एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ होने को लेकर चिंतन

30 दिसम्बर, 2025

झाओयांग, चीन

जब मैं किशोरावस्था में थी तो मुझे चियुंग याओ के उपन्यासों पर आधारित टीवी नाटक देखना बहुत पसंद था जिनकी नायिकाएँ सदाचारी और दयालु होती थीं, जीवन चाहे कितना भी कष्टदायक या कठिन क्यों न हो, वे अपने पति और परिवार के साथ खड़ी रहती थीं, उनकी सेवा के लिए बिना थके और बिना किसी शिकायत के काम करती थीं। दर्शक उन्हें बहुत प्यार और प्रशंसा देते थे और उन्होंने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी थी। इसके अलावा अपने परिवार से मिली शिक्षा और संस्कारों ने मुझे धीरे-धीरे यह एहसास दिलाया कि एक स्त्री को अपना जीवन अपने पति और बच्चों के लिए जीना चाहिए और पूरे परिवार की अच्छी देखभाल करनी चाहिए। यही एक अच्छी स्त्री होने की सार्थकता है। शादी के बाद हर दिन काम पर जाने के अलावा मैं हमेशा अपने परिवार के लिए खाना बनाने, कपड़े धोने और सफाई करने में व्यस्त रहती थी, अपने पति और बच्चे की रोजमर्रा की जरूरतों का पूरा ध्यान रखती थी। दिन-ब-दिन, साल-दर-साल, समय चाहे कितना भी मुश्किल या थका देने वाला क्यों न रहा हो, मैंने कभी शिकायत नहीं की। मेरी सास और पति मुझसे बहुत खुश थे, रिश्तेदार और पड़ोसी सभी मेरी एक नेक और अच्छी पत्नी के रूप में तारीफ करते थे। भले ही मुझे अपने परिवार और आस-पास के लोगों से तारीफें मिलती थीं, लेकिन मैं अंदर से बहुत खुश नहीं थी। मैं अक्सर अपने परिवार की उलझनों के कारण थकी हुई और एक खालीपन महसूस करती थी और कभी-कभी खुद से पूछती थी, “क्या जिंदगी सचमुच ऐसे ही जीनी चाहिए?”

2008 में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार लिया और कुछ ही समय में मैंने कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया। तीन साल बाद मुझे कलीसिया का अगुआ चुन लिया गया, हर दिन मुझे जल्दी निकलना पड़ता था और मैं देर से घर पहुँचती थी, क्योंकि मैं कलीसिया के कार्य में व्यस्त रहती थी। कभी-कभी जब मैं देर से घर पहुँचती तो मेरा पति मुझसे नाखुश रहता और मेरी सास मुझे अनदेखा कर देती। उनके मन में मेरी एक अच्छी पत्नी और बहू की जो छवि थी, उसे बनाए रखने के लिए कलीसिया का कार्य खत्म करने के बाद मैं घर जाकर जल्दी से घर का काम-काज निपटाती और दूसरे कामों में अपनी सास की मदद करती। मैं हर दिन व्यस्त रहती, मेरे पास परमेश्वर के वचनों को पढ़ने का समय नहीं होता था और कभी-कभी तो मैं सभाओं के दौरान ही सो जाती थी। अपने मन में मैं जानती थी कि एक सृजित प्राणी होने के नाते मुझे अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन मुझे यह भी लगता था कि एक स्त्री को एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ होना चाहिए और परिवार की अच्छी देखभाल करनी चाहिए, अगर मैं अपने परिवार की देखभाल नहीं कर पाई तो मैं एक अच्छी स्त्री नहीं रह पाऊँगी, लोग मेरी आलोचना करेंगे और मेरा जमीर मुझे चैन से नहीं बैठने देगा। नतीजतन, मेरा मन हमेशा पारिवारिक मामलों में बँधा और उलझा रहता था, मैं अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित नहीं हो पाती थी। 2012 के राष्ट्रीय दिवस की छुट्टियों के दौरान मेरे बच्चे की सात दिन की छुट्टी थी, लेकिन ठीक उसी समय उच्च अगुआओं ने हमें एक सभा में आमंत्रित कर लिया और कलीसिया का कार्य भी कार्यान्वित करना था, इसलिए मैं चार दिन तक घर नहीं जा पाई। भले ही मैं तन से कलीसिया में थी, लेकिन मेरा मन परिवार के साथ था। मुझे चिंता लगी रही, “क्या मेरी सास मेरी अनुपस्थिति में मेरे बच्चे की अच्छे से देखभाल कर पाएगी? कहीं मेरा पति नाराज तो नहीं हो जाएगा?” मेरा मन हमेशा अशांत रहता और इसका असर मेरे कर्तव्यों के निर्वहन पर पड़ रहा था। घर जाते समय मुझे बहुत चिंता हो रही थी और मुझे डर था कि कहीं मेरा पति मुझ पर गुस्सा न करे। जब मैं घर पहुँची तो मेरी सास और पति ने चाहे मुझे कितना भी डाँटा, मैं शांत रही और चुपचाप कार्य करती रही, क्योंकि मुझे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी न कर पाने के कारण ग्लानि हो रही थी। बाद में मेरे पति और सास ने टीवी पर सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम करने के लिए सीसीपी द्वारा फैलाई गई बेबुनियाद अफवाहें देखीं और मेरी आस्था के प्रति उनका विरोध बढ़ता गया।

