क्या दूसरों के सौंपे गए कामों के प्रति निष्ठावान होना सही तरीका है?
यिन एन, चीनमेरे दादाजी हमारे गाँव के बहुत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और वे हमेशा दूसरों की मदद करके खुश रहते थे। जब मैं छोटी थी तो वह और मेरी...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
2001 में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। 2020 में, जाँच में मुझे मस्तिष्क रोधगलन और हृदय रोग होने का पता चला। उस समय मुझे इलाज के लिए पैसों की सख्त जरूरत थी और संयोग से मेरे बेटे ने मुझे 5,000 युआन भेजे। मैंने सोचा, “मेरा बेटा ही वह है जिस पर मैं हमेशा निर्भर रह सकती हूँ। जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी, तब भी मुझे अपने बेटे पर ही निर्भर रहना होगा।” 2022 में, मेरे बेटे की शादी हो गई और उसने अपने दम पर एक घर और एक कार दोनों खरीदे। बाद में, मेरी बहू ने मेरे लिए एक हजार युआन से ज्यादा खर्च करके सोने की एक अंगूठी खरीदी। उसने मुझसे यह भी कहा, “हमें आपसे और कुछ नहीं चाहिए, बस भविष्य में जब हमारे बच्चे हों, तो आप उनकी देखभाल में हमारी मदद कर दें तो बहुत अच्छा होगा।” यह देखकर कि मेरा बेटा और बहू मेरे प्रति कितने अच्छे हैं, मैंने सोचा, “यह मेरा इकलौता बेटा है। मुझे अपने बेटे और बहू के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने होंगे, क्योंकि जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी, तो मुझे अपनी देखभाल के लिए उन पर ही निर्भर रहना होगा। मेरी सेहत साल-दर-साल खराब होती जा रही है। जब तक मेरे हाथ-पैर चल रहे हैं, अगर मैं उनके बच्चों की देखभाल में मदद करूँगी, तो जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी, वे मेरी देखभाल करेंगे।” यह सोचकर, मैं मान गई और कहा, “ठीक है। जब तुम्हारे बच्चे होंगे, तो मैं उनकी देखभाल करूँगी।” बाद में, मेरी सुरक्षा के जोखिमों के कारण मुझे कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़ना पड़ा ताकि मैं सीसीपी द्वारा गिरफ्तार किए जाने से बच सकूँ।
अप्रैल 2024 में एक दिन, मुझे पता चला कि मेरी बहू गर्भवती है और मेरे परिवार ने मुझे उसकी देखभाल करने के लिए वापस जाने को कहा। मैं जल्दी से वापस चली गई। लेकिन जैसे ही मैं घर पहुँची, गाँव के अधिकारी मेरे पारिवारिक पंजीकरण की जाँच करने आ गए। यह सोचकर कि सीसीपी के पास मेरी तस्वीर है और वे इतने सालों से मुझे ढूँढ़ रहे हैं, मेरी घर पर रुकने की हिम्मत नहीं हुई और मैं तुरंत वहाँ से निकल गई। कलीसिया लौटने के बाद, मैं बहुत दुखी थी और सोचने लगी, “मेरा बेटा दूसरे शहर में काम करता है और उसके पास मेरी बहू की देखभाल करने का समय नहीं है। अगर उसकी सास होने के नाते मैं उसकी देखभाल नहीं करूँगी, तो उसके परिवार वाले मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मुझे तो यह भी नहीं पता कि मेरी बहू अब कैसी है।” यह सोचने के बाद, मैंने लगातार उनके प्रति ऋणी महसूस किया। मेरे दिल की इस पीड़ा के कारण, मेरा मस्तिष्क रोधगलन फिर से बढ़ गया। मैं और भी चिंतित हो गई, सोचने लगी, “मेरी उम्र बढ़ती जा रही है और मेरी सेहत भी खराब होती जा रही है। क्या भविष्य में मुझे अपने बेटे और बहू की देखभाल की जरूरत नहीं पड़ेगी? जब मेरी बहू को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब मैंने उसकी देखभाल नहीं की। अगर एक दिन मैं बूढ़ी और बीमार होकर उनके पास लौटी, तो क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे और बुढ़ापे में मेरी देखभाल करेंगे?” जब भी मैं यह सब सोचती, मेरी दशा और खराब हो जाती। दिन बीतते गए और जल्द ही बच्चे के जन्म का समय आ गया। लेकिन मैं अब भी अपनी बहू की देखभाल के लिए वापस नहीं जा सकती थी और मैं आहें भरे बिना नहीं रह सकी। उस समय, मैं नए लोगों को सींचने का कर्तव्य निभा रही थी। भले ही मैं हर दिन अपना कर्तव्य कर रही थी, लेकिन मेरा दिल अक्सर इस मामले से बाधित रहता था; मैं न तो काम का जायजा ले पाती थी और न ही नए लोगों की समस्याएँ समय पर सुलझा पाती थी। नतीजतन, कुछ नए लोगों की समस्याएँ समय पर हल नहीं हुईं और वे नकारात्मकता और कमजोरी में जी रहे