परमेश्वर के दैनिक वचन : धर्म-संबंधी धारणाओं का खुलासा | अंश 294

31 जुलाई, 2020

जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते, वे परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत होते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, वे तो परमेश्वर के और भी बड़े विरोधी होते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे "मज़बूत देह" वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं? जो लोग परमेश्वर के सामने अपने आपको बड़ा मूल्य देते हैं, वे सबसे अधिक अधम लोग हैं, जबकि जो खुद को तुच्छ समझते हैं, वे सबसे अधिक आदरणीय हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं, और दूसरों के आगे परमेश्वर के कार्य की धूमधाम से उद्घोषणा करते हैं, जबकि वे सीधे परमेश्वर को देखते हैं—ऐसे लोग बेहद अज्ञानी होते हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर की गवाही नहीं होती, वे अभिमानी और अत्यंत दंभी होते हैं। परमेश्वर का वास्तविक अनुभव और व्यवहारिक ज्ञान होने के बावजूद, जो लोग ये मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर का बहुत थोड़ा-सा ज्ञान है, वे परमेश्वर के सबसे प्रिय लोग होते हैं। ऐसे लोग ही सच में गवाह होते हैं और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य होते हैं। जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते वे परमेश्वर के विरोधी हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझते तो हैं मगर सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, फिर भी परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध जाते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जिनमें देहधारी परमेश्वर के प्रति धारणाएँ हैं और जिनका दिमाग विद्रोह में लिप्त रहता है, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो लोग परमेश्वर की आलोचना करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; और जो कोई भी परमेश्वर को जानने या उसकी गवाही देने में असमर्थ है, वो परमेश्वर का विरोधी है। इसलिये मेरा तुम लोगों से आग्रह है : यदि तुम लोगों को सचमुच विश्वास है कि तुम इस मार्ग पर चल सकते हो, तो इस मार्ग पर चलते रहो। लेकिन अगर तुम लोग परमेश्वर के विरोध से परहेज नहीं कर सकते, तो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बेहतर है कि तुम लोग यह मार्ग छोड़कर चले जाओ। अन्यथा इस बात की संभावना बहुत ज़्यादा है कि तुम्हारे साथ बुरा हो जाए, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति बहुत ही भ्रष्ट है। तुम लोगों में लेशमात्र भी निष्ठा, आज्ञाकारिता, या ऐसा हृदय नहीं है जिसमें धार्मिकता और सत्य की प्यास हो या परमेश्वर के लिए प्रेम हो। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी दशा बेहद खराब है। तुम लोगों को जिन बातों का पालन करना चाहिए उनका पालन नहीं कर पाते, और जो बोलना चाहिए वो तुम बोल नहीं पाते। तुम्हें जिन चीज़ों का अभ्यास करना चाहिए उनका अभ्यास तुम लोग कर नहीं पाए। तुम लोगों को जो कार्य करना चाहिए था, वो तुमने किया नहीं। तुम लोगों में जो निष्ठा, विवेक, आज्ञाकारिता और संकल्पशक्ति होनी चाहिए, वो तुम लोगों में है नहीं। तुम लोगों ने उस तकलीफ़ को नहीं झेला है, जो तुम्हें झेलनी चाहिए, तुम लोगों में वह विश्वास नहीं है, जो होना चाहिए। सीधी-सी बात है, तुम लोग सभी गुणों से रहित हो : क्या तुम लोग इस तरह जीते रहने से शर्मिंदा नहीं हो? मैं तुम लोगों को विश्वास दिलाना चाहूँगा, तुम लोगों के लिए अनंत विश्राम में आँखें बंद कर लेना बेहतर होगा और इस तरह तुम परमेश्वर को तुम लोगों की चिंता करने और कष्ट झेलने से मुक्त कर दोगे। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास तो करते हो मगर उसकी इच्छा को नहीं जानते; तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते तो हो, मगर इंसान से परमेश्वर की जो अपेक्षाएँ हैं, उसे पूरा करने में असमर्थ हो। तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो मगर परमेश्वर को जानते नहीं, तुम लक्ष्यहीन जीवन जीते हो, न कोई मूल्य है और न ही कोई सार्थकता है। तुम लोग इंसान की तरह जीते तो हो मगर तुम लोगों में विवेक, सत्यनिष्ठा या विश्वसनीयता लेशमात्र भी नहीं है—क्या तुम लोग खुद को अब भी इंसान कह सकते हो? तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो फिर भी उसे धोखा देते हो; और तो और, तुम लोग परमेश्वर का धन हड़प जाते हो और उसके चढ़ावों को खा जाते हो, फिर भी, परमेश्वर की भावनाओं के प्रति न तो तुम्हारे अंदर कोई आदर-भाव है, न ही परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज़मीर जागता है। तुम लोग परमेश्वर की अत्यंत मामूली अपेक्षाओं को भी पूरा नहीं कर पाते। क्या फिर भी तुम खुद को इंसान कह सकते हो? तुम परमेश्वर का दिया आहार ग्रहण करते हो, उसकी दी हुई ऑक्सीजन में साँस लेते हो, तुम उसके अनुग्रह का आनंद लेते हो, मगर अंत में, तुम लोगों को परमेश्वर का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता है। उल्टे, तुम लोग ऐसे निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्या तुम लोग एक कुत्ते से भी बदतर जंगली जानवर नहीं हो? क्या जानवरों में कोई ऐसा है जो तुम लोगों से भी अधिक द्वेषपूर्ण हो?

