परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" | अंश 136

परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं" | अंश 136

147 |13 जून, 2020

देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब सबसे पहली बार उसने देह धारण किया, तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं पहचाना, और यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया। दूसरी बार भी लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया, उसे बहुत कम पहचाना, और एक बार फिर से मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया। क्या मनुष्य परमेश्वर का बैरी नहीं हैं? यदि मनुष्य उसे नहीं जानता है, तो वह परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? और वह कैसे परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हो सकता है? परमेश्वर को प्यार करना, परमेश्वर की सेवा करना, महिमा बढ़ाना—क्या ये कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? यदि तुम अपने जीवन को इन अवास्तविक, अव्यवहारिक बातों के प्रति समर्पित करते हो, तो क्या तुम व्यर्थ में श्रम नहीं करते हो? जब तुम परमेश्वर को जानते तक नहीं हो तो तुम परमेश्वर के अंतरंग कैसे हो सकते हो? क्या इस प्रकार की खोज अज्ञात और काल्पनिक नहीं है? क्या यह कपटपूर्ण नहीं है? कोई परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? परमेश्वर का अंतरंग होने का व्यवहारिक महत्व क्या है? क्या तुम परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग हो सकते हो? क्या तुम देख सकते हो कि पवित्रात्मा कितना महान और उच्च है? किसी अदृश्य, अमूर्त परमेश्वर का अंतरंग होना—क्या यह अज्ञात और काल्पनिक नहीं है? इस प्रकार की खोज का व्यावहारिक महत्व क्या है? क्या ये सभी कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? तुम जिस चीज की खोज करते हो वह है परमेश्वर का अंतरंग बनना, फिर भी वास्तव में तुम शैतान के छोटे से पालतू कुत्ते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते हो और अस्तित्वहीन "सभी चीजों के परमेश्वर" की खोज करते हो, जो कि अदृश्य, अमूर्त और तुम्हारी अपनी धारणाओं का है। अस्पष्टता से कहा जाए, तो इस प्रकार का "परमेश्वर" शैतान है, और व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो यह तुम स्वयं हो। तुम अपना स्वयं का ही अंतरंग होने का प्रयास करते हो फिर भी कहते हो कि तुम परमेश्वर का अंतरंग होने की खोज करते हो—क्या यह ईशनिंदा नहीं है? इस प्रकार की खोज का क्या मूल्य है? यदि परमेश्वर का आत्मा देहधारी नहीं होता है, तो परमेश्वर का सार मनुष्य के लिए केवल अदृश्य, अमूर्त जीवन का आत्मा, निराकार और अनाकार है, अभौतिक प्रकार का, अगम्य और अबोधगम्य है। मनुष्य किसी निराकार, चमत्कारिक, अथाह आत्मा से अंतरंग किस प्रकार से हो सकता है? क्या यह एक मज़ाक नहीं है? इस प्रकार के बेतुके तर्क गलत और अव्यावहारिक हैं। सृजन किया हुआ मनुष्य परमेश्वर के आत्मा के लिए अंतर्निहित रूप से भिन्न है, इसलिए ये दोनों किस प्रकार से अंतरंग हो सकते हैं? यदि परमेश्वर का आत्मा देह में साकार नहीं होता, यदि परमेश्वर देहधारी न हुआ होता और उसने एक प्राणी बनकर अपने आपको विनीत न बनाया होता, तो सृजन किया गया मनुष्य अयोग्य और उसका अंतरंग होने में असमर्थ दोनो होता, और उन परमेश्वर के विश्वासियों के अलावा जिनके पास उनकी आत्माओं के स्वर्ग में प्रवेश कर जाने के बाद परमेश्वर का अंतरंग होने का एक अवसर है, अधिकांश लोग परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग होने के योग्य नहीं होते। और यदि मनुष्य देहधारी परमेश्वर के मार्गदर्शन में स्वर्ग में परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करता है, तो क्या वह आश्चर्यजनक ढंग से मूर्ख अमानविक