थे। जब मैंने देखा कि मैंने अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से पूरा नहीं किया है, तो मैंने यह नहीं सोचा कि चीजों को कैसे सुलझाऊँ और कैसे उन्हें बदलूँ। इसके बजाय, मैंने यह तक सोचा, “अगर कोई नतीजा नहीं निकलता है तो न सही। अगर मुझे बरखास्त कर दिया गया, तो शायद मैं अपने बेटे के पास जाकर बच्चे की देखभाल में उसकी मदद कर सकूँगी।” चूँकि मैं एक गलत दशा में जी रही थी, मैं पवित्र आत्मा की अगुआई के बिना अपना कर्तव्य कर रही थी और मैं नकारात्मक और दुखी हो गई। तब मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, मैं लगातार घर जाकर अपनी बहू और पोते की देखभाल करना चाहती हूँ। मुझे डर है कि अगर मैं अभी वापस नहीं गई, तो बुढ़ापे में मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं होगा। मैं जानती हूँ कि इस दशा में जीना गलत है। तू मुझे प्रबुद्ध कर और मेरा मार्गदर्शन कर ताकि मैं सत्य को समझ सकूँ और अपनी समस्याओं को पहचान सकूँ।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील रहते हैं? और माता-पिता क्यों अपने बच्चों से अतिशय स्नेह करते हैं? लोग वास्तव में किस प्रकार की इच्छाएँ पालते हैं? क्या उनकी मंशा उनकी खुद की योजनाओं और स्वार्थी आकांक्षाओं को पूरा करने की नहीं है? क्या उनका इरादा वास्तव में परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने का है? क्या वे परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या उनकी मंशा सृजित प्राणी के कर्तव्यों को अच्छे से पूरा करने की है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। परमेश्वर उजागर करता है कि लोगों के बीच कोई सच्चा प्यार या देखभाल होती ही नहीं। हर किसी के अपने इरादे होते हैं और सब अपना व्यक्तिगत लाभ चाहते हैं। परमेश्वर ने जैसा उजागर किया था, मैं वैसी ही थी। मैं जो अपनी बहू की गर्भावस्था के बारे में लगातार सोच रही थी, वह इसलिए नहीं था कि मैं सच्चे दिल से उसकी देखभाल करना चाहती थी, बल्कि इसके पीछे मेरे अपने इरादे थे। मुझे लगता था कि पिछले कुछ सालों से मेरी सेहत खराब होती जा रही है और बुढ़ापे में मुझे देखभाल के लिए अपने बेटे पर ही निर्भर रहना होगा। इसलिए, जब तक मैं कर सकती थी, मैं उसके बच्चे की देखभाल में मदद करना चाहती थी, ताकि बदले में वह बुढ़ापे में मेरी देखभाल करे। लेकिन जब मैं अपने कर्तव्य और सुरक्षा के खतरों के कारण वापस नहीं जा सकी, तो मेरा दिल पीड़ा से भर गया और मेरे मन में अपना कर्तव्य निभाने का कोई बोझ नहीं रहा। मैंने देखा कि मैं सिर्फ अपनी देह के हितों के बारे में विचार कर रही थी।
बाद में, मैंने अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य खोजा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जब लोग परमेश्वर द्वारा आयोजित माहौल और उसकी संप्रभुता को स्पष्ट रूप से देख, समझ और स्वीकार कर उसके आगे समर्पण नहीं कर पाते, और जब लोग अपने दैनिक जीवन में तरह-तरह की मुश्किलों का सामना करते हैं, या जब ये मुश्किलें सामान्य लोगों के बरदाश्त के बाहर हो जाती हैं, तो अवचेतन रूप में उन्हें हर तरह की चिंता और व्याकुलता होती है, और यहाँ तक कि संताप भी हो जाता है। वे नहीं जानते कि कल कैसा होगा या परसों या उनका भविष्य कैसा होगा और इसलिए वे हर चीज के बारे में संतप्त, व्याकुल और चिंतित महसूस करते हैं। ऐसा कौन-सा संदर्भ है जो इन नकारात्मक भावनाओं को जन्म देता है? होता यह है कि वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास नहीं रखते—यानी वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करने में और इसकी असलियत देख पाने में असमर्थ होते हैं, और उनके दिलों में परमेश्वर के लिए कोई सच्ची आस्था नहीं होती। यहाँ तक कि अपनी आँखों से देखने पर भी परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को नहीं समझ सकते या उस पर यकीन नहीं कर सकते। वे नहीं मानते कि उनके भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता है, वे नहीं मानते कि उनके जीवन परमेश्वर के हाथों में हैं और इसलिए उनके दिलों में परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा हो जाता