परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (4)" | अंश 33

02 मार्च, 2021

कार्य के इस अंतिम चरण में, वचन के द्वारा परिणामों को प्राप्त किया जाता है। वचन के माध्यम से, मनुष्य बहुत से रहस्यों को और पिछली पीढ़ियों के दौरान किये गए परमेश्वर के कार्य को समझ जाता है; वचन के माध्यम से, मनुष्य को पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध किया जाता है; वचन के माध्यम से, मनुष्य पिछली पीढ़ियों के द्वारा कभी नहीं सुलझाए गए रहस्यों को, और साथ ही अतीत के समयों के भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों के कार्य को, और उन सिद्धान्तों को समझ जाता है जिनके द्वारा वे काम करते थे; वचन के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर स्वयं के स्वभाव को, और साथ ही मनुष्य की विद्रोहशीलता और विरोध को भी समझ जाता है, और स्वयं अपने सार को जान जाता है। कार्य के इन चरणों और बोले गए सभी वचनों के माध्यम से, मनुष्य आत्मा के कार्य को, परमेश्वर के देहधारी देह के कार्य को, और इसके अतिरिक्त, उसके सम्पूर्ण स्वभाव को जान जाता है। छ: हज़ार वर्षों से अधिक की परमेश्वर की प्रबंधन योजना का तुम्हारा ज्ञान भी वचन के माध्यम से प्राप्त किया गया था। क्या तुम्हारी पुरानी अवधारणाओं का तुम्हारा ज्ञान और उन्हें एक ओर करने में तुम्हारी सफलता भी वचन के माध्यम से प्राप्त नहीं की गयी थी? पिछले चरण में, यीशु ने चिन्ह और अद्भुत काम किए थे, परन्तु इस चरण में ऐसा नहीं है। वह अब ऐसा क्यों नहीं करता है, क्या इस बारे में तुम्हारी समझ भी वचन के माध्यम से ही प्राप्त नहीं की गई थी? इसलिए, इस चरण में बोले गए वचन पिछली पीढ़ियों के प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा किए गए कार्यों से बढ़कर हैं। यहाँ तक कि भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ भी ऐसे परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकती थीं। भविष्यद्वक्ताओं ने केवल भविष्यवाणियां कीं थीं, कि भविष्य में क्या होगा, परन्तु उस कार्य के बारे में नहीं कहा था जिसे परमेश्वर उस समय करने वाला था। उन्होंने मनुष्य की ज़िन्दगियों में उनकी अगुवाई करने के लिए, मनुष्य को सच्चाई प्रदान करने के लिए या मनुष्य पर रहस्यों को प्रकट करने के लिए नहीं बोला था, और उनके बोल जीवन प्रदान करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं थे। इस चरण में बोले गए वचनों के बारे में, इसमें भविष्यवाणी और सत्य है, परन्तु वे प्रमुख रूप से मनुष्य को जीवन प्रदान करने के काम आते हैं। वर्तमान समय के वचन भविष्यद्वक्ताओं की भविष्यवाणियों से भिन्न हैं। यह कार्य का ऐसा चरण है जो भविष्यवाणियां करने के लिए नहीं बल्कि मनुष्य के जीवन के लिए है, और मनुष्य के जीवन स्वभाव को परिवर्तित करने के लिए है। प्रथम चरण पृथ्वी पर परमेश्वर की आराधना करने हेतु मनुष्य के लिए एक मार्ग तैयार करने का यहोवा का कार्य था। यह पृथ्वी पर कार्य के स्रोत को खोजने हेतु आरम्भ का कार्य था। उस समय, यहोवा ने इस्राएलियों को सब्त का पालन करना, अपने माता-पिता का आदर करना और दूसरों के साथ शांतिपूर्वक रहना सिखाया। चूँकि उस समय के मनुष्य नहीं समझते थे कि किस चीज ने मनुष्य को बनाया था, न ही वह समझते थे कि पृथ्वी पर किस प्रकार रहना है, इसलिए कार्य के प्रथम चरण में मनुष्य की ज़िन्दगियों में उनकी