परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 15 | अंश 241

63 |07 अगस्त, 2020

पृथ्वी पर मैं मनुष्यों के हृदय में व्यवहारिक परमेश्वर स्वयं हूँ; स्वर्ग में मैं समस्त सृष्टि का स्वामी हूँ। मैंने पर्वत चढ़े हैं और नदियाँ लाँघी हैं और मानवजाति के बीच से भीतर-बाहर होता रहा हूँ। कौन व्यवहारिक परमेश्वर स्वयं का खुलेआम विरोध करने की हिम्मत करता है? कौन सर्वशक्तिमान की संप्रभुता से अलग होने का साहस करता है? कौन यह दृढ़ता से कहने का साहस करता है कि मैं, संदेह की छाया से परे, स्वर्ग में हूँ? पुनः, कौन यह दृढ़ता से कहने का साहस करता है कि मैं, त्रुटि की थोड़ी सी भी संभावना के बिना, पृथ्वी पर हूँ? समस्त मानवजाति में कोई भी उन स्थानों के बारे में स्पष्ट रूप से हर विवरण के साथ कहने में सक्षम नहीं है जहाँ मैं रहता हूँ। क्या ऐसा हो सकता है कि, जब मैं स्वर्ग में हूँ तो मैं अलौकिक परमेश्वर स्वयं हूँ? क्या ऐसा हो सकता है कि, जब मैं पृथ्वी पर हूँ तो मैं व्यवहारिक परमेश्वर स्वयं हूँ? कि मैं समस्त सृष्टि का शासक हूँ, या कि मैं समस्त मानव संसार की पीड़ा का अनुभव करता हूँ—निश्चय ही, ये सब निर्धारित नहीं कर सकते हैं कि मैं व्यवहारिक परमेश्वर स्वयं हूँ या नहीं? यदि मनुष्य ऐसा सोचता है, तो क्या वह समस्त आशाओं से परे अनाड़ी नहीं बनता है? मैं स्वर्ग में हूँ; मैं पृथ्वी पर भी हूँ; मैं सृष्टि की असंख्य वस्तुओं के बीच हूँ और असंख्य लोगों के बीच भी हूँ। मनुष्य मुझे हर दिन छू सकता है; इसके अलावा, वह मुझे हर दिन देख सकता है। जहाँ तक मानवजाति का संबंध है, मैं कभी-कभी छिपा हुआ और कभी-कभी दृश्यमान प्रतीत होता हूँ; ऐसा प्रतीत होता है कि मेरा अस्तित्व वास्तविक है, और फिर भी ऐसा भी प्रतीत होता है कि मेरा व्यक्तित्व नहीं है। मुझमें मनुष्यजाति के लिए अज्ञेय रहस्य पड़े हैं। यह ऐसा है मानो कि सभी मनुष्य मुझमें और अधिक रहस्यों को खोजने के लिए सूक्ष्मदर्शीयंत्र से झाँक रहे हों, जिसके द्वारा अपने हृदय से उस असुखद अनुभूति को दूर करने की आशा करते हों। परंतु यदि वे फ़्लूरोस्कोप का भी उपयोग करें, तब भी मानवजाति कैसे मुझमें छुपे रहस्यों में से किसी का भी खुलासा कर सकेगी?

