने दिया हो या ले लिया हो, अय्यूब परमेश्वर के प्रति समर्पण करने और हमेशा उसके नाम की स्तुति करने में सक्षम था। परमेश्वर उसके साथ चाहे जैसे भी पेश आया, अय्यूब की अपनी कोई माँग नहीं थी। परमेश्वर के प्रति वफादार व्यक्ति होने का यही सच्चा मतलब है। मैं परमेश्वर से लाभ पाने के लिए उस पर विश्वास करती थी और अपना कर्तव्य निभाती थी। मुझमें न कोई वफादारी थी और न सच्चा दिल था। मैं बस एक अवसरवादी थी। मेरा परमेश्वर में विश्वास और उसका अनुसरण झूठा था और केवल अनुग्रह और आशीषों की मेरी माँग ही सच्ची थी। मैंने इन भौतिक चीजों को सबसे ऊपर महत्व दिया, और लगातार परमेश्वर से अनुग्रह और आशीषों की माँग की। मैं बिल्कुल भी ऐसी इंसान नहीं थी जो सचमुच परमेश्वर में विश्वास करती हो, और वास्तव में उसकी घृणा और नफरत का पात्र बन रही थी। अगर परमेश्वर ने मुझे इस तरह से बेनकाब न किया होता, तो मैंने कभी भी अपने असली चेहरे को साफ-साफ नहीं देखा होता।

फिर मैंने आत्मचिंतन किया : ऐसा क्यों है कि जब अच्छी चीजें होती हैं, तो मैं परमेश्वर की स्तुति कर सकती हूँ, लेकिन जब मेरा पति बीमार पड़ गया और हमें आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा तो मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत की? मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “बहुत सालों से जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके हृदय को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छाशक्ति या संकल्प की कमी है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और मनमौजी भी हो गए हैं। उनमें स्वयं से परे जाने के संकल्प का पूरी तरह से अभाव है और इन अंधकारपूर्ण प्रभावों के बंधनों से मुक्त होने का तो लेशमात्र भी साहस नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़ चुके हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में उनके परिप्रेक्ष्य अभी भी असहनीय रूप से घिनौने हैं और यहाँ तक कि सुनने में भी पूरी तरह से आपत्तिजनक हैं। लोग पूरी तरह से कायर, शक्तिहीन, नीच और कमजोर हैं। वे अंधकार की शक्तियों से बेहद घृणा नहीं करते, वे प्रकाश और सत्य के लिए प्रेम महसूस नहीं करते; इसके बजाय, वे उन्हें निष्कासित करने की पूरी कोशिश करते हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?)। “जो लोग अधिकतम गहराई से भ्रष्ट देशों में जन्मे हैं, वे इस बारे में और भी अधिक अज्ञानी हैं कि परमेश्वर क्या है, या परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है। लोग जितने अधिक भ्रष्ट होते हैं, वे उतना ही कम परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जानते हैं, और उनका विवेक और अंतर्दृष्टि उतनी ही खराब होती है। परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का मूल कारण शैतान द्वारा उसकी भ्रष्टता है। शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए जाने के कारण मनुष्य का जमीर सुन्न हो गया है, वह नैतिक रूप से भ्रष्ट हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने से पहले मनुष्य मूल रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पित था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनके प्रति समर्पण करता था। उसमें मूल रूप से सही विवेक और जमीर था और उसमें सामान्य मानवता थी। