परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 98

29 जून, 2020

शैतान को परमेश्वर की आज्ञा

अय्यूब 2:6 यहोवा ने शैतान से कहा, "सुन, वह तेरे हाथ में है, केवल उसका प्राण छोड़ देना।"

शैतान ने कभी सृष्टिकर्ता के अधिकार का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं की है, और इस वजह से, सभी चीजें व्यवस्थित रहती हैं

यह अय्यूब की पुस्तक का एक उद्धरण है, और इन वचनों में "वह" का मतलब है अय्यूब। संक्षिप्त होने के बावजूद यह वाक्य कई मुद्दे स्पष्ट करता है। यह आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर और शैतान के बीच हुई एक विशेष बातचीत का वर्णन करता है, और हमें बताता है कि परमेश्वर के वचनों का लक्ष्य शैतान था। यह इसे भी दर्ज करता है कि परमेश्वर ने विशेष रूप से क्या कहा था। परमेश्वर के वचन शैतान के लिए एक आज्ञा और एक आदेश थे। इस आदेश का विशिष्ट विवरण अय्यूब के जीवन को बख्शने से और इससे संबंधित है कि परमेश्वर ने शैतान द्वारा अय्यूब के साथ किए जाने वाले व्यवहार में मर्यादा-रेखा कहाँ खींची—शैतान को अय्यूब का जीवन छोड़ना था। इस वाक्य से पहली चीज जो हम सीखते हैं, वह यह है कि ये परमेश्वर द्वारा शैतान से कहे गए वचन थे। अय्यूब की पुस्तक के मूल पाठ के अनुसार, यह हमें ऐसे वचनों की पृष्ठभूमि बताता है : शैतान अय्यूब पर आरोप लगाना चाहता था, इसलिए उसकी परीक्षा लेने से पहले उसे परमेश्वर की सहमति प्राप्त करनी थी। अय्यूब की परीक्षा लेने का शैतान का अनुरोध स्वीकार करते हुए परमेश्वर ने शैतान के सामने निम्नलिखित शर्त रखी : "अय्यूब तुम्हारे हाथ में है; लेकिन उसके प्राण छोड़ देना।" इन वचनों की प्रकृति क्या है? ये स्पष्ट रूप से एक आज्ञा, एक आदेश है। इन वचनों की प्रकृति समझने के बाद, तुम्हें निश्चित रूप से यह भी समझ लेना चाहिए कि जिसने यह आदेश जारी किया, वह परमेश्वर था, और जिसने यह आदेश प्राप्त कर उसका पालन किया, वह शैतान था। कहने की जरूरत नहीं कि इस आदेश में परमेश्वर और शैतान के बीच का संबंध इन वचनों को पढ़ने वाले हर व्यक्ति पर स्पष्ट है। बेशक, यह आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर और शैतान के बीच का संबंध भी है, और परमेश्वर और शैतान की पहचान और हैसियत के बीच का अंतर भी, जो पवित्रशास्त्र में परमेश्वर और शैतान के बीच हुई बातचीत के अभिलेख में दिया गया है, और यह परमेश्वर और शैतान की पहचान और हैसियत के बीच स्पष्ट अंतर है, जिसे आज तक मनुष्य विशिष्ट उदाहरण और पाठ्य अभिलेख में देख सकता है। इस जगह, मुझे कहना होगा कि इन वचनों का अभिलेख परमेश्वर की पहचान और हैसियत के बारे में मानव-जाति के ज्ञान का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, और यह परमेश्वर के बारे में मानव-जाति के ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है। आध्यात्मिक दुनिया में सृष्टिकर्ता और शैतान के बीच हुई इस बात के माध्यम से मनुष्य सृष्टिकर्ता के अधिकार का एक और विशिष्ट पहलू समझने में सक्षम है। ये वचन सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार की एक और गवाही हैं।

