परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 74

16 जून, 2020

जब परमेश्वर देह बनता है और मानवजाति के बीच रहता है, तो वह किस प्रकार की पीड़ा अनुभव करता है? क्या कोई सचमुच इस बात को समझता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर बड़ी पीड़ा सहता है, और यद्यपि वह स्वयं परमेश्वर है, फिर भी लोग उसके सार को नहीं समझते और हमेशा उसके साथ एक मनुष्य के समान व्यवहार करते हैं, जिससे उसे दुःख और अन्याय महसूस होता है—वे कहते हैं कि इन कारणों से परमेश्वर की पीड़ा सचमुच बहुत बड़ी है। अन्य लोग कहते हैं कि परमेश्वर निर्दोष और निष्पाप है, परंतु वह मनुष्य के समान पीड़ा भुगतता है और मानवजाति के साथ रहकर उत्पीड़न, बदनामी और अपमान का सामना करता है; वे कहते हैं कि वह अपने अनुयायियों की ग़लतफहमियाँ और अवज्ञा भी सहता है—इस तरह, वे कहते हैं कि परमेश्वर की पीड़ा को सचमुच मापा नहीं जा सकता। अब, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझते। वास्तव में यह पीड़ा, जिसके बारे में तुम लोग बात करते हो, परमेश्वर के लिए वास्तविक पीड़ा नहीं है, उसकी पीड़ा इससे कहीं बड़ी है। तो स्वयं परमेश्वर के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? देहधारी परमेश्वर के देह के लिए सच्ची पीड़ा क्या है? परमेश्वर के लिए, मानवजाति का उसे नहीं समझना पीड़ा नहीं गिना जाता, और न ही लोगों में परमेश्वर के बारे में कुछ ग़लतफहमियाँ होना और उनका उसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखना पीड़ा गिना जाता है। हालाँकि, लोग प्रायः महसूस करते हैं कि परमेश्वर ने अवश्य ही बहुत बड़ा अन्याय सहा है, कि जितने समय तक परमेश्वर देह में रहता है, वह अपना व्यक्तित्व मानवजाति को नहीं दिखा सकता और लोगों को अपनी महानता नहीं देखने दे सकता, और कि परमेश्वर विनम्रता से एक मामूली देह में छिपा रहता है, जो उसके लिए बहुत बड़ी यातना होनी चाहिए। लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझ सकते हैं और जो कुछ देख सकते हैं, उसे गंभीरता से ले लेते हैं, और परमेश्वर पर हर प्रकार की सहानुभूति प्रक्षेपित कर देते हैं, यहाँ तक कि उसकी पीड़ा के लिए उसकी थोड़ी स्तुति भी प्रस्तुत कर देते हैं। वास्तव में, इसमें एक अंतर है; लोग परमेश्वर की पीड़ा के बारे में जो कुछ समझते हैं और वह वास्तव में जो महसूस करता है, उसके बीच एक अंतर है। मैं तुम लोगों को सच बता रहा हूँ—परमेश्वर के लिए, चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या देहधारी परमेश्वर का देह, ऊपर वर्णित पीड़ा सच्ची पीड़ा नहीं है। तो फिर वह क्या है, जिसे परमेश्वर वास्तव में भुगतता है? आओ, केवल देहधारी परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पीड़ा के बारे में बात करें।