एक रात जब मैं घर पहुँची ही थी, मेरा पति मुझ पर गुस्सा हो गया, उसने मेरे स्कूटर को नदी में फेंकने की धमकी दी, वह मेरी परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें भी फेंकना चाहता था। मैंने उससे परमेश्वर के वचनों की पुस्तकें छीनने की बहुत कोशिश की और इस कोशिश में उसने मुझे कई थप्पड़ मारे और मेरी टाँगों पर पोछे के हैंडल से मारा। मेरी सास ने कुछ न देखने का नाटक किया और अपने कमरे में चली गई। मेरा दिल बुरी तरह टूट गया। मेरी आस्था की वजह से वे मेरे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे थे। बाद में मेरा पति फूट-फूट कर रोने लगा, उसने मुझसे माफी माँगी और मैंने उसे माफ कर दिया। मुझे लगा कि उसने मेरे साथ ऐसा व्यवहार सिर्फ इसलिए किया क्योंकि मैं परिवार की देखभाल अच्छे से नहीं कर रही थी। उसके बाद मैं परिवार की देखरेख करते हुए सावधानी से अपना कर्तव्य निभाने लगी। चूँकि मैं अपने कर्तव्य में मन नहीं लगा पाई थी, मेरे कर्तव्य के नतीजे अच्छे नहीं मिले और मैं वाकई थक चुकी थी। मैंने ऐसे भाई-बहनों को देखा जो पारिवारिक उलझनों से मुक्त होकर पूरे मन से कलीसिया के कार्य में लगे हुए थे, मुझे बहुत ईर्ष्या हुई। मुझे वाकई उम्मीद थी कि एक दिन मैं भी उनकी तरह अपना कर्तव्य पूरी आजादी से निभा सकूँगी। वह कितना अद्भुत होगा! उस दौरान मैं अक्सर परमेश्वर के वचनों का भजन सुनती थी जिसका शीर्षक था, “क्या तुम अपने दिल का प्रेम दोगे परमेश्वर को?” जब भी मैं यह भजन सुनती, मेरी आँखों में आँसू आ जाते। भले ही मैं परमेश्वर में विश्वास रखती थी और अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन मेरी वफादारी मेरे परिवार, पति और बच्चे के साथ थी। मैंने अपना दिल परमेश्वर को नहीं दिया था और मैं अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर रही थी। जब मैंने इन बातों पर विचार किया तो मुझे बेचैनी और ग्लानि हुई। मुझे लगा जैसे मैं किसी अदृश्य रस्सी से बंधी हुई हूँ, अपने कर्तव्य और परिवार के बीच फँसी हुई हूँ और मेरा दिल बहुत पीड़ित था। इसलिए मैं अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करती कि वह मेरे लिए कोई मार्ग खोले।

बाद में मैं अपना कर्तव्य निभाने कहीं और चली गई। उस समय मैंने अपना कर्तव्य ठीक से निभाने का निश्चय किया, लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि मैं अपने पति और बच्चे को अकेला नहीं छोड़ सकती और मैं घर लौट गई। मेरा दिल अपने कर्तव्य में नहीं लग रहा था और मेरे कर्तव्य के नतीजे भी नहीं मिल रहे थे, इसलिए मुझे बरखास्त कर दिया गया। बरखास्त किए जाने के बाद मैं बहुत निराश महसूस कर रही थी। मुझे लगा कि मैं सत्य का अनुसरण करने वाली इंसान नहीं हूँ और मैंने आगे बढ़ने का अपना संकल्प खो दिया। कुछ महीनों बाद अगुआ ने मेरे साथ संगति की और मेरे लिए पाठ-आधारित कर्तव्य की व्यवस्था की। मुझे घबराहट भी हुई और खुशी भी, मैं सोच रही थी, “यह कर्तव्य परमेश्वर की ओर से एक तरक्की है। लेकिन अगर यह कर्तव्य ज्यादा व्यस्तता की माँग करता है तो मैं बार-बार घर नहीं जा पाऊँगी। मेरे पति और बच्चे का क्या होगा? मेरी सास की टाँगों में भी दर्द रहता है और अगर मैं घर पर अधिक समय नहीं रहूँगी तो उनकी देखभाल कौन करेगा?” जब मैंने इन बातों पर विचार किया तो इस कर्तव्य को स्वीकार करने का मेरा साहस जवाब दे गया। मुझे पता था कि यह कर्तव्य मिलना मुश्किल है और अगर मैं इसे खो दूँगी तो शायद मुझे इसे दोबारा करने का मौका कभी न मिले। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, पहले, मैं अपने परिवार की देखभाल के लिए बार-बार अपने कर्तव्य को टालती रही और इससे तुम दुखी और निराश हुए। अपना कर्तव्य निभाने के इस अवसर के साथ मैं तुम्हारी अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करना चाहती हूँ, लेकिन मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और मुझे डर है कि मैं इस अनुभव में कामयाब नहीं हो पाऊँगी। हे परमेश्वर, मेरा मार्गदर्शन कर मुझे आस्था और शक्ति प्रदान करो।” इसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों का भजन “परमेश्वर को पसंद हैं लोग जिनमें संकल्प है” सुना : “व्यावहारिक परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, हममें यह संकल्प होना चाहिए : चाहे कितने ही बड़े परिवेश या किसी भी तरह की मुश्किल का सामना कर रहे हों, और चाहे हम कितने ही कमजोर या नकारात्मक हो जाएँ, हम अपने स्वभावगत बदलाव में या परमेश्वर के कहे वचनों में आस्था नहीं छोड़ेंगे। परमेश्वर ने लोगों से एक वादा किया है, और इसके लिए यह जरूरी है कि उनमें संकल्प, आस्था, और इसे धारण करने की दृढ़ता हो। परमेश्वर को कायर लोग पसंद नहीं हैं; वह दृढ़ निश्चयी लोगों को पसंद करता है। भले ही तुमने बहुत-सारी भ्रष्टता दिखाई है, भले ही तुमने बहुत-से विमार्ग लिए हैं या कई अपराध किए हैं, परमेश्वर के बारे में शिकायतें की हैं या धर्म के अंदर से परमेश्वर का प्रतिरोध किया या अपने दिल में उसके खिलाफ ईशनिंदा पाली है, वगैरह-वगैरह—परमेश्वर इन सब पर कतई गौर नहीं करता है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि क्या व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं और क्या वह किसी दिन बदल सकता है या नहीं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास का मार्ग)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था दी और मैं बेहद प्रभावित हुई। परमेश्वर ने मेरी पिछली असफलताओं को नहीं देखा, बल्कि यह देखा कि क्या अब मैं अपना कर्तव्य निभाने के अवसर को संजो सकती हूँ और क्या सच्चा पश्चात्ताप कर सकती हूँ। परमेश्वर दृढ़निश्चयी लोगों को पसंद करता है। मैं इस बार कायर नहीं बन सकती थी और परमेश्वर को फिर से निराश नहीं कर सकती थी। मैं अपना कर्तव्य निभाने के इस अवसर को संजोने को तैयार थी।

