परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" | अंश 160

परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" | अंश 160

0 |25 मार्च, 2021

आरंभ में, मानवजाति के सृजन के बाद, इस्राएलियों ने परमेश्वर के कार्य के आधार के रूप में काम किया। संपूर्ण इस्राएल पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का आधार था। यहोवा का कार्य व्यवस्थाओं की स्थापना करके मनुष्य की सीधे अगुआई और चरवाही करना था, ताकि मनुष्य एक उपयुक्त जीवन जी सके और पृथ्वी पर सही तरीके से यहोवा की आराधना कर सके। व्यवस्था के युग में परमेश्वर मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता था और न ही उसे छुआ जा सकता था। क्योंकि उसने उन लोगों का मार्गदर्शन किया, जिन्हें शैतान ने सबसे पहले भ्रष्ट किया था, उन्हें शिक्षा दी, उनकी देखभाल की, उसके वचनों में केवल व्यवस्थाओं, विधानों और मानव-व्यवहार के मानदंड थे, उनमें उन लोगों के लिए जीवन के सत्य नहीं थे। उसकी अगुआई में इस्राएली शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट नहीं किए गए थे। उसका व्यवस्था का कार्य उद्धार के कार्य में केवल पहला चरण था, उद्धार के कार्य का एकदम आरंभ, और वास्तव में उसका मनुष्य के जीवन-स्वभाव में होने वाले परिवर्तनों से कुछ लेना-देना नहीं था। इसलिए, उद्धार के कार्य के आरंभ में उसे इस्राएल में अपने कार्य के लिए देह धारण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसीलिए उसे एक माध्यम—एक उपकरण—की आवश्यकता थी, जिसके ज़रिए मनुष्य के साथ संपर्क किया जा सकता। इस प्रकार, सृजित प्राणियों के मध्य से यहोवा की ओर से बोलने और कार्य करने वाले लोग उठ खड़े हुए, और इस तरह से मनुष्य के पुत्र और नबी मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आए। मनुष्य के पुत्रों ने यहोवा की ओर से मनुष्यों के मध्य कार्य किया। यहोवा द्वारा उन्हें "मनुष्य के पुत्र" कहे जाने का अर्थ है कि ऐसे लोग यहोवा की ओर से व्यवस्था निर्धारित करते हैं। वे लोग इस्राएलियों के बीच याजक भी थे; ऐसे याजक, जिनका यहोवा द्वारा ध्यान रखा जाता था और जिनकी रक्षा की जाती थी, जिनमें यहोवा का आत्मा कार्य करता था; वे लोगों के मध्य अगुआ थे और सीधे यहोवा की सेवा करते थे। दूसरी ओर, नबी सभी देशों और सभी कबीलों के लोगों के साथ यहोवा की ओर से बोलने का कार्य करते थे। उन्होंने यहोवा के कार्य की भविष्यवाणी भी की। चाहे वे मनुष्य के पुत्र हों या नबी, सभी को स्वयं यहोवा के आत्मा द्वारा ऊपर उठाया गया था और उनमें यहोवा का कार्य था। लोगों के मध्य ये वे लोग थे, जो सीधे यहोवा का प्रतिनिधित्व करते थे; उन्होंने अपना कार्य केवल इसलिए किया, क्योंकि उन्हें यहोवा ने ऊपर उठाया था, इसलिए नहीं कि वे ऐसे देह थे, जिनमें स्वयं पवित्र आत्मा ने देहधारण किया था। इसलिए, हालाँकि वे परमेश्वर की ओर से बोलने और कार्य करने में एक-समान थे, फिर भी व्यवस्था के युग में वे मनुष्य के पुत्र और नबी देहधारी परमेश्वर का देह नहीं थे। अनुग्रह के युग और अंतिम चरण में परमेश्वर का कार्य ठीक विपरीत था, क्योंकि मनुष्य के उद्धार और न्याय का कार्य दोनों स्वयं देहधारी परमेश्वर द्वारा किए गए थे, इसलिए उसकी ओर से कार्य करने के लिए नबियों और मनुष्य के पुत्रों को फिर से ऊपर उठाने की आवश्यकता नहीं थी। मनुष्य की नज़रों में उनके कार्य के सार और पद्धति में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है। इसी कारण से लोग लगातार नबियों एवं मनुष्य के पुत्रों के कार्यों को देहधारी परमेश्वर के कार्य समझ रहे हैं। देहधारी परमेश्वर का रंग-रूप मूल रूप से वैसा ही था, जैसा कि