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सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ

(1) सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत

ईसाई धर्म के सिद्धांत बाइबल से उत्पन्न होते हैं, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत उन सभी सच्चाइयों से उत्पन्न होते हैं, जो परमेश्वर द्वारा सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के दौरान व्यक्त किए गए हैं। इसका मतलब यह है कि पुराना नियम, नया नियम और राज्य के युग की बाइबल—लौटे हुए प्रभु यीशु, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, के द्वारा व्यक्त 'वचन देह में प्रकट होता है'—सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ और सिद्धांत हैं। पुराना नियम व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा परमेश्वर के नियमों और आदेशों को पारित करने और मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करने सम्बन्धी परमेश्वर के कार्य का आलेख करता है; नया नियम अनुग्रह के युग के दौरान प्रभु यीशु द्वारा किए गए छुटकारे के कार्य को दर्ज करता है; और 'वचन देह में प्रकट होता है' में राज्य के युग के दौरान मानव जाति की शुद्धि और उद्धार के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त सभी सत्य हैं, साथ ही आखिरी दिनों के दौरान परमेश्वर के न्याय के कार्य का एक विवरण भी। कार्य के तीनों चरणों में परमेश्वर के सभी उदगार ही सच्ची बाइबल हैं, और कार्य के इन तीनों चरणों के दौरान परमेश्वर के सारे कथन, अर्थात कार्य के इन तीनों चरणों के दौरान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए सभी सत्य, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ हैं। ये तीन पवित्र ग्रंथ सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मूलभूत मान्यताएँ और सिद्धांत हैं।