पाठ-आधारित कर्तव्य लेने के बाद मैंने अपनी दशा के आधार पर परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों की खोज की। मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े : “इस असली समाज में जीने वाले लोगों को शैतान बुरी तरह भ्रष्ट कर चुका है। लोग चाहे पढ़े-लिखे हों या नहीं, उनके विचारों और दृष्टिकोणों में ढेर सारी परंपरागत संस्कृति रची-बसी है। खास कर महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पतियों की देखभाल करें, अपने बच्चों का पालन-पोषण करें, नेक पत्नी और प्यारी माँ बनें, अपना पूरा जीवन पति और बच्चों के लिए समर्पित कर उनके लिए जिएँ, यह सुनिश्चित करें कि परिवार को रोज तीन वक्त खाना मिले और साफ-सफाई जैसे सारे घरेलू काम करें। नेक पत्नी और प्यारी माँ होने का यही स्वीकार्य मानक है। हर महिला भी यही सोचती है कि चीजें इसी तरह की जानी चाहिए और अगर वह ऐसा नहीं करती तो फिर वह नेक औरत नहीं है और उसने अंतरात्मा और नैतिकता के मानकों का उल्लंघन कर दिया है। इन नैतिक मानकों का उल्लंघन कुछ महिलाओं की अंतरात्मा पर बहुत भारी पड़ता है; उन्हें लगता है कि वे अपने पति और बच्चों को निराश कर चुकी हैं और वे नेक औरत नहीं हैं। लेकिन परमेश्वर पर विश्वास करने, उसके ढेर सारे वचन पढ़ने, कुछ सत्य समझ चुकने और कुछ मामलों की असलियत जान जाने के बाद तुम सोचोगी, ‘मैं सृजित प्राणी हूँ और मुझे इसी रूप में अपना कर्तव्य निभाकर खुद को परमेश्वर के लिए खपाना चाहिए।’ इस समय क्या नेक पत्नी और प्यारी माँ होने, और सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य करने के बीच कोई टकराव होता है? अगर तुम नेक पत्नी और प्यारी माँ बनना चाहती हो तो फिर तुम अपना कर्तव्य पूरे समय नहीं कर सकती, लेकिन अगर तुम अपना कर्तव्य पूरे समय करना चाहती हो तो फिर तुम नेक पत्नी और प्यारी माँ नहीं बन सकती। अब तुम क्या करोगी? अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से करने का फैसला कर कलीसिया के कार्य के लिए जिम्मेदार बनना चाहती हो, परमेश्वर के प्रति समर्पित रहना चाहती हो, तो फिर तुम्हें नेक पत्नी और प्यारी माँ बनना छोड़ना पड़ेगा। अब तुम क्या सोचोगी? तुम्हारे मन में किस प्रकार की विसंगति उत्पन्न होगी? क्या तुम्हें ऐसा लगेगा कि तुमने अपने पति और बच्चों को निराश कर दिया है? इस प्रकार का अपराधबोध और बेचैनी कहाँ से आते हैं? जब तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य नहीं निभा पाती तो क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि तुमने परमेश्वर को निराश कर दिया है? तुम्हें कोई अपराधबोध या ग्लानि नहीं होती क्योंकि तुम्हारे दिलोदिमाग में सत्य का लेशमात्र संकेत भी नहीं मिलता है। तो फिर तुम क्या समझी? परंपरागत संस्कृति और नेक पत्नी और प्यारी माँ होना। इस प्रकार तुम्हारे मन में ‘अगर मैं नेक पत्नी और प्यारी माँ नहीं हूँ तो फिर मैं नेक और भली औरत नहीं हूँ’ की धारणा उत्पन्न होगी। उसके बाद से तुम इस धारणा के बंधनों से बँध जाओगी, और परमेश्वर में विश्वास करने और अपने कर्तव्य करने के बाद भी इसी प्रकार की धारणाओं से बँधी रहोगी। जब अपना कर्तव्य करने और नेक पत्नी और प्यारी माँ होने के बीच टकराव होता है तो भले ही तुम अनमने ढंग से अपना कर्तव्य करने का फैसला कर परमेश्वर के प्रति थोड़ी-सी भक्ति दिखा लो, फिर भी तुम्हें मन ही मन बेचैनी और अपराधबोध होगा। इसलिए अपना कर्तव्य निभाने के दौरान जब तुम्हें कुछ फुर्सत मिलेगी तो तुम अपने बच्चों और पति की देखभाल करने के मौके तलाश करोगी, उनकी और अधिक भरपाई करना चाहोगी और सोचोगी कि भले ही तुम्हें ज्यादा कष्ट झेलना पड़े तो भी यह ठीक है, बशर्ते तुम्हारे पास मन की शांति हो। क्या यह एक नेक पत्नी और प्यारी माँ होने के बारे में परंपरागत संस्कृति के विचारों और सिद्धांतों के असर का नतीजा नहीं है?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। “परमेश्वर का यह कहने का क्या अर्थ है, ‘परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है’? इसका अर्थ हर व्यक्ति को यह एहसास कराना है : हमारा जीवन और हमारे प्राण परमेश्वर ने रचे हैं, ये हमें उसी से मिले हैं—वे हमारे माता-पिता से नहीं आते, प्रकृति से तो बिल्कुल भी नहीं, ये चीजें हमें परमेश्वर ने दी थीं; बात बस इतनी है कि हमारी देह हमारे माता-पिता से उत्पन्न हुई है और हमारे बच्चे हमसे उत्पन्न होते हैं, लेकिन हमारे बच्चों की किस्मत पूरी तरह परमेश्वर के हाथ में है। हम परमेश्वर पर विश्वास कर सकते हैं, यह भी परमेश्वर का दिया हुआ अवसर है; यह उसने निर्धारित किया है और उसका अनुग्रह है। इसलिए तुम्हें किसी दूसरे के प्रति दायित्व या जिम्मेदारी निभाने की जरूरत नहीं है; तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के प्रति अपना वह कर्तव्य अच्छे से निभाना चाहिए जो तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में निभाना ही चाहिए। लोगों को सबसे पहले यही करना चाहिए, यही वह मुख्य चीज और प्रधान बात है जिसे लोगों को अपने जीवन में पूरा करना चाहिए। अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाती हो तो तुम मानक स्तर की सृजित प्राणी नहीं हो। दूसरों की नजरों में तुम नेक पत्नी और प्यारी माँ, बहुत ही अच्छी गृहिणी, संतानोचित संतान और समाज की आदर्श सदस्य हो सकती हो, लेकिन परमेश्वर के समक्ष तुम ऐसी इंसान हो, जिसने उसके खिलाफ विद्रोह किया है, जिसने अपना दायित्व या कर्तव्य बिल्कुल भी नहीं निभाया है, जिसने परमेश्वर का आदेश तो स्वीकारा मगर उसे पूरा नहीं किया, जिसने उसे मँझधार में छोड़ दिया। क्या इस तरह के किसी व्यक्ति को परमेश्वर की स्वीकृति हासिल हो सकती है? ऐसे लोग व्यर्थ होते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह समझाया कि मैं हमेशा से यही मानती रही हूँ कि एक स्त्री को अपने पति का ध्यान रखना चाहिए, अपने बच्चों का पालन-पोषण करना चाहिए और एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ बनना चाहिए। ये विचार और दृष्टिकोण शैतान से आते हैं। शैतान लोगों में यह दृष्टिकोण भरता है कि एक स्त्री को अपना जीवन घर पर बिताना चाहिए, अपने परिवार की सेवा करनी चाहिए, अपने पति और बच्चों के इर्द-गिर्द अपना जीवन बिताना चाहिए और अगर वह उनकी अच्छे से देखभाल नहीं करती है तो वह अच्छी स्त्री नहीं है। मैं इसी विचार और दृष्टिकोण के साथ जी रही थी। हालाँकि मैं अच्छी तरह जानती थी कि परमेश्वर में विश्वास रखना और अपना कर्तव्य निभाना पूरी तरह से स्वाभाविक और न्यायसंगत है और यही एक सृजित प्राणी को करना चाहिए, फिर भी अपना कर्तव्य निभाते हुए मैं घर की हर चीज के बारे में सोचती रहती थी। जब भी मेरे पास थोड़ा खाली समय होता, मैं खुद को पारिवारिक मामलों में व्यस्त कर लेती, यहाँ तक कि मैं भक्ति और परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के अपने समय का भी त्याग कर देती थी। मुझे अपने कर्तव्य में कोई दायित्व-बोध नहीं था और मैं कलीसिया के कार्य में देरी कर देती थी। हालाँकि कहने को तो मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन मन ही मन मैं अपने पति और बच्चे के रोजमर्रा के जीवन के बारे में सोचती रहती थी, अगर मैं जरा भी गलती कर देती और अपने पति को दुखी देखती तो मुझे लगता कि मैंने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कीं। भले ही मेरा पति मुझे मारता था, डाँटता था और परमेश्वर के वचनों की मेरी पुस्तकें फेंक देना चाहता था, भले ही मेरी सास मेरा मजाक उड़ाती थी और मुझे डाँटती थी, लेकिन मुझे उनसे नफरत नहीं थी। बल्कि मुझे लगता था कि मैं अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी नहीं कर पा रही हूँ और एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ नहीं बन पा रही हूँ। दरअसल परमेश्वर ने अपने वचनों में कभी भी स्त्रियों से एक अच्छी पत्नी या प्रेममयी माँ बनने की अपेक्षा नहीं की है। परमेश्वर चाहता है कि हम सत्य का अनुसरण करें, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभाएँ, अपनी जिम्मेदारियाँ और मिशन पूरा करें। मुझे सत्य की समझ नहीं थी और शैतान के भ्रमों को इस हद तक सत्य मान बैठी थी कि मैंने एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ बनने को उचित कार्य समझा, मैंने एक सृजित प्राणी के कर्तव्य-निर्वहन को कोई अतिरिक्त चीज समझा। अपने कर्तव्य को ठीक से न निभा पाने के कारण मुझे किसी प्रकार की ऋणग्रस्तता या बेचैनी महसूस नहीं होती थी, लेकिन जब मैं अपने परिवार की देखभाल अच्छे से नहीं कर पाती थी तो मुझे लगता कि मैं उन्हें निराश कर रही हूँ। फिर पता चला कि समस्या मेरे दृष्टिकोणों और विचारों में ही है। मानव जीवन परमेश्वर से मिलता है और परमेश्वर ने मुझे इस संसार में जिम्मेदारियों और एक मिशन को पूरा करने के लिए भेजा है, न कि अपने परिवार या रिश्तेदारों की खातिर जीने के लिए। अगर मैं एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ बनने के लिए जिऊँ, अपने परिवार की अच्छी देखभाल करूँ और वह कर्तव्य न निभा पाऊँ जो मुझे निभाना चाहिए तो मैं एक बेहद स्वार्थी व्यक्ति होऊँगी, एक ऐसी व्यक्ति बन जाऊँगी जिससे परमेश्वर चिढ़ता और घृणा करता है। इतने सालों तक मैंने एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ बनने की कोशिश में बहुत समय बरबाद कर दिया और अपने कर्तव्य निभाने के बहुत से अवसर गँवा दिए। अब मैं उस तरह नहीं जी सकती थी। बाद में मैं सचेत रहकर पूरा मन अपने कर्तव्य में लगाने लगी और जब कभी घर के बारे में सोचती तो परमेश्वर से प्रार्थना करती कि वह मेरे दिल की रक्षा करे ताकि मैं अपने कर्तव्य को प्राथमिकता दे सकूँ, मुझे पता भी नहीं चलता था और मेरा दिल शांत हो जाता था। कभी-कभी मैं घर जाकर चीजों को सुलझाने में मदद करती, मेरा पति या सास चाहे कुछ भी कहे, मेरा दिल अब बेबस महसूस नहीं करता था।

