परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" | अंश 246

79 |07 अगस्त, 2020

हर एक वाक्य जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के स्वभाव को सिद्ध करता है। आप यदि मेरे वचनों पर सावधानी से मनन करोगे तो अच्छा होगा, और आप निश्चय उनसे बड़ा लाभ उठाएंगे। परमेश्वर के सार-तत्व को समझना बड़ा ही कठिन काम है, परन्तु मैं भरोसा करता हूँ कि आप सभी के पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव का कुछ तो ज्ञान है। तब, मैं आशा करता हूँ कि आप वह कार्य जिससे परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचती है और भी अधिक करेंगे और मुझे दिखाएँगे। तब ही मुझे पुनः आश्वासन मिलेगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर को हर समय अपने दिल में रखिए। जब आप कार्य करते हैं तो उसके वचनों के साथ बने रहिये। सब बातों में उसके विचारों की खोज कीजिए, और ऐसा कोई भी काम मत कीजिए जिससे परमेश्वर का अनादर और अपमान हो। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को अपने हृदय के भविष्य के खालीपन को भरने के लिए अपने मन में मत रखिये। यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप परमेश्वर के स्वभाव को ठेस लगायेंगे। यदि आपने परमेश्वर के विरूद्ध कभी भी ईश निन्दा की टिप्पणी या शिकायत नहीं की है और अपने सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ उसने आपको सौंपा है उस से यथोचित कार्य करने में समर्थ रहे हैं, साथ ही परमेश्वर के वचनों के लिए पूर्णतया समर्पण कर दिया है, तो आप प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने से बचने में सफल हुए हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप ने कभी ऐसा कहा है, "मैं ऐसा क्यों न सोचूँ कि वह परमेश्वर है?", "मैं सोचता हूँ कि ये शब्द पवित्र आत्मा के प्रकाशन से बढ़कर और कुछ नहीं हैं", "मैं नहीं सोचता कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सही है", "परमेश्वर की मानवीयता मेरी मानवीयता से बढ़कर नहीं है", "परमेश्वर का वचन सामान्य रूप से विश्वास करने योग्य नहीं है," या अन्य प्रकार की दोषारोपण संबंधी टीका टिप्पणियाँ, तो मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप अपने पापों का अंगीकार करें और पश्चाताप करें। अन्यथा, आपको पापों की क्षमा के लिए कभी अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि आपने किसी मनुष्य को नहीं, परन्तु स्वयं परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। आप सोच सकते हैं कि आप मात्र एक मनुष्य पर न्याय-विचार कर रहे हैं, किन्तु परमेश्वर का आत्मा इस रीति से विचार नहीं करता है। उसकी देह का अनादर उसके अनादर के बराबर है। यदि ऐसा है, तो क्या आपने परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई है? आपको याद रखना होगा कि जो कुछ भी परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया गया है वह उसकी देह में उसके कार्य का समर्थन करने और ऐसे कार्य को भली भांति करने के लिए किया गया है। यदि आप इसे महत्व न दें, तब मैं कह सकता हूँ आप ही वो शख्स हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करने में कभी सफल नहीं हो पाएँगे। क्योंकि आपने परमेश्वर के क्रोध को भड़का दिया है, इस प्रकार आपको सज़ा देने के लिए उसे उचित दण्ड का इस्तेमाल करना होगा।

परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होना कोई खिलवाड़ की बात नहीं है। आपको उसके स्वभाव को समझना ही होगा। इस तरह से आप धीर धीरे परमेश्वर के सार-तत्व से परिचित होते जाएँगे, जब तुम इस ज्ञान में प्रवेश कर लोगे, और इस प्रकार आप एक ही साथ एक महान और ख़ू़बसूरत स्थिति में आगे बढ़ते जाएँगे। अंत में आप अपने घृणित आत्मा पर इतनी लज्जा महसूस करेंगेकि आप अपनी शक्ल दिखाने से भी लजाएँगे। उस समय, आप परमेश्वर के स्वभाव को कम से कम ठेस पहुँचानायेंगे, आपका हृदय परमेश्वर के निकट और भी निकट होता जाएगा, और धीरे धीरे उसके लिए आपका प्यार आपके हृदय में बढ़ता जाएगा। ये मानव जाति के ख़ूबसूरत स्थिति में प्रवेश करने का एक चिन्ह है। परन्तु आप ने इसे अभी प्राप्त नहीं किया है। आपने अपनी नियति के लिए यहाँ वहाँ भटकते हुए अपने आप को थका दिया है, तो परमेश्वर के स्वभाव से परिचित होने की कौन सोचेगा? क्या इसे जारी रहना चाहिए, आप अनजाने में प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करेंगे क्योंकि आप परमेश्वर के स्वभाव के बारे में बहुत ही कम जानते हैं। तो क्या अब आप परमेश्वर के स्वभाव के विरूद्ध अपने अपराधों के लिये नींव नहीं खोद रहे हैं? मैं चाहता हूं कि आप इस बात को समझें कि परमेश्वर के स्वभाव और मेरे कार्य में कोई मतभेद नहीं है। क्योंकि यदि आप बार बार प्रशासनिक आदेशों के विरूद्ध अपराध करते रहेंगे, तो आप में से कौन है जो दण्ड से बच पाएगा? तो क्या मेरा कार्य पूरी तरह व्यर्थ नहीं हो जाएगा? इसलिए, मैं अभी भी कहता हूँ कि अपने कार्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के साथ साथ, आप जो कदम उठा रहे हैं उसके प्रति सावधान रहिए। यह एक बड़ी माँग है जो मैं आप से करूँगा और आशा करता हूँ कि आप इस पर सावधानी से विचार करेंगे और इसे महत्वपूर्ण समझेंगे। यदि एक दिन ऐसा आया जब आपके कार्य मुझे प्रचण्ड रूप से क्रोधित करें, तब परिणाम सिर्फ आपको ही भुगतने होंगे जिन पर आपको विचार करना होगा, और आपके स्थान पर दण्ड को सहने वाला और कोई नहीं होगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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