है और फिर शिकायतें पैदा होती हैं और वे समर्पण नहीं कर पाते” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (3))। परमेश्वर ने जो उजागर किया, वह ठीक मेरी ही दशा थी। जब मैंने पहली बार परमेश्वर को स्वीकार किया था और जब मैं स्वस्थ थी, तो मैं अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित कर पाती थी, लेकिन जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी, मेरी स्वास्थ्य समस्याएँ धीरे-धीरे बढ़ने लगीं। मुझे मस्तिष्क रोधगलन हुआ और मेरे दिल की हालत भी ठीक नहीं थी। अनजाने में, मैं संताप और व्याकुलता में जीने लगी, इस बात को लेकर चिंतित रहती थी कि अगर मेरी सेहत बिगड़ गई और मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं हुआ तो मैं क्या करूँगी। जब मेरे बेटे और बहू को मेरी जरूरत थी, तो मैं उनकी देखभाल के लिए वापस नहीं गई, तो क्या वे तब भी मेरी देखभाल करेंगे जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी और मुझे देखभाल की जरूरत होगी? जब मैंने यह सोचा, तो मैं नकारात्मक भावनाओं में डूबने लगी, अपने कर्तव्य का बोझ खो बैठी और यहाँ तक कि कलीसिया में अपना कर्तव्य करने के लिए भी अनिच्छुक हो गई। मैं बस अपनी बहू की देखभाल करने के लिए वापस जाना चाहती थी। भले ही मैं अक्सर कहती थी कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है, लेकिन जब चीजें मुझ पर आईं, तो मैंने परमेश्वर की संप्रभुता में आस्था खो दी और बस दूसरों पर निर्भर रहना चाहा। मैंने देखा कि मुझे परमेश्वर में आस्था बिल्कुल भी नहीं थी। अब मुड़कर सोचती हूँ तो इन बातों की चिंता करने का क्या मतलब था? परमेश्वर ने पहले ही व्यवस्थित कर दिया था कि मेरा भविष्य का जीवन कैसा होगा, मुझे बस परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और स्वाभाविक रूप से चीजों का अनुभव करने की जरूरत थी।
मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा। परमेश्वर कहता है : “माता-पिता पहले ही अपने बच्चों से इन चीजों का आनंद ले चुके हैं, इन्हें पा चुके हैं, जोकि उनके लिए एक बहुत बड़ी सांत्वना और पुरस्कार है। दरअसल, सिर्फ बच्चों को जन्म देने और उन्हें पाल-पोसकर बड़ा करने के कार्य से ही तुम पहले ही उनसे बहुत-कुछ हासिल कर चुके हो। तुम्हारे बच्चे तुम्हारे प्रति संतानोचित निष्ठा का पालन करेंगे या नहीं, क्या अपनी मृत्यु से पहले तुम उन पर भरोसा कर सकोगे और तुम उनसे क्या प्राप्त कर सकोगे, ये चीजें इस बात पर निर्भर करती हैं कि क्या तुम लोगों का साथ रहना नियत है और यह परमेश्वर द्वारा नियत किए जाने पर निर्भर करता है। दूसरी ओर, तुम्हारे बच्चे कैसे माहौल में जीते हैं, उनके जीवनयापन की दशा कैसी है, क्या वे इस स्थिति में हैं कि तुम्हारी देखभाल कर सकें, क्या उनकी वित्तीय स्थिति ठीक है, क्या उनके पास तुम्हें भौतिक आनंद और सहायता देने के लिए अतिरिक्त धन है, ये भी परमेश्वर द्वारा नियत किए जाने पर निर्भर करते हैं। इसके अलावा, माता-पिता के तौर पर व्यक्तिपरक ढंग से, क्या तुम्हारे भाग्य में है कि तुम अपने बच्चों द्वारा दी जाने वाली भौतिक वस्तुओं, धन या भावनात्मक आराम का आनंद लो, यह भी परमेश्वर द्वारा नियत किए जाने पर निर्भर करता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) ये वे चीजें नहीं हैं कि इंसान इन्हें सुनिश्चित कर सकें। देखो, कुछ बच्चे माता-पिता को पसंद नहीं होते और माता-पिता उनके साथ रहने को तैयार नहीं होते, लेकिन परमेश्वर ने उनका अपने माता-पिता के साथ रहना नियत किया है, इसलिए वे ज्यादा दूर यात्रा नहीं कर सकते या अपने माता-पिता को नहीं छोड़ सकते। वे जीवन भर अपने माता-पिता के साथ ही फँसे रहते हैं—तुम कोशिश करके भी उन्हें दूर नहीं भगा सकते। दूसरी ओर, कुछ बच्चों के माता-पिता उनके साथ रहने के बहुत इच्छुक होते हैं; वे अलग नहीं किए जा सकते, हमेशा एक-दूसरे को याद करते हैं, लेकिन विविध कारणों से वे माता-पिता के शहर या उसी देश में नहीं रह पाते। उनके लिए एक-दूसरे को देखना और आपस में बात करना मुश्किल होता है; भले ही संचार के तरीके बहुत विकसित हो चुके हैं और वीडियो संवाद भी संभव है, फिर भी यह दिन-रात साथ रहने