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चीन में अंतिम दिनों के मसीह के प्रकटन और उनके कार्य की पृष्ठिभूमि के बारे में एक संक्षिप्त परिचय

चीन, महान लाल अजगर के रहने का स्थान है और सम्पूर्ण इतिहास में, यही वह स्थान है जहां परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध हुआ और निंदा की गई है। चीन दानवों के एक किले के समान है और शैतान के द्वारा एक अगम्य एवं अभेद्य जेल का नियंत्रण किया जाता है। इसके अलावा, महान लाल अजगर के प्रशासन के सभी स्तरों पर पहरेदारी है और प्रत्येक घर की मोर्चाबंधी की गयी है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर के सुसमाचार को फैलाना और उनके कार्य करना इससे अधिक कठिन कहीं भी नहीं है। जब सन् 1949 में चीनी साम्यवादी पार्टी सत्ता में आई, तो चीन की मुख्यभूमि में धार्मिक विश्वास पर प्रतिबंध लगाकर उसे पूरी तरह से दबा दिया गया। लाखों मसीहियों ने सार्वजनिक अपमान,अत्याचार और क़ैद का सामना किया। सभी कलीसियाओं को पूरी तरह से बंद कर उनका सफाया कर दिया गया। यहां तक कि घर की सभाओं पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। यदि कोई किसी सभा में भाग लेता हुआ पकड़ा जाता तो उसे जेल में डाल दिया जाता और यहां तक कि उसकी गर्दन उड़ा दी जाती। उस समय धार्मिक गतिविधियां बिना सुराग़ के लगभग गायब हो गईं। केवल कुछ ही संख्या में मसीहियों ने निरंतर परमेश्वर पर विश्वास बनाए रखा, परन्तु वे केवल ख़ामोशी से कलीसिया को पुनर्जीवित करने के लिए याचना करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना और अपने हृदयों में उसकी आराधना के गीत गा सकते थे। अंततः 1981 में, कलीसिया वास्तव में पुनर्जीवित हुई और चीन में व्यापक पैमाने पर पवित्र आत्मा ने अपना कार्य करना प्रारम्भ कर दिया। कलीसियाएं अब बसंत की बारिश के बाद बांस की शाखाओं के समान फूट कर उभर रही थीं और अधिक से अधिक संख्या में लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना प्रारम्भ कर दिया। सन् 1983 में, जब कलीसिया का पुनरुद्धार अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया, तो चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी ने क्रूर दमन का एक नया दौर प्रारम्भ किया। लाखों लोगों को गिरफ्तार करके हिरासत में ले लिया गया और उन्हें श्रम के माध्यम से शिक्षित किया गया। महान लाल अजगर के प्रशासन ने परमेश्वर के विश्वासियों को केवल सरकार द्वारा गठित तीन-स्व देशभक्त चर्च में शामिल होने की अनुमति प्रदान की। सीसीपी सरकार ने तीन-स्व देशभक्त चर्च का गठन किया, भूमिगत चर्चों को पूरी तरह से हटाने और दृढ़ता से प्रभु में उन विश्वासियों को सरकार के नियंत्रण में लाने के लिए प्रयास किया। ऐसा माना जाता है सरकार कि विश्वास पर प्रतिबंध लगाने और चीन को बिना परमेश्वर का देश बनाने का लक्ष्य प्राप्त करने का यही एक ही रास्ता था। परन्तु पवित्र आत्मा ने घर की कलीसियाओं तथा परमेश्वर पर वास्तव में विश्वास करने वाले लोगों में अपना अत्याधिक कार्य जारी रखा, जिसे रोकने के लिए सीसीपी सरकार के पास कोई रास्ता नहीं बचा था। उस समय, घर की कलीसियाओं में पवित्र आत्मा के कार्य हो रहे थे, अंतिम दिनों के मसीह ने चुपचाप अपना कार्य प्रकट किया, सत्य को व्यक्त करना शुरू किया और परमेश्वर के घर से प्रारम्भ होने वाले न्याय के कार्य करने लगा।