जब मेरे लोग मेरे कार्यों के माध्यम से, मेरे साथ-साथ महिमा पाएँगे, उस समय उस विशाल लाल अजगर की माँद खोदी जाएगी, सारी कीचड़ और मिट्टी साफ की जाएगी, और असंख्य वर्षों से जमा प्रदूषित जल मेरी दहकती आग में सूख जाएगा और उसका अस्तित्व नहीं रहेगा। इसके बाद वह विशाल लाल अजगर आग और गंधक की झील में नष्ट हो जाएगा। क्या तुम लोग सचमुच मेरी सतर्क देखभाल के अधीन रहना चाहते हो ताकि अजगर द्वारा छीने न जाओ? क्या तुम लोग सचमुच इसके कपटपूर्ण दाँव-पेंचों से घृणा करते हो? कौन मेरे लिए निष्ठावान गवाही देने में सक्षम है? मेरे नाम के वास्ते, मेरे आत्मा के वास्ते, मेरी समस्त प्रबंधन योजना के वास्ते—कौन अपने शरीर की समस्त ताकत समर्पित करने में सक्षम है? आज, जब राज्य मनुष्यों के संसार में है, यही वह समय है कि मैं व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के संसार में आया हूँ। यदि ऐसा ना हेाता, क्या कोई है जो, बहादुरी से, मेरी ओर से युद्ध क्षेत्र में जाता? ताकि राज्य आकार ले सके, ताकि मेरा हृदय तृप्त हो सके, और पुनः, ताकि मेरा दिन आ सके, ताकि वह समय आ सके जब सृष्टि की असंख्य वस्तुएँ पुर्नजन्म लेती हैं और बहुतायत से बढ़ती हैं, ताकि मनुष्य को पीड़ा के सागर से बचाया जा सके, ताकि आने वाला कल आ सके, और ताकि वह अद्भुत हो सके और फल-फूल सके और विकसित हो सके, और पुनः, ताकि भविष्य का आंनद हो सके, समस्त मानवजाति मेरे लिए अपने आप को बलिदान करने में कुछ भी नहीं बचाते हुए, अपनी संपूर्ण शक्ति से प्रयास कर रही है। क्या यह इस बात का एक संकेत नहीं है कि विजय पहले से ही मेरी है, और क्या यह मेरी योजना की परिपूर्णता का निशान नहीं है?

मनुष्य जितना अधिक अंत के दिनों में रहेंगे, उतना ही अधिक वे संसार का खालीपन महसूस करेंगे और उतना ही उनमें जीवन जीने का उनका साहस कम हो जाएगा। इसी कारण से, असंख्य लोग निराशा में मर गए हैं, असंख्य अन्य लोग अपनी खोज में निराश हो गए हैं, और असंख्य अन्य लोग शैतान के हाथों स्वयं में छेड़छाड़ किए जाने की पीड़ा भोग रहे हैं। मैं ने बहुत से लोगों को बचाया है, बहुतों को राहत दी, और कितनी ही बार, जब मानवजाति ने ज्योति खो दी, मैं उन्हें वापस ज्योति के स्थान पर ले गया, ताकि वे मुझे ज्योति के भीतर जान सकें, और खुशी के बीच मेरा आनंद ले सकें। क्योंकि मेरी ज्योति के आने की वजह से, मेरे राज्य में रहने वाले लोगों के हृदय में श्रद्धा बढ़ती है, क्योंकि प्रेम करने के लिए मैं मानवजाति के लिए एक परमेश्वर हूँ, ऐसा परमेश्वर जिससे मानवजाति अनुरक्त आसक्ति के साथ चिपकती है, और मानवजाति मेरी आकृति की स्थायी छाप से परिपूर्ण हो जाती है। किंतु, हर चीज पर विचार किए जाने पर, कोई भी ऐसा नहीं है जो समझता हो कि क्या यह पवित्रात्मा का कार्य है, या देह की क्रिया है। यही अकेली बात एक जीवनकाल के दौरान मनुष्य के लिए सूक्ष्म विस्तार में अनुभव पाने हेतु पर्याप्त है। मनुष्य ने अपने हृदय की अंतरतम गहराईयों में मुझे कभी भी तिरस्कृत नहीं किया है, बल्कि, वह अपनी आत्मा की गहराई में मुझसे लिपटा रहता है। मेरी बुद्धि उसकी सराहना को ऊपर उठाती है, जो अद्भुत कार्य मैं करता हूँ वे उसकी आँखों के लिए एक दावत हैं, मेरे वचन उसके मन को हैरान करते हैं, और फिर भी वे उसे बहुत अच्छे लगते हैं। मेरी वास्तविकता मनुष्य को अनिश्चित, अवाक् और व्यग्र कर देती है, और फिर भी वह सब स्वीकार करने के लिये तैयार है। क्या यह मनुष्य का सटीक माप नहीं है, जो कि वास्तव में वह है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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