परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 8

17 मार्च, 2021

परमेश्वर के मार्ग पर चलें: परमेश्वर का भय मानें और बुराई से दूर रहें

एक कहावत है जिस पर तुम सब को ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि यह कहावत अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मेरे मन में हर दिन अनगिनत बार आती है। ऐसा क्यों है? क्योंकि जब भी मैं किसी के सामने होता हूँ, जब भी मैं किसी की कहानी सुनता हूँ, जब भी मैं परमेश्वर पर विश्वास करने के विषय में किसी व्यक्ति का अनुभव या उनकी गवाही को सुनता हूँ, तब मैं हमेशा यह तौलने के लिए इस कहावत का उपयोग करता हूँ कि वह व्यक्ति उस प्रकार का इंसान है या नहीं जिसे परमेश्वर चाहता है, और उस प्रकार का इंसान है या नहीं जिसे परमेश्वर पसन्द करता है। अतः फिर वह कहावत क्या है? अब तुम सब पूरी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हो। जब मैं उस कहावत को प्रकट करता हूँ, कदाचित् तुम लोगों को निराशा महसूस हो क्योंकि ऐसे लोग हैं जो इसके प्रति अनेक वर्षों से दिखावटी प्रेम दिखा रहे हैं। परन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैंने इसके प्रति कभी भी दिखावटी प्रेम नहीं दिखाया है। यह कहावत मेरे हृदय में बसी हुई है। अतः यह कहावत क्या है? यह "परमेश्वर के मार्ग में चलना: परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना है।" क्या यह बहुत ही सरल वाक्यांश नहीं है? फिर भी हालाँकि यह कहावत सरल हो सकती है, कोई व्यक्ति जिसके पास असल में इसकी गहरी समझ है वह महसूस करेगा कि इसका बड़ा वज़न है; कि अभ्यास करने के लिए इसका बड़ा मूल्य है; कि सत्य की वास्तविकता के साथ यह जीवन की भाषा है; कि यह उनके लिए जीवनपर्यन्त उद्देश्य है जो परमेश्वर को संतुष्ट करने की खोज करते हैं; कि यह किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा अनुसरण करने हेतु जीवनपर्यन्त मार्ग है जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हैं। अतः तुम लोग क्या सोचते हो: क्या यह कहावत सत्य है? क्या इसका इस प्रकार का महत्व है? कदाचित् कुछ लोग हैं जो इस कहावत के बारे में ऐसा कहते हुए सोच रहे हैं, इसे समझने का प्रयास कर रहे हैं, और अभी भी ऐसे लोग हैं जो इसके विषय में सन्देहास्पद हैं: क्या यह कहावत अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह अत्यंत महत्वपूर्ण है? क्या यह इतना ज़रूरी है और जोर देने लायक है? कदाचित् कुछ ऐसे लोग हैं जो इस कहावत को उतना पसन्द नहीं करते हैं, क्योंकि वे सोचते हैं कि परमेश्वर के मार्ग को लेना और उसे एक कहावत में सारभूत करना इसे बहुत ही सरल बनाना है। जो कुछ परमेश्वर ने कहा था वह सब लेना और एक कहावत में उसका संक्षेपण करना—क्या यह परमेश्वर को थोड़ा महत्वहीन नहीं बना रहा है? क्या यह ऐसा ही है? ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों में से अधिकांश जन इन वचनों के पीछे के गंभीर अर्थ को पूरी तरह से नहीं समझते हो। यद्यपि तुम लोगों ने इसे लिख लिया है, फिर भी तुम सब इस कहावत को अपने हृदय में स्थान देने का इरादा नहीं करते हो; तुम सब बस इसे लिख लेते हो, और अपने खाली समय में इसे फिर से पढ़ते हो और इस पर गहराई से विचार करते हो। कुछ अन्य लोग भी हैं जो इस कहावत को स्मरण करने की भी परवाह नहीं करते हैं, अच्छे उपयोग के लिए इसका अभ्यास करने की तो बात ही छोड़ ही दो। परन्तु मैं इस कहावत पर चर्चा क्यों करता हूँ? तुम लोगों के दृष्टिकोण, या जो कुछ तुम सब सोचोगे उनकी परवाह किए बगैर, मुझे इस कहावत पर चर्चा करनी है क्योंकि यह इस बात से अत्यंत प्रासंगिक है कि किस प्रकार परमेश्वर मनुष्य के परिणामों को निर्धारित करता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि इस कहावत के विषय में तुम लोगों की वर्तमान समझ क्या है, या तुम सब इससे कैसा व्यवहार करते हो, मैं अभी भी तुम लोगों को बताने जा रहा हूँ: यदि कोई व्यक्ति इस कहावत का उचित रीति से अभ्यास कर सकता है और परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मानक को हासिल कर सकता है, तो उन्हें जीवित बचे हुए इंसान के रूप में आश्वस्त किया जाता है, तो उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति के रूप में आश्वस्त किया जाता है जिसके पास एक अच्छा परिणाम होता है। यदि तुम उस मानक को प्राप्त नहीं कर सकते हो जिसे इस कहावत के द्वारा रखा गया है, तो ऐसा कहा जा सकता है कि तेरा परिणाम अज्ञात है। इस प्रकार मैं तुम लोगों की मानसिक तैयारी के लिए इस कहावत के बारे में तुम सब से कहता हूँ, और जिससे तुम लोग जान लो कि तुम सब को मापने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के मानक का उपयोग करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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