से अलग है। चाहे जिस कारण से उनके बच्चे विदेश जाते हैं, शादी के बाद किसी दूसरी जगह काम करते या जीवनयापन करते हैं, वगैरह, इससे उनके और उनके माता-पिता के बीच एक बहुत बड़ा फासला आ जाता है। एक बार भी मिलना आसान नहीं होता और फोन या वीडियो कॉल करना समय पर निर्भर करता है। समय के अंतर या दूसरी असुविधाओं के कारण वे अपने माता-पिता से अक्सर संवाद नहीं कर पाते। ये बड़े पहलू किससे संबंधित हैं? क्या ये सब परमेश्वर द्वारा नियत किए जाने से संबद्ध नहीं हैं? (हाँ।) यह ऐसी चीज नहीं है जिसका फैसला माता-पिता या बच्चे की व्यक्तिपरक इच्छाओं से किया जा सकता है; सबसे बढ़कर यह परमेश्वर द्वारा नियत किए जाने पर निर्भर करता है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि सभी माता-पिता उम्मीद करते हैं कि जब वे बूढ़े हो जाएँ तो उनके बच्चे उनकी देखभाल करें। लेकिन यह सचमुच ऐसी चीज नहीं है जिसके लिए लोग खुद ही प्रयास कर सकते हैं; बल्कि यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसके विधान से तय होता है। मुझे अपनी जान-पहचान की एक बुजुर्ग बहन की याद आई। जब उसके बच्चों ने अपने परिवार बसा लिए, तो वह कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाती रही और उसके पास अपने नाती-पोतों की देखभाल में मदद करने का समय नहीं था। लेकिन जब वह 60 साल की हो गई, तो उसकी बेटी खुद आगे बढ़कर उसकी देखभाल करने लगी और वह अपनी बेटी के घर से भी अपने कर्तव्यों को निभा पाती थी। एक और उदाहरण में, मैं किसी को जानती थी जो अपने बेटे के परिवार के लिए पैसे कमाने और उसके बच्चों की देखभाल में मदद करने के लिए काम कर रही थी, लेकिन अंत में, उसे उसकी बहू ने घर से निकाल दिया। मुझे 2020 का वह समय भी याद आया जब मैं बीमार थी और मुझे सच में पैसों की जरूरत थी। भले ही मैंने अपने बेटे से कुछ नहीं कहा था, लेकिन उसने मुझे 5,000 युआन दे दिए। क्या यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का नतीजा नहीं था? जब मैं यह समझ गई, तो मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। मैं इतने सालों से परमेश्वर में विश्वास करती थी और परमेश्वर के इतने सारे वचन खाए और पिए थे, लेकिन जैसे ही मैं बीमार पड़ी, मैं बेनकाब हो गई। मैंने परमेश्वर पर भरोसा नहीं किया, मैंने खुद ही रास्ते निकालने की कोशिश की और मैं सहारे के लिए बार-बार अपने बेटे के पास भागना चाहती थी। मैं किस तरह से परमेश्वर की विश्वासी थी? परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि अगर परमेश्वर ने यह पूर्व-निर्धारित किया है कि किसी व्यक्ति के बच्चे बुढ़ापे में उसकी देखभाल नहीं करेंगे, तो चाहे वे अपने बच्चों के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखने की कितनी भी कोशिश करें, यह सब व्यर्थ जाएगा। अगर परमेश्वर ने यह पूर्व-निर्धारित किया है कि मेरे बच्चे मेरी देखभाल करेंगे, तो समय आने पर परमेश्वर मेरे लिए चीजों की व्यवस्था कर देगा। अगर किसी दिन मैं अपनी सेहत के कारण अपना कर्तव्य नहीं निभा पाई, तो मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करके इसका अनुभव करूँगी। मेरा मानना था कि इसमें सीखने के लिए सबक और पाने के लिए सत्य हैं। उसके बाद, मैं अपनी बहू की देखभाल न कर पाने की चिंता से मुक्त हो गई और मैं अपने दिल को शांत करके अपना कर्तव्य निभा सकी।
बाद में, मैंने पढ़ा कि परमेश्वर उजागर करता है कि कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए पारंपरिक संस्कृति का उपयोग करता है और मुझे अपने भीतर के गलत दृष्टिकोणों के भेद की कुछ पहचान हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “पारंपरिक चीनी संस्कृति पर गौर करें तो चीनी लोग खास तौर से संतानोचित निष्ठा पर जोर देते हैं। प्राचीन काल से वर्तमान तक, लोगों की मानवता के हिस्से और किसी के अच्छे-बुरे होने की माप के मानक के रूप में इस पर हमेशा चर्चा होती रही है। बेशक, समाज में, एक सामान्य प्रथा और लोकमत भी है कि अगर बच्चे संतानोचित निष्ठा नहीं रखते, तो उनके माता-पिता भी शर्मिंदा महसूस करेंगे, और बच्चे अपने नाम पर यह कलंक सह नहीं पाएँगे। विविध कारकों के प्रभाव में