जून 2015 में मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए दूर चली गई। पहले जब मैं अपने गृहनगर में अपना कर्तव्य निभा रही होती थी तो मैं कुछ समय बाद घर लौट आती थी, लेकिन इस बार मैं कई महीनों तक घर वापस नहीं जा पाई। जैसे-जैसे मौसम ठंडा होता गया, मुझे चिंता होने लगी, “मेरा पति और बच्चे कैसे होंगे? क्या मेरे माता-पिता स्वस्थ होंगे?” इन बातों के बारे में सोचकर मैं फिर से बेचैन होने लगी और अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपने गृहनगर लौटना चाहा। मुझे एहसास हुआ कि इस तरह सोचना सही नहीं है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मेरे दिल की रक्षा करे। बाद में मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “तुम लोगों को सभी सुंदर और अच्छी चीजों का अनुसरण करना चाहिए और तुम्हें सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता प्राप्त करनी चाहिए। यही नहीं, तुम्हें अपने जीवन के लिए उत्तरदायी होना चाहिए और तुम्हें इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। लोग पृथ्वी पर आते हैं और मेरे सामने आ पाना दुर्लभ है और सत्य को खोजने और प्राप्त करने का अवसर पाना भी दुर्लभ है। तुम लोग इस खूबसूरत समय को इस जीवन में अनुसरण करने का सही मार्ग मानकर महत्त्व क्यों नहीं दोगे? और तुम लोग हमेशा सत्य और न्याय के प्रति इतने तिरस्कारपूर्ण क्यों बने रहते हो? तुम लोग क्यों हमेशा उस अधार्मिकता और गंदगी के लिए स्वयं को रौंदते और बरबाद करते रहते हो, जो लोगों के साथ खिलवाड़ करती है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे वाकई प्रेरित किया और मुझे जीवन में सही लक्ष्य दिया। यह तथ्य कि मैं परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार पाई और सुसमाचार के विस्तार में अपना कर्तव्य निभाने का अवसर पा सकी, मेरे लिए एक आशीष था और उससे भी बढ़कर परमेश्वर द्वारा मेरा उत्कर्ष था। मैंने विचार किया कि किस तरह पतरस ने अपना जीवन परमेश्वर को जानने और प्रेम करने के प्रयास में बिताया था। जब परमेश्वर ने उसे झुंड की चरवाही करने का कार्य सौंपा तो उसने खुद में परमेश्वर के प्रेम और विश्वास को महसूस किया, वह सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर अपना सर्वस्व अर्पित करने को और भी अधिक तत्पर हो गया। आखिरकार वह परमेश्वर के लिए सलीब पर उल्टा लटक गया, उसने शानदार गवाही दी और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त की। पतरस का जीवन बेहद सार्थक था। अब सुसमाचार के विस्तार का बहुत ही महत्वपूर्ण समय है, मुझे पतरस की मिसाल का अनुसरण करना था, अपना कर्तव्य निभाने के अवसर को संजोना था, सत्य का अनुसरण करने में अपनी सारी ऊर्जा लगानी थी और राज्य के सुसमाचार के विस्तार के लिए अपना कर्तव्य निभाना था। उसके बाद मुझे अपना कर्तव्य निभाने में पारिवारिक मामलों की वजह से उतनी बाधा नहीं रही और मैं ज्यादा निश्चिंत महसूस करने लगी।

