परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 139

16 अक्टूबर, 2021

शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप

अय्यूब 1:6-11 एक दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया। यहोवा ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आता है?" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है? क्योंकि उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है।" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है? क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा? तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

अय्यूब 2:1-5 फिर एक और दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी उसके सामने उपस्थित हुआ। यहोवा ने शैतान से पूछा, "तू कहाँ से आता है?" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" यहोवा ने शैतान से पूछा, "क्या तू ने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है कि पृथ्वी पर उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है? यद्यपि तू ने मुझे बिना कारण उसका सत्यानाश करने को उभारा, तो भी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।" शैतान ने यहोवा को उत्तर दिया, "खाल के बदले खाल; परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है। इसलिये केवल अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और मांस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।"

इन दो अंशों में पूरी तरह से परमेश्वर और शैतान के मध्य एक वार्तालाप है; ये अंश इस बात को दर्ज करते हैं कि परमेश्वर ने क्या कहा और शैतान ने क्या कहा। परमेश्वर ने बहुत अधिक नहीं बोला, और बड़ी सरलता से बोला। क्या हम परमेश्वर के सरल वचनों में उसकी पवित्रता देख सकते हैं? कुछ लोग कहेंगे कि ऐसा करना आसान नहीं है। तो क्या हम शैतान के प्रत्युत्तरों में उसका घिनौनापन देख सकते हैं? (हाँ।) आओ, पहले देखें कि यहोवा परमेश्वर ने शैतान से किस प्रकार के प्रश्न पूछे। "तू कहाँ से आता है?" क्या यह एक सीधा प्रश्न नहीं है? क्या इसमें कोई छिपा हुआ अर्थ है? (नहीं।) यह केवल एक शुद्ध प्रश्न है, जिसमें किसी गुप्त उद्देश्य की मिलावट नहीं है। यदि मुझे तुम लोगों से पूछना होता : "तुम कहाँ से आए हो?" तब तुम लोग किस प्रकार उत्तर देते? क्या इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है? क्या तुम लोग यह कहते : "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ"? (नहीं।) तुम लोग इस प्रकार उत्तर न देते। तो फिर शैतान को इस तरीके से उत्तर देते देख तुम लोगों को कैसा लगता है? (हमें लगता है कि शैतान बेतुका है, लेकिन धूर्त भी है।) क्या तुम लोग बता सकते हो कि मुझे कैसा लग रहा है? हर बार जब मैं शैतान के इन शब्दों को देखता हूँ, तो मुझे घृणा महसूस होती है, क्योंकि वह बोलता तो है, पर उसके शब्दों में कोई सार नहीं होता। क्या शैतान ने परमेश्वर के प्रश्न का उत्तर दिया? नहीं, शैतान ने जो शब्द कहे, वे कोई उत्तर नहीं थे, उनसे कुछ हासिल नहीं हुआ। वे परमेश्वर के प्रश्न के उत्तर नहीं थे। "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" तुम इन शब्दों से क्या समझते हो? आखिर शैतान कहाँ से आया था? क्या तुम लोगों को इस प्रश्न का कोई उत्तर मिला? (नहीं।) यह शैतान की धूर्त योजनाओं की "प्रतिभा" है—किसी को पता न लगने देना कि वह वास्तव में क्या कह रहा है। ये शब्द सुनकर