माता-पिता भी इस पारंपरिक सोच से गहराई से विषाक्त हो जाते हैं, और बिना सोचे-जाने माँग करते हैं कि उनके बच्चे संतानोचित निष्ठा रखें। बच्चों के पालन-पोषण का क्या तुक है? यह तुम्हारे अपने प्रयोजनों के लिए नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदारी और दायित्व है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। एक पहलू यह है कि बच्चों का पालन-पोषण करना मानवीय सहज ज्ञान से संबंधित है, जबकि दूसरा यह है कि यह इंसानी जिम्मेदारी का अंश है। तुम सहज ज्ञान और जिम्मेदारी के कारण बच्चों को जन्म देते हो, इस खातिर नहीं कि तुम अपने बुढ़ापे की तैयारी करो और बुढ़ापे में तुम्हारी देखभाल हो। क्या यह दृष्टिकोण सही नहीं है? (बिल्कुल।) क्या जिन लोगों के बच्चे नहीं हैं, वे बूढ़े होने से बच सकते हैं? क्या बूढ़े होने का अर्थ अनिवार्य रूप से दुखी होना है? जरूरी नहीं है, है ना? जिन लोगों के बच्चे नहीं हैं वे भी बुढ़ापे तक जी सकते हैं, कुछ तो स्वस्थ भी रहते हैं, अपने बुढ़ापे का आनंद लेते हैं, और शांति से कब्र में चले जाते हैं। क्या बच्चों वाले लोग निश्चित रूप से अपने बुढ़ापे में खुश और सेहतमंद रहने का आनंद लेते हैं? (जरूरी नहीं।) इसलिए, उम्र-दराज माता-पिता की सेहत, खुशी और जीवन स्थिति, साथ ही उनके भौतिक जीवन की गुणवत्ता का उनके बच्चों के उनके प्रति संतानोचित निष्ठा रखने से बहुत कम ही लेना-देना होता है, और दोनों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता। तुम्हारी जीने की स्थिति, जीवन की गुणवत्ता, और बुढ़ापे में शारीरिक दशा का संबंध उससे होता है, जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिए नियत किया है, और जो जीने का माहौल तैयार किया है, इनका तुम्हारे बच्चों के संतानोचित निष्ठा रखने से कोई सीधा संबंध नहीं होता। तुम्हारे बुढ़ापे में तुम्हारी जीने की हालत की जिम्मेदारी उठाने को तुम्हारे बच्चे बाध्य नहीं हैं” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि बच्चों की परवरिश करने का उद्देश्य यह नहीं है कि वे बुढ़ापे में तुम्हारी देखभाल करें और यह कि हर किसी का अपना मिशन और अपनी जिम्मेदारियाँ होती हैं। लेकिन शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मैंने उसके द्वारा मुझमें डाले गए विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार कर लिया, जैसे “बुढ़ापे का सहारा बनने के लिए कोई होना चाहिए,” “बुढ़ापे में देखभाल के लिए कोई होना चाहिए,” और “बुढ़ापे में सहारे के लिए बच्चों की परवरिश करो।” मेरा मानना था कि अगर किसी व्यक्ति के पास बुढ़ापे में देखभाल करने के लिए बच्चे न हों, तो उसका गुजारा नहीं हो सकता। जब मैं बूढ़ी हो गई और मुझे तरह-तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ होने लगीं, तो मैं बस अपने बेटे और बहू के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहती थी ताकि वे भविष्य में मेरी देखभाल करें। जब मैं खतरों के कारण अपनी गर्भवती बहू की देखभाल के लिए वापस नहीं जा सकी, तो मेरा कर्तव्य निभाने में मन ही नहीं लगा। इसका मतलब यह हुआ कि नए लोगों की समस्याएँ कभी हल नहीं हुईं और उनके जीवन प्रवेश में देरी हुई। लेकिन मैंने फिर भी पश्चात्ताप नहीं किया और यहाँ तक कि उम्मीद करने लगी कि मेरे कर्तव्य में बदलाव हो जाएगा ताकि मैं घर जाकर अपनी बहू की देखभाल कर सकूँ। मैंने सोचा कि मैंने कई सालों तक परमेश्वर में विश्वास किया है और परमेश्वर के सत्य के इतने प्रावधान का आनंद लिया है। मैं न केवल परमेश्वर का कर्ज चुकाने के लिए अपना कर्तव्य ठीक से निभाने में विफल रही, बल्कि मैं अपने बेटे और बहू को खुश करने के लिए अपना कर्तव्य छोड़ने तक को तैयार थी। जब चीजें मुझ पर आईं, तो मैंने सिर्फ अपने बचाव के रास्ते के बारे में सोचा। मैंने अपने कर्तव्य के प्रति जरा भी निष्ठा नहीं दिखाई। मुझमें किस तरह से कोई मानवता थी? मुझे एहसास हुआ कि “बुढ़ापे का सहारा बनने के लिए कोई होना चाहिए,” “बुढ़ापे में देखभाल के लिए कोई होना चाहिए,” और “बुढ़ापे में सहारे के लिए बच्चों की परवरिश करो” जैसे दृष्टिकोण लोगों को नियंत्रित करने के लिए शैतान की चालें हैं। इन दृष्टिकोणों के अनुसार जीने के कारण मैं परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास नहीं कर पाई, मैंने परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह किया, उसके प्रति समर्पण नहीं किया और मुझे अपने कर्तव्य के प्रति कोई दायित्व बोध नहीं रहा। मैंने अपना कर्तव्य निभाने का अवसर लगभग खो ही दिया था। अगर मैं इन दृष्टिकोणों को मानती रहती, तो मैं उद्धार का मौका खो देती और सचमुच खुद को बरबाद कर देती। फिर मैंने हाल के वर्षों में अपनी बीमारी के अनुभवों के बारे में सोचा। 