परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 103

29 जून, 2020

हालाँकि मनुष्य भ्रष्ट हो चुका है, लेकिन वह अभी भी सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन रहता है

शैतान हजारों वर्षों से मनुष्य को भ्रष्ट कर रहा है। उसने मनुष्य में बेहिसाब बुराई गढ़ी है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसे धोखा दिया है, और दुनिया में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य के साथ दुर्व्यवहार किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, मनुष्य को परमेश्वर का विरोध करने के लिए बहकाया है, और ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने परमेश्वर की प्रबंधन-योजना को बार-बार उलझाया और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के तहत, सभी चीजें और जीवित प्राणी परमेश्वर द्वारा निर्धारित नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करते रहते हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान की दुष्ट प्रकृति और निरंकुशता बहुत कुरूप, बहुत घृणित और नीच, और बहुत क्षुद्र और कमजोर है। भले ही शैतान परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजों के बीच चलता है, लेकिन वह परमेश्वर द्वारा नियंत्रित लोगों, चीजों और पदार्थों में थोड़ा-सा भी बदलाव करने में सक्षम नहीं है। हजारों वर्ष बीत चुके हैं, और मानव-जाति अभी भी परमेश्वर द्वारा प्रदत्त प्रकाश और हवा का आनंद लेती है, अभी भी स्वयं परमेश्वर द्वारा छोड़ी गई साँस से साँस लेती है, अभी भी परमेश्वर द्वारा सृजित फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीटों का आनंद लेती है, और परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई सभी चीजों का आनंद लेती है; दिन और रात अभी भी लगातार एक-दूसरे की जगह लेते हैं; चार मौसम हमेशा की तरह बारी-बारी से आते हैं; आकाश में उड़ने वाले हंस सर्दियों में चले जाते हैं और अगले बसंत में फिर लौट आते हैं; पानी में रहने वाली मछलियाँ कभी नदी-झीलें—अपना घर नहीं छोड़तीं; गर्मी के दिनों में शलभ पृथ्वी पर दिल खोलकर गाते हैं; पतझड़ के दौरान हवा के साथ घास में झींगुर मृदुता से गुनगुनाते हैं; हंस झुंड में एकत्र होते हैं, जबकि बाज अकेले रहते हैं; सिंहों के समूह शिकार करके अपना भरण-पोषण करते हैं; बारहसिंगा घास और फूलों से भटककर दूर नहीं जाता...। सभी चीजों के बीच हर तरह का जीवित प्राणी जाता और लौटता है और फिर चला जाता है, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन हो जाते हैं—लेकिन जो नहीं बदलता, वह है उनकी सहज प्रवृत्ति और अस्तित्व की व्यवस्थाएँ। वे परमेश्वर के प्रावधान और पोषण के तहत रहते हैं, और कोई उनकी सहज प्रवृत्ति नहीं बदल सकता, और न ही कोई उनके अस्तित्व की व्यवस्थाओं के नियम भंग कर सकता है। हालाँकि मानव-जाति, जो सभी चीजों के बीच रहती है, शैतान द्वारा भ्रष्ट की गई और ठगी गई है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा बनाए गए पानी, और परमेश्वर द्वारा बनाई गई हवा, और परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीजें नहीं छोड़ सकता, और मनुष्य अभी भी परमेश्वर द्वारा सृजित स्थान में रहता और वंश-वृद्धि करता है। मानव-जाति की सहज प्रवृत्तियाँ नहीं बदली हैं। मनुष्य अभी भी देखने के लिए अपनी आँखों पर, सुनने के लिए अपने कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, समझने के लिए अपने दिल पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों पर, इत्यादि, निर्भर करता है; वे सभी सहज प्रवृत्तियाँ जो परमेश्वर ने मनुष्य को दीं, ताकि वह परमेश्वर का प्रावधान स्वीकार कर सके, अपरिवर्तित रहती हैं, जिन क्षमताओं के माध्यम से मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है, उनमें कोई बदलाव नहीं आया है, एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने के लिए मानव-जाति की क्षमता नहीं बदली है, मानव-जाति की आध्यात्मिक आवश्यकताएँ नहीं बदली हैं, मानव-जाति की अपने मूल को खोजने की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानव-जाति की लालसा नहीं बदली है। ऐसी हैं मानव-जाति की वर्तमान परिस्थितियाँ, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहती हैं, और जिसने शैतान द्वारा किया गया खूनी विनाश सहन किया है। हालाँकि मनुष्य शैतान द्वारा रौंदे गए हैं, और अब वे सृष्टि की शुरुआत वाले आदम और हव्वा नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, कल्पना, धारणाओं आदि जैसी परमेश्वर-विरोधी चीजों से भरे हुए हैं और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से पूर्ण हैं, फिर भी परमेश्वर की दृष्टि में मानव-जाति अभी भी वही मानव-जाति है, जिसे उसने बनाया था। मानव-जाति अभी भी परमेश्वर द्वारा शासित और आयोजित है, और अभी भी परमेश्वर द्वारा निर्धारित क्रम के भीतर रहती है, और इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में मानव-जाति, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, सिर्फ गर्द से ढकी हुई है, उसका पेट गड़गड़ाता है, वह थोड़ी धीमी प्रतिक्रिया देती है, उसकी स्मृति उतनी अच्छी नहीं रही जितनी हुआ करती थी, और थोड़ी पुरानी पड़ गई है—लेकिन मनुष्य के सभी कार्य और सहज प्रवृत्तियाँ पूरी तरह से अक्षत हैं। यही वह मनुष्य है, जिसे परमेश्वर बचाने का इरादा रखता है। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की पुकार सुननी होगी, बस सृष्टिकर्ता की वाणी सुननी होगी, फिर वह उठ खड़ा होगा और उस वाणी के स्रोत का पता लगाने के लिए दौड़ेगा। इस मनुष्य को बस सृष्टिकर्ता की आकृति देखनी होगी, फिर वह किसी और चीज पर ध्यान नहीं देगा, और परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के लिए सब-कुछ त्याग देगा, यहाँ तक कि उसके लिए अपना जीवन भी दे देगा। जब मानव-जाति का हृदय सृष्टिकर्ता के हार्दिक वचनों को समझेगा, तब मानव-जाति शैतान को नकार देगी और सृष्टिकर्ता के साथ आ जाएगी; जब मानव-जाति अपने शरीर से गंदगी पूरी तरह से धो देगी, और एक बार फिर से सृष्टिकर्ता का प्रावधान और पोषण प्राप्त कर लेगी, तब मानव-जाति की स्मृति बहाल हो जाएगी, और उस समय मानव-जाति वास्तव में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में लौट आएगी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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