नहीं है? मनुष्य अदृश्य परमेश्वर के प्रति मात्र "भक्ति" का अनुसरण करता है और जिसे देखा जा सकता है उस परमेश्वर पर थोड़ा सा भी ध्यान नहीं देता है, क्योंकि किसी अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है—वह मनुष्य जैसा चाहे भी वैसा कर सकता है। किन्तु दृश्यमान परमेश्वर का अनुसरण इतना आसान नहीं है। जो मनुष्य एक अज्ञात परमेश्वर को खोजता है वह अवश्य परमेश्वर को प्राप्त करने में असमर्थ है, क्योंकि सभी अज्ञात और अमूर्त वस्तुएँ मनुष्य के द्वारा कल्पना की गई हैं, और मनुष्यों के द्वारा प्राप्त किए जाने में असमर्थ हैं। यदि तुम लोगों के बीच आया हुआ परमेश्वर एक शानदार और उच्च परमेश्वर होता जो तुम लोगों के लिए भी अगम्य होता, तो तुम लोग उसकी इच्छा को कैसे खोज सकते थे? और तुम लोग किस प्रकार से उसे जान और समझ सकते थे? यदि वह केवल उसका अपना कार्य करता, और मनुष्य के साथ उसका कोई भी सामान्य सम्पर्क नहीं होता, या उसमें कोई सामान्य मानवता नहीं होती और वह नश्वर मात्र की पहुँच से बाहर होता, तो, भले ही उसने तुम लोगों के लिए कितना भी अधिक कार्य किया होता किन्तु तुम लोगों का उसके साथ कोई सम्पर्क नहीं होता, और तुम लोग उसे देखने में असमर्थ होते, तो तुम लोग उसे कैसे जान सकते थे? यदि यह इस सामान्य मानवता धारण की हुई देह के लिए नहीं होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका नहीं होता; यह केवल परमेश्वर के देहधारण के कारण है कि मनुष्य इस देहधारी परमेश्वर का अंतरंग होने के योग्य है। मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग बन जाता है क्योंकि मनुष्य उसके सम्पर्क में आता है, क्योंकि मनुष्य उसके साथ रहता है और उसका साथ बनाए रखता है, और धीरे-धीरे उसे जान जाता है। यदि यह इस तरह से नहीं होता, तो क्या मनुष्य द्वारा अनुसरण किया जाना व्यर्थ नहीं होता? अर्थात्, यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता की वजह से है कि मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग होने में सक्षम है। यह केवल परमेश्वर के देहधारी होने के कारण है कि मनुष्य के पास अपने कर्तव्य को पूरा करने का एक अवसर है, और वास्तविक परमेश्वर की आराधन करने का एक अवसर है। क्या यह सर्वाधिक वास्तविक और व्यवहारिक सत्य नहीं है? अब, क्या तुम अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करते हो? केवल जब परमेश्वर अपने आप को एक निश्चित स्थिति तक विनम्र कर लेता है, अर्थात्, केवल जब परमेश्वर देह धारण कर लेता है, तभी मनुष्य उसका अंतरंग और विश्वासपात्र बन सकता है। परमेश्वर पवित्रात्मा का हैः मनुष्य कैसे इस पवित्रात्मा का अंतरंग होने के योग्य हो सकता है, जो कि बहुत ही उच्च और अथाह है? केवल जब परमेश्वर का आत्मा देह में अवरोहण करता है, और मनुष्य के जैसे बाह्य स्वरूप वाला प्राणी बनता है, तभी मनुष्य उसकी इच्छा को समझ सकता है और वास्तव में उसके द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। वह देह में बोलता और कार्य करता है, मनुष्य की खुशियों, दुःखों और क्लेशों में सहभागी होता है, इसी संसार में मनुष्य के जैसे रहता है, मनुष्य की रक्षा करता है, उसका मार्गदर्शन करता है, और इसके माध्यम से मनुष्य को शुद्ध करता है, और अपने द्वारा मनुष्य को उद्धार और अपने आशीषों को प्राप्त करने की अनुमति देता है। इन चीज़ों को प्राप्त करने के बाद, मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को वास्तव में समझता है, और केवल तभी वह परमेश्वर का अंतरंग बन सकता है। केवल यही व्यवहारिक है। यदि परमेश्वर मनुष्य के लिए अदृश्य और अमूर्त होता, तो मनुष्य उसका कैसे अंतरंग हो सकता था? क्या यह खोखला सिद्धांत नहीं है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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