2018 में, सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस के कारण नसों पर दबाव पड़ने से मैं अपनी बाहें सीधी नहीं कर पाती थी। जिस बहन के घर में मैं रहती थी, उसने मेरे लिए कुछ दवा खरीदी और बाद में, मैं आखिरकार अपनी बाहें फिर से सीधी कर पाई। इसके अलावा, 2020 में मुझे मस्तिष्क रोधगलन हुआ और डॉक्टरों ने कहा कि मेरी बीमारी का इलाज मुश्किल है। अप्रत्याशित रूप से, एक बुजुर्ग बहन ने मुझे मस्तिष्क रोधगलन के लिए दवा के चार डिब्बे दिए। दवा लेने के बाद, मेरी सेहत धीरे-धीरे सुधरने लगी। हाल के वर्षों में इनमें से कोई भी बीमारी मेरे बेटे पर निर्भर रहने से ठीक नहीं हुई : यह परमेश्वर ही था जिसने बार-बार लोगों, घटनाओं और चीजों की व्यवस्था की ताकि मेरी बीमारियाँ ठीक हो सकें। मैं आज परमेश्वर की सुरक्षा के कारण ही जीवित हूँ! मुझे “बुढ़ापे का सहारा बनने के लिए कोई होना चाहिए” और “बुढ़ापे में निर्भर रहने के लिए कोई होना चाहिए” जैसी शैतान की भ्रांतियों को छोड़ना था और खुद को परमेश्वर को सौंपना था और अपने बचे हुए समय का उपयोग उसे संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य ठीक से निभाने में करना था।
इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा। परमेश्वर कहता है : “माता-पिता को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि उनके बच्चे संतानोचित निष्ठा रखें, बुढ़ापे में उनकी देखभाल करें, और अपने माता-पिता की उम्र-दराज जिंदगी का बोझ उठाएँ—इसकी कोई जरूरत नहीं है। एक ओर यह वह रवैया है जो माता-पिता को अपने बच्चों के प्रति रखना चाहिए, और दूसरी ओर, यह वह आत्म-सम्मान है जो माता-पिता में होना चाहिए। बेशक, एक और भी महत्वपूर्ण पहलू है : यह वह सिद्धांत है जिसका सृजित प्राणियों के रूप में माता-पिता को अपने बच्चों से पेश आते समय पालन करना चाहिए। अगर तुम्हारे बच्चे चौकस हों, संतानोचित निष्ठा रखते हों, और तुम्हारी देखभाल करने को तैयार हों, तो तुम्हें उन्हें मना करने की जरूरत नहीं है; अगर वे अनिच्छुक हों, तो तुम्हें दिन भर रोते-सुबकते नहीं रहना चाहिए, दिल से परेशान और असंतुष्ट महसूस नहीं करना चाहिए, या अपने बच्चों के खिलाफ दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए। तुम्हें अपने जीवन और जीवित रहने की जिम्मेदारी और बोझ खुद उठाना चाहिए, और इसे दूसरों, खास तौर से अपने बच्चों पर नहीं डालना चाहिए। तुम्हें अपने बच्चों के साथ या सहायता के बगैर खुद सक्रियता और सही ढंग से अपने जीवन का सामना करना चाहिए, और अपने बच्चों से दूर होने पर भी तुम्हें जीवन में आई तमाम चीजों का अपने आप सामना करना चाहिए। बेशक, अगर तुम्हें अपने बच्चों से अनिवार्य मदद की जरूरत हो, तो तुम उनसे इसका आग्रह कर सकते हो, लेकिन यह इस विचार पर आधारित नहीं होना चाहिए कि तुम्हारे बच्चों को तुम्हारे प्रति संतानोचित निष्ठा रखनी चाहिए या तुम्हें उनके भरोसे रहना चाहिए। इसके बजाय, दोनों को अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने के नजरिये से एक-दूसरे के लिए काम सँभालने चाहिए, ताकि माता-पिता और बच्चे के बीच के रिश्ते को तर्कपूर्ण ढंग से सँभाल सकें। बेशक, अगर दोनों पक्ष तर्कपूर्ण हों, एक-दूसरे को स्थान दें, एक-दूसरे का सम्मान करें, तो अंत में वे यकीनन बेहतर ढंग से सद्भावना के साथ मिल-जुलकर रह सकेंगे, इस पारिवारिक स्नेह को सँजो सकेंगे, एक-दूसरे के लिए अपनी परवाह, चिंता और प्रेम को सँजो सकेंगे। बेशक, आपसी सम्मान और समझ के आधार पर ये काम करना ज्यादा मानवीय और उचित है” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (19))। परमेश्वर