ईसाई धर्म अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के कार्य से उत्पन्न हुआ था, लेकिन प्रभु यीशु मसीह ने, जिनको यह मानता ​​है, अनुग्रह के युग में केवल छुटकारे का कार्य किया था। चूंकि देहधारी प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था और उन्होंने मनुष्य के पापों की बलि के रूप में सेवा की, मनुष्य को शैतान के हाथों से मुक्त किया और नियमों द्वारा उसे निंदा और फटकार पाने से छुड़ाया, फिर भी मनुष्य को अपने पापों की माफ़ी और परमेश्वर के कृपापूर्ण अनुग्रह और आशीर्वाद का आनंद पाने के लिए परमेश्वर के सामने आकर अपने पापों को कबूल करना और पश्चाताप करना ज़रूरी था। यह प्रभु यीशु द्वारा किया गया छुटकारे का कार्य था। यद्यपि मनुष्य के पापों को प्रभु यीशु के छुटकारे के द्वारा माफ किया गया था, मनुष्य को उसके पापी स्वभाव से मुक्त नहीं किया गया था, वह अभी भी उसके द्वारा बाध्य और नियंत्रित था, और वह पाप किये बिना और अहंकारी तथा अभिमानी बनकर परमेश्वर का विरोध किये बिना, अपने यश और मुनाफे के लिए प्रयास किये बगैर, ईर्ष्यापूर्ण और विवादी हुए बिना, झूठ बोलने और लोगों को धोखा दिए बगैर, संसार के बुरे तरीकों का अनुसरण करने आदि के बिना रह नहीं सकता था। मनुष्य पाप के बंधन से मुक्त नहीं हुआ था और पवित्र नहीं बना था, और इस तरह प्रभु यीशु ने कई बार भविष्यवाणी की थी कि वे आखिरी दिनों के न्याय के कार्य को पूरा करने के लिए फिर से आएँगे, यह कहते हुए कि: "देख, मैं शीघ्र आनेवाला हूँ;" (प्रकाशितवाक्य 22:12)। "यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिये नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिये आया जो मुझे तुच्छ जानता है और मेरी बातें ग्रहण नहीं करता है उसको दोषी ठहरानेवाला तो एक है: अर्थात् जो वचन मैं ने कहा है, वही पिछले दिन में उसे दोषी ठहराएगा" (यूहन्ना 12:47-48) पतरस के पहले धर्मपत्र में यह भी लिखा है कि "क्योंकि वह समय आ पहुँचा है कि पहले परमेश्‍वर के लोगों का न्याय किया जाए" (1 पतरस 4:17)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आखिरी दिनों के मसीह, लौटे हुए प्रभु यीशु हैं। उन्होंने मनुष्य की शुद्धि और उद्धार के लिए सभी सत्यों को व्यक्त किया है, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले निर्णय के कार्य को किया है, और बाइबल की भविष्यवाणियों को पूर्ण रूप से पूरा किया है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त 'वचन देह में प्रकट होता है' अंतिम दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य का एक विवरण है और इसके बारे में प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में भविष्यवाणी की गई थी "आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा किया गया न्याय का कार्य मानव जाति के लिए परमेश्वर के उद्धार के कार्य का अंतिम चरण है, और यह इसका सबसे मौलिक और निर्णायक चरण भी है। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा बचाया जाना और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना चाहता है, तो उसे परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना चाहिए, और इसी में प्रभु यीशु के इन वचनों को पूरा किया गया है: "आधी रात को धूम मची: 'देखो, दूल्हा आ रहा है! उससे भेंट करने के लिये चलो'" (मत्ती 25:6)। "देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ" (प्रकाशितवाक्य 3:20)। केवल अगर मनुष्य परमेश्वर के वचनों के न्याय और उनकी ताड़ना को स्वीकार करता है और उनका अनुभव करता है, तो वह परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को जान पाता है, शैतान द्वारा की गई मनुष्य की भ्रष्टता के सार और उसकी प्रकृति को और उसके सच्चे तथ्य को जान सकता है, नेकी से परमेश्वर के सामने पश्चाताप कर सकता है, स्वयं को समस्त पाप से मुक्त कर सकता है, पवित्रता प्राप्त कर सकता है, एक ऐसा व्यक्ति बन सकता है जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन और परमेश्वर की पूजा करता हो, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। केवल तभी वह परमेश्वर के वादों और आशीषों के उत्तराधिकार को पाने के योग्य होगा, और उस सुंदर गंतव्य को प्राप्त करेगा।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत, परमेश्वर द्वारा उनके कार्य के तीन चरणों में व्यक्त सभी सत्यों से उत्पन्न होते हैं, जिसका अर्थ है कि वे बाइबल तथा 'वचन देह में प्रकट होता है' में दर्ज किए गए ईश्वर के वचनों से उत्पन्न होते हैं। परमेश्वर ने सृष्टि के सर्जन के बाद मानव जाति को बचाने का काम शुरू कर दिया, और मनुष्य के उद्धार के लिए उनकी प्रबंधन योजना तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि वे आखिरी दिनों के दौरान परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले निर्णय के कार्य को खत्म नहीं करेंगे। कार्य के तीन चरणों में परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों और सभी सत्यों से हम पूरी तरह से यह देख पाएँगे कि चाहे वह शुरुआत में व्यवस्था के युग में मनुष्य के उपयोग द्वारा किया गया परमेश्वर का कार्य हो, या वह अनुग्रह और राज्य के युगों में दो बार देह-धारण के समय किया गया कार्य हो, ये सभी एक आत्मा के उद्गार और उसकी सच्चाई की अभिव्यक्ति हैं; सार में, बस एक ही परमेश्वर हैं जो बोलते और कार्य करते हैं। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के सिद्धांत बाइबल और 'वचन देह में प्रकट होता है' से उत्पन्न होते हैं।

