परमेश्वर के दैनिक वचन | "व्यवस्था के युग का कार्य" | अंश 19

66 |07 अगस्त, 2020

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परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना

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अंत के दिनों के मसीह के कथनों के पाठ

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परमेश्वर के दैनिक वचन | "व्यवस्था के युग का कार्य" | अंश 19

दो हज़ार वर्षों से पूर्व जिस दौरान यहोवा ने अपना कार्य किया, मनुष्य कुछ नहीं जानता था, और, लगभग समस्त मानवजाति चरित्रहीनता में पतित हो गई थी, जल प्रलय द्वारा संसार के विनाश से पहले तक, वे स्वच्छंद संभोग और भ्रष्टता की गहराई तक पहुँच गए थे; जिसमें उनके हृदय यहोवा से रिक्त थे, उसके मार्ग से तो और भी अधिक रिक्त थे। उन्होंने उस कार्य को कभी नहीं समझा था जिसे यहोवा करने जा रहा था; उनमें समझ का अभाव था, और ज्ञान तो बिलकुल भी नहीं था, और, एक साँस लेती हुई मशीन के समान, वे मनुष्य, परमेश्वर, संसार और सदृश चीज़ों से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। पृथ्वी पर वे साँप के समान बहुत से प्रलोभनों में व्यस्त थे, और बहुत सी ऐसी बातें कहते थे जो यहोवा का अपमान करती थी, लेकिन क्योंकि वे अनभिज्ञ थे इसलिए यहोवा ने उन्हें ताड़ित या अनुशासित नहीं किया था। केवल जलप्रलय के बाद ही, जब नूह 601 वर्ष का था, यहोवा विधिवत् रूप से नूह के सामने प्रकट हुआ और इन कुल 2,500 वर्षों में, उसने उसका तथा उसके परिवार का मार्गदर्शन किया, और व्यवस्था के युग की समाप्ति तक नूह और उसके वंशजों के साथ-साथ, जलप्रलय में जिन्दा बचे पक्षियों और जानवरों की अगुआई की। वह इस्राएल में कार्य पर था, अर्थात्, 2,000 वर्षों तक विधिवत रूप से इस्राएल में कार्य पर था, और 500 वर्षों तक एक ही समय में इस्राएल और उसके बाहर कार्य पर था, जो साथ मिलकर 2,500 वर्ष होते हैं। इस अवधि के दौरान, उसने इस्राएलियों को निर्देश दिया कि यहोवा की सेवा करें, उन्हें मन्दिर का निर्माण करना चाहिए और याजकों के लबादे पहनने चाहिए, और उषाकाल में नंगे पाँव मन्दिर में प्रवेश करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उनके जूते मन्दिर को गंदा कर दें और मन्दिर के ऊपर से उन पर आग गिरा दी जाए और उन्हें जलाकर मार डाले। उन्होंने अपने कर्तव्यों को पूरा किया और यहोवा की योजनाओं के प्रति समर्पित हो गए। उन्होंने मन्दिर में यहोवा से प्रार्थना की, और यहोवा का प्रकटन प्राप्त करने के बाद, अर्थात्, यहोवा के बोलने के बाद, उन्होंने जनसाधारण की अगुवाई की और उन्हें सिखाया कि उन्हें यहोवा—उनके परमेश्वर—के प्रति आदर दर्शाना चाहिए। और यहोवा ने उनसे कहा कि उन्हें एक मन्दिर और एक वेदी बनानी चाहिए, और यहोवा के द्वारा निर्धारित समय पर, अर्थात्, फसह के पर्व पर, उन्हें यहोवा की सेवा हेतु बलिदान के रूप में वेदी पर रखने के लिए नए जन्मे हुए बछड़ों और मेम्नों को तैयार करना चाहिए, जिस से लोगों को नियन्त्रण में रखा जा सके और उनके हृदयों में यहोवा के लिए आदर उत्पन्न किया जा सके। उन्होंने इस व्यवस्था का पालन किया या नहीं यह यहोवा के प्रति उनकी वफादारी का पैमाना बन गया। यहोवा ने उनके लिए सब्त का दिन भी नियत किया, उसकी सृष्टि की रचना का सातवाँ दिन। सब्त के बाद का दिन उसने पहला दिन, यहोवा की स्तुति करने, उसके लिए भेंट चढ़ाने, और उसके लिए संगीत की रचना करने हेतु एक दिन बनाया। इस दिन, लोगों के खाने के लिए वेदी के ऊपर की बलियों को बाँटने हेतु यहोवा ने सभी याजकों को बुलाकर इकट्ठा किया ताकि वे यहोवा की वेदी पर बलियों का आनन्द उठा सकें। और यहोवा ने कहा कि वे धन्य हैं, कि उन्होंने उसके साथ एक हिस्सा साझा किया, और कि वे उसके चुने हुए लोग हैं (जो कि इस्राएलियों के साथ यहोवा की वाचा थी)। इसीलिए, आज के दिन तक, इस्राएल के लोग अभी भी कहते हैं कि यहोवा ही उनका एकमात्र परमेश्वर है, और अन्य लोगों का परमेश्वर नहीं है।

— 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

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