बाद में परमेश्वर के नवीनतम वचन और पढ़कर मुझे गुणी स्त्रियों, एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ के बारे में पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों की और गहरी समझ मिली। परमेश्वर कहता है : “पूर्वी लोग चाहते हैं कि स्त्रियाँ हमेशा शिष्ट हों, तीन आज्ञाकारिताएँ और चार गुण का मूर्तरूप हों, सद्गुणी और विनम्र हों—किस प्रयोजन से? ताकि उन पर नियंत्रण करना आसान हो। यह एक घातक विचारधारा है जो पारंपरिक पूर्वी संस्कृति से विकसित हुई है, और यह वास्तव में लोगों के लिए हानिकारक है, और यह आखिरकार स्त्रियों को दिशाहीन और विचारहीन जीवन जीने की ओर आगे बढ़ाती है। ये स्त्रियाँ नहीं जानतीं कि उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए, या कौन-से क्रियाकलाप सही हैं या गलत। वे अपने परिवारों के लिए अपना जीवन भी दे देती हैं, फिर भी उन्हें लगता है कि उन्होंने ज्यादा कुछ नहीं किया है। क्या यह स्त्रियों के लिए एक प्रकार की हानि है? (हाँ, है।) वे तब भी प्रतिरोध नहीं करतीं जब उनके अपने अधिकार, जो उन्हें मिलने चाहिए, छीन लिए जाते हैं। वे प्रतिरोध क्यों नहीं करती हैं? वे कहती हैं : ‘प्रतिरोध करना गलत है, यह सद्गुण नहीं है। अमुक स्त्री को देखो, वह मुझसे बहुत बेहतर काम करती है, और उसने मुझसे बहुत ज्यादा सहा है, फिर भी वह कभी शिकायत नहीं करती।’ वे ऐसा क्यों सोचती हैं? (वे पारंपरिक सांस्कृतिक सोच से प्रभावित हैं।) इसी पारंपरिक संस्कृति ने उनके भीतर गहरी जड़ें जमा रखी हैं, और उन्हें असीम कष्ट दिए हैं। वे इस किस्म की यातना को सहन करने में कैसे सक्षम हैं? वे अच्छी तरह जानती हैं कि इस प्रकार की यातना बहुत पीड़ादायक है, यह उन्हें असहाय महसूस करवाती है, और उनके दिल दुखाती है, तो फिर भी वे इसे कैसे स्वीकार सकती हैं? इसका वस्तुपरक कारण क्या है? यह कि यह उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि है, इसलिए वे इससे मुक्त नहीं हो सकतीं, बल्कि सिर्फ इसे दब्बूपन के साथ स्वीकार सकती हैं। वे व्यक्तिपरक ढंग से ऐसा ही महसूस भी करती हैं। वे सत्य को नहीं समझती हैं, या यह नहीं समझती हैं कि स्त्रियों को गरिमा के साथ कैसे जीना चाहिए या स्त्रियों के लिए जीने का सही तरीका क्या है। किसी ने भी उन्हें ये बातें नहीं बताई हैं। उनके ज्ञान के मुताबिक स्त्रियों के स्व-आचरण और क्रियाकलापों की कसौटी क्या है? पारंपरिक संस्कृति। उन्हें लगता है कि जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन तक पहुँचा है, वह सही है, और यदि कोई इसका उल्लंघन करता है तो उसकी अंतरात्मा की निंदा की जानी चाहिए। यही उनकी ‘कसौटी’ है। लेकिन क्या यह कसौटी वास्तव में सही है? क्या इसे उद्धरण चिह्नों में रखना चाहिए? (हाँ, इसे रखना चाहिए।) यह कसौटी सत्य के अनुरूप नहीं है। इस प्रकार की सोच और दृष्टिकोण के अधीन किसी का व्यवहार चाहे जितना भी स्वीकृत या अनुकूल क्यों ना हो, क्या वास्तव में यह कसौटी है? ऐसा नहीं है, क्योंकि यह सत्य और मानवता के विरुद्ध है। लंबे समय से पूर्वी स्त्रियों को अपने पूरे परिवारों की देखभाल करनी पड़ती रही है, और वे तमाम छोटे-छोटे तुच्छ मामलों की जिम्मेदारी उठाती रही हैं। क्या यह उचित है? (नहीं, उचित नहीं है।) तो फिर वे उसे कैसे सहन कर सकती हैं? इस वजह से कि वे इस प्रकार की सोच और दृष्टिकोण से बँधी हुई हैं। इसे सहन करने की उनकी क्षमता दर्शाती है कि भीतर गहरे में वे 80% यकीन से कह सकती हैं कि ऐसा करना ही सही है, और यदि वे इसे बस सहन कर लें तो पारंपरिक संस्कृति के मानकों पर खरी उतरने में सक्षम होंगी। इसलिए वे उस दिशा में, उन मानकों की ओर भागती हैं। यदि भीतर गहरे में वे सोचतीं कि यह गलत है और उन्हें यह नहीं करना चाहिए, यह मानवता के अनुरूप नहीं है, और यह मानवता और सत्य के विरुद्ध है, तो भी क्या वे ऐसा करतीं? (नहीं, वे ऐसा नहीं करतीं।) उन्हें उन लोगों से दूर जाने और उनका दास न बनने का कोई तरीका सोचना होगा। लेकिन अधिकतर स्त्रियाँ ऐसा करने की हिम्मत नहीं करेंगी—वे क्या सोचती हैं? वे सोचती हैं कि वे अपने समुदाय के बिना जीवित रह सकती हैं, लेकिन अगर उन्होंने अपना समुदाय छोड़ दिया, तो उन्हें एक भयानक कलंक ढोना पड़ेगा और कुछ खास दुष्परिणाम झेलने होंगे। ये सब नाप-तोल कर वे सोचती हैं कि यदि उन्होंने ऐसा किया तो उनके सहयोगी बातें करेंगे कि वे किस तरह से सद्गुणी नहीं हैं, समाज उनकी खास तरीकों से निंदा करेगा और उनके बारे में कुछ खास राय बनाएगा, और इन सबके गंभीर दुष्परिणाम होंगे। अंत में, वे इस पर सोच-विचार करती हैं और उन्हें लगता है, ‘इसे सहन करना ही बेहतर है। वरना निंदा का भार मुझे कुचल देगा!’ अनेक पीढ़ियों से पूर्वी स्त्रियाँ ऐसी ही हैं। इन तमाम नेक कर्मों के बदले उन्हें क्या सहना पड़ता है? अपनी मानवीय गरिमा और मानवाधिकारों से वंचित किया जाना। क्या ये विचार और नजरिये सत्य के अनुरूप हैं? (नहीं, नहीं हैं।) वे सत्य के अनुरूप नहीं हैं। उन्हें अपनी गरिमा और मानवाधिकारों से वंचित रखा गया है, उन्होंने अपनी सत्यनिष्ठा, अपने रहने और सोचने के लिए स्वतंत्र स्थान, और अपने बोलने और अपनी इच्छाएँ व्यक्त करने का अधिकार खो दिया है—उनके किए हुए सारे काम घर के लोगों के लिए होते हैं। यह करने का उनका प्रयोजन क्या है? पारंपरिक संस्कृति द्वारा स्त्रियों से अपेक्षित मानकों पर खरा उतरना, और दूसरे लोगों से अच्छी पत्नियाँ और नेक लोग कहलवाकर अपनी प्रशंसा पाना। क्या यह एक प्रकार की यातना नहीं है? (हाँ, है।) क्या ऐसी सोच उचित है या विकृत? (विकृत है।) क्या यह सत्य के अनुरूप है? (नहीं, ऐसा नहीं है।)” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग तीन))परमेश्वर के वचन पढ़कर मेरी भावनाओं की सचमुच पुष्टि हो गई थी। मैं बिल्कुल वैसी ही इंसान थी जिसे परमेश्वर ने ऐसे व्यक्ति के रूप में उजागर किया है जिसे शैतान की पारंपरिक संस्कृति से गहरा नुकसान पहुँचा है। बचपन से ही टीवी नाटकों में गुणी और सौम्य महिला पात्रों की छवि ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी थी। मेरे माता-पिता की शिक्षा और समाज के विचारों के प्रभाव में आकर मेरे विचार पूरी तरह से सीमित हो गए थे। मैंने एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ बनने, अपने पति की देखभाल करने और अपने बच्चे का पालन-पोषण करने को एक महिला होने के नाते अपने मानकों के रूप में लिया और इन मामलों को सकारात्मक चीजों के तौर पर माना। मैं अपने पति और परिवार की सेवा में समय बिताती थी, अपने परिवारजनों के रोजमर्रा के जीवन की देखभाल करने में ही लगी रहती थी और मैं बिना किसी निष्ठा और गरिमा के जीती थी, फिर भी इसे नेक कार्य समझती थी। साल-दर-साल एक “अच्छी महिला” के रूप में अपनी छवि बनाए रखने के लिए, परमेश्वर के वचन सुनने और यह जानने के बावजूद कि वे सत्य हैं, मैंने खुलकर उनका अनुसरण करने की हिम्मत नहीं की। जब मैं अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करती भी थी तो यह हमेशा इस शर्त पर होता था कि मैं इसका असर अपने परिवार के जीवन पर नहीं पड़ने दूँगी और जब मैं अपने परिवार की देखभाल ठीक से न पर पाती तो मुझे बेचैनी होने लगती, मुझे लगता था कि मैं उन्हें निराश कर रही हूँ और मैं फौरन उसकी भरपाई करने के तरीके सोचने लगती थी। मेरे लिए उनकी देखभाल न करने से बेहतर था कि मैं अपने कर्तव्यों का ही त्याग कर दूँ। दरअसल मेरा पति और सास दोनों वयस्क हैं और उस समय तक मेरा बच्चा भी जूनियर हाई स्कूल में जा चुका था, इसलिए वे अपनी देखभाल करने में पूरी तरह सक्षम थे। लेकिन मैं फिर भी चिंतित रहती थी और मुझे हमेशा लगता था कि उनकी देखभाल न करना मेरी गलती है। मैं बार-बार कलीसिया के कार्य को दरकिनार कर देती भाई-बहनों के जीवन-प्रवेश को दरकिनार कर देती। मैं सचमुच घृणास्पद थी और दयनीय भी! परमेश्वर में विश्वास रखना और अपने कर्तव्यों का पालन करना पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है। यह स्पष्ट था कि मेरा परिवार परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा था और मुझे अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोक रहा था, लेकिन उनका भेद पहचानने के बजाय मैं यह सोचती थी कि अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए उनकी देखभाल अच्छे से न करने के लिए मैं ही दोषी हूँ और मुझे ग्लानि होती। आखिरकार मुझे समझ आया कि ये पारंपरिक सांस्कृतिक विचार लोगों के लिए वाकई हानिकारक हैं और उन्होंने मेरी सोच को पूरी तरह से विकृत कर दिया है जिसके कारण मैं काले-सफेद और सही-गलत में अंतर नहीं कर पा रही हूँ। शैतान एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ होने और तीन आज्ञाकारिताएँ और चार गुण जैसे पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों का इस्तेमाल करता है ताकि हम गुमराह हो जाएँ और यह मान लें कि महिलाओं को परिवार में हीनता का दर्जा मिलना चाहिए और उन्हें दूसरों का गुलाम बनकर रहना चाहिए जिससे महिलाओं को स्वतंत्र इच्छा रखने और अस्तित्व के अधिकार से वंचित किया जा सके। यह महिलाओं को नियंत्रित करने और कुचलने का एक तरीका है। मैं इन बातों की असलियत नहीं जान पाई थी, यही कारण था कि मुझे इन पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों से नुकसान पहुँचाया जाता रहा और नियंत्रित किया जाता रहा, यही वजह थी कि मैं बार-बार अपने कर्तव्यों में देरी करती रही, सत्य का अनुसरण करने का अपना संकल्प गँवा बैठी, अपने अपेक्षित कर्तव्य नहीं निभा पाई और बिना किसी सत्यनिष्ठा और गरिमा के जीवन जीती रही। अगर ऐसा ही चलता रहता तो परमेश्वर का कार्य समाप्त होने पर मैं भी परमेश्वर द्वारा हटा दी जाती। इन बातों का एहसास होने पर मैं अपने दिल की गहराइयों से शैतान को अस्वीकारने और इन पारंपरिक सांस्कृतिक विचारों के अनुसार जीवन न जीने को तैयार हो गई।

