परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 16

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 16

675 |19 मई, 2020

ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

तू इस प्रकार के व्यक्ति को हर जगह पाएगा: जब वे परमेश्वर के मार्ग के विषय में सुनिश्चित हो जाते हैं उसके पश्चात्, विभिन्न कारणों से, वे चुपचाप और बिना कुछ कहे छोड़कर चले जाते हैं और जो कुछ उनका हृदय चाहता है वही करते हैं। कुछ समय के लिए, हम इस बात पे नहीं जाएंगे कि यह व्यक्ति छोड़कर क्यों चला जाता है। पहले हम इस ओर देखेंगे कि इस प्रकार के व्यक्ति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति क्या है। यह बिलकुल स्पष्ट है! जिस क्षण यह व्यक्ति छोड़कर चला जाता है, परमेश्वर की नज़रों में उनके विश्वास का दायरा समाप्त हो जाता है। यह वह व्यक्ति नहीं है जिसने इसे समाप्त किया है, परन्तु परमेश्वर है। यह कि इस व्यक्ति ने परमेश्वर को छोड़ दिया था, इसका अर्थ है उन्होंने पहले से ही परमेश्वर का तिरस्कार कर दिया है, यह कि वे पहले से ही परमेश्वर को नहीं चाहते हैं। इसका अर्थ है कि उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार नहीं किया है। चूँकि यह व्यक्ति परमेश्वर को नहीं चाहता है, क्या परमेश्वर तब भी उन्हें चाहता है? इसके अतिरिक्त, जब इस व्यक्ति के पास ऐसी मनोवृत्ति एवं ऐसा दृष्टिकोण है, और उसने परमेश्वर को छोड़ने का संकल्प किया है, तो उन्होंने पहले से ही परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित कर दिया है। यद्यपि वे आवेश में नहीं आए थे और परमेश्वर को कोसते नहीं थे, यद्यपि वे किसी बुरे या चरम व्यवहार में संलग्न नहीं हुए थे, और यद्यपि ऐसा व्यक्ति सोच रहा है: यदि ऐसा दिन आता है जब मैं बाह्य रुप से आनन्द से तृप्त हो जाता हूँ, या जब किसी चीज़ के लिए मुझे अभी भी परमेश्वर की आवश्यकता होती है, तो मैं वापस लौट आऊंगा। या यदि परमेश्वर मुझे पुकारता है, तो मैं वापस लौट आऊंगा। या वे कहते हैं: जब मैं बाहर से चोट खाया हुआ हूँ, जब मैं देखता हूँ कि बाहरी संसार अत्यंत अंधकारमय और अत्यंत दुष्ट है और मैं अब आगे से बहाव के साथ बहना नहीं चाहता हूँ, तो मैं परमेश्वर के पास वापस लौट आऊंगा। यद्यपि इस व्यक्ति ने अपने मन में गणना कर ली है कि वे समय के किस बिन्दु पर वापस लौट रहे हैं, यद्यपि वे अपनी वापसी के लिए द्वार को खुला छोड़ देते हैं, फिर भी वे एहसास नहीं करते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे किस प्रकार सोचते हैं और किस प्रकार योजना बनाते हैं, क्योंकि ये सब बस ख्याली पुलाव है। उनकी सबसे बड़ी गलती यह है कि वे इस बात के विषय में अस्पष्ट हैं कि जब वे छोड़कर जाना चाहते हैं तो परमेश्वर को कैसा लगता है। उस क्षण की शुरूआत से जब यह व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ने का निश्चय करता है, परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से छोड़ दिया है; परमेश्वर ने पहले से ही अपने हृदय में उनके परिणाम को निर्धारित कर दिया है। वह परिणाम क्या है? यह व्यक्ति हैमस्टर (चूहे की एक प्रजाति) में से एक है, और वह उनके साथ ही नाश होगा। इस प्रकार, लोग अकसर इस प्रकार की स्थिति को देखते हैं: कोई व्यक्ति परमेश्वर को छोड़ देता है, परन्तु वे दण्ड नहीं पाते हैं। परमेश्वर अपने स्वयं के सिद्धान्तों के अनुसार संचालन करता है। लोग कुछ चीज़ों को ही देख सकते हैं, और कुछ चीज़ों का निष्कर्ष परमेश्वर के हृदय में निकाला जाता है, अतः लोग नतीजे को नहीं देख सकते हैं। वह चीज़ जिसे लोग देखते हैं वह आवश्यक रूप से चीज़ों का सच्चा पहलु नहीं है; परन्तु अन्य पहलु है, ऐसा पहलु जिसे तू नहीं देखता है—ये परमेश्वर के हृदय के सच्चे विचार एवं निष्कर्ष हैं।