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद मनुष्य का मूल विवेक, जमीर और मानवता पूरी तरह से सुन्न पड़ गई और शैतान द्वारा बिगाड़ दी गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपना समर्पण और प्रेम खो दिया है। मनुष्य का विवेक असामान्य हो गया है, उसका स्वभाव एक जानवर के स्वभाव के समान हो गया है और परमेश्वर के खिलाफ उसकी विद्रोहशीलता लगातार बढ़ती जा रही है और अधिक गंभीर होती जा रही है। फिर भी मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही समझता है, बस लगातार विरोध और विद्रोह करता रहता है। मनुष्य के स्वभाव के खुलासे उसके विवेक, अंतर्दृष्टि और जमीर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्योंकि उसका विवेक और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं और उसका जमीर अत्यंत सुन्न पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है)। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, मैं समझ गई कि यह शैतान ही है जिसने लोगों के मन को भ्रष्ट और उसका क्षरण कर दिया है। यह दुनिया जीवित रहने के विभिन्न शैतानी नियमों से भरी है, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “सबसे पहले अपना लाभ” और “कभी घाटे का सौदा मत करो।” हर व्यक्ति इन शैतानी फलसफों के अनुसार जीता है, स्वार्थी और नीच बन जाता है और पूरी तरह से अंतरात्मा की अवहेलना करता है। वह जो कुछ भी करता है, उसमें वह सबसे पहले यह सोचता है कि क्या यह उसके लिए फायदेमंद है। अगर यह फायदेमंद है, तो वह इसे करेगा; अगर नहीं है तो वह इसे नहीं करेगा। मैं भी इन शैतानी विचारों और ख्यालों से गहराई तक भ्रष्ट हो चुकी थी। जब मैंने देखा कि परमेश्वर पर विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने से मेरे पास उसकी देखभाल और सुरक्षा थी, और मेरे परिवार का जीवन सुधरता हुआ लग रहा था, तो मेरा मानना था कि यह परमेश्वर का आशीष है जो मैंने इसलिए प्राप्त किया है कि मैं अपना कर्तव्य समर्पित होकर निभाती आ रही हूँ, और अगर मैं इस तरह सक्रिय रूप से अपना कर्तव्य निभाती रहूँगी तो मैं भविष्य में उद्धार प्राप्त भी कर पाऊँगी और राज्य में भी प्रवेश भी कर पाऊँगी। जब मेरा पति बीमार पड़ गया और मेरे परिवार को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा, तो मैंने परमेश्वर को गलत समझा और उसके बारे में शिकायत की और अपना कर्तव्य निभाने में लापरवाह रही। तथ्यों ने खुलासा कर दिया कि अपना कर्तव्य निभाने में मेरे अंदर बिल्कुल भी सच्चा दिल नहीं था। मैं जो कुछ भी कर रही थी, वह सिर्फ परमेश्वर को धोखा देने और उसके खिलाफ योजनाएँ बनाने की कोशिश थी, अपना कर्तव्य निभाकर परमेश्वर से आशीष ऐंठने की व्यर्थ ही कोशिश कर रही थी। हमें बचाने के लिए परमेश्वर स्वयं देहधारी हुआ और सत्य व्यक्त करता है। वह अपने दिल का सारा खून हमारे लिए समर्पित करता है, और कभी भी अपने हितों के बारे में नहीं सोचता। परमेश्वर का सार विश्वासयोग्य है; यह निस्वार्थ, सुंदर और अच्छा है। इसके विपरीत, मैं जो थोड़ा-सा कर्तव्य निभाती थी उसके भीतर सौदेबाजियाँ, माँगें और धोखेबाजियाँ छिपी होती थीं और मैं वास्तव में परमेश्वर के साथ उसे परमेश्वर मानकर पेश नहीं आती थी। मैं एक ऐसी स्वार्थी और नीच इंसान थी जो सारी मानवता और विवेक को खो चुकी थी। अगर ये चीजें मेरे साथ घटित नहीं होतीं तो मैं कभी भी साफ-साफ यह नहीं देख पाती कि मैं वास्तव में क्या थी। केवल तब जाकर मैंने समझा कि मेरे पति की बीमारी और मेरे परिवार की आर्थिक कठिनाइयाँ परमेश्वर का इरादतन मेरे लिए चीजें मुश्किल बनाना नहीं था। बल्कि, मंशा यह थी कि मुझे मेरा स्वार्थी और घिनौना कुरूप चेहरा साफ-साफ दिखा दे, मेरे दिल को जगा दे और मुझे यह दिखा दे कि मैं कैसे आचरण करूँ। यह मेरे लिए परमेश्वर का महान उद्धार था, जिसमें उसका प्रेम निहित था, लेकिन मैं इतनी अधिक अंधी थी कि उसके इरादे को नहीं समझ पाई और मैं निरंतर उसे गलत समझती रही और उसके बारे में शिकायत करती रही। जब मैं यह समझ गई, तो मैं पछतावे से भर गई, और खुद से नफरत करने लगी। तब मैं परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की इच्छुक हो गई, फिर चाहे मेरे पति की बीमारी या हमारे पारिवारिक जीवन में कोई सुधार हो या न हो।