भी तुम लोग यह नहीं जान सकते कि उसने क्या कहा है, हालाँकि उसने उत्तर देना समाप्त कर लिया है। फिर भी वह मानता है कि उसने उत्तम तरीके से उत्तर दिया है। तो तुम कैसा महसूस करते हो? घृणा महसूस करते हो ना? (हाँ।) अब तुमने इन शब्दों की प्रतिक्रिया में घृणा महसूस करना शुरू कर दिया है। शैतान सीधे तौर पर बात नहीं करता, और तुम्हें अपना सिर खुजलाता छोड़ देता है, और तुम उसके शब्दों के स्रोत को समझने में असमर्थ रहते हो। कभी-कभी वह जान-बूझकर ऐसा बोलता है, और कभी-कभी जब वह बोलता है तो उसके शब्द उसके सार और स्वभाव द्वारा नियंत्रित होते हैं। ये शब्द सीधे शैतान के मुँह से बाहर आए। शैतान ने इन शब्दों को लंबे समय तक नहीं तोला; या उन्हें इस तरह नहीं बोला कि उसे चतुर समझा जाए, बल्कि उसने इन्हें स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया। जैसे ही तुम शैतान से पूछते हो कि वह कहाँ से आया है, वह तुम्हें इस प्रकार, इन शब्दों में जवाब देता है। तुम बिलकुल उलझन में पड़ जाते हो, और नहीं जान पाते कि आखिर वह कहाँ से आया है। क्या तुम लोगों के बीच में कोई ऐसा है, जो इस प्रकार से बोलता है? (हाँ।) यह बोलने का कैसा तरीका है? (यह अस्पष्ट है और निश्चित उत्तर नहीं देता।) बोलने के इस तरीके का वर्णन करने के लिए हमें किस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए? यह ध्यान भटकाने वाला और गुमराह करने वाला है, है कि नहीं? मान लो, कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि दूसरे यह जानें कि वह कल कहाँ गया था। तुम उससे पूछते हो : "मैंने तुम्हें कल देखा था। तुम कहाँ जा रहे थे?" वह तुम्हें सीधे यह नहीं बताता कि वह कल कहाँ गया था। इसके बजाय वह कहता है "कल क्या दिन था। बहुत थकाने वाला दिन था!" क्या उसने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दिया? दिया, लेकिन वह उत्तर नहीं दिया, जो तुम चाहते थे। यह मनुष्य के बोलने की चालाकी की "प्रतिभा" है। तुम कभी पता नहीं लगा सकते कि उसका क्या मतलब है, न तुम उसके शब्दों के पीछे के स्रोत या इरादे को ही समझ सकते हो। तुम नहीं जानते कि वह क्या टालने की कोशिश कर रहा है, क्योंकि उसके हृदय में उसकी अपनी कहानी है—वह कपटी है। क्या तुम लोग भी अकसर इस तरह से बोलते हो? (हाँ।) तो तुम लोगों का क्या उद्देश्य होता है? क्या यह कभी-कभी तुम्हारे अपने हितों की रक्षा के लिए होता है, और कभी-कभी अपनी स्थिति, अपनी छवि बनाए रखने के लिए, अपने निजी जीवन के रहस्य गुप्त रखने के लिए, अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए? उद्देश्य चाहे कुछ भी हो, यह तुम्हारे हितों से अलग नहीं है, यह तुम्हारे हितों से जुड़ा हुआ है। क्या यह मनुष्य का स्वभाव नहीं है? क्या इस प्रकार के स्वभाव वाला हर व्यक्ति शैतान के समान नहीं है? हम ऐसा कह सकते हैं, है न? सामान्य रूप से कहें, तो यह अभिव्यक्ति घृणित और वीभत्स है। तुम लोग भी अब घृणा़ महसूस करते हो, है न? (हाँ।)