(2) 'वचन देह में प्रकट होता है' के बारे में

'वचन देह में प्रकट होता है' सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आखिरी दिनों के मसीह, के व्यक्तिगत कथन है, और यही वे सारे सत्य हैं जो कि परमेश्वर ने आखिरी दिनों के अपने न्याय के कार्य के दौरान मनुष्य को शुद्ध करने और बचाने के लिए व्यक्त किये हैं। ये सत्य पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं, परमेश्वर के जीवन और तत्व का प्रकाशन हैं, और परमेश्वर के स्वभाव की, और उनके पास क्या है और वे क्या है, इसकी अभिव्यक्ति हैं। यह एक ही मार्ग है जिससे होकर मनुष्य परमेश्वर को जान सकता है और शुद्ध होकर बचाया जा सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचन मनुष्य के कार्यों और आचरण का सर्वोच्च सिद्धांत हैं, और मनुष्य के जीवन के लिए इससे उच्चतर और कोई सूत्र नहीं हैं।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के ईसाई रोज 'वचन देह में प्रकट होता है' में परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं ठीक उसी तरह जैसे ईसाई धर्म के ईसाई बाइबल पढ़ते हैं। सभी ईसाई परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के मार्गदर्शक और जीवन के समस्त सूत्रों में सर्वोच्च मानते हैं। अनुग्रह के युग में, सभी ईसाइयों ने बाइबल पढ़ी और बाइबल के उपदेश सुने। धीरे-धीरे लोगों के व्यवहार में परिवर्तन हुआ, और उन्होंने कम, और भी कम पाप किये। इसी तरह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को पढने और परमेश्वर के वचनों की सहभागिता के माध्यम से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के ईसाई धीरे-धीरे सच्चाई को समझते हैं और पाप के बंधन से मुक्त हो जाते हैं, वे अब और पाप नहीं करते और परमेश्वर का विरोध नहीं करते, और परमेश्वर के साथ अनुकूल बन जाते हैं। तथ्य यह साबित करते हैं कि केवल परमेश्वर के वचनों को पढ़ने से मनुष्य शुद्ध और परिवर्तित हो सकता है और वास्तविक व्यक्ति की छवि को जी सकता है। ये वे तथ्य हैं जिनसे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में कार्य किया तो परमेश्वर के वचनों को बाइबल में दर्ज किया गया था, जबकि 'वचन देह में प्रकट होता है' में परमेश्वर द्वारा आखिरी दिनों के कार्य के दौरान व्यक्त किए गए वचन हैं। दोनों का स्रोत पवित्र आत्मा से है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों और कार्य ने बाइबल की भविष्यवाणियों को पूर्ण रूप से पूरा किया है, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटे हुए प्रभु यीशु हैं, जैसा कि प्रभु यीशु ने कहा था: "मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा" (यूहन्ना 16:12-13)। और उसी तरह, प्रकाशित वाक्य में भी यह भविष्यवाणी की गई है कि, "जिसके कान हों वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाओं से क्या कहता है।" (प्रकाशितवाक्य 2:7)। "जो सिंहासन पर बैठा था, मैं ने उसके दाहिने हाथ में एक पुस्तक देखी जो भीतर और बाहर लिखी हुई थी, और वह सात मुहर लगाकर बन्द की गई थी. … देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है।" (प्रकाशितवाक्य 5:1, 5)।

आज, हम सभी ने एक तथ्य को देखा है: सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी वचन सत्य हैं, और उन में अधिकार और शक्ति है--वे परमेश्वर की वाणी हैं। कोई भी इस से इनकार नहीं कर सकता या इसको बदल नहीं सकता है। 'वचन देह में प्रकट होता है' इंटरनेट पर सभी देशों और क्षेत्रों के लोगों के द्वारा खोज करने और जांच के लिए मुक्त रूप से उपलब्ध है। कोई भी इससे इनकार करने की हिम्मत नहीं करता कि वे परमेश्वर के वचन हैं, या वे सच्चाई हैं। परमेश्वर के वचन सारी मानव जाति को अग्रसर कर रहे हैं, लोगों ने धीरे धीरे परमेश्वर के वचनों के बीच जागृत होना शुरू कर दिया है, और वे धीरे-धीरे सच्चाई की स्वीकृति तथा सच्चाई के ज्ञान की ओर बढ़ रहे हैं। राज्य का युग वह युग है जब सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पृथ्वी पर शासन करते हैं। परमेश्वर के एक-एक वचन को कार्यान्वित और पूर्ण किया जाएगा। जिस तरह परमेश्वर के सभी विश्वासी आज बाइबल को स्वीकार करते हैं, जो लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, वे निकट भविष्य में मानेंगे कि 'वचन देह में प्रकट होता है' आखिरी दिनों में परमेश्वर के उदगार है। आज, 'वचन देह में प्रकट होता है' सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की मान्यताओं का आधार है, और यह (पुस्तक) निश्चित रूप से अगले युग में सारी मानव जाति के अस्तित्व की नींव बन जाएगी।

(3) परमेश्वर के नाम और परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के बारे में

शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, मनुष्य शैतान के अधिकार क्षेत्र में रहता है और उसका भ्रष्टाचार निरंतर गहरा हो गया है। मनुष्य खुद को बचा नहीं सकता, और उसे परमेश्वर द्वारा उद्धार की ज़रूरत है। भ्रष्ट मानव जाति की ज़रूरतों के अनुसार, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में, अनुग्रह के युग में, और राज्य के युग में तीन चरणों में कार्य किया है। व्यवस्था के युग में, परमेश्वर ने नियमों और आदेशों को पारित करने और मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करने का कार्य किया। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर देह बने और व्यवस्था के युग में उनके किये कार्य के आधार पर, क्रूस पर चढ़ने का कार्य किया और मनुष्य को पाप से छुड़ाया। राज्य के युग में, परमेश्वर एक बार फिर देह बन गए हैं, और अनुग्रह के युग के छुटकारे के कार्य के आधार पर, परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को करते हैं, मनुष्य की शुद्धि और उसके उद्धार के लिए सभी सत्यों को व्यक्त करते हैं, और हमारे लिए शुद्धि और मुक्ति की खोज का एकमात्र तरीका ले आते हैं। सिर्फ अगर हम सच्चाई की वास्तविकता को अपने जीवन के रूप में हासिल करें, और उसके माध्यम से हम ऐसे लोग बन जाएँ जो परमेश्वर की आज्ञा मानते हैं और पूजा करते हैं, तभी हम परमेश्वर के राज्य में ले जाये जाने और परमेश्वर के वादे और आशीषें प्राप्त करने के योग्य होंगे। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण आपस में घनिष्टता से जुड़े हुए हैं, प्रत्येक चरण अपरिहार्य है, प्रत्येक पिछले चरण से अधिक ऊंचा और गहरा जाता है, वे सभी एक ही परमेश्वर के कार्य हैं, और मानव जाति के उद्धार का पूरा कार्य परमेश्वर के कार्य के ये तीन चरण ही हैं।

ये तीन नाम—यहोवा, यीशु, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर—वे अलग-अलग नाम हैं, जिन्हें परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में, अनुग्रह के युग में, और राज्य के युग में ग्रहण किए हैं। परमेश्वर विभिन्न नाम लेते हैं क्योंकि अलग-अलग युग में उनका कार्य बदलता रहता है। परमेश्वर एक नया युग शुरू करने और उस युग के कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक नए नाम का उपयोग करते हैं। परमेश्वर का नाम व्यवस्था के युग में यहोवा था, और अनुग्रह के युग में यीशु। परमेश्वर एक नए नाम—सर्वशक्तिमान परमेश्वर—का प्रयोग करते हैं राज्य के युग में, प्रकाशित वाक्य की भविष्यवाणियों को पूरा करते हुए: "फिलदिलफिया की कलीसिया के दूत को यह लिख : …. जो जय पाए उसे मैं अपने परमेश्‍वर के मन्दिर में एक खंभा बनाऊँगा, और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्‍वर का नाम और अपने परमेश्‍वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम जो मेरे परमेश्‍वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है,और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा।" (प्रकाशितवाक्य 3:7, 12)। "प्रभु परमेश्‍वर, जो है और जो था और जो आनेवाला है,जो सर्वशक्‍तिमान है, यह कहता है, मैं ही अल्फ़ा और ओमेगा हूँ"" (प्रकाशितवाक्य 1:8)। यद्यपि इन तीन युगों में परमेश्वर के नाम और कार्य अलग-अलग हैं, तत्व में केवल एक ही परमेश्वर हैं, और एक ही स्रोत है।

मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर के कार्य में मुख्य रूप से तीन चरण शामिल हैं। उन्होंने प्रत्येक युग में एक अलग नाम का प्रयोग किया है, लेकिन परमेश्वर का तत्व कभी नहीं बदलता है। कार्य के तीनों चरण एक ही परमेश्वर द्वारा किये जाते हैं; इस प्रकार, यहोवा, यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक ही परमेश्वर हैं। यीशु यहोवा के प्रकटन थे, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर लौटे हुए प्रभु यीशु हैं, और इसलिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सच्चे परमेश्वर हैं जिन्होंने स्वर्ग और पृथ्वी और सारी चीजों का सर्जन किया, समस्त चीज़ों को आदेश देते हैं, और सब कुछ पर संप्रभुता रखते हैं, और वे ही अनन्त और एक मात्र सृष्टा हैं।

मनुष्य को बचाने के कार्य के तीन चरणों में, परमेश्वर ने मनुष्य को अपने पूरे स्वभाव से अवगत कराया है, जिससे हम यह देख सकें कि परमेश्वर का स्वभाव न केवल दया और प्रेम है, बल्कि धार्मिकता, महिमा और क्रोध भी है, कि उनका तत्व पवित्रता और धार्मिकता है, और सच्चाई और प्रेम है, और यह कि परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर का अधिकार और उनकी शक्ति किसी भी सर्जित या असर्जित सत्ता के पास नहीं है। हम मानते हैं कि सृष्टि के समय से लेकर दुनिया के अंत तक परमेश्वर ने जो भी वचन कहे हैं वे सभी सत्य हैं। स्वर्ग और पृथ्वी खत्म हो जाएँगे, लेकिन परमेश्वर के वचन कभी ओझल नहीं होंगे, और उनमें से एक-एक को कार्यान्वित किया जाएगा!