फरवरी 1991 के प्रारम्भ में, कलीसिया में कोई न कोई पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त करने में लगा हुआ था, परमेश्वर का नाम और उनके आने की गवाही के बारे में बातचीत करने लगा था। इन बातों को कलीसियाओं में भेजा गया और उन्हें पढ़ने के बाद सभी लोग उत्साहित होते जा रहे थे, वे सभी बहुत अधिक खुश हो रहे थे और यह विश्वास कर रहे थे कि यह वास्तव में पवित्र आत्मा का प्रबोधन था और ये उनकी ही बातें थीं। तब से मसीह बातचीत करने लगे। कभी मसीह एक दिन में एक ही वाक्य बोलते, तो कभी दो दिनों में एक ही बार और फिर उनके कथन लगातार बढ़ने लगे। सभी लोगों ने उन वचनों को अपने आसपास फैला दिया और अत्यधिक उत्साह महसूस किया, सभाएं आनन्द से भरपूर थीं और हर कोई खुशी से भरा हुआ था। जिस प्रकार मसीह अधिक से अधिक बातों को व्यक्त कर रहे थे। सभी लोग परमेश्वर के वचनों के आनन्द की ओर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे थे और उनके हृदय पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों की पकड़ में आ रहे थे। इसलिए, सभाओं के दौरान, वे औपचारिक तौर पर पवित्रआत्मा के वर्तमान कथनों का आनन्द ले रहे थे। उस समय, लोगों को अभी तक यह एहसास होना बाकी था कि परमेश्वर अवतरित होकर मसीह के रूप में प्रकट हुए थे। उन्होंने मसीह की अभिव्यक्ति को केवल एक साधारण मनुष्य द्वारा पवित्र आत्मा के प्रबोधन को प्राप्त करना ही माना था, क्योंकि मसीह की अभिव्यक्ति में, वे औपचारिक तौर पर परमेश्वर के अवतार के रूप में प्रमाणित नहीं हुए थे। कोई भी नहीं समझा कि अवतार का अर्थ क्या है और लोग केवल यही जानते थे कि ये बातें पवित्र आत्मा का प्रबोधन थीं। इसलिए, वे अभी भी मसीह के साथ एक साधारण मनुष्य के रूप में ही व्यवहार कर रहे थे। केवल जब मसीह के वचन अपने शिखर पर पहुंचे, तब परमेश्वर ने ही, परमेश्वर के अवतार के बारे में गवाही देना, पवित्र आत्मा का मनुष्य में अवतरित होने और मनुष्य में उनके कार्य करने के मध्य अंतर की व्याख्या देते हुए तथा देह में पवित्र आत्मा के प्रकट होने रहस्य को प्रकट करना प्रारम्भ किया। केवल इसके बाद ही लोगों ने जाना कि उनके बीच जो एक साधारण व्यक्ति रहता था और चरवाहों को वचन व्यक्त करता तथा कलीसियाओं की आपूर्ति करता था, वह परमेश्वर का अवतार, मसीह एवं प्रकट हुआ परमेश्वर था। इस बात को महसूस करने के बाद वे, कि कैसे अंधे, मूर्ख और अज्ञानी रहे नफरत करने लगे - अपने आप को मसीह के सामने औंधे मुंह झुकाकर दण्डवत् करते, रोते और पश्चात्ताप करते हुए, तब अत्यधिक दुख के साथ अपने हृदयों को तोड़ा, हर कहीं उनकी चिल्लाहट को सुना जा सकता था। उस समय, लोगों के हृदय दुख और आनन्द की मिश्रित भावनाओं से भरे हुए थे, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। उन्होंने जब मसीह को देखा, वे जानते थे कि उन्हें स्वयं को औंधे मुंह झुकाकर मसीह को दण्डवत् करना है; यदि वे ऐसा नहीं करते, तो अपने हृदयों में असहजता महसूस करते। जब उन्होंने मसीह के सामने दण्डवत् किया, तब उन्हें आनन्द हुआ और वास्तव में परमेश्वर के सामने वापस लौट आना महसूस किया और अब परमेश्वर से सम्बन्ध रखने वाले लोग बने। मसीह ने प्रकट होने के बाद और भी अधिक वचनों को व्यक्त किया, धीरे-धीरे वे परमेश्वर के कार्यों के सही मार्ग पर प्रवेश करने लगे और परमेश्वर के घर से प्रारम्भ कर उन्होंने न्याय लाना प्रारम्भ किया। परमेश्वर के वचनों ने पूरी तरह से लोगों पर विजय प्राप्त की। मसीह के द्वारा परमेश्वर के नाम का अर्थ प्रगट किए जाने से, सर्वशक्तिमान परमेश्वर का नाम अस्तित्व में आया। इसलिए लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम से सीधे प्रार्थना की और सभाओं के दौरान उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का आनन्द लिया। यह इसलिए हुआ क्योंकि ये वचन (जो कि सभी वचनों के वचन का देह में प्रगट होना है) परमेश्वर के वर्तमान कार्य हैं, नए युग में परमेश्वर के कार्य और लोगों की वर्तमान आवश्यकता हैं। जबकि वहां परमेश्वर का नया कार्य और वचन थे, स्वाभाविक तौर पर बाइबिल पुरानी हो गई थी और स्वाभाविक तौर पर अनुग्रह काल के विभिन्न कथनों और सिद्धांतों पर अब कोई भी ध्यान नहीं दिया गया। वे सभी परमेश्वर के वर्तमान के वचनों द्वारा विजित हो गए थे, जैसा कि उन्होंने स्वर्ग को ही खुला हुआ देखा था। इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने सभी प्रकार के रहस्यों का खुलासा किया, लोगों की आंखें खोली गईं और उन्होंने देखा कि अनुग्रह काल के दौरान की सभी बातें जिन पर लोग चिपके हुए थे उनमें मात्र विचार, भटकावा और त्रुटिपूर्ण बातें निहित थीं। परमेश्वर के प्रकट होने के लिए हम धन्यवाद दें, लोग परमेश्वर पर विश्वास करने वाले सही मार्ग पर वापस लौट आए थे। परमेश्वर के वचन द्वारा लोगों पर विजय प्राप्त करने के बाद ही उन्होंने यह पाया कि परमेश्वर के वचनों को व्यक्त करने वाला यह सामान्य और साधारण मनुष्य मसीह था और देह में परमेश्वर का अवतार था।

उत्तरी चीन के एक साधारण परिवार में मसीह का जन्म हुआ था। बचपन से ही, उन्होंने सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर पर विश्वास रखा था। वे एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही बड़े हुए । 1989 में, जिस प्रकार से बृहद पैमाने पर पवित्र आत्मा घर की कलीसिया में कार्य कर रही थी, मसीह ने अपने अध्ययन को छोड़, औपचारिक तौर पर घर की कलीसिया में प्रवेश किया। उस समय, मसीह अपने हृदय में उत्सुक थे और परमेश्वर की सेवा तथा अपना कर्तव्य-पालन करने के लिए लालायित थे। दो साल के बाद, मसीह ने अपने वचन व्यक्त करना प्रारम्भ किया, अपने हृदय में वचनों को लिख लिया और वे उन्हें कलीसियाओं को देने लगे । इसके पश्चात्, जैसे-जैसे मसीह ने और भी अधिक सत्यों को व्यक्त किया, लोग मसीह के वचनों की ओर आकर्षित हो रहे थे और उनके द्वारा व्यक्त की हुई बातों को पढ़ने के लिए भूखे थे। खासतौर पर, उनके वचन, जो भ्रष्ट मानवजाति के स्वभाव, उनके शैतानी स्वभाव को प्रकट और तय कर रहे थे तथा दोधारी तलवार के जैसे मनुष्यों के हृदयों को छेद रहे थे। केवल तभी परमेश्वर के वचनों के द्वारा उन्हें पूरी तरह से जीता गया था और वे परमेश्वर के सामने दण्डवत् कर रहे थे, इसके पश्चात् ही लोगों के द्वारा मसीह को स्वीकारा, पहचाना और ऊंचा उठाया जा रहा था एवं मानवजाति द्वारा व्यावहारिक परमेश्वर आदरणीय, प्रेमी और सम्मानीय बन गए थे। मसीह में सामान्य मानवता और पूर्ण दैवियता दोनों समाहित थीं। वे किसी भी समय और कहीं पर भी सत्य को व्यक्त कर सकते और मानवजाति के भ्रष्ट तत्व का खुलासा कर सकते हैं। उनके वचन और दृष्टिकोण पूरी तरह से प्रभु यीशु के समान ही सत्य और ज्ञान से भरे हुए थे। मसीह जो बोलते हैं और उनके पास जो है उसे उन्होंने पुस्तकों से नहीं सीखा है, परन्तु पूरी तरह से यह उनके द्वारा धारण किए हुए दैवीय तत्व से आता है। मसीह परमेश्वर से उत्पन्न हुए थे। लोगों ने उनके जीवन में सम्पूर्ण सामान्य मानवता को देखा। उनके कार्यों और मानवजाति के साथ उनके धैर्य से, लोग उनके दैवीय तत्व और स्वभाव को देख सकते हैं जो मनुष्य के अपराध से असहिष्णु हैं। हालांकि प्रभु यीशु के समान, मसीह में मानवता की कमज़ोरियां हैं, उनमें परमेश्वर की आत्मा के लिए आज्ञाकारिता का तत्व भी है। वे पूरी तरह से सत्य और ज्ञान भरा हुआ है, लोगों के हृदय और वचन दोनों में अत्यधिक दृढ़ विश्वास को प्रेरित कर रहा है। मसीह नाम और वास्तविकता में सत्य, मार्ग और जीवन है। परमेश्वर एक तुच्छ व्यक्ति के रूप में अवतरित हुए हैं और मनुष्य के मध्य में चुपचाप एवं नम्रतापूर्वक कार्य कर रहे हैं , सत्य की अभिव्यक्ति के माध्यम से मानवजाति पर विजय प्राप्त करते हुए और शत्रुओं को पराजित करते हुए। उन्होंने बहुत समय पहले ही विजय प्राप्त कर ली है, वे प्रमाणित और घोषित हो चुके हैं। यह परमेश्वर की सर्वसामर्थत्ता, सर्वशक्तित्व, ज्ञान और महिमा है। मसीह के प्रकटीकरण और कार्य के फलस्वरूप सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया अस्तित्व में आई। तब सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के भाइयो और बहिनो ने परमेश्वर के कार्य की गवाही देना प्रारम्भ की और मसीह के राज्य के