Christian Song | बचे रहने के लिए तुम्हें सत्य का अनुसरण जरूर करना चाहिए | 2026 प्रशंसा की आवाजें
15 जनवरी, 2026
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सत्य का अनुसरण करने का सबसे सरल अभ्यास यह है कि तुम्हें परमेश्वर से सारी चीजें स्वीकार करनी चाहिए और सारी चीजों में समर्पण करना चाहिए। यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि जब बात तुम्हारे कर्तव्य और दायित्वों की हो और इसे और बड़े पैमाने पर कहें तो जब बात परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपे गए आदेश और कुछ महत्वपूर्ण कार्य की हो, तुम्हें हमेशा कीमत चुकानी चाहिए। यह चाहे कितना भी मुश्किल क्यों न हो—चाहे तुम्हें जी-तोड़ मेहनत करनी पड़े, चाहे तुम पर ज़ुल्म ढाए जाएँ, या भले ही तुम्हारी जान को खतरा हो—तुम्हें कीमत की परवाह नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी वफादारी अर्पित करनी चाहिए और मृत्यु तक समर्पण करना चाहिए। यह सत्य का अनुसरण करने की वास्तविक अभिव्यक्ति, वास्तविक त्याग और सच्चा अभ्यास है। अगर सत्य का अनुसरण करने को लेकर लोगों के पास तड़प, दृढ़ता और आस्था वाला दिल होता है—अगर उनके दिलों में यह ताकत होती है—तब उनके साथ घटित होने वाली कोई भी चीज कठिन नहीं है। चिंता की बात यह है कि कुछ लोगों में आस्था की कमी जरूर है।
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आखिरकार, अंत के युग के कार्य के इस चरण में, परमेश्वर लोगों को उन सत्यों का हर पहलू साफ-साफ बताता है जिनका उन्हें अभ्यास करना है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की इस वर्तमान अवधि में लोगों से सत्य का अनुसरण करवाना उनके लिए चीजें मुश्किल बनाना नहीं है; बल्कि यह कुछ ऐसा है जिसे वे हासिल करने में सक्षम हैं। एक तरफ, परमेश्वर की यह माँग बिल्कुल उचित है; दूसरी तरफ, लोगों के पास सत्य का अनुसरण करने के लिए पर्याप्त स्थितियाँ और एक पर्याप्त आधार है। अगर कोई अंत में फिर भी सत्य प्राप्त करने में असफल रहता है, तो इसका कारण यह है कि उसकी समस्याएँ बहुत ही गंभीर हैं। ऐसा व्यक्ति जो भी दंड भोगे, जो भी परिणाम प्राप्त करे, जो भी मृत्यु प्राप्त करे, वह उसी के लायक है। वह किसी दया का पात्र नहीं है। परमेश्वर के लिए, लोगों के प्रति दया या करुणा जैसी कोई अवधारणा नहीं होती है। वह अपने स्वभाव, साथ ही अपने स्थापित किए हुए नियमों और विधानों, लोगों से अपनी माँगों और उस व्यक्ति की अभिव्यक्तियों के आधार पर उस व्यक्ति को मिलने वाले परिणाम का न्याय करता है, और यह निर्धारण करता है कि उस व्यक्ति के लिए यह जीवन और आने वाला संसार कैसा होगा। यह इतना ही सरल है।
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परमेश्वर यह परवाह नहीं करता है कि कितने लोग बचे रहेंगे या अंत में कितने नष्ट किए जाएँगे और दंडित होंगे। यह तुम लोगों को क्या बताता है? यह तुम लोगों को बताता है कि परमेश्वर ने लोगों की कोई निश्चित संख्या पूर्वनियत नहीं की है और तुम इसके लिए प्रयास कर सकते हो। परमेश्वर इसी तरह बोलता और कार्य करता है; वह हर व्यक्ति के साथ निष्पक्षता से व्यवहार करता है और हर व्यक्ति को पर्याप्त अवसर देता है। वह तुम्हें पर्याप्त अवसर, पर्याप्त अनुग्रह, और अपने वचनों, अपने कार्य, अपनी दया और सहनशीलता का पर्याप्त अंश देता है। वह हर व्यक्ति के प्रति निष्पक्ष है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो और परमेश्वर का अनुसरण करने के मार्ग पर चल पड़े हो, और तुम, चाहे कितना भी बड़ा कष्ट सहो या कितनी भी मुश्किलों का सामना करो, सत्य को स्वीकार सकते हो और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध हो जाते हैं, तो तुम बचा लिए जाओगे। अगर तुम परमेश्वर की गवाही दे सकते हो और एक ऐसा सृजित प्राणी बनते हो जो मानक स्तर का हो, सारी चीजों का एक ऐसा अधिपति बनते हो जो मानक स्तर का हो तो तुम बचे रहोगे।
—वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, मनुष्य को सत्य का अनुसरण क्यों करना चाहिए
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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