लोग जो परमेश्वर के कार्य के दौरान भाग खड़े होते हैं वे ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को छोड़ देते हैं

अतः परमेश्वर इस प्रकार के व्यक्ति को ऐसा गंभीर दण्ड कैसे दे सकता है? परमेश्वर उनके प्रति इतना क्रोधित क्यों है? सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव महाप्रतापी एवं रोष भरा है। वह कोई भेड़ नहीं है कि कोई भी उसे घात कर दे; इससे भी बढ़कर, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। साथ ही वह कोई खाली हवा नहीं है कि लोगों के द्वारा उस पर स्वामित्व जताया जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर मौजूद है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार-तत्व को क्रोधित नहीं करना है। हो सकता है कि यह क्रोध किसी एक शब्द के द्वारा उत्पन्न हुआ हो; कदाचित् एक विचार; कदाचित् किसी प्रकार का बुरा व्यवहार; कदाचित् सादा व्यवहार, ऐसा व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में एवं नैतिकता में स्वीकार्य है; या कदाचित् किसी सिद्धान्त एवं मत (थ्योरी) के द्वारा उत्पन्न हुआ हो। फिर भी, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर चला जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है, तो शायद तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और शायद तुम उसे हर समय ठेस पहुंचाते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ होते हो, और तुम नहीं जानते हो कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ पर स्वयं को कैसे रखना है—परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत हो सकते हो कि परमेश्वर को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता है, तो तुम जान लोगे कि परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना क्या है।

परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना आवश्यक रूप से इसके विषय में नहीं है कि तुम कितनी अधिक सच्चाई को जानते हो, तुमने कितनी अधिक परीक्षाओं का अनुभव किया है, या तुमको कितना अधिक अनुशासित किया गया है। इसके बजाए, यह इस बात पर निर्भर है कि परमेश्वर के लिहाज से तुम्हारे हृदय का सार-तत्व क्या है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति क्या है। लोगों का सार-तत्व और उनकी आत्मनिष्ठ मनोवृत्ति—ये अत्यंत महत्वपूर्ण एवं मुख्य बातें हैं। उन लोगों के लिहाज से जिन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया है और छोड़कर चले गये हैं, परमेश्वर के प्रति उनकी घृणित मनोवृत्ति ने और उनके हृदय ने जो सत्य को तुच्छ जानते हैं परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित किया है, इस प्रकार जहाँ तक परमेश्वर की बात है उन्हें कभी भी क्षमा नहीं किया जाएगा। उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जाना है, उनके पास वह जानकारी है कि परमेश्वर का आगमन पहले ही हो चुका है, यहाँ तक कि उन्होंने परमेश्वर के नए कार्य का भी अनुभव किया है। उनका चला जाना भ्रमित होने की स्थिति नहीं है, और न ही ऐसी स्थिति है कि वे इसके विषय में अस्पष्ट हैं। यह ऐसी स्थिति तो बिलकुल भी नहीं है कि उन्हें जबरदस्ती इसमें धकेला जा रहा है। इसके बजाए उन्होंने सचेत रूप से, एवं स्पष्ट मस्तिष्क के साथ, परमेश्वर को छोड़कर जाने का चुनाव किया है। उनका चले जाना अपने मार्ग को खोना नहीं है; यह उन्हें फेंक दिया जाना नहीं है। इसलिए, परमेश्वर की दृष्टि में, वे एक मेम्ने के समान नहीं हैं जो झुण्ड से भटक गया है, उड़ाऊ पुत्र की तो बात ही छोड़ दो जिसने अपने मार्ग को खो दिया था। वे दण्डमुक्ति के साथ चले गए, और ऐसी परिस्थिति, और ऐसी दशा परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करती है, और इस क्रोध के कारण ही है कि वह उन्हें एक आशाहीन परिणाम देता है। क्या इस प्रकार का परिणाम भयावह नहीं है? अतः यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो वे परमेश्वर को ठेस पहुंचा सकते हैं। यह कोई छोटी बात नहीं है! यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की मनोवृत्ति को गंभीरता से नहीं लेता है, और तब भी मानता है कि परमेश्वर उनके लौटकर आने की प्रतीक्षा कर रहा है—क्योंकि वे परमेश्वर की भटकी हुई भेड़ों में से एक हैं और परमेश्वर अभी भी उनके हृदय के परिवर्तन का इंतज़ार कर रहा है—तो यह व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसे उनके दण्ड के दिन से बहुत दूर किया गया है। परमेश्वर उन्हें स्वीकार करने से मना तो नहीं करेगा। यह दूसरी बार है जब उन्होंने उसके स्वभाव को क्रोधित किया है; यह तो और भी अधिक भयानक बात है! इस व्यक्ति की श्रद्धा विहीन मनोवृत्ति ने पहले से ही परमेश्वर के प्रशासनिक आदेश को ठेस पहुंचा दिया है। क्या परमेश्वर अब भी उन्हें स्वीकार करेगा? इस मामले के सम्बन्ध में परमेश्वर के सिद्धान्त हैं: यदि कोई व्यक्ति सच्चे मार्ग के विषय में निश्चित है फिर भी वह जानते बूझते एवं स्पष्ट मस्तिष्क के साथ परमेश्वर को ठुकरा सकता है, और स्वयं को परमेश्वर से दूर कर सकता है, तब परमेश्वर उनके उद्धार के मार्ग को अवरुद्ध कर देगा, और इसके बाद राज्य में प्रवेश करने के उस दरवाजे को उनके लिए बन्द कर दिया जाएगा। जब यह व्यक्ति आकर एक बार फिर द्वार खटखटाता है, तो परमेश्वर उनके लिए दोबारा द्वार नहीं खोलेगा। इस व्यक्ति को सदा के लिए द्वार से बाहर रखा जाएगा। कदाचित् तुम लोगों में से कुछ ने बाईबिल में मूसा की कहानी को पढ़ा है। जब मूसा को परमेश्वर के द्वारा अभिषिक्त किया गया था उसके पश्चात्, 250 अगुवे मूसा के कार्यों एवं अन्य विभिन्न कारणों की वजह से उससे असंतुष्ट थे। उन्होंने किसकी आज्ञा मानने से मना किया था? वह मूसा नहीं था। उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधों को मानने से इंकार किया था; उन्होंने इस मामले पर परमेश्वर के कार्य को मानने से मना किया। उन्होंने निम्नलिखित बातें कही थीं: "तू ने अपने ऊपर बहुत कुछ ले लिया है, देख सारी मंडली, और उनमें से हर एक जन पवित्र है, और यहोवा हमारे बीच में है...।" मनुष्य की नज़रों में, क्या ये शब्द बहुत गंभीर हैं? वे गंभीर नहीं हैं! कम से कम शब्दों का शाब्दिक अर्थ गंभीर नहीं है। वैधानिक अर्थ में, उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा है, क्योंकि सतही तौर पर यह कोई शत्रुतापूर्ण भाषा या शब्दावली नहीं है, और इसमें ईश निन्दा सम्बन्धी कोई अर्थ तो बिलकुल भी नहीं है। यहाँ केवल एक साधारण सा वाक्य है, इससे अधिक और कुछ नहीं। फिर भी ऐसा क्यों है कि ये शब्द परमेश्वर के ऐसे कोप को भड़का सकते हैं? यह इसलिए है क्योंकि उन्हें लोगों से नहीं कहा गया है, परन्तु परमेश्वर से कहा गया है। उनके द्वारा अभिव्यक्त की गई मनोवृत्ति एवं स्वभाव बिलकुल वही है जो परमेश्वर के स्वभाव को क्रोधित करता है, विशेषकर परमेश्वर के उस स्वभाव को क्रोधित करता है जिसे ठेस नहीं पहुंचाय जा सकता है। हम सब जानते हैं कि अन्त में उनका परिणाम क्या हुआ था। ऐसे लोगों के सम्बन्ध में जो परमेश्वर को छोड़ देते हैं, उनका दृष्टिकोण क्या है? उनकी मनोवृत्ति क्या है? और क्यों उनका दृष्टिकोण एवं मनोवृत्ति ऐसा कारण बनता है कि परमेश्वर उनके साथ इस तरह से व्यवहार करता है? कारण यह है कि वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि वह परमेश्वर है फिर भी वे अभी भी परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने का चुनाव करते हैं। इसी लिए उद्धार के लिए उनके अवसर से उन्हें पूरी तरह से वंचित कर दिया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे बाईबिल कहती है: "क्योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।" क्या अब तुम लोग इस विषय पर स्पष्ट हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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