परमेश्वर के दैनिक वचन : देहधारण | अंश 136

13 जून, 2020

देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब वह पहली बार देह बना, तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं पहचाना, और उन्होंने यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया। फिर, जब वह दूसरी बार देह बना, तो लोगों ने फिर भी उस पर विश्वास नहीं किया, और पहचाना तो बिलकुल भी नहीं, और उन्होंने एक बार फिर से मसीह को सलीब पर चढ़ा दिया। क्या मनुष्य परमेश्वर का बैरी नहीं है? यदि मनुष्य उसे नहीं जानता, तो वह परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? कैसे वह परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हो सकता है? क्या परमेश्वर से प्यार करने, परमेश्वर की सेवा करने, और परमेश्वर की महिमा बढ़ाने के मनुष्य के दावे कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? यदि तुम अपने जीवन को इन अवास्तविक, अव्यावहारिक बातों को समर्पित करते हो, तो क्या तुम व्यर्थ में श्रम नहीं करते हो? तुम परमेश्वर के अंतरंग कैसे हो सकते हो, जब तुम जानते तक नहीं कि परमेश्वर कौन है? क्या इस प्रकार की खोज अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है? क्या यह कपटपूर्ण नहीं है? कोई परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? परमेश्वर का अंतरंग होने के व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या तुम परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग हो सकते हो? क्या तुम देख सकते हो कि पवित्रात्मा कितना महान और उच्च है? किसी अदृश्य, अमूर्त परमेश्वर का अंतरंग होना—क्या यह अस्पष्ट और अमूर्त नहीं है? इस प्रकार की खोज के व्यावहारिक मायने क्या हैं? क्या यह सब एक कपटपूर्ण झूठ नहीं है? तुम जिस चीज का प्रयास करते हो, वह है परमेश्वर का अंतरंग बनना, पर वास्तव में तुम शैतान के छोटे-से पालतू कुत्ते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, और तुम अस्तित्वहीन "सभी चीजों के परमेश्वर" की खोज करते हो, जो कि अदृश्य, अमूर्त और तुम्हारी अपनी धारणाओं का उत्पाद है। अस्पष्ट रूप से कहा जाए, तो इस प्रकार का "परमेश्वर" शैतान है, और व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो यह तुम स्वयं हो। तुम अपना स्वयं का ही अंतरंग होने का प्रयास करते हो, फिर भी कहते हो कि तुम परमेश्वर का अंतरंग होने का प्रयास करते हो—क्या यह ईशनिंदा नहीं है? ऐसी खोज का क्या मूल्य है? यदि परमेश्वर का आत्मा देह नहीं बनता, तो परमेश्वर का सार मनुष्य के लिए केवल अदृश्य, अमूर्त जीवन का आत्मा, रूपहीन और निराकार है, अभौतिक प्रकार का, अगम्य और अबोधगम्य है। मनुष्य किसी निराकार, चमत्कारी, अथाह आत्मा का अंतरंग कैसे हो सकता है? क्या यह एक मजाक नहीं है? इस प्रकार के बेतुके तर्क गलत और अव्यावहारिक हैं। सृजित मनुष्य परमेश्वर के आत्मा के लिए अंतर्निहित रूप से भिन्न है, इसलिए ये दोनों अंतरंग कैसे हो सकते हैं? यदि परमेश्वर का आत्मा देह में साकार नहीं होता, यदि परमेश्वर देह न बनता और उसने एक सृजित प्राणी बनकर अपने आपको विनीत न बनाया होता, तो सृजित मनुष्य उसका अंतरंग होने में अयोग्य और असमर्थ दोनों होता, और उन परमेश्वर के विश्वासियों के अलावा, जिनके पास उनकी आत्माओं के स्वर्ग में प्रवेश कर जाने के बाद परमेश्वर का अंतरंग होने का एक अवसर हो सकता है, अधिकतर लोग परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग होने के अयोग्य होते। और यदि लोग देहधारी परमेश्वर के मार्गदर्शन में स्वर्ग में परमेश्वर के अंतरंग होने की इच्छा करते हैं, तो क्या वे आश्चर्यजनक ढंग से मूर्ख अमानव नहीं हैं? लोग केवल अदृश्य परमेश्वर