खोज करते-करते मुझे परमेश्वर के वचनों का एक और अंश मिला : “अय्यूब ने परमेश्वर से किन्हीं लेन-देनों की बात नहीं की, और परमेश्वर से कोई याचनाएँ या माँगें नहीं कीं। उसका परमेश्वर के नाम की स्तुति करना भी सभी चीज़ों पर शासन करने की परमेश्वर की महान सामर्थ्य और अधिकार के कारण था, और वह इस पर निर्भर नहीं था कि उसे आशीषें प्राप्त हुईं या उस पर आपदा टूटी। वह मानता था कि परमेश्वर लोगों को चाहे आशीष दे या उन पर आपदा लाए, परमेश्वर की सामर्थ्य और उसका अधिकार नहीं बदलेगा, और इस प्रकार, व्यक्ति की परिस्थितियाँ चाहे जो हों, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। मनुष्य को धन्य किया जाता है तो परमेश्वर की संप्रभुता के कारण किया जाता है, और इसलिए जब मनुष्य पर आपदा टूटती है, तो वह भी परमेश्वर की संप्रभुता के कारण ही टूटती है। परमेश्वर की सामर्थ्य और अधिकार मनुष्य से संबंधित सब कुछ पर शासन करते हैं और उसे व्यवस्थित करते हैं; मनुष्य के भाग्य के उतार-चढ़ाव परमेश्वर की सामर्थ्य और उसके अधिकार की अभिव्यंजना हैं, और तुम इसे चाहे जिस दृष्टिकोण से देखो, परमेश्वर के नाम की स्तुति की जानी चाहिए। यही वह है जो अय्यूब ने अपने जीवन के वर्षों के दौरान अनुभव किया था और जानने लगा था। अय्यूब के सभी विचार और कार्यकलाप परमेश्वर के कानों तक पहुँचे थे, और परमेश्वर के सामने आए थे, और परमेश्वर द्वारा महत्वपूर्ण माने गए थे। परमेश्वर ने अय्यूब के इस ज्ञान को सँजोया, और ऐसा हृदय होने के लिए अय्यूब को सँजोया। यह हृदय सदैव, और सर्वत्र, परमेश्वर के आदेश की प्रतीक्षा करता था, और समय या स्थान चाहे जो हो, उस पर जो कुछ भी टूटता उसका स्वागत करता था। अय्यूब ने परमेश्वर से कोई माँगें नहीं कीं। उसने स्वयं अपने से जो माँगा वह यह था कि परमेश्वर से आई सभी व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करे, इन्हें स्वीकार करे, इनका सामना करे और इनके प्रति समर्पण करे; अय्यूब इसे अपना कर्तव्य मानता था, और यह ठीक वही था जो परमेश्वर चाहता था(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II)। जब अय्यूब ने अपनी सारी भेड़ें और मवेशी और अपनी सारी दौलत खो दी, यूँ तो वह मानसिक पीड़ा में था, पर वह तार्किक था। जब वह परमेश्वर का इरादा नहीं समझ पाया तो वह जल्दबाजी में किसी नतीजे पर नहीं पहुँचा, और उसने कभी भी परमेश्वर के खिलाफ शिकायत या विद्रोह का एक भी शब्द नहीं बोला। वह जानता था कि परमेश्वर ही एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, जिसने सब कुछ बनाया है और जो सभी चीजों का संप्रभु है और कि चाहे परमेश्वर दे या वापस ले ले, उसके नाम की हमेशा स्तुति और बड़ाई की जानी चाहिए। परमेश्वर ने जिन परिवेशों का इंतजाम किया था, अय्यूब उससे उन सबको स्वीकार कर पाया और उनके प्रति समर्पण कर पाया। इसके विपरीत, जब मैंने खुद को देखा, तो मैंने पाया कि जब परमेश्वर ने मुझे अनुग्रह और आशीष प्रदान किया तो मैंने खुश होकर उसके नाम की स्तुति की, लेकिन जब मेरा पति बीमार पड़ गया और मेरे परिवार को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा तो मैंने उसके इरादे को खोजने और समझने के लिए प्रार्थना नहीं की। इसके बजाय, मैं अपना कर्तव्य निभाने का यह इस्तेमाल करना चाहती थी कि छलपूर्वक परमेश्वर का भरोसा जीतने का प्रयास करूँ और अपने परिवार की मुश्किलें हल करने में उससे मदद करवाऊँ। जब परमेश्वर ने जो किया वह मेरी इच्छा के अनुसार नहीं था, तो मैंने शिकायत की कि वह मेरे प्रति धार्मिक नहीं है। मैंने परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी सच्चा समर्पण नहीं दिखाया। अय्यूब और मुझमें सचमुच जमीन-आसमान का अंतर था। मेरी मानवता बहुत ही घटिया थी!

