परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" | अंश 159

40 |07 अगस्त, 2020

तुम लोगों को अवश्य परमेश्वर के कार्य के दर्शन को जान लेना चाहिए और उसके कार्य के सामान्य निर्देशों को समझ लेना चाहिए। यह एक सकारात्मक तरीके से प्रवेश है। एक बार जब तुम दर्शन के सत्यों में परिशुद्धता से निपुण हो जाते हो, तो तुम्हारा प्रवेश सुरक्षित बन जाता है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसका कार्य कैसे बदलता है, तुम अपने हृदय में अडिग बने रहोगे, दर्शन के बारे में स्पष्ट रहोगे, और तुम्हारे पास तुम्हारे प्रवेश और तुम्हारी तलाश के लिए एक लक्ष्य होगा। इस तरह से, तुम्हारे भीतर का समस्त अनुभव और ज्ञान और गहराई से बढ़ेगा और अधिक परिष्कृत हो जाएगा। एक बार जब तुम बड़ी तस्वीर को उसकी सम्पूर्णता में समझ जाते हो, तो तुम जीवन में कोई नुकसान नहीं भुगतोगे, और तुम खोओगे नहीं। यदि तुम कार्यों के इन चरणों को नहीं जान लेते हो, तो तुम उनमें से प्रत्येक पर नुकसान भुगतोगे। तुम में मात्र कुछ ही दिनों में नाटकीय रूप से सुधार नहीं हो सकता है, और तुम यहाँ तक कि कुछ सप्ताहों में भी सही मार्ग को पकड़ने में समर्थ नहीं हो सकोगे। क्या यह तुम्हारी प्रगति को रोक नहीं रहा है? एक सकारात्मक तरीके से और ऐसे अभ्यासों से अधिक प्रवेश है जिन में तुम लोगों को अवश्य निपुणता प्राप्त करनी चाहिए, और इसलिए भी उसके कार्य के दर्शन के अनेक बिन्दुओं को अवश्य समझना चाहिए, जैसे कि विजय के उसके कार्य का महत्व, भविष्य में सिद्ध बनाए जाने का मार्ग, परीक्षणों और क्लेश के अनुभवों के माध्यम से क्या अवश्य प्राप्त किया जाना चाहिए, न्याय और ताड़ना का महत्व, पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांत, और सिद्धता और विजय के सिद्धांत। ये सभी दर्शन के सत्य हैं। शेष व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण, और साथ ही भविष्य की गवाही हैं। ये भी दर्शन से संबंधित सत्य हैं, और सर्वाधिक मौलिक, और साथ ही अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान में, तुम लोगों के पास प्रवेश करने और अभ्यास करने के लिए बहुत कुछ है, और यह अब बहुस्तरीय और अधिक विस्तृत है। यदि तुम्हारे पास इन सत्यों का कोई ज्ञान नहीं है, तो यह सबूत है कि तुम ने अभी प्रवेश नहीं किया है। अधिकांश समय, मनुष्य का सत्य का ज्ञान अत्यधिक उथला है; मनुष्य कुछ बुनियादी सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ है और नहीं जानता है कि मामूली मामलों को भी कैसे सँभाला जाए। मनुष्य सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होना अपने विद्रोहीपन के स्वभाव की वजह से है, और इसलिए है क्योंकि आज का उसका ज्ञान बहुत ही सतही और एकतरफ़ा है। इस प्रकार, मनुष्य को सिद्ध बनाना आसान कार्य नहीं है। तुम्हारी विद्रोहशीलता बहुत ज़्यादा है, और तुम अपने पुराने अहम् को बहुत ज़्यादा बनाए रखते हो; तुम सत्य के पक्ष में खड़े रहने में असमर्थ हो, और यहाँ तक कि तुम सबसे स्पष्ट सत्यों का अभ्यास करने में भी असमर्थ हो। ऐसे मनुष्यों को नहीं बचाया जा सकता है और ये वे लोग हैं जिन्हें जीता नहीं गया है। यदि तुम्हारे प्रवेश में न विस्तार है और न ही उसका कोई उद्देश्य है, तो तुम तक विकास बहुत ही धीमी गति से आएगा। यदि तुम्हारे प्रवेश में वास्तविकता का ज़रा सा भी अंश नहीं है, तो तुम्हारी तलाश व्यर्थ हो जाएगी। यदि तुम सत्य के सार से अनभिज्ञ हो, तो तुम अपरिवर्तित रहोगे। मनुष्य के जीवन में वृद्धि और उसके स्वभाव में परिवर्तन सभी वास्तविकता में प्रवेश करने के द्वारा और, इससे भी अधिक, विस्तृत अनुभवों में प्रवेश करने के द्वारा प्राप्त होते हैं। यदि तुम्हारे प्रवेश के दौरान तुम्हारे पास कई विस्तृत अनुभव हैं, और तुम्हारे पास अधिक वास्तविक ज्ञान और प्रवेश है, तो तुम्हारा स्वभाव शीघ्रता से बदल जाएगा। भले ही वर्तमान में तुम अभ्यास में अधिक प्रबुद्ध नहीं हो, तब भी तुम्हें कम से कम कार्य के दर्शन के बारे में प्रबुद्ध अवश्य होना चाहिए। यदि नहीं, तो तुम प्रवेश करने में असमर्थ होगे, और तुम ऐसा तब तक करने में असमर्थ रहोगे जब तक कि पहले तुम्हें सत्य का ज्ञान न हो जाए। यदि पवित्र आत्मा तुम्हें तुम्हारे अनुभव में प्रबुद्ध करती है केवल तभी तुम सत्य की अधिक गहरी समझ प्राप्त करोगे और अधिक गहराई से प्रवेश करोगे। तुम लोगों को परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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