कहता है : “माता-पिता को यह माँग नहीं करनी चाहिए कि उनके बच्चे संतानोचित निष्ठा रखें, बुढ़ापे में उनकी देखभाल करें, और अपने माता-पिता की उम्र-दराज जिंदगी का बोझ उठाएँ—इसकी कोई जरूरत नहीं है। एक ओर यह वह रवैया है जो माता-पिता को अपने बच्चों के प्रति रखना चाहिए, और दूसरी ओर, यह वह आत्म-सम्मान है जो माता-पिता में होना चाहिए।” इन वचनों ने सचमुच मेरे दिल को छू लिया। परमेश्वर ने हमें स्पष्ट रूप से बताया है कि माता-पिता और बच्चों के बीच का रिश्ता आपसी देखभाल और समझ पर आधारित होना चाहिए और इसमें कोई सौदेबाजी शामिल नहीं होनी चाहिए। हर किसी का अपना मिशन होता है और माता-पिता के रूप में, हमें अपने बच्चों से हमारा भरण-पोषण और देखभाल करने के लिए नहीं कहना चाहिए। बुजुर्गों को भी गरिमा के साथ जीना चाहिए और हमेशा अपने बच्चों की देखभाल पर निर्भर रहने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। भले ही मैंने अपने बेटे की परवरिश की, लेकिन अब वह बड़ा और आत्मनिर्भर हो गया है और अब उसका मुझसे बहुत अधिक लेना-देना नहीं है। हर किसी का जीवन में अपना रास्ता होता है और उसे जीवन में होने वाली घटनाओं का सामना स्वतंत्र रूप से करना पड़ता है। लेकिन मैं हमेशा चाहती थी कि जब मैं बूढ़ी हो जाऊँ तो मेरा बेटा मेरी देखभाल करे और मैंने उस जीवन को अकेले अनुभव करने की हिम्मत नहीं की जिसकी व्यवस्था परमेश्वर ने मेरे लिए की है। मैं कैसे किसी गरिमा के साथ जी रही थी? परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, मेरा परिप्रेक्ष्य कुछ हद तक बदल गया और मैंने बहुत अधिक मुक्त महसूस किया।
एक दिन, मुझे घर से एक पत्र मिला। उसमें लिखा था कि मेरी बहू ने बच्चे को जन्म दे दिया है और मुझसे उसकी देखभाल के लिए वापस आने को कहा गया था। मेरा मन थोड़ा विचलित हो गया और सोचने लगी, “अभी मैं अपने कर्तव्य में इतनी व्यस्त हूँ। अगर मैं सच में घर चली गई, तो मुझे नहीं पता कि मुझे यहाँ वापस आने में कितना समय लगेगा। इससे कलीसिया के काम में देरी होगी। इसके अलावा, सीसीपी लगातार मुझे गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही है। वापस जाने में जोखिम होने की संभावना है। लेकिन अगर मैं वापस नहीं गई और अगर मेरे बेटे और बहू ने मुझसे रिश्ता तोड़ लिया, तो क्या होगा? मुझे बुढ़ापे में अपनी देखभाल के लिए उन पर ही निर्भर रहना है। अगर कोई और चारा नहीं रहा, तो मुझे वापस जाना ही पड़ेगा।” जब मैंने यह सोचा, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं अब भी बुढ़ापे में अपने बेटे पर निर्भर रहना चाहती थी और मैंने अपनी समस्या के संबंध में सत्य को खोजा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के जन्म से लेकर वर्तमान तक के दशकों के दौरान केवल उसके लिए कीमत ही नहीं चुकाता। परमेश्वर के अनुसार, तुम अनगिनत बार इस दुनिया में आए हो, और अनगिनत बार तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है। इसका प्रभारी कौन है? परमेश्वर इसका प्रभारी है। तुम्हारे पास इन चीजों को जानने का कोई तरीका नहीं है। ... एक व्यक्ति के लिए परमेश्वर कितना परिश्रम करता है! कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं साठ साल का हूँ। साठ साल से परमेश्वर मुझ पर निगाह रख रहा है, मेरी रक्षा और मेरा मार्गदर्शन कर रहा है। बूढ़ा होने पर अगर मैं कोई कर्तव्य नहीं निभा पाया और कुछ करने लायक नहीं रहा—क्या परमेश्वर तब भी मेरी देखभाल करेगा?’ क्या यह कहना मूर्खता नहीं है? ऐसा नहीं है कि परमेश्वर बस एक जीवन-काल के लिए एक व्यक्ति पर नजर रखता और उसकी रक्षा करता और उसके भाग्य पर उसकी संप्रभुता होती है। अगर यह केवल एक जीवन-काल की, एक ही जीवन की बात होती, तो यह प्रदर्शित करना संभव नहीं होता कि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और सभी चीजों पर उसकी संप्रभुता है। परमेश्वर किसी व्यक्ति के लिए जो परिश्रम करता है और जो कीमत चुकाता है, वह केवल इस बात की व्यवस्था करने के लिए नहीं है कि वह इस जीवन में क्या करेगा, बल्कि उसके अनगिनत जीवनकाल की व्यवस्था करने के लिए है। परमेश्वर इस दुनिया में पुनर्जन्म