परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए" | अंश 422

परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए" | अंश 422

0 |13 अप्रैल, 2021

परमेश्वर का कार्य और वचन तुम्हारे स्वभाव में बदलाव लाने के लिए हैं; उसका लक्ष्य मात्र अपने कार्य और वचन को तुम लोगों को समझाना या ज्ञात कराना नहीं है। इतना पर्याप्त नहीं है। तुम्हारे अंदर सोचने-समझने की योग्यता है, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन इंसानी भाषा में लिखे हैं, और वह बड़ी स्पष्टता से बोलता है। मिसाल के तौर पर, तुम इस बात को पूरी तरह से जानने में सक्षम हो कि परमेश्वर तुम्हें क्या बात समझाना और किस पर अमल करवाना चाहता है; यह ऐसी बात है जिसे सूझ-बूझ रखने वाला एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है। विशेषकर, वर्तमान चरण में परमेश्वर जो वचन कह रहा है, वे खासतौर पर स्पष्ट और पारदर्शी हैं, और परमेश्वर ऐसी अनेक बातों की ओर इशारा कर रहा है जिन पर लोगों ने विचार नहीं किया है इसके साथ-साथ हर तरह की इंसानी स्थितियों की ओर इशारा कर रहा है। उसके वचन व्यापक हैं और पूरी तरह से स्पष्ट हैं। इसलिए अब, लोग बहुत-से मुद्दों को समझते हैं, लेकिन एक चीज़ अभी भी छूट रही है—लोगों का उसके वचनों को अमल में लाना। लोगों को सत्य के हर पहलू का विस्तार से अनुभव करना चाहिए, उसकी छान-बीन और खोज ज़्यादा विस्तार से करनी चाहिए, बजाय इसके कि जो कुछ भी उन्हें उपलब्ध कराया जाए, महज़ उसे आत्मसात करने का इंतज़ार करें; वरना वे परजीवी से ज़्यादा कुछ नहीं हैं। वे परमेश्वर के वचनों को जानते तो हैं, फिर भी उस पर अमल नहीं करते। इस तरह का व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता और अंतत: उसे हटा दिया जाएगा। 1990 के पतरस जैसा बनने के लिए तुम लोगों में से हर एक को परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना चाहिए, अपने अनुभव में सच्चा प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ अपने सहयोग में ज़्यादा और कहीं अधिक विशाल प्रबोधन प्राप्त करना चाहिए, जो तुम्हारे अपने जीवन के लिए सदा अधिक सहायक होगा। अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, तुम लोगों द्वारा परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया ही उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है, या इसे और अधिक साफ तौर पर कहें तो, परमेश्वर में विश्वास रखना उसके वचनों को जानना, समझना, उनका अनुभव करना और उन्हें जीना है; परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की सच्चाई ऐसी ही है। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अनंत जीवन पाने की आशा करते हो लेकिन परमेश्वर के वचनों को इस प्रकार अमल में लाने का प्रयास नहीं करते मानो कि वह ऐसी कोई चीज़ है जो तुम्हारे भीतर है, तो तुम मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जा कर केवल भोज्य-पदार्थों को देखा और उनमें से किसी भी चीज़ का स्वाद चखे बिना स्वादिष्ट चीज़ों को रट लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

हटा दिया जाएगा उन्हें जो नहीं करते परमेश्वर के वचनों का अभ्यास

तुम्हारे स्वभाव में तब्दीली लाना है परमेश्वर के काम और वचन का अभिप्राय। महज़ इसे समझाना या पहचान कराना मकसद नहीं है उसका। इतना काफ़ी नहीं है, और यही सब-कुछ नहीं है। तुम ग्रहण कर सको अगर, तो आसान है समझना परमेश्वर के वचन। क्योंकि इंसानी ज़बान में लिखे हैं अधिकतर वचन। जो परमेश्वर चाहता है कि तुम जानो और करो, वो है ऐसा जो सामान्य इन्सान समझ सकता। इंसान परमेश्वर के वचनों में, हर तरह के सत्य का अनुभव करे। वो विस्तार से खोजे और जाँचे इसे। जो भी मिल जाए उसे लेने का इंतज़ार न करे, वरना मुफ़्तख़ोर के सिवा कुछ न होगा वो। जानता हो परमेश्वर के वचन के सत्य को, मगर अमल में न लाए वो, तो इसे प्रेम नहीं करता वो, आख़िरकार हटा दिया जाएगा उसको।

परमेश्वर जो कहता है अब साफ़ है। ये पारदर्शी और सुबोध है। बहुत-सी चीज़ों पर ध्यान दिलाता है परमेश्वर जो सोची नहीं हैं इंसान ने। इंसान के अलग-अलग हालात ज़ाहिर करता है वो। सबको अंगीकार करते हैं परमेश्वर के वचन। पूर्णमासी के चाँद की रोशनी की तरह साफ़ हैं वो। बहुत से मामलों को समझ सकता है इंसान। परमेश्वर के वचन को अमल में लाने की कोशिश करे इंसान। बस यही कमी है असल में इंसान में। इंसान परमेश्वर के वचनों में, हर तरह के सत्य का अनुभव करे। वो विस्तार से खोजे और जाँचे इसे। जो भी मिल जाए उसे लेने का इंतज़ार न करे, वरना मुफ़्तख़ोर के सिवा कुछ न होगा वो। जानता हो परमेश्वर के वचन के सत्य को, मगर अमल में न लाए वो, तो इसे प्रेम नहीं करता वो, आख़िरकार हटा दिया जाएगा उसको।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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