नबियों और मनुष्य के पुत्रों का था। देहधारी परमेश्वर तो नबियों की अपेक्षा और भी अधिक साधारण एवं अधिक वास्तविक था। इसलिए मनुष्य उनके मध्य अंतर करने में अक्षम है। मनुष्य केवल रूप-रंग पर ध्यान देता है, इस बात से पूरी तरह से अनजान, कि यद्यपि दोनों काम करने और बोलने में एक-जैसे हैं, फिर भी उनमें मूलभूत अंतर है। चूँकि चीज़ों को अलग-अलग करके बताने की मनुष्य की क्षमता बहुत ख़राब है, इसलिए वह सरल मुद्दों के बीच अंतर करने में भी अक्षम है, जटिल चीज़ों का तो फिर कहना ही क्या। नबियों और पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए लोग बोलते और कार्य करते थे, तो यह मनुष्य के कर्तव्य निभाने के लिए था, यह एक सृजित प्राणी का कार्य करने के लिए था, जिसे मनुष्य को करना चाहिए। किंतु देहधारी परमेश्वर के वचन और कार्य उसकी सेवकाई करने के लिए थे। यद्यपि उसका बाहरी स्वरूप एक सृजित प्राणी का था, किंतु उसका काम अपना कार्य करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सेवकाई करने के लिए था। "कर्तव्य" शब्द सृजित प्राणियों के संबंध में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि "सेवकाई" देहधारी परमेश्वर के देह के संबंध में। इन दोनों के बीच एक अनिवार्य अंतर है; इन दोनों की अदला-बदली नहीं की जा सकती। मनुष्य का कार्य केवल अपना कर्तव्य निभाना है, जबकि परमेश्वर का कार्य अपनी सेवकाई का प्रबंधन करना और उसे कार्यान्वित करना है। इसलिए, यद्यपि कई प्रेरित पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए गए और कई नबी उसके साथ थे, किंतु फिर भी उनका कार्य और उनके वचन केवल सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य निभाने के लिए थे। हो सकता है, उनकी भविष्यवाणियाँ देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए जीवन के मार्ग से बढ़कर रही हों, और उनकी मानवता देहधारी परमेश्वर की मानवता का अतिक्रमण करती हो, पर फिर भी वे अपना कर्तव्य ही निभा रहे थे, सेवकाई पूरी नहीं कर रहे थे। मनुष्य का कर्तव्य उसके कार्य को संदर्भित करता है; मनुष्य के लिए केवल यही प्राप्य है। जबकि, देहधारी परमेश्वर द्वारा की जाने वाली सेवकाई उसके प्रबंधन से संबंधित है, और यह मनुष्य द्वारा अप्राप्य है। चाहे देहधारी परमेश्वर बोले, कार्य करे, या चमत्कार करे, वह अपने प्रबंधन के अंतर्गत महान कार्य कर रहा है, इस प्रकार का कार्य उसके बदले मनुष्य नहीं कर सकता। मनुष्य का कार्य केवल सृजित प्राणी के रूप में परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के किसी दिए गए चरण में केवल अपना कर्तव्य पूरा करना है। परमेश्वर के प्रबंधन के बिना, अर्थात्‌, यदि देहधारी परमेश्वर की सेवकाई खो जाती है, तो सृजित प्राणी का कर्तव्य भी खो जाएगा। अपनी सेवकाई करने में परमेश्वर का कार्य मनुष्य का प्रबंधन करना है, जबकि मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य की पूर्ति स्रष्टा की माँगें पूरी करने के लिए अपने दायित्वों की पूर्ति है, और उसे किसी भी तरह से अपनी सेवकाई करना नहीं माना जा सकता। परमेश्वर के अंतर्निहित सार के लिए—उसके पवित्रात्मा के लिए—परमेश्वर का कार्य उसका प्रबंधन है, किंतु देहधारी परमेश्वर के लिए, जो एक सृजित प्राणी का बाहरी रूप धारण करता है, उसका कार्य अपनी सेवकाई करना है। वह जो कुछ भी कार्य करता है, अपनी सेवकाई करने के लिए करता है, और मनुष्य जो अधिकतम कर सकता है, वह है उसके प्रबंधन के क्षेत्र के भीतर और उसकी अगुआई के अधीन अपना सर्वश्रेष्ठ देना।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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