परमेश्वर के दैनिक वचन | "नये युग की आज्ञाएँ" | अंश 243

परमेश्वर के दैनिक वचन | "नये युग की आज्ञाएँ" | अंश 243

879 |23 जुलाई, 2020

कि लोगों को कई कर्तव्यों का अवश्य पालन करना चाहिए जो उन्हें करने चाहिए। इसी का लोगों को पालन करना चाहिए और इसे ही अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। पवित्रात्मा को वह करने दो जो पवित्रात्मा के द्वारा अवश्य किया जाना चाहिए; मनुष्य उसमें कोई भूमिका नहीं निभा सकता है। मनुष्य को उस पर दृढ़ रहना चाहिए जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, जिसका पवित्रात्मा से कोई संबंध नहीं है। यह कुछ नहीं बल्कि वह है जो मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए, और आज्ञा के रूप में उसका पालन किया जाना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे कि पुराने विधान की व्यवस्था का अनुपालन किया जाता है। यद्यपि अब व्यवस्था का युग नहीं है, किंतु फिर भी बहुत से वचन, व्यवस्था के युग के प्रकार के हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए, और उन्हें केवल पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने पर भरोसा करके पूरा नहीं किया जाता है, बल्कि वे हैं जिनका मनुष्य द्वारा पालन किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए: तुम लोग व्यवहारिक परमेश्वर के कार्य की आलोचना नहीं करोगे। तुम लोग उस मनुष्य का विरोध नहीं करोगे जिसकी परमेश्वर द्वारा गवाही दी गई है। परमेश्वर के सामने, तुम लोग अपना स्थान बनाए रखोगे और स्वच्छंद नहीं होगे। तुम लोगों को वाणी से संयमित होना चाहिए, और तुम लोगों के वचनों और कार्यों को परमेश्वर द्वारा गवाही के लिए व्यक्ति की व्यवस्थाओं का पालन अवश्य करना चाहिए। तुम लोगों को परमेश्वर की गवाही का आदर करना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के काम और उसके मुँह से निकले वचनों की उपेक्षा नहीं करोगे। तुम लोग परमेश्वर के स्वर और कथनों के लक्ष्य की नकल नहीं करोगे। बाह्य रूप से तुम लोग ऐसा कुछ नहीं करोगे जो परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति का स्पष्ट रूप से विरोध करता हो। प्रत्येक व्यक्ति को इसका और इससे अधिक का पालन करना चाहिए। प्रत्येक युग में, परमेश्वर कई नियम निर्दिष्ट करता है जो व्यवस्था के अनुसार होते हैं, और मनुष्य के द्वारा पालन किए जाते हैं। इसके माध्यम से, वह मनुष्य के स्वभाव को विवश करता है और उसकी ईमानदारी का पता लगाता है। उदाहरण के लिए, पुराने विधान के युग के वचनों "तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना" को लें। ये वचन आज लागू नहीं होते हैं; उस समय, वे मात्र मनुष्य के बाहरी स्वभाव को कुछ विवश करते थे, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास की ईमानदारी को प्रदर्शित करने के लिए उनका उपयोग किया जाता था और ये परमेश्वर पर विश्वास करने वालों के चिन्ह थे। यद्यपि अब राज्य का युग है, किंतु अब भी बहुत से ऐसे नियम है जिनका मनुष्य को अवश्य पालन करना चाहिए। अतीत के नियम लागू नहीं होते हैं; आज, मनुष्य के करने के लिए बहुत से, अधिक अनुकूल अभ्यास हैं, और जो कि आवश्यक हैं। वे पवित्र आत्मा के कार्य को शामिल नहीं करते हैं और मनुष्य द्वारा ही अवश्य किए जाने चाहिए।