फिर मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “परमेश्वर ने मनुष्य के लिए मुक्त इच्छा रची, और इस मुक्त इच्छा से कौन-से विचार आते हैं? क्या वे मानवता के अनुरूप होते हैं? इन विचारों को कम-से-कम मानवता के अनुरूप तो होना ही चाहिए। इसके अलावा, उसका अभिप्राय यह भी था कि लोग अपनी जीवन प्रक्रिया में सभी लोगों, घटनाओं और चीजों के बारे में सटीक सोच और समझ रखेंगे और फिर जीने और परमेश्वर की आराधना करने का सही मार्ग चुनेंगे। इस प्रकार जिया हुआ जीवन परमेश्वर का दिया हुआ है, और इसका आनंद लेना चाहिए। लेकिन लोग जीवन भर इन तथाकथित पारंपरिक संस्कृतियों और नैतिक धर्मग्रन्थों से प्रतिबंधित, बँधे हुए और विकृत रहते हैं, और आखिरकार वे क्या बन जाते हैं? वे पारंपरिक संस्कृति की कठपुतलियाँ बन जाते हैं। क्या ऐसा लोगों के सत्य नहीं समझने के कारण नहीं है? (हाँ, ऐसा है।) क्या तुम लोग भविष्य में इस मार्ग पर चलना चुनोगे? (नहीं, मैं नहीं चुनूँगा।) ... तो तुम्हें कैसे कार्य करना चाहिए? (सिद्धांतों के अनुरूप।) बेशक सिद्धांतों के अनुरूप कार्य करना सही है और तुम्हें सभी के साथ सिद्धांतों के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए, यदि वे परमेश्वर में विश्वास रखते हों तो उनसे भाई-बहनों की तरह, और वे विश्वास नहीं रखते हैं तो उनसे गैर-विश्वासियों की तरह पेश आना चाहिए। तुम्हें अपने साथ गलत करने, अपनी सत्यनिष्ठा को विकृत करने और उनके लिए अपना जीवन न्योछावर कर अपनी गरिमा और अधिकार छोड़ने की जरूरत नहीं है। वे इस योग्य नहीं हैं। इस संसार में केवल एक ही है जो इस योग्य है कि उसके लिए तुम अपना जीवन व्यतीत कर सकते हो। वह कौन है? (परमेश्वर।) क्यों? क्योंकि परमेश्वर सत्य है, और उसके वचन मनुष्य के अस्तित्व, स्व-आचरण और क्रियाकलापों की कसौटी है। अगर तुम्हारे पास परमेश्वर है, उसके वचन हैं, तो तुम भटकोगे नहीं, और इस बारे में सटीक रहोगे कि तुम कैसे आचरण करते हो और कार्य करते हो। एक बार बचा लिए जाने के बाद किसी पर परमेश्वर के वचनों का यही अंतिम प्रभाव होता है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद आठ : वे दूसरों से केवल अपने प्रति समर्पण करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर के प्रति नहीं (भाग तीन))। परमेश्वर के वचनों ने सचमुच मेरे दिल को रोशन कर दिया। परमेश्वर लोगों के लिए विवाह की व्यवस्था इसलिए करता है ताकि लोग अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ निभा सकें, न कि लोगों को गुलाम बनाने के लिए, किसी को किसी और के लिए जीने के लिए तो बिल्कुल नहीं। विवाह में पति और पत्नी दोनों की अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व होते हैं और किसी को भी दूसरे के मन मुताबिक होने की जरूरत नहीं है। मैं अपने विवाह और परिवार में चाहे जो भी भूमिका निभाऊँ, वह महज एक जिम्मेदारी है जिसे मुझे निभाना चाहिए। जब कलीसिया कार्य को लेकर व्यस्तता न हो तो मैं एक पत्नी के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकती हूँ और अपने परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों का ध्यान रख सकती हूँ। लेकिन जब अपने कर्तव्य को लेकर मेरी व्यस्तता बढ़ जाए और मेरे पास घर जाने का भी समय न हो तो मुझे अपने कर्तव्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। इन बातों को समझ लेने पर मुझे अपने दिल में मुक्ति और आजादी का एक गहरा एहसास हुआ। ऐसा लगा जैसे मेरे दिल में अचानक कोई खिड़की खुल गई है जिसने मुझे रोशनी से भर दिया है।