पहले अंश को फिर से देखें तो, शैतान फिर से यहोवा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहता है : "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?" शैतान अय्यूब के संबंध में यहोवा के आकलन पर हमला कर रहा है, और यह हमला दुश्मनी के रंग में रँगा है। "क्या तू ने उसकी, और उसके घर की, और जो कुछ उसका है उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा?" यह अय्यूब पर किए गए यहोवा के कार्य के संबंध में शैतान की समझ और उसका आकलन है। शैतान उसका इस तरह आकलन करता है, और कहता है : "तू ने तो उसके काम पर आशीष दी है, और उसकी सम्पत्ति देश भर में फैल गई है। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।" शैतान सदा अस्पष्टता से बात करता है, पर यहाँ वह निश्चय के साथ बोल रहा है। लेकिन निश्चय के साथ बोले जाने के बावजूद ये शब्द एक हमला हैं, ईश-निंदा हैं और यहोवा परमेश्वर की, स्वयं परमेश्वर की अवज्ञा हैं। जब तुम लोग ये शब्द सुनते हो, तो तुम्हें कैसा लगता है? क्या तुम्हें घृणा महसूस होती है? क्या तुम लोग शैतान के इरादों को देख पा रहे हो? सर्वप्रथम, शैतान अय्यूब के संबंध में—जो परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने वाला मनुष्य है, यहोवा के आकलन को नकारता है। फिर वह हर उस चीज़ को नकारता है, जिसे अय्यूब कहता और करता है, अर्थात् वह उसके मन में मौजूद यहोवा के भय को नकारता है। क्या यह आरोप लगाना नहीं है? शैतान यहोवा की हर कथनी और करनी पर दोषारोपण करता है, उसे नकारता है और उस पर संदेह करता है। वह यह कहते हुए विश्वास नहीं करता कि "अगर तुम कहते हो कि चीज़ें ऐसी हैं, तो फिर मैंने उन्हें क्यों नहीं देखा? तुमने उसे बहुत सारे आशीष दिए हैं, तो वह तुम्हारा भय क्यों नहीं मानेगा?" क्या यह परमेश्वर के हर कार्य का खंडन नहीं है? दोषारोपण, खंडन, ईश-निंदा—क्या शैतान के शब्द हमला नहीं हैं? क्या ये शब्द, शैतान जो कुछ अपने हृदय में सोचता है, उसकी सच्ची अभिव्यक्ति नहीं हैं? ये वचन निश्चित रूप से वैसे नहीं हैं, जैसे हमने अभी पढ़े थे : "पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।" वे पूरी तरह से भिन्न हैं। इन शब्दों के माध्यम से शैतान अपने दिल की बात पूरी तरह से अनावृत कर देता है—परमेश्वर के प्रति अपना रवैया और अय्यूब के परमेश्वर का भय मानने से घृणा। जब ऐसा होता है, तो उसकी दुर्भावना और बुरी प्रकृति पूरी तरह से उजागर हो जाती हैं। वह उनसे घृणा करता है, जो परमेश्वर का भय मानते हैं; वह उनसे घृणा करता है, जो बुराई से दूर रहते हैं; और इनसे भी बढ़कर, वह मनुष्य को आशीष प्रदान करने के लिए यहोवा से घृणा करता है। वह इस अवसर का उपयोग अय्यूब को नष्ट करने के लिए करना चाहता है; जिस अय्यूब को परमेश्वर ने अपने हाथों से बड़ा किया है, उसे बरबाद करने के लिए वह कहता है : "तुम कहते हो, अय्यूब तुम्हारा भय मानता है और बुराई से दूर रहता है। मैं इसे अलग तरह से देखता हूँ।" वह यहोवा को उकसाने और प्रलोभन देने के लिए कई तरीकों का इस्तेमाल करता है और कई हथकंडे अपनाता है, ताकि यहोवा परमेश्वर अय्यूब को शैतान को सौंप दे, जिससे कि वह उसके साथ बेहूदगी से पेश आ सके, उसे नुकसान पहुँचा सके और उसके साथ दुर्व्यवहार कर सके। वह इस अवसर का लाभ इस मनुष्य को नष्ट करने के लिए करना चाहता है, जो परमेश्वर की नज़रों में धार्मिक और पूर्ण है। क्या शैतान के पास इस प्रकार का हृदय होना केवल एक क्षणिक आवेग का परिणाम है? नहीं, ऐसा नहीं है। इसे बनने में लंबा समय लगा है। परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह एक व्यक्ति की देखभाल करता है, उस पर नज़र रखता है, और शैतान इस पूरे समय के दौरान उसके हर कदम का पीछा करता है। परमेश्वर जिस किसी पर भी अनुग्रह करता है, शैतान भी पीछे-पीछे चलते हुए उस पर नज़र रखता है। यदि परमेश्वर इस व्यक्ति को चाहता है, तो शैतान परमेश्वर को रोकने के लिए अपने सामर्थ्य में सब-कुछ करता है, वह परमेश्वर के कार्य को भ्रमित, बाधित और नष्ट करने के लिए विभिन्न बुरे हथकंडों का इस्तेमाल करता है, ताकि वह अपना छिपा हुआ उद्देश्य हासिल कर सके। क्या है वह उद्देश्य? वह नहीं चाहता कि परमेश्वर किसी भी मनुष्य को प्राप्त कर सके; उसे वे सभी लोग अपने लिए चाहिए जिन्हें परमेश्वर चाहता है, ताकि वह उन पर कब्ज़ा कर सके, उन पर नियंत्रण कर सके, उनको अपने अधिकार में ले सके, ताकि वे उसकी आराधना करें, ताकि वे बुरे कार्य करने में उसका साथ दें। क्या यह शैतान का भयानक उद्देश्य नहीं है? तुम लोग अकसर कहते हो कि शैतान कितना बुरा, कितना खराब है, परंतु क्या तुमने उसे देखा है? तुम सिर्फ यह देख सकते हो कि मनुष्य कितना बुरा है। तुमने असल में नहीं देखा है कि शैतान वास्तव में कितना बुरा है। पर क्या तुम लोगों ने अय्यूब से संबंधित इस मामले में शैतान की बुराई देखी है? (हाँ।) इस मामले ने शैतान के भयंकर चेहरे और उसके सार को बिलकुल स्पष्ट कर दिया है। परमेश्वर के साथ युद्ध करने और उसके पीछे-पीछे चलने में शैतान का उद्देश्य उस समस्त कार्य को नष्ट करना है, जिसे परमेश्वर करना चाहता है; उन लोगों पर कब्ज़ा और नियंत्रण करना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है; उन लोगों को पूरी तरह से मिटा देना है, जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है। यदि वे मिटाए नहीं जाते, तो वे शैतान द्वारा इस्तेमाल किए जाने के लिए उसके कब्ज़े में आ जाते हैं—यह उसका उद्देश्य है। और परमेश्वर क्या करता है? परमेश्वर इस अंश में केवल एक सरल वाक्य कहता है; परमेश्वर के इससे कुछ भी अधिक करने का कोई अभिलेख नहीं है, परंतु शैतान के कहने और करने के और भी कई अभिलेख हम देखते हैं। पवित्र शास्त्र के नीचे दिए गए अंश में यहोवा शैतान से पूछता है, "तू कहाँ से आता है?" शैतान क्या उत्तर देता है? (उसका उत्तर अभी भी यही है "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ।") यह अभी भी वही वाक्य है। यह शैतान का आदर्श वाक्य, उसका परिचय-कार्ड बन गया है। ऐसा कैसे है? क्या शैतान घृणास्पद नहीं है? निश्चित रूप से इस घिनौने वाक्य को एक बार कहना ही काफी है। शैतान बार-बार इसे दोहराए क्यों जाता है। इससे एक बात साबित होती है : शैतान का स्वभाव अपरिवर्तनीय है। शैतान अपना बदसूरत चेहरा छिपाने के लिए दिखावे का इस्तेमाल नहीं कर सकता है। परमेश्वर उससे एक प्रश्न पूछता है और वह इस तरह प्रत्युतर देता है। ऐसा है, तो सोचो, मनुष्यों के साथ वह कैसा व्यवहार करता होगा! वह परमेश्वर से नहीं डरता, परमेश्वर का भय नहीं मानता, और परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं करता। अतः वह बेहूदगी से परमेश्वर के सम्मुख ढीठ होने की, परमेश्वर के प्रश्न पर लीपापोती करने के लिए उन्हीं शब्दों का प्रयोग करने की, परमेश्वर के प्रश्न का वही उत्तर दोहराने और इस उत्तर से परमेश्वर को उलझाने की कोशिश करता है—यह शैतान का कुरूप चेहरा है। वह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर विश्वास नहीं करता, वह परमेश्वर के अधिकार पर विश्वास नहीं करता, और वह निश्चित रूप से परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे समर्पण करने के लिए तैयार नहीं होता। वह लगातार परमेश्वर के विरोध में रहता है, लगातार परमेश्वर के हर कार्य पर हमला कर उसे बरबाद करने की कोशिश करता है—यह उसका दुष्ट उद्देश्य है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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