लेने वाली प्रत्येक आत्मा के लिए पूरी जिम्मेदारी लेता है। वह अपने जीवन का मूल्य चुकाते हुए, हर व्यक्ति का मार्गदर्शन करते हुए और उसके प्रत्येक जीवन को व्यवस्थित करते हुए बहुत ध्यान से काम करता है। मनुष्य की खातिर परमेश्वर इतना परिश्रम करता है और इतनी कीमत चुकाता है, और वह मनुष्य को ये सभी सत्य और यह जीवन प्रदान करता है। अगर लोग इन अंतिम दिनों में सृजित प्राणियों का कर्तव्य नहीं निभाते और वे सृष्टिकर्ता के पास नहीं लौटते—वे चाहे कितने ही जन्मों और पीढ़ियों से गुजरे हों, अगर अंत में, वे अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाते और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने में विफल रहते हैं—तब क्या परमेश्वर के प्रति उनका कर्ज बहुत बड़ा नहीं हो जाएगा? क्या वे परमेश्वर की चुकाई सभी कीमतों का लाभ पाने के लिए अयोग्य नहीं हो जाएँगे? उनका जमीर इतना कमजोर होगा कि वे इंसान कहलाने लायक नहीं रहेंगे, क्योंकि परमेश्वर के प्रति उनका कर्ज बहुत बड़ा हो जाएगा। ... परमेश्वर मनुष्य पर जो अनुग्रह, प्रेम और दया दिखाता है वह केवल दृष्टिकोण भर नहीं है—वे वास्तव में तथ्य भी हैं। वह तथ्य क्या है? वह यह है कि परमेश्वर अपने वचन तुम्हारे अंदर डालता है, तुम्हें प्रबुद्ध करता है, ताकि तुम देख सको कि उसमें क्या मनोहर है, और यह दुनिया क्या है, ताकि तुम्हारा हृदय रोशनी से भर जाए, तुम उसके वचन और सत्य समझ सको। इस तरह, अनजाने ही, तुम सत्य प्राप्त कर लेते हो। परमेश्वर बहुत वास्तविक तरीके से तुम पर बहुत सारा काम करके तुम्हें सत्य प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। जब तुम सत्य प्राप्त कर लेते हो, जब तुम सबसे कीमती चीज, शाश्वत जीवन प्राप्त कर लेते हो, तब परमेश्वर के इरादे संतुष्ट होते हैं। जब परमेश्वर देखता है कि लोग सत्य का अनुसरण करते हैं और उसके साथ सहयोग करने के लिए तैयार हैं, तो वह खुश और संतुष्ट होता है। तब उसका एक दृष्टिकोण होता है, और जब उसका वह दृष्टिकोण होता है, तो वह काम करता है, और मनुष्य का अनुमोदन कर उसे आशीष देता है। वह कहता है, ‘मैं तुम्हें इनाम दूँगा, वह आशीष दूँगा जिसके तुम पात्र हो।’ और तब तुम सत्य और जीवन प्राप्त कर लेते हो। जब तुम्हें सृष्टिकर्ता का ज्ञान होता है और उससे प्रशंसा प्राप्त होती है, तब भी क्या तुम अपने दिल में खालीपन महसूस करोगे? तुम नहीं करोगे; तुम संतुष्ट होगे और आनंद की भावना महसूस करोगे। क्या किसी के जीवन का मूल्य होने का यही अर्थ नहीं है? यह सबसे मूल्यवान और सार्थक जीवन है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए कीमत चुकाना बहुत महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं बहुत प्रभावित हुई। परमेश्वर पूरी मानवजाति के भाग्य पर संप्रभुता और नियंत्रण रखता है और केवल वही मेरा सहारा है। मैंने सोचा कि कैसे परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने के इन सालों में परमेश्वर हमेशा मेरी अगुआई और सुरक्षा करता रहा है और मैंने परमेश्वर के बहुत से कर्मों को देखा है। जब परमेश्वर मेरे साथ है, तो मुझे चिंता करने की क्या जरूरत है? अगर परमेश्वर के कार्य के इस अहम पल में, मैं अपने परिवार और देह के लिए जीती रही, अपने बेटे के साथ अपने रिश्ते को बनाए रखने के लिए अपना कर्तव्य नहीं निभा पाई और अंत में उद्धार का मौका खो बैठी, तो यह सचमुच बहुत बड़ी मूर्खता होगी! मैं बस अपने बाकी जीवन में अपना कर्तव्य पूरा करने में अपना सब कुछ लगा देना चाहती हूँ। भले ही बुढ़ापे में मेरा बेटा मेरी देखभाल न करे, मुझे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। मैं बस परमेश्वर पर निर्भर रहकर इसका अनुभव करूँगी। अब मैं हर दिन अपने कर्तव्य निभाने में व्यस्त रहती हूँ और काफी सुकून और मुक्त महसूस करती हूँ।
इस अनुभव के बाद, मेरा सबसे गहरा एहसास यह है कि परमेश्वर ही मेरा सच्चा सहारा है। केवल परमेश्वर ही सत्य व्यक्त कर सकता है, हमें जीवन का सही मार्ग दिखा सकता है और एक सार्थक जीवन जीने में हमारी अगुआई कर सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद!
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