के प्रति "वफ़ादारी" का अनुसरण करते हैं और देखे जा सकने वाले परमेश्वर पर थोड़ा-सा भी ध्यान नहीं देते, क्योंकि किसी अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करना बहुत आसान है। लोग उसे जिस तरह चाहें, कर सकते हैं। किंतु दृश्यमान परमेश्वर का अनुसरण इतना आसान नहीं है। जो व्यक्ति किसी अज्ञात परमेश्वर को खोजता है, वह परमेश्वर को प्राप्त करने में पूरी तरह असमर्थ रहता है, क्योंकि सभी अज्ञात और अमूर्त वस्तुएँ मनुष्य द्वारा कल्पित हैं, और मनुष्य उन्हें प्राप्त नहीं कर सकता। यदि तुम लोगों के बीच आया हुआ परमेश्वर एक उच्च और असाधारण परमेश्वर होता, जो तुम लोगों के लिए अगम्य होता, तो तुम लोग उसकी इच्छा को कैसे समझ पाते? और तुम किस तरह उसे जान और समझ पाते? यदि वह केवल अपना कार्य करता, और मनुष्य के साथ उसका कोई भी सामान्य संपर्क न होता, या उसमें कोई सामान्य मानवता नहीं होती और वह मनुष्यों की पहुँच से बाहर होता, तो भले ही उसने तुम लोगों के लिए कितना भी अधिक कार्य किया होता, किंतु तुम लोगों का उसके साथ कोई संपर्क न होता, और तुम लोग उसे देखने में असमर्थ होते, तो तुम लोग उसे कैसे जान सकते थे? यदि यह सामान्य मानवता से युक्त देह का मामला न होता, तो मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका न होता; यह केवल परमेश्वर के देह बनने के कारण है कि मनुष्य देहधारी परमेश्वर का अंतरंग होने के योग्य है। लोग परमेश्वर के अंतरंग इसलिए हो पाते हैं, क्योंकि वे उसके संपर्क में आते हैं, क्योंकि वे उसके साथ इकट्ठे रहते हैं और उसका साथ बनाए रखते हैं, और इसलिए धीरे-धीरे उसे जान जाते हैं। यदि ऐसा न होता, तो क्या मनुष्य का अनुसरण व्यर्थ न होता? अर्थात्, यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण नहीं, बल्कि देहधारी परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता की वजह से है कि मनुष्य परमेश्वर का अंतरंग होने में सक्षम है। यह केवल परमेश्वर के देह बनने के कारण है कि लोगों के पास अपना कर्तव्य पूरा करने का अवसर है, और वास्तविक परमेश्वर की आराधना करने का अवसर है। क्या यह सर्वाधिक वास्तविक और व्यावहारिक सत्य नहीं है? अब, क्या तुम अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर का अंतरंग होने की इच्छा करते हो? केवल जब परमेश्वर अपने आपको एक निश्चित बिंदु तक विनम्र कर लेता है, अर्थात्, केवल जब परमेश्वर देह बनता है, तभी मनुष्य उसका अंतरंग और विश्वासपात्र बन सकता है। परमेश्वर पवित्रात्मा का है : लोग इस पवित्रात्मा के अंतरंग होने के योग्य कैसे हो सकते हैं, जो कि बहुत ही उच्च और अथाह है? केवल जब परमेश्वर का आत्मा देह में अवरोहण करता है, और मनुष्य के जैसे बाह्य स्वरूप वाला प्राणी बनता है, तभी लोग उसकी इच्छा को समझ सकते हैं और वास्तव में उसके द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं। वह देह में बोलता और कार्य करता है, मानवजाति की खुशियों, दुःखों और क्लेशों में सहभागी होता है, उसी संसार में रहता है जिसमें मानवजाति रहती है, मनुष्यों की रक्षा करता है, उनका मार्गदर्शन करता है, और इसके माध्यम से लोगों को शुद्ध करता है और उन्हें अपना उद्धार और अपने आशीष प्राप्त करने देता है। इन चीज़ों को प्राप्त करने के बाद लोग वास्तव में परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं, और केवल तभी वे परमेश्वर के अंतरंग बन सकते हैं। केवल यही व्यावहारिक है। यदि परमेश्वर लोगों के लिए अदृश्य और अमूर्त होता, तो फिर वे उसके अंतरंग कैसे हो सकते थे? क्या यह खोखला सिद्धांत नहीं है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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