अगुवाई करना परमेश्वर के लिए आवश्यक था। वह सब कुछ जो यहोवा ने उनसे कहा था उसे इससे पहले मानवजाति को ज्ञात नहीं करवाया गया था या उनके पास नहीं था। उस समय भविष्यवाणियां करने के लिए परमेश्वर ने अनेक भविष्यद्वक्ताओं को खड़ा किया, और वे सभी ऐसा यहोवा की अगुवाई में करते थे। यह परमेश्वर के कार्य का मात्र एक भाग था। प्रथम चरण में, परमेश्वर देह नहीं बना था, अतः वह भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से सभी कबीलों और जातियों से बात करता था। जब यीशु ने उस समय अपना कार्य किया, तब उसने इतनी बातें नहीं की जितनी आज के दिन हैं। अंत के दिनों में वचन के इस कार्य को युगों और पिछली पीढ़ियों में कभी नहीं किया गया था। यद्यपि यशायाह, दानिय्येल और यूहन्ना ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ कीं थीं, फिर भी ऐसी भविष्यवाणियाँ उन वचनों से बिलकुल अलग हैं जिन्हें अब बोला जाता है। उन्होंने जो कुछ कहा था वे केवल भविष्यवाणियाँ थीं, किन्तु आज के वचन नहीं हैं। यदि आज जो कुछ मैंने कहा मैं उसे भविष्यवाणियों में बदल दूँ, तो क्या तुम लोग समझने में समर्थ होगे? मान लो कि जिस बारे में मैं बात करता हूँ वो ऐसे मुद्दों के बारे में होते जो मेरे जाने के बाद होंगे, तो तुम समझ कैसे प्राप्त कर सकते थे? वचन के कार्य को यीशु के समय में या व्यवस्था के युग में कभी नहीं किया गया था। कदाचित् कुछ लोग कह सकते हैं, "क्या यहोवा ने भी अपने कार्य के समय में वचनों को नहीं कहा था? बीमारियों की चंगा करने, दुष्टात्माओं को निकालने और चिन्ह एवं अद्भुत कामों को करने के अतिरिक्त, क्या यीशु ने भी उस समय वचनों को नहीं कहा था?" वचन कैसे बोले जाते हैं इनमें अन्तर है। यहोवा के द्वारा कहे गए वचनों का सार क्या था? वह केवल पृथ्वी पर मनुष्य की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई कर रहा था, जो जीवन के आध्यात्मिक मामलों को नहीं छूता था। ऐसा क्यों कहा जाता है कि यहोवा के वचनों की घोषणा सभी स्थानों के लोगों को निर्देश देने के लिए थी? "निर्देश" शब्द स्पष्ट रूप से बताने और सीधे आदेश देने की ओर संकेत करता है। उसने जीवन के साथ मनुष्य की आपूर्ति नहीं की; बल्कि इसके बजाए, उसने बस मनुष्य का हाथ पकड़कर उसको अपना आदर करना सिखाया था। यह ज़्यादातर दृष्टांत के माध्यम से नहीं किया गया था। इस्राएल में यहोवा का कार्य मनुष्य से व्यवहार करना या उसे अनुशासित करना या न्याय करना और ताड़ना देना नहीं था; यह अगुवाई करने के लिए था। यहोवा ने मूसा से कहा कि वो उसके लोगों से कहे कि वे जंगल में मन्ना इकट्ठा करें। प्रतिदिन सूर्योदय से पहले, उन्हें मन्ना इकट्ठा करना था, केवल इतना कि उसे उसी दिन ही खाया जा सके। मन्ना को अगले दिन के लिए नहीं रखा जा सकता था, क्योंकि तब उसमें फफूँद लग जाता। उसने मनुष्य को भाषण नहीं दिया या उनके स्वभावों को प्रकट नहीं किया था, और उसने उनकी राय और विचारों को प्रकट नहीं किया था। उसने मनुष्य को बदला नहीं था परन्तु उनकी ज़िन्दगियों में उनकी अगुवाई की थी। उस समय, मनुष्य एक बालक के समान था; मनुष्य कुछ नहीं समझता था और केवल कुछ मूलभूत यांत्रिक गतिविधियाँ ही कर सकता था; इसलिए, यहोवा ने केवल लोगों की अगुवाई करने के लिए व्यवस्थाओं की स्थापना की थी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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