परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 95

04 जुलाई, 2020

कुछ लोग अनुमान लगाना और कल्पना करना पसंद करते हैं, लेकिन मनुष्य की कल्पना कहाँ तक पहुँच सकती है? क्या वह इस दुनिया से परे जा सकती है? क्या मनुष्य परमेश्वर के अधिकार की प्रामाणिकता और सटीकता का अनुमान लगाने और उसकी कल्पना करने में सक्षम है? क्या मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने देने में सक्षम हैं? क्या वे मनुष्य को वास्तव में परमेश्वर के अधिकार को समझने और उसके प्रति समर्पित होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं? तथ्य साबित करते हैं कि मनुष्य का अनुमान और कल्पना केवल मनुष्य की बुद्धि की उपज हैं, और मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने में थोड़ी-सी भी सहायता या लाभ प्रदान नहीं करते। विज्ञान-कथाएँ पढ़ने के बाद कुछ लोग चंद्रमा की कल्पना करने में सक्षम होते हैं, या इस बात की कि तारे कैसे होते हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य को परमेश्वर के अधिकार की कोई समझ है। मनुष्य की कल्पना तो बस कल्पना ही है। इन चीजों के तथ्यों के बारे में, अर्थात् परमेश्वर के अधिकार से उनके संबंध के बारे में, उसे बिलकुल भी समझ नहीं है। अगर तुम चाँद पर हो भी आए, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? क्या यह दर्शाता है कि तुम्हें परमेश्वर के अधिकार की बहुआयामी समझ है? क्या यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य की व्यापकता की कल्पना करने में सक्षम हो? चूँकि मनुष्य का अनुमान और कल्पना उसे परमेश्वर के अधिकार को जानने देने में असमर्थ हैं, तो मनुष्य को क्या करना चाहिए? सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प अनुमान या कल्पना न करना होगा अर्थात जब परमेश्वर के अधिकार को जानने की बात आए, तो मनुष्य को कभी कल्पना पर भरोसा नहीं करना चाहिए और अनुमान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मैं यहाँ तुम लोगों से क्या कहना चाहता हूँ? परमेश्वर के अधिकार, परमेश्वर के सामर्थ्य, परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर के सार का ज्ञान अपनी कल्पना पर भरोसा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता। चूँकि परमेश्वर के अधिकार को जानने के लिए तुम कल्पना पर भरोसा नहीं कर सकते, तो फिर तुम परमेश्वर के अधिकार का सच्चा ज्ञान किस तरह प्राप्त कर सकते हो? इसका तरीका है परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, संगति करना और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना। इस तरह तुम्हें परमेश्वर के अधिकार का एक क्रमिक अनुभव और सत्यापन होगा और तुम उसकी एक क्रमिक समझ और वर्धमान ज्ञान प्राप्त करोगे। परमेश्वर के अधिकार का ज्ञान प्राप्त करने का यही एकमात्र तरीका है; इसका कोई छोटा रास्ता नहीं है। तुम लोगों से कल्पना न करने के लिए कहना तुम लोगों को विनाश की प्रतीक्षा करते हुए निष्क्रिय बैठने के लिए प्रेरित करने या तुम लोगों को कुछ भी करने से रोकने के समान नहीं है। सोचने और कल्पना करने के लिए अपने मस्तिष्क का उपयोग न करने का अर्थ है अनुमान लगाने के लिए तर्क का उपयोग न करना, विश्लेषण करने के लिए ज्ञान का उपयोग न करना, आधार के रूप में विज्ञान का उपयोग न करना, बल्कि इस बात को समझना, सत्यापित करना और पुष्टि करना कि जिस परमेश्वर में तुम विश्वास करते हो, उसके पास अधिकार है, इस बात की पुष्टि करना कि वह तुम्हारे भाग्य पर संप्रभुता रखता है, और यह कि परमेश्वर के वचनों के माध्यम से, सत्य के माध्यम से, हर उस चीज के माध्यम से जिसका तुम जीवन में सामना करते हो, उसका सामर्थ्य हर समय उसे स्वयं सच्चा परमेश्वर साबित करता है। यही एकमात्र तरीका है, जिससे परमेश्वर की समझ प्राप्त की जा सकती है। कुछ लोग कहते हैं कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त करने का कोई आसान तरीका खोजना चाहते हैं, लेकिन क्या तुम लोग ऐसा कोई तरीका सोच सकते हो? मैं तुमसे कहता हूँ, सोचने की कोई जरूरत नहीं : कोई दूसरा तरीका नहीं है! उसके द्वारा व्यक्त प्रत्येक वचन और वह जो भी करता है, बस उसी के माध्यम से परमेश्वर के पास जो कुछ है और जो वह है, उसे कर्तव्यनिष्ठा और दृढ़ता से जाना और सत्यापित किया जा सकता है। परमेश्वर को जानने का यही एकमात्र तरीका है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर के पास है और जो वह है, और परमेश्वर की हर चीज, खोखली और खाली नहीं, बल्कि वास्तविक है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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