परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" | अंश 501

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे" | अंश 501

0 |14 सितम्बर, 2020

जितना अधिक तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को धारण किए रहोगे; जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे भीतर रहेगा; और जितना अधिक तुम सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर की आशीष तुम पर होगी। यदि तुम हमेशा इसी प्रकार से अभ्यास करते रहोगे, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रेम को अपने भीतर देखोगे, और तुम पतरस के समान परमेश्वर को जानोगेः पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास स्वर्ग और पृथ्वी तथा उसमें की हर एक चीज को बनाने की बुद्धि है, परन्तु इसके अलावा, उसके पास मनुष्यों के मध्य में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि भी है। पतरस कहता है कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा उसमें की सभी चीज़ों को बनाने के कारण, वह नकेवल मनुष्यों के प्रेम के योग्य है, बल्कि, मनुष्य को बनाने, उन्हें बचाने, पूर्ण बनाने और अपने प्रेम को उत्तराधिकार में देने की योग्यता रखता है। इसलिए, पतरस ने कहा कि उसमें ऐसा और भी बहुत कुछ है जो परमेश्वर को मनुष्यों के प्रेम के और भी अधिक योग्य बनाता है। पतरस ने यीशु से कहा, "क्या तू स्वर्ग और पृथ्वी और उसमें की सभी बातों को बनाने से अधिक के कारण मनुष्यों के प्रेम के योग्य नहीं है? तुम्हारे भीतर और भी बहुत कुछ है जो प्रेम करने के योग्य है, तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते हो और घूमते-फिरते हो, तुम्हारी आत्मा मुझे भीतर तक छूती है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मेरी निंदा करते हो—ये बातें तुम्हें मनुष्यों के प्रेम के लिये और भी अधिक योग्य बनाती हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविक जीवन को खोजना और पता लगाना होगा, और अपनी देह को एक तरफ रखने को तैयार रहना होगा। तुम्हें यह संकल्प करना होगाः ऐसा संकल्पी बनना जो सभी बातों में परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य हो, जिसमें आलस या देह के आनन्द की अभिलाषा न हो, मात्र देह के लिए जीवित न हो बल्कि परमेश्वर के लिए जीवित रहे। ऐसा भी समय हो सकता है जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाओ। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानते हो; अगली बार, हो सकता है कि इसमें अत्यधिक प्रयास करना पड़े, तुम उसे संतुष्ट करोगे, न कि देह को संतुष्ट करोगे। जब तुम इस प्रकार से अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानोगे। तब तुम देखोगे कि परमेश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी तथा जो कुछ भी उसमें है उसे बनाया है, कि वह देहधारी हुआ ताकि लोग वास्तव में और असली में उसे देख सकें, और उसके साथ हकीकत में जुड़ सकें, कि वह मनुष्यों के मध्य चल सकता है, उसकी आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकती है, औरउसकी सुंदरता को देखा जा सकता है तथा उसके अनुशासन, दण्ड और आशीषों को अनुभव किया जा सकता है। यदि तुम हमेशा इस प्रकार से अनुभव करते रहोगे, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे और यदि एक दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य सम्बन्ध समाप्त हो जाए, तो तुम उस तिरस्कार को सहन कर पाओगे और पश्चाताप को महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य सम्बन्ध होगा तो तुम कभी भी परमेश्वर को छोड़ने की इच्छा नहीं करोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहेगा कि वह तुम्हे छोड़ रहा है, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और तुम कहोगे कि परमेश्वर के द्वारा छोड़े जाने से अच्छा मर जाना है। जैसे ही तुम में इस प्रकार की भावनाएं आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, और इस प्रकार से तुम्हारी नींव बनेगी, और तुमनिश्चय ही परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लोगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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