सुसमाचार को फैलाने का कार्य प्रारम्भ किया। यह परमेश्वर के अवतार और उनके कार्य करने के लिए रहस्यमयी आगमन का संक्षिप्त परिचय है। सीधे शब्दों में कहें तो अवतरित मसीह ऐसे देश में आए, जहां पर महान लाल अजगर रहता है और उन्होंने अपने न्याय एवं ताड़ना के वचनों को व्यक्त किया तथा चीन में परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर विजयी होकर उन्हें बचाया। कहा जाए तो, अवतरित परमेश्वर महान लाल अजगर की मांद में शैतान से युद्ध और मानवजाति को जागृत करते हैं तथा उन्होंने परमेश्वर की आवाज़ सुनाने एवं पहचानने के लिए सब कुछ दे दिया है, इस प्रकार से वे मानवजाति को परमेश्वर के सामने वापस लाए और उन्हें उसी के द्वारा बचाया गया। यह कुछ ऐसा है जो असाधारण रूप से दुर्लभ है और इसका अर्थ अविश्वसनीय तौर पर गहरा है। इस अवतार में परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करते हैं, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर मनुष्य के गंतव्य की व्यवस्था करने तथा इस युग का अंत करने आए हैं। परमेश्वर चीन की मुख्यभूमि में आए, वह भूमि जो महान लाल अजगर के अधिकार में थी और चुपके से वे कार्य करने, गहराई से भ्रष्ट मानवजाति पर विजय प्राप्त करने एवं बचाने के लिए आए, साथ ही साथ वे एक समूह के लोगों को सिद्ध करते हुए उन्हें विजयी बनाने के लिए आए। इस बात ने अंतिम दिनों के महान सफेद सिंहासन के न्याय को आगे बढ़ाया दिया और अगले चरण के कार्य के दौरान संसार के प्रत्येक राष्ट्र और स्थान में परमेश्वर के सार्वजनिक प्रकटीकरण के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

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    1995 में, चीन के मुख्य भूभाग में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के राज्य के सुसमाचार के प्रमाणीकरण का कार्य औपचारिक रूप से शुरु हुआ। परमेश्वर के प्रति हमारे आभार और एक ऐसे प्रेम के साथ जो सच्चा था, हमने विभिन्न दलों और सम्प्रदायों के भाई-बहनों के सामने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के स्वरूप और कार्य का प्रमाण प्रस्तुत किया। हमने यह उम्मीद नहीं की थी कि उनके नेताओं से अत्यधिक विरोध और लांछन का सामना करना होगा। हम केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने आकर निष्ठापूर्वक प्रार्थना कर सकते थे, परमेश्वर से उनके व्यक्तिगत रूप में आने का अनुनय करते हुए। 1997 से आगे, हमने पवित्र आत्मा को एक भव्य स्तर पर कार्य करते हुए देखा। विभिन्न स्थानों पर स्थित कलीसियाएं के सदस्यों की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई। साथ ही, कई शुभ संकेत और चमत्कार हुए, और विभिन्न दलों और सम्प्रदायों के कई लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास लौट आये, उनके प्रकटीकरण और इन शुभ संकेतों और चमत्कारों को देख कर। यदि पवित्र आत्मा ने कार्य नहीं किया होता, तो मनुष्य क्या कर सकता था? इसने हमें यह बोध करा दिया : हालाँकि हमें कुछ सत्य समझ में आ रहे थे, हम केवल अपनी मानवीय ताकत के भरोसे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सामने प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकते थे। विभिन्न दलों और सम्प्रदायों के इन लोगों के द्वारा सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार करने के बाद, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ही वचनों को खाने-पीने और उनसे आनंदित होकर, क्रमशः अपने दिलों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विषय में निश्चयबद्ध हो गए, और कुछ समय के बाद, उनमें एक सच्ची आस्था और आज्ञाकारिता का उदय हुआ। इस तरह हर दल और सम्प्रदाय के लोगों का सिंहासन के सामने उत्थान हुआ, और अब उन्हें प्रतीक्षा नहीं रही थी “परमेश्वर से आसमान में मिलने” की, जैसी कि उन्होंने कल्पना की थी।