बाहरी तौर पर, यहोवा परमेश्वर शैतान के साथ बातचीत कर रहा है। सार के संदर्भ में, जिस रवैये के साथ यहोवा परमेश्वर बोलता है, और जिस स्थान पर वह खड़ा है, वह शैतान से ऊँचा है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहोवा परमेश्वर शैतान को आदेशात्मक स्वर में आज्ञा दे रहा है, और शैतान को बता रहा है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, कि अय्यूब पहले से ही उसके हाथों में है, और वह अय्यूब के साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र है—लेकिन वह अय्यूब की जान न ले। इसका निहित पाठ यह है कि, हालाँकि अय्यूब शैतान के हाथों में सौंप दिया गया है, लेकिन उसका जीवन शैतान को नहीं दिया गया है; कोई भी अय्यूब का जीवन परमेश्वर के हाथों से नहीं ले सकता, जब तक कि परमेश्वर की अनुमति न हो। शैतान को दिए गए इस आदेश में परमेश्वर का रवैया स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है, और यह आदेश उस स्थिति को भी अभिव्यक्त और प्रकट करता है, जिससे यहोवा परमेश्वर शैतान के साथ बातचीत करता है। इसमें यहोवा परमेश्वर न केवल उस परमेश्वर का दर्जा रखता है, जिसने प्रकाश, वायु और सभी चीजों और जीवों का सृजन किया, उस परमेश्वर का, जो सभी चीजों और जीवों पर प्रभुत्व रखता है, बल्कि उस परमेश्वर का भी, जो मानव-जाति को आज्ञा देता है, और रसातल को आज्ञा देता है, परमेश्वर जो सभी जीवित चीजों के जीवन और मृत्यु को नियंत्रित करता है। आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर के अलावा और कौन शैतान को ऐसा आदेश देने का साहस करेगा? और परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से शैतान को अपना आदेश क्यों दिया? क्योंकि अय्यूब सहित सभी मनुष्यों का जीवन परमेश्वर के नियंत्रण में है। परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब की जान को नुकसान पहुँचाने या उसकी जान लेने की अनुमति नहीं दी, यहाँ तक कि जब परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति दी, तब भी परमेश्वर को विशेष रूप से ऐसा आदेश देना याद था, इसलिए उसने एक बार फिर शैतान को अय्यूब की जान न लेने की आज्ञा दी। शैतान ने कभी परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करने का साहस नहीं किया है, और, इसके अलावा, उसने हमेशा परमेश्वर के आदेश और विशिष्ट आज्ञाएँ ध्यान से सुनी हैं और उनका पालन किया है, कभी उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं किया है, और निश्चित रूप से, परमेश्वर के किसी भी आदेश को मुक्त रूप से बदलने की हिम्मत नहीं की है। ऐसी हैं वे सीमाएँ, जो परमेश्वर ने शैतान के लिए निर्धारित की हैं, और इसलिए शैतान ने कभी इन सीमाओं को लाँघने का साहस नहीं किया है। क्या यह परमेश्वर के अधिकार का सामर्थ्य नहीं है? क्या यह परमेश्वर के अधिकार की गवाही नहीं है? मानव-जाति की तुलना में शैतान को इस बात की ज्यादा स्पष्ट समझ है कि परमेश्वर के प्रति कैसे व्यवहार करना है, और परमेश्वर को कैसे देखना है, और इसलिए, आध्यात्मिक दुनिया में, शैतान परमेश्वर की हैसियत और अधिकार को बहुत स्पष्ट रूप से देखता है, और वह परमेश्वर के अधिकार की शक्ति और उसके अधिकार प्रयोग के पीछे के सिद्धांतों की गहरी समझ रखता है। वह उन्हें नजरअंदाज करने की बिलकुल भी हिम्मत नहीं करता, न ही वह किसी भी तरह से उनका उल्लंघन करने की या ऐसा कुछ करने की हिम्मत करता है, जो परमेश्वर के अधिकार का उल्लंघन करता हो, और वह किसी भी तरह से परमेश्वर के कोप को चुनौती देने का साहस नहीं करता। हालाँकि शैतान दुष्ट और अहंकारी प्रकृति का है, लेकिन उसने कभी परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित हद और सीमाएँ लाँघने का साहस नहीं किया है। लाखों वर्षों से उसने इन सीमाओं का कड़ाई से पालन किया है, परमेश्वर द्वारा दी गई हर आज्ञा और आदेश का पालन किया है, और कभी भी हद पार करने की हिम्मत नहीं की है। हालाँकि शैतान दुर्भावना से भरा है, लेकिन वह भ्रष्ट मानव-जाति से कहीं ज्यादा बुद्धिमान है; वह सृष्टिकर्ता की पहचान जानता है, और अपनी सीमाएँ भी जानता है। शैतान के "विनम्र" कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्य स्वर्गिक आदेश हैं, जिनका शैतान द्वारा उल्लंघन नहीं किया जा सकता, और यह ठीक परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके अधिकार के कारण है कि सभी चीजें एक व्यवस्थित तरीके से बदलती और बढ़ती हैं, ताकि मानव-जाति परमेश्वर द्वारा स्थापित क्रम के भीतर रह सके और वंश-वृद्धि कर सके, कोई भी व्यक्ति या वस्तु इस आदेश को भंग करने में सक्षम नहीं है, और कोई भी व्यक्ति या वस्तु इस व्यवस्था को बदलने में सक्षम नहीं है—क्योंकि ये सभी सृष्टिकर्ता के हाथों से और सृष्टिकर्ता के आदेश और अधिकार से आते हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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