परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (3)" | अंश 113

परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारण का रहस्य (3)" | अंश 113

0 |14 अक्टूबर, 2020

जब परमेश्वर अपना कार्य करता है, तो वह किसी निर्माण या आंदोलनों में शामिल होने नहीं आता, बल्कि अपनी सेवकाई पूरी करने के लिए आता है। हर बार जब वह देह बनता है, तो यह केवल कार्य के किसी चरण को पूरा करने और एक नए युग का सूत्रपात करने के लिए होता है। अब राज्य के युग का आगमन हो चुका है, और राज्य के लिए प्रशिक्षण की शुरुआत भी। कार्य का यह चरण मनुष्य का कार्य नहीं है, और यह एक खास हद तक मनुष्य पर कार्य करने के लिए नहीं है, बल्कि यह केवल परमेश्वर के कार्य के एक हिस्से को पूरा करने के लिए है। जो वह करता है, वह मनुष्य का कार्य नहीं है, यह पृथ्वी को छोड़ने से पहले एक निश्चित परिणाम प्राप्त करने हेतु मनुष्य में कार्य करने के लिए नहीं है; यह उसकी सेवकाई पूरी करने और उस कार्य को समाप्त करने के लिए है, जो उसे करना चाहिए, जो पृथ्वी पर उसके कार्य के लिए उचित व्यवस्थाएँ करना और परिणामस्वरूप महिमान्वित हो जाना है। देहधारी परमेश्वर का कार्य उन व्यक्तियों के कार्य के समान नहीं है, जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा उपयोग किया जाता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर अपना काम करने आता है, तो वह केवल अपनी सेवकाई पूरी करने की परवाह करता है। जहाँ तक उसकी सेवकाई से संबंध न रखने वाले अन्य समस्त मुद्दों की बात है, वह उनमें कोई भाग नहीं लेता, यहाँ तक कि वह उनसे आँख मूँद लेता है। वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए, और वह उस कार्य की बिलकुल परवाह नहीं करता, जो मनुष्य को करना चाहिए। वह जो कार्य करता है, वह केवल उस युग से संबंधित होता है जिसमें वह होता है, और उस सेवकाई से संबंधित होता है जिसे उसे पूरा करना चाहिए, मानो अन्य सभी मुद्दे उसके दायरे से बाहर हों। वह एक मनुष्य के रूप में जीने के बारे में स्वयं को अधिक मूलभूत ज्ञान से सुसज्जित नहीं करता, न ही वह अधिक सामाजिक कौशल सीखता है और न ही खुद को ऐसी अन्य किसी चीज़ से लैस करता है जिसे मनुष्य समझता है। वह उन तमाम चीज़ों की ज़रा भी परवाह नहीं करता जो इंसान में होनी चाहिए, और वह मात्र उस कार्य को करता है जो उसका कर्तव्य है। और इस प्रकार, जैसा कि मनुष्य इसे देखता है, देहधारी परमेश्वर इतना अपूर्ण है कि जो बातें मनुष्य में होनी चाहिए, वह उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता, और उसे ऐसी बातों की कोई समझ नहीं है। जीवन का सामान्य ज्ञान और साथ ही व्यक्तिगत आचरण को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत और दूसरों के साथ बातचीत जैसे मामले मानो उससे कोई संबंध नहीं रखते। लेकिन तुम देहधारी परमेश्वर में असामान्यता का जरा-सा भी संकेत नहीं पा सकते। कहने का अभिप्राय यह है कि उसकी मानवता केवल एक सामान्य व्यक्ति के रूप में उसके जीवन और उसके मस्तिष्क के सामान्य विवेक को बनाए रखती है और उसे सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता प्रदान करती है। लेकिन उसके अंदर उन सब बातों में से ऐसी कोई अन्य बात नहीं है, जो सिर्फ़ मनुष्य (सृजित प्राणियों) में होनी चाहिए। परमेश्वर केवल अपनी सेवकाई पूरी करने के लिए देहधारी बनता है। उसका कार्य पूरे युग के लिए निर्देशित होता है, न कि किसी एक व्यक्ति या स्थान के लिए, वह समूचे विश्व के लिए निर्देशित होता है। यही उसके कार्य की दिशा और वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा वह कार्य करता है। कोई इसे बदल नहीं सकता, और मनुष्य के पास इसमें शामिल होने का कोई उपाय नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो वह अपने साथ उस युग के कार्य को लेकर आता है, और बीस, तीस, चालीस यहाँ तक कि सत्तर या अस्सी वर्षों तक मनुष्य के साथ रहने का उसका कोई इरादा नहीं होता, जिससे कि मनुष्य उसे बेहतर ढंग से समझ सके और उसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त कर सके। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है! ऐसा करने से परमेश्वर के अंतर्निहित स्वभाव के बारे में मनुष्य का ज्ञान बिलकुल भी गहरा नहीं होगा; इसके बजाय, यह केवल उसकी धारणाओं में वृद्धि ही करेगा और उसकी धारणाओं और विचारों को पुख्ता ही बनाएगा। इसलिए तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि वास्तव में देहधारी परमेश्वर का कार्य क्या है। निश्चित रूप से तुम लोग मेरे इन वचनों को समझने में असफल नहीं हो सकते, जो मैंने तुम लोगों से कहे थे : "मैं एक सामान्य मनुष्य के जीवन का अनुभव करने के लिए नहीं आया हूँ"। क्या तुम लोग इन वचनों को भूल गए हो : "परमेश्वर पृथ्वी पर एक सामान्य मनुष्य का जीवन जीने के लिए नहीं आता"? तुम लोग परमेश्वर के देह बनने के उद्देश्य को नहीं समझते, और न ही तुम लोग इसका अर्थ जानते हो कि "परमेश्वर एक सृजित प्राणी के जीवन का अनुभव करने के इरादे से पृथ्वी पर कैसे आ सकता है?" परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपना काम पूरा करने आता है, और इसलिए पृथ्वी पर उसका कार्य थोड़े समय का होता है। वह पृथ्वी पर इस इरादे के साथ नहीं आता कि परमेश्वर का आत्मा उसके देह को एक ऐसे श्रेष्ठ मानव के रूप में विकसित करे, जो कलीसिया की अगुआई करेगा। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह वचन का देह बनना है; हालाँकि मनुष्य उसके कार्य को नहीं जानता और ज़बरदस्ती चीज़ों को उस पर थोपता है। किंतु तुम सब लोगों को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर "देह बना वचन" है, न कि उस समय के लिए परमेश्वर की भूमिका निभाने हेतु पवित्र आत्मा द्वारा विकसित किया गया एक देह। स्वयं परमेश्वर विकसित किया गया उत्पाद नहीं है, बल्कि देह बना वचन है और आज वह तुम सब लोगों के बीच अपने कार्य को आधिकारिक रूप से कर रहा है। तुम सब जानते और मानते हो कि परमेश्वर का देहधारण एक तथ्यामक सत्य है, लेकिन तुम लोग ऐसा अभिनय करते हो, मानो तुम इसे समझते हो। देहधारी परमेश्वर के कार्य से लेकर उसके देहधारण के मायने और सार तक, तुम लोग इन्हें ज़रा भी समझने में असमर्थ हो, और स्मृति से वचनों को धाराप्रवाह बोलने में दूसरों का अनुसरण करते हो। क्या तुम मानते हो कि देहधारी परमेश्वर वैसा ही है, जैसी तुम कल्पना करते हो?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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