परमेश्वर के वचनों ने ही मुझे “एक अच्छी पत्नी और प्रेममयी माँ होने” के पारंपरिक विचार के बंधन और नुकसान से मुक्त होने में मदद की है; अब मैं राज्य के सुसमाचार के विस्तार में अपना कर्तव्य निभा पा रही हूँ—यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीष है और यही मेरे जीवन को मूल्यवान बनाता है। परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर का आशीष आपके पास आएगा! हमसे संपर्क करने के लिए बटन पर क्लिक करके, आपको प्रभु की वापसी का शुभ समाचार मिलेगा, और 2025 में उनका स्वागत करने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

मुझे सच्ची खुशी मिल गई

चोंगशेंग, चीनछोटी उम्र से ही मुझे रोमांटिक ड्रामे देखना बहुत पसंद था और मुख्य पात्रों के बीच प्रेमपूर्ण रिश्तों से मुझे हमेशा ईर्ष्या होती...

मुझे सचमुच खुशहाल जीवन मिला

मैं एक साधारण ग्रामीण परिवार में पली-बढ़ी हूं। हालाँकि हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, फिर भी मैं बहुत खुश थी। मेरी माँ का...

दोराहे

कारा, दक्षिण कोरियामेरा एक सुखी परिवार था, और मेरे पति मुझसे अच्छी तरह पेश आते थे। हमने एक पारिवारिक रेस्तराँ खोला, जो बढ़िया चल रहा था।...

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें