परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 109

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 109

308 |29 जून, 2020

क्या तुम सब सदोम के विनाश में परमेश्वर के क्रोध के आवश्यक तत्व को देख सकते हो? क्या उसके क्रोध में कोई चीज़ मिली हुई है? क्या परमेश्वर का क्रोध पवित्र है? मनुष्य के शब्दों में, क्या परमेश्वर का क्रोध बिना किसी मिलावट के है? क्या उसके क्रोध के पीछे कोई छल है? क्या कोई षडयंत्र है? क्या अकथनीय रहस्य हैं? मैं तुम्हें कठोरता और गम्भीरता से कह सकता हूँ; परमेश्वर के क्रोध का कोई अंश ऐसा नहीं है जो किसी को सन्देह की ओर ले जा सकता है। उसका क्रोध पवित्र एवं अमिश्रित है और वह उसमें किसी अन्य इरादों या लक्ष्यों को आश्रय नहीं देता है। उसके क्रोध का कारण पवित्र, निर्दोष और आलोचना से परे है। यह उसकी पवित्र हस्ती का एक स्वाभाविक प्रकाशन और प्रदर्शन है; यह कुछ ऐसा है जिसे सृष्टि में कोई भी धारण नहीं करता है। यह परमेश्वर के अद्वितीय धर्मी स्वभाव का एक हिस्सा है, साथ ही यह सृष्टिकर्ता और उसकी सृष्टि की अपनी अपनी हस्तियों के बीच एक असाधारण अन्तर भी है।

इसके बावजूद कि कोई दूसरों के देखते हुए क्रोध करता है या उनके पीठ के पीछे, क्योंकि प्रत्येक के पास अलग अलग इरादे और उद्देश्य होते हैं। कदाचित् वे अपनी प्रतिष्ठा का निर्माण कर रहे हैं, या शायद वे अपने हितों का समर्थन कर रहे हैं, अपनी छवि को दुरुस्त कर रहे हैं या अपने चेहरे का ख्याल रख रहे हैं। कुछ लोग अपने क्रोध में नियन्त्रण रखने का अभ्यास कर रहे हैं, जबकि अन्य लोग बहुत उतावले हैं और थोड़े से नियन्त्रण के बिना जब भी वे चाहते हैं क्रोध से आगबबूला हो जाते हैं। संक्षेप में, मनुष्य का क्रोध उसके भ्रष्ट स्वभाव में से ही निकलता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इसका उद्देश्य क्या है, यह शारीर और स्वभाव से है; इसका न्याय और अन्याय से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि मनुष्य के स्वभाव और हस्ती में ऐसा कुछ नहीं है जो सत्य के अनुरूप हो। इसलिए, भ्रष्ट मानवता के मिजाज़ और परमेश्वर के क्रोध का एक सांस में जिक्र नहीं किया जाना चाहिए। बिना किसी अपवाद के, शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए एक मनुष्य का स्वभाव भ्रष्टता के बचाव से ही शुरू होता है, और यह भ्रष्टता पर आधारित होता है; इस प्रकार, मनुष्य के क्रोध का जिक्र परमेश्वर के प्रचण्ड क्रोध के समान एक ही साँस में नहीं किया जा सकता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे सैद्धान्तिक रूप से कितने उचित दिखाई देते हैं। जब परमेश्वर अपना क्रोध प्रकट करता है, दुष्ट की शक्तियों को रोका जाता है, बुरी चीज़ों को नष्ट किया जाता है, जबकि धर्मी और सकारात्मक चीज़ें परमेश्वर की देखरेख एवं सुरक्षा का आनन्द लेती हैं, और उन्हें निरन्तर बढ़ने की अनुमति दी जाती है। परमेश्वर अपने क्रोध को प्रकट करता है क्योंकि अधर्मी, नकारात्मक और बुरी चीज़ें सामान्य गतिविधि और धर्मी एवं सकारात्मक चीज़ों के विकास को बाधित, परेशान या नष्ट करती हैँ। परमेश्वर के क्रोध का लक्ष्य उसकी स्वयं की हस्ती और पहचान के बचाव के लिए नहीं है, किन्तु धर्मी, सकारात्मक, सुन्दर और अच्छी चीज़ों के अस्तित्व के बचाव के लिए, और मानवता के सामान्य रूप से जीवित रहने के नियमों और विधियों के बचाव के लिए है। यह परमेश्वर के क्रोध का मूल कारण है। परमेश्वर का कोप बिलकुल उचित, स्वाभाविक और उसके स्वभाव का असली प्रकाशन है। उसके क्रोध के पीछे कोई इरादे नहीं हैं, न ही धूर्तता या षडयंत्र हैं; या उससे भी बढ़कर, उसके कोप में कोई इच्छा, चतुराई, द्वेष, हिंसा, बुराई या कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिन्हें सारी भ्रष्ट मानवता में पाया जाता है। परमेश्वर द्वारा अपने क्रोध को प्रकट करने से पहले, उसने बिलकुल स्पष्ट रीति से और पूरी तरह से हर एक मामले के आवश्यक तत्व को पहले से ही जान लिया था, और उसने पहले से ही सटीक एवं स्पष्ट परिभाषाओं और परिणामों का सूत्र में वर्णन कर दिया था। इस प्रकार, हर मामले में जिसे वह करता है परमेश्वर का उद्देश्य कांच के समान स्वच्छ है, जैसी उसकी मनोवृत्ति है। वह गड़बड़ दिमागवाला नहीं है; वह अन्धा नहीं है; वह आवेगशील नहीं है; वह लापरवाह नहीं है; उससे बढ़कर, वह सिद्धान्तविहीन नहीं है। यह परमेश्वर के क्रोध का व्यावहारिक पहलू है, और यह परमेश्वर के क्रोध के इस व्यावहारिक पहलू के कारण ही है कि मानवता ने अपना सामान्य अस्तित्व हासिल किया है। परमेश्वर के क्रोध के बिना, मानवता जीवन जीने की असामान्य दशाओं में नीचे चली जाती; सभी चीज़ें जो धर्मी, सुन्दर और अच्छी हैं उन्हें नष्ट कर दिया जाता और वे अस्तित्व में नहीं रहतीं। परमेश्वर के क्रोध के बिना, वे नियम और विधि जो सृष्टि को संचालित करती हैं उन्हें तोड़ दिया जाता या उन्हें पूरी तरह से पलट दिया जाता। मनुष्य की उत्पत्ति के समय से, परमेश्वर ने मानवता के सामान्य अस्तित्व को बचाने और कायम रखने के लिए अपने धर्मी स्वभाव का निरन्तर इस्तेमाल किया है। क्योंकि उसके धर्मी स्वभाव में क्रोध और प्रताप का समावेश है, सभी बुरे लोग, चीज़ें, पदार्थ और समस्त चीज़ें जो मानवता के सामान्य अस्तित्व को परेशान करती हैं और क्षति पहुंचती हैं उन्हें उसके क्रोध के कारण दण्डित, नियन्त्रित और नष्ट कर दिया जाता है। पिछली अनेक शताब्दियों से, परमेश्वर ने सब प्रकार के अशुद्ध आत्माओं और बुरे आत्माओं को मार गिराने और नष्ट करने के लिए अपने धर्मी स्वभाव का लगातार इस्तेमाल किया है जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और मानवता का प्रबंधन करने के उसके कार्य में शैतान के सहअपराधियों और दलालों के समान कार्य करते हैं। इस प्रकार, मुनष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर का कार्य उसकी योजना के अनुसार सदैव बढ़ता गया है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के क्रोध की उपस्थिति के कारण, मनुष्यों के बीच के सर्वाधिक नेक कारण को कभी भी नष्ट नहीं किया गया है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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