अनुग्रह के युग में व्यवस्था के युग के बहुत से अभ्यास हटा दिए गए हैं क्योंकि ये व्यवस्थाएँ उस समय के कार्य के लिए विशेष रूप से प्रभावी नहीं थीं। उन्हें हटाने के बाद, बहुत से अभ्यास निर्दिष्ट किए गए थे जो उस युग के लिए उपयुक्त थे। और जो आज बहुत से नियम बन गए हैं। जब आज का परमेश्वर आया, तो इन नियमों को छोड़ दिया गया, और इनके अनुपालन की अब और आवश्यकता नहीं थी, और आज के कार्य के लिए कई अनुकूल अभ्यास निर्दिष्ट कर दिए गए थे। आज ये अभ्यास नियम नहीं हैं, बल्कि एक प्रभाव प्राप्त करने के लिए हैं; ये आज के लिए अनुकूल हैं—और कल, शायद, ये नियम बन जाएँगे। कुल मिलाकर, तुम्हें उसका पालन करना चाहिए जो आज के कार्य में लाभदायक है। आने वाले कल पर ध्यान न दो: आज जो किया जाता है वह आज की खातिर है। हो सकता है कि कल बेहतर अभ्यास होंगे जिन्हे करने की तुम्हें आवश्यकता होगी—किन्तु उस पर अधिक ध्यान मत दो, उसका पालन करो जिसका पालन आज किया जाना चाहिए ताकि परमेश्वर का विरोध करने से बचा जाए। आज मनुष्य के लिए निम्नलिखित का पालन करने से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है: तुम्हें अवश्य परमेश्वर को धोखा नहीं देना या परमेश्वर से कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए जो तुम्हारी आँखों के सामने खड़ा है। तुम अपने सामने परमेश्वर के सम्मुख कोई भी गंदी या अहंकारी बात नहीं कहोगे। तुम परमेश्वर के भरोसे को जीतने के लिऐ, अपने भले कार्यों और अच्छे वचनों और अच्छे भाषणों के द्वारा अपनी आँखों के सामने परमेश्वर को धोखा नहीं दोगे। तुम परमेश्वर के सामने अनादरपूर्वक क्रिया नहीं करोगे। तुम उस सब का पालन करोगे जो परमेश्वर के मुँह से बोला जाता है और उसके वचनों का प्रतिरोध, विरोध, या उसके वचनों पर विवाद नहीं करोगे। तुम परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों का वह अर्थ नहीं लगाओगे जैसा तुम्हें उचित लगेगा। तुम्हें अपनी जिह्वा के प्रति सतर्क रहना चाहिए ताकि इसे तुम्हें शैतान की कपटपूर्ण योजनाओं का शिकार होने का कारण बनने से बचा सको। तुम्हारे लिए परमेश्वर द्वारा निर्दिष्ट सीमा का उल्लंघन करने से बचने के लिए तुम्हें अपने क़दमों के प्रति सतर्क रहना चाहिए। ऐसा करना तुममें परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से अहंकारी और आडंबरपूर्ण वचनों को कहने का कारण बनेगा, और इसलिए तुम परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाओगे। तुम परमेश्वर के मुँह से निकले वचनों को लापरवाही से नहीं दोहराओगे, कहीं ऐसा न हो कि दूसरे तुम्हारी हँसी उड़ाएँ, और शैतान तुम्हें मूर्ख बनाए। तुम आज के परमेश्वर के समस्त कार्य का आज्ञापालन करोगे। भले ही तुम उसको न समझ पाओ, किंतु तुम उस पर आलोचनात्मक राय नहीं बनाओगे; तुम केवल खोज और संगति कर सकते हो। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के मूल स्थान का उल्लंघन नहीं करेगा। तुम मनुष्य की स्थिति से आज के परमेश्वर की सेवा करने से अधिक कुछ भी नहीं कर सकते हो। तुम मनुष्य की स्थिति से आज के परमेश्वर को सिखा नहीं सकते हो—ऐसा करना मार्ग से भटकना है। परमेश्वर द्वारा गवाही दिए गए व्यक्ति के स्थान पर कोई भी व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है; तुम्हारे वचनों, कार्यों, और अंतर्तम विचारों में, तुम मनुष्य की स्थिति में स्थिर हो। इसका पालन किया जाना है, यह मनुष्य का उत्तरदायित्व है, यह किसी के द्वारा भी परिवर्तनीय नहीं है, और ऐसा करना प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। यह सभी को स्मरण रखना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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