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और यह समझने लगी कि परमेश्वर में विश्वास करने और अपना कर्तव्य निभाने का संबंध आशीष पाने या दुर्भाग्य भुगतने से कैसे है। परमेश्वर कहता है : “मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष होंगे या हाय का सामना करना होगा, इन दोनों के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसकी स्वर्ग द्वारा प्रेषित वृत्ति है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। हाय का सामना करना उस सज़ा को संदर्भित करता है जो एक व्यक्ति को तब मिलती है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी लोगों का स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात जब उन्हें पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उन्हें आशीष प्राप्त होते हैं या हाय का सामना करना पड़ता है, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करते हुए, जो उन्हें करना ही चाहिए और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह तो कम से कम व्यक्ति को, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना ही चाहिए। तुम्हें अपना कर्तव्य आशीष प्राप्त करने की खातिर नहीं निभाना चाहिए और तुम्हें हाय का सामना करने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार भी नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बता दूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज है, जो उसे करनी ही चाहिए, और यदि वह अपना कर्तव्य करने में अक्षम है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि मानव जीवन परमेश्वर द्वारा दिया गया है और वह सब कुछ जिसका इंसान आनंद लेता है परमेश्वर द्वारा प्रदान किया जाता है। लोगों को अपने कर्तव्य बिना शर्त निभाने चाहिए। यह बिल्कुल स्वाभाविक और न्यायोचित है। लोगों को शर्तें या माँगें नहीं रखनी चाहिए; और उन्हें केवल आशीष और अनुग्रह पाने के लिए तो अपना कर्तव्य बिल्कुल नहीं निभाना चाहिए। यह सबसे अविवेकपूर्ण चीज है जो वे कर सकते हैं। जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों को पालने के लिए बहुत कठिनाइयाँ सहते हैं, उसी तरह बच्चों को अपने माता-पिता का सहारा बनना चाहिए। अगर लोग केवल तभी अपने माता-पिता का सहारा बनते हैं जब वे देखते हैं कि उन्हें विरासत मिलनी है, और जब उनके पास कोई संपत्ति नहीं होती तो अपने माता-पिता को भगा देते हैं, तो ऐसे लोग विद्रोही संतान हैं; वे जानवर हैं। उनमें कोई मानवता नहीं है। एक सृजित प्राणी के तौर पर अपना कर्तव्य निभाना मेरा परम कर्तव्य है, और मुझे इसमें कोई इरादा या उद्देश्य नहीं लाना चाहिए। चाहे परमेश्वर मुझे आशीष दे या न दे, मुझे बिना शर्त अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए। इसके अलावा, मेरे पति ने मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की कोशिश की थी। यह उसी की गलती थी कि उसकी बीमारी ठीक नहीं हुई थी। वह सहानुभूति के लायक नहीं था। मेरा पति परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला व्यक्ति था और फिर भी मैंने उसकी बीमारी ठीक करने के लिए परमेश्वर से विनती की और यहाँ तक कि परमेश्वर के बारे में शिकायत की। यह पूरी तरह से अविवेकपूर्ण था और परमेश्वर की घृणा और नफरत का कारण बना। भविष्य में, चाहे मेरे पति की बीमारी ठीक हो या न हो, मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने, अपना रवैया सही करने और पूरे दिल और दिमाग से अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने की इच्छुक थी। एक बार जब मैं यह समझ गई तो मुझमें उतनी कड़वाहट नहीं रही। फिर मैंने ख्याल किया कि बाइबल क्या कहती है : “आकाश के पक्षियों को देखो! वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; फिर भी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे अधिक मूल्य नहीं रखते?(मत्ती 6:26)। परमेश्वर ने कहा कि हवा के पक्षी न तो बोते हैं और न ही काटते हैं, फिर भी वह उन्हें भी खिलाता है, तो इंसानों की तो बात ही क्या है। परमेश्वर नहीं चाहता कि मैं भविष्य की घटनाओं के लिए तैयारी करूँ या योजना बनाऊँ, बल्कि चाहता है कि मैं चीजों को स्वाभाविक रूप से होने दूँ। मुझे बस पर्याप्त भोजन और कपड़ों से संतुष्ट रहना चाहिए। हालाँकि हमारे परिवार को आर्थिक मुश्किलें थीं, फिर भी हम गुज़ारा कर सकते थे, और मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने को तैयार थी, अब कल के लिए व्यथा और चिंता नहीं सह रही थी।

बाद में मेरे पति के दोस्त का चाचा छुट्टी में हमारे इलाके में आया। उसने मेरे पति को औषधीय प्लास्टर और कमर और पैर दर्द के इलाज के तरीके सिखाए, और उसका मुफ्त में इलाज भी किया। कुछ समय बाद, मेरे पति की हालत बहुत बेहतर हो गई, और उसने कमर और पैर दर्द के इलाज के लिए बाजार में एक क्लिनिक भी खोल लिया, जिससे परिवार की आमदनी में मदद के लिए कुछ पैसे आने लगे। इन बातों का अनुभव करने के बाद, मेरे पति ने मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने की उतनी ज़्यादा कोशिश करना बंद कर दिया। इसके बाद, मेरे पति की बीमारी कई बार फिर से उभरी, लेकिन अपने पति की बीमारी के कारण मैं परमेश्वर के बारे में अब और शिकायत नहीं करती थी। मैं जानती हूँ कि परमेश्वर जो भी आयोजन करता है वह अच्छा है और मुझे परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए और अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए। मैं इस तरह से बदल पाने में सफल रही, यह परमेश्वर के वचनों की अगुआई का नतीजा है। परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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