परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 60

12 अक्टूबर, 2021

अय्यूब को एक बार फिर परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाता है, और वह फिर कभी शैतान द्वारा दोषारोपित नहीं किया जाता है

यहोवा परमेश्वर के कथनों के बीच ऐसे वचन हैं कि "तुम लोगों ने मेरे विषय मेरे दास अय्यूब की सी ठीक बात नहीं कही।" वह क्या था जो अय्यूब ने कहा था? यह वह था जिसके बारे में हमने पहले बात की थी, और साथ ही अय्यूब की पुस्तक में वचनों के अनेक पन्नों में बताया गया है जिनमें अय्यूब द्वारा बोला गया अंकित है। वचनों के इन अनेक पन्नों में से सभी में, अय्यूब को परमेश्वर के बारे में कभी एक बार भी कोई शिकायत या संदेह नहीं है। वह बस परिणाम की प्रतीक्षा करता है। यह वह प्रतीक्षा है जो आज्ञाकारिता की उसकी प्रवृत्ति है, जिसके परिणामस्वरूप, और परमेश्वर को कहे गए उसके वचनों के परिणामस्वरूप, अय्यूब को परमेश्वर द्वारा स्वीकार किया गया था। जब उसने परीक्षाएँ भुगतीं और कष्ट झेला, तब परमेश्वर उसके बगल में था, और यद्यपि परमेश्वर की उपस्थिति से उसका कष्ट कम नहीं हुआ था, फिर भी परमेश्वर ने वह देखा जो वह देखना चाहता था, और वह सुना जो वह सुनना चाहता था। अय्यूब के कार्यकलापों और वचनों में से प्रत्येक परमेश्वर की आँखों और कानों तक पहुँचा; परमेश्वर ने सुना, और उसने देखा—यह तथ्य है। परमेश्वर के बारे में अय्यूब का ज्ञान, और उस समय, उस अवधि के दौरान उसके हृदय में परमेश्वर के बारे में उसके विचार, वास्तव में उतने विशिष्ट नहीं थे जितने आज के लोगों के हैं, परंतु उस समय के संदर्भ में, परमेश्वर ने तब भी वह सब पहचान लिया जो उसने कहा था, क्योंकि उसका व्यवहार और उसके हृदय के विचार, साथ ही वह जो उसने अभिव्यक्त और प्रकट किया था, उसकी अपेक्षाओं के लिए पर्याप्त थे। उस समय के दौरान जब अय्यूब को परीक्षाओं से गुज़ारा गया था, उसने अपने हृदय में जो सोचा और करने का ठान लिया था, उसने परमेश्वर को परिणाम दिखाया, वह परिणाम जो परमेश्वर के लिए संतोषजनक था, और उसके बाद परमेश्वर ने अय्यूब की परीक्षाएँ दूर कर दीं, अय्यूब अपने कष्टों से निकल गया, और उसकी परीक्षाएँ समाप्त हो गई थीं और फिर कभी दुबारा उस पर नहीं आईं। चूँकि अय्यूब इन परीक्षाओं से पहले ही गुज़ारा जा चुका था, और इन परीक्षाओं के दौरान वह डटा रहा था, और उसने शैतान पर पूरी तरह विजय प्राप्त कर ली थी, इसलिए परमेश्वर ने उसे वे आशीष प्रदान किए जिनका वह समुचित रूप से अधिकारी था। जैसा कि अय्यूब 42:10,12 में अभिलिखित है, अय्यूब एक बार फिर धन्य किया गया था, और उससे कहीं अधिक धन्य किया गया जितना पहले दृष्टांत में किया गया था। इस समय शैतान पीछे हट गया था, तथा उसने अब और न कुछ कहा या न कुछ किया, और उसके बाद से शैतान ने अब और न अय्यूब के साथ छेड़छाड़ की या न ही उस पर आक्रमण किया, और शैतान ने अय्यूब को दिए गए परमेश्वर के आशीषों के विरुद्ध अब और कोई दोषारोपण नहीं किया।

अय्यूब ने अपने जीवन का उत्तरार्द्ध परमेश्वर के आशीषों के बीच बिताया

यद्यपि उस समय के उसके आशीष केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊँटों, भौतिक संपत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थे, फिर भी परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को जो आशीष प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थे। क्या उस समय यह अंकित किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की अनंत प्रतिज्ञाएँ अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब को अपने आशीषों में, परमेश्वर ने उसके अंत का उल्लेख नहीं किया या उसकी थोड़ी भी चर्चा नहीं की, और परमेश्वर के हृदय में अय्यूब चाहे जो महत्व और स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपने आशीषों में अत्यधिक नपा-तुला था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा के बिंदु तक नहीं पहुँची थी, इस योजना को उसके कार्य के अंतिम चरण में अभी प्रवेश करना था, तब परमेश्वर ने मनुष्य को भौतिक आशीष मात्र ही प्रदान करते हुए, अंत का कोई उल्लेख नहीं किया था। इसका अर्थ यह है कि अय्यूब के जीवन का उत्तरार्द्ध परमेश्वर के आशीषों के बीच गुज़रा था, जो वही था जिसने उसे दूसरों से अलग बनाया था—किंतु उनके समान ही उसकी आयु बढ़ी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन आया जब उसने संसार को अलविदा कह दिया। इस प्रकार यह अभिलिखित है कि "अन्त में अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" (अय्यूब 42:17)। यहाँ "वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मर गया" का क्या अर्थ है? परमेश्वर ने लोगों के अंत की घोषणा की उससे पहले के युग में, परमेश्वर ने अय्यूब के लिए एक जीवन काल निर्धारित किया था, और जब वह उस आयु तक पहुँच गया था तब उसने अय्यूब को स्वाभाविक रूप से इस संसार से जाने दिया। अय्यूब को दूसरे आशीष से उसकी मृत्यु तक, परमेश्वर ने और कोई कष्ट नहीं बढ़ाए। परमेश्वर के लिए, अय्यूब की मृत्यु स्वाभाविक, और आवश्यक भी थी; यह कुछ ऐसा था जो बहुत सामान्य था, और न तो न्याय था और न ही दण्डाज्ञा। जब वह जीवित था, तब अय्यूब परमेश्वर की आराधना करता और उसका भय मानता था; उसकी मृत्यु के बाद उसका अंत किस प्रकार हुआ, इस संबंध में परमेश्वर ने कुछ नहीं कहा, न ही इस बारे में कोई टिप्पणी की। परमेश्वर जो कहता और करता है उसमें उसके औचित्य का प्रबल बोध होता है, और उसके वचनों और कार्यों की विषयवस्तु और सिद्धांत उसके कार्य के चरण और उस अवधि के अनुसार होते हैं जिसमें वह कार्य कर रहा होता है। परमेश्वर के हृदय में अय्यूब जैसे किसी व्यक्ति का किस प्रकार का अंत हुआ? क्या परमेश्वर अपने हृदय में किसी भी प्रकार के निर्णय पर पहुँच गया था? निस्संदेह वह पहुँच गया था! बस इतना ही है कि मनुष्य को यह अविदित था; परमेश्वर मनुष्य को बताना नहीं चाहता था, न ही मनुष्य को बताने का उसका कोई इरादा था। इस प्रकार, ऊपरी तौर पर कहें, तो अय्यूब वृद्धावस्था में दीर्घायु होकर मरा, और ऐसा था अय्यूब का जीवन।

अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब द्वारा जिए गए जीवन का मूल्य

क्या अय्यूब ने मूल्यवान जीवन जिया? वह मूल्य कहाँ था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि उसने मूल्यवान जीवन जिया? मनुष्य के लिए उसका मूल्य क्या था? मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसने शैतान और संसार के लोगों के सामने गूँजती हुई गवाही में उस मनुष्यजाति का प्रतिनिधित्व किया जिसे परमेश्वर बचाना चाहता था। उसने वह कर्तव्य निभाया जो परमेश्वर के सृजित प्राणी को निभाना ही चाहिए था, उन सभी लोगों के लिए जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है, एक प्रतिमान स्थापित किया, और एक आदर्श के रूप में कार्य किया, लोगों को देखने दिया कि परमेश्वर पर भरोसा रखकर शैतान पर विजय प्राप्त करना पूरी तरह संभव है। परमेश्वर के लिए उसका मूल्य क्या था? परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य परमेश्वर का भय मानने, परमेश्वर की आराधना करने, परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने, और परमेश्वर के कर्मों की स्तुति करने, परमेश्वर को आराम देने और उसके आनंद लेने के लिए कुछ करने की उसकी क्षमता में निहित था; परमेश्वर के लिए, अय्यूब के जीवन का मूल्य इसमें भी निहित था कि कैसे, उसकी मृत्यु से पहले, अय्यूब ने परीक्षाओं का अनुभव किया और शैतान पर विजय प्राप्त की, और शैतान के समक्ष परमेश्वर की गूँजती हुई गवाही दी, जिससे परमेश्वर ने मनुष्यजाति के बीच महिमा प्राप्त की, उसके हृदय को आराम मिला और इसने उसके आतुर हृदय को एक परिणाम देखने दिया और आशा देखने दी। उसकी गवाही ने मनुष्यजाति के प्रबंधन के परमेश्वर के कार्य में, परमेश्वर की अपनी गवाही में डटे रहने की क्षमता का, और परमेश्वर की ओर से शैतान को लज्जित करने में सक्षम होने का दृष्टांत स्थापित किया। क्या यह अय्यूब के जीवन का मूल्य नहीं है? अय्यूब ने परमेश्वर के हृदय को आराम पहुँचाया, उसने परमेश्वर को महिमा प्राप्त करने की खुशी का पूर्वस्वाद चखाया, और परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए अद्भुत आरंभ प्रदान किया था। इस बिंदु से आगे, अय्यूब का नाम परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का प्रतीक, और शैतान पर मनुष्यजाति की विजय का चिह्न बन गया। अपने जीवनकाल के दौरान अय्यूब ने जो जिया, वह और साथ ही शैतान के ऊपर उसकी उल्लेखनीय विजय परमेश्वर द्वारा हमेशा हृदय में सँजोकर रखी जाएगी, और आने वाली पीढ़ियों द्वारा उसकी पूर्णता, खरेपन, और परमेश्वर के भय का सम्मान और अनुकरण किया जाएगा। परमेश्वर द्वारा उसे दोषरहित, चमकदार मोती के समान हमेशा सँजोया जाएगा, और इसलिए वह मनुष्य के द्वारा भी सहेजकर रखे जाने योग्य है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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