जब परमेश्वर देहधारी बनता है, तो एक औसत, सामान्य व्यक्ति बनकर, मानवजाति के बीच लोगों के साथ-साथ रहकर क्या वह लोगों के जीने के तरीकों, व्यवस्थाओं और फ़लसफ़ों को देख और महसूस नहीं कर सकता? जीने के ये तरीके और व्यवस्थाएँ उसे कैसा महसूस कराते हैं? क्या वह अपने हृदय में घृणा महसूस करता है? वह घृणा क्यों महसूस करेगा? मानवजाति के जीने की क्या पद्धतियाँ और व्यवस्थाएँ हैं? वे किन सिद्धांतों में समाहित हैं? वे किस चीज़ पर आधारित हैं? मानवजाति की पद्धतियाँ, नियम इत्यादि, जिन्हें वे जीवन के तरीके से जोड़ते हैं—वे सब शैतान के तर्क, ज्ञान और फ़लसफ़े पर निर्मित हैं। इस प्रकार की व्यवस्थाओं के अधीन जीने वाले मनुष्यों में कोई मानवता, कोई सत्य नहीं होता—वे सभी सत्य की उपेक्षा करते हैं और परमेश्वर से शत्रुता रखते हैं। यदि हम परमेश्वर के सार पर एक नज़र डालें, तो हम देखते हैं कि उसका सार शैतान के तर्क, ज्ञान और फ़लसफ़े के ठीक विपरीत है। उसका सार धार्मिकता, सत्य और पवित्रता, और सभी सकारात्मक चीज़ों की अन्य वास्तविकताओं से भरा हुआ है। ऐसे सार वाले और ऐसी मानवजाति के बीच रहने वाले परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? वह अपने हृदय में क्या महसूस करता है? क्या वह दर्द से भरा हुआ नहीं है? उसके हृदय में दर्द है, ऐसा दर्द जिसे कोई व्यक्ति समझ या महसूस नहीं कर सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि जिसका भी वह सामना या मुक़ाबला करता है या जो भी वह सुनता, देखता और अनुभव करता है, वह सब मानवजाति की भ्रष्टता, दुष्टता और सत्य के प्रति उनका विद्रोह और प्रतिरोध है। जो कुछ भी मनुष्यों से आता है, वह सब उसकी पीड़ा का स्रोत है। अर्थात्, चूँकि उसका सार भ्रष्ट मनुष्यों के सार के समान नहीं है, इसलिए मनुष्यों की भ्रष्टता उसकी सबसे बड़ी पीड़ा का स्रोत बन जाती है। जब परमेश्वर देह बनता है, तो क्या उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाता है, जिसकी भाषा उसके समान हो? ऐसा व्यक्ति मानवजाति में नहीं पाया जा सकता। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिल सकता, जो परमेश्वर के साथ संवाद या विचार-विनिमय कर सकता हो—तो तुम क्या कहोगे कि परमेश्वर को कैसा महसूस होता है? जिन चीज़ों के बारे में लोग चर्चा करते हैं, जिनसे वे प्रेम करते हैं, जिनके पीछे भागते हैं और जिनकी लालसा करते हैं, वे सभी पाप और दुष्ट प्रवृतियों से जुड़ी हुई हैं। परमेश्वर जब इन सबका सामना करता है, तो क्या यह उसके हृदय में कटार जैसा नहीं लगता? इन चीज़ों का सामना करके क्या उसे अपने हृदय में आनंद मिल सकता है? क्या वह सांत्वना पा सकता है? उसके साथ जो रह रहे हैं, वे विद्रोहशीलता और दुष्टता से भरे हुए मनुष्य हैं—उसका हृदय पीड़ित कैसे नहीं हो सकता? वास्तव में कितनी बड़ी है यह पीड़ा, और कौन इस बारे में परवाह करता है? कौन ध्यान देता है? और कौन इसे समझ पाने में सक्षम है? लोगों के पास परमेश्वर के हृदय को समझने का कोई तरीका नहीं है। उसकी पीड़ा ऐसी है, जिसे समझ पाने में लोग विशेष रूप से असमर्थ हैं, और मानवजाति की उदासीनता और संवेदनशून्यता परमेश्वर की पीड़ा को और अधिक गहरा कर देती है।

कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो मसीह की दुर्दशा पर अकसर सहानुभूति दिखाते हैं, क्योंकि बाइबल में एक पद है जिसमें कहा गया है : "लोमड़ियों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।" जब लोग इसे सुनते हैं, तो वे इसे गंभीरता से ले लेते हैं और मान लेते हैं कि यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे परमेश्वर सहता है, और यही सबसे बड़ी पीड़ा है जिसे मसीह सहन करता है। अब, इसे तथ्यों के परिप्रेक्ष्य से देखने पर, क्या मामला ऐसा ही है? नहीं; परमेश्वर इन कठिनाइयों को पीड़ा नहीं मानता। उसने कभी देह की पीड़ाओं के कारण अन्याय के विरुद्ध चीख-पुकार नहीं की है, और उसने कभी मनुष्यों को प्रतिफल या पुरस्कार स्वरूप कोई चीज़ देने के लिए बाध्य नहीं किया है। किंतु जब वह मानवजाति की हर चीज़ और मनुष्यों का भ्रष्ट जीवन और उनकी बुराई देखता है, जब वह देखता है कि मानवजाति शैतान के चंगुल में है और शैतान द्वारा क़ैद कर ली गई है और बचकर नहीं निकल सकती, कि पाप में रहने वाले लोग नहीं जानते कि सत्य क्या है, तो वह ये सब पाप सहन नहीं कर सकता। मनुष्यों के प्रति उसकी घृणा हर दिन बढ़ती जाती है, किंतु उसे यह सब सहना पड़ता है। यह परमेश्वर की सबसे बड़ी पीड़ा है। परमेश्वर अपने अनुयायियों के बीच खुलकर अपने हृदय की आवाज़ या अपनी भावनाएँ व्यक्त तक नहीं कर सकता, और उसके अनुयायियों में से कोई भी उसकी पीड़ा को वास्तव में समझ नहीं सकता। कोई भी उसके हृदय को समझने या दिलासा देने की कोशिश तक नहीं करता, जो दिन-प्रतिदिन, साल-दर-साल, बार-बार इस पीड़ा को सहता है। तुम लोग इस सब में क्या देखते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों को जो कुछ दिया है, उसके बदले में वह उनसे कुछ नहीं चाहता, किंतु अपने सार की वजह से वह मानवजाति की दुष्टता, भ्रष्टता और पाप बिलकुल भी सहन नहीं कर सकता, बल्कि अत्यधिक नफ़रत और अरुचि महसूस करता है, जो परमेश्वर के हृदय और उसके देह को अनंत पीड़ा की ओर ले जाती हैं। क्या तुम लोगों ने इसे देखा है? ज़्यादा संभावना इस बात की है कि तुम लोगों में से कोई भी इसे नहीं देख सकता, क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी वास्तव में परमेश्वर को नहीं समझ सकता। समय के साथ तुम लोगों को धीरे-धीरे इसे अपने आप समझना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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