परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (3)" | अंश 115

248 |06 अगस्त, 2020

परमेश्वर देह बनता है यह मनुष्य को परमेश्वर की देह को जानने की अनुमति देने के अभिप्राय से नहीं है, या देहधारी परमेश्वर की देह और मनुष्य की देह के बीच भेद करने की अनुमति देने के लिए नहीं है; मनुष्य की विवेक की योग्यता को प्रशिक्षित करने के लिए परमेश्वर देह नहीं बनता है, मनुष्य के लिए इस अभिप्राय के साथ तो बिलकुल भी नहीं कि वह परमेश्वर के देहधारी देह की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिलेगी। इसमें से कुछ भी परमेश्वर के देह बनने के लिए मूल इच्छा नहीं है। मनुष्य की निन्दा करने के लिए, जानबूझकर मनुष्य को प्रकट करने के लिए, या चीज़ों को मनुष्य के लिए कठिन बनाने के लिए परमेश्वर देह नहीं बनता है। इनमें से कोई भी परमेश्वर की मूल इच्छा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह ऐसा कार्य है जो अपरिहार्य है। यह उसके बड़े कार्य और उसके बड़े प्रबंधन के लिए है कि वह ऐसा करता है, और उन कारणों के लिए नहीं है जिनकी मनुष्य कल्पना करता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल तभी आता है जब उसके कार्य के द्वारा अपेक्षित होता है, और हमेशा जब आवश्यकता होती है। वह पृथ्वी पर घूमने-फिरने के इरादे से नहीं आता है, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। अन्यथा वह इतने भारी उत्तरदायित्व को क्यों ग्रहण करेगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम लेगा? केवल तभी परमेश्वर देह बनता है जब उसे ऐसा करना है, और वह हमेशा एक अद्वितीय महत्व के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ मनुष्य को उस पर एक नज़र डालने और अपनी आँखों को खोलेने की अनुमति देने के लिए होता, तो वह, पूरी निश्चितता के साथ, इतनी तुच्छता से मनुष्य के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन और अपने बड़े काम के लिए, और अपने लिए बहुत से लोगों को प्राप्त करने में सक्षम होने के लिए आता है। वह उस युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए और शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देह में आता है। इसके अतिरिक्त, वह समस्त मानवजाति की उनकी ज़िन्दगियों में अगुवाई करने के लिए आता है। यह सब कुछ उसके प्रबंधन से सम्बन्धित है, और ऐसा कार्य है जो पूरे विश्व से सम्बन्धित है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने की अनुमति देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बना होता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों नहीं करता? क्या यह अत्यधिक आसानी का मामला नहीं है? परन्तु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाए बसने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए एक उपयुक्त स्थान को चुनता है जो उसे अवश्य करना चाहिए। केवल यह अकेला देह ही अत्यधिक महत्व का है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और साथ ही एक संपूर्ण युग के कार्य को भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात दोनों करता है। यह समस्त महत्वपूर्ण मामला है जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है, और पृथ्वी पर आए परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के एक चरण का महत्व है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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