जो पादरी और एल्डर्स ऊँचे-ऊँचे उपदेश-मंचों पर खड़े होकर लोगों को उपदेश देते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी और शैतान के साथी हैं; तुम लोगों में से वे लोग जो उपदेश-मंचों पर खड़े होकर लोगों को उपदेश नहीं देते, परमेश्वर के और भी अधिक विरोधी नहीं हैं? क्या शैतान के साथ तुम लोगों की मिली-भगत और भी ज़्यादा मज़बूत नहीं है? जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते, वे नहीं जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कैसे बनें। निश्चित रूप से, ऐसा तो नहीं हो सकता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझते हैं, वे न जानते हों कि परमेश्वर के अनुरूप कैसे बनें। परमेश्वर के कार्य में कभी भी त्रुटि नहीं होती; बल्कि, त्रुटि इंसान के अनुसरण में होती है। क्या वे पतित लोग जो जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं, पादरियों और एल्डरों से भी अधिक कुटिल और दुष्ट नहीं हैं? बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और उन लोगों में, ऐसे भी हैं जो बहुत से दूसरे तरीकों से परमेश्वर का विरोध करते हैं। जैसे सभी प्रकार के विश्वासी होते हैं, वैसे ही परमेश्वर का विरोध करने वाले भी सभी प्रकार के होते हैं, सब एक-दूसरे से भिन्न होते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझते, उनमें से एक को भी नहीं बचाया जा सकता। अतीत में इंसान ने परमेश्वर का कितना भी विरोध किया हो, लेकिन जब इंसान को परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य समझ में आ जाता है, और वो परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करता है, तो परमेश्वर उसके पिछले सारे पाप धो देता है। अगर इंसान सत्य की खोज और सत्य का अभ्यास करे, तो परमेश्वर उसके कृत्यों को अपने मन में नहीं रखता। इसके अलावा, इंसान द्वारा सत्य के अभ्यास के आधार पर परमेश्वर उसे सही ठहराता है। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। इंसान के परमेश्वर को देखने या उसके कार्य का अनुभव करने से पहले, परमेश्वर के प्रति इंसान का चाहे जो रवैया रहा हो, परमेश्वर उसे अपने मन में नहीं रखता। लेकिन, एक बार जब इंसान परमेश्वर को जान लेता है और उसके कार्य का अनुभव कर लेता है, तो इंसान के सभी कर्म और क्रियाकलाप परमेश्वर द्वारा "ऐतिहासिक अभिलेख" में लिख लिए जाते हैं, क्योंकि इंसान ने परमेश्वर को देख लिया है और उसके कार्य में जीवन जी लिया है।

जब इंसान वास्तव में परमेश्वर का स्वरूप देख लेता है, वह उसकी सर्वश्रेष्ठता को देख लेता है, और परमेश्वर के कार्य को वास्तव में जान लेता है, और इसके अलावा, जब इंसान का पुराना स्वभाव बदल जाता है, तब इंसान परमेश्वर का विरोध करने वाले अपने विद्रोही स्वभाव को पूरी तरह से दूर कर लेता है। ऐसा कहा जा सकता है कि हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर का विरोध किया होगा और हर इंसान ने कभी न कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया होगा। लेकिन, यदि तुम अपनी खुशी से देहधारी परमेश्वर की आज्ञा मानते हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, अपेक्षित सत्य का अभ्यास करते हो, अपेक्षित कर्तव्य का निर्वहन करते हो, और अपेक्षित नियमों को मानते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोह को दूर करना चाहते हो, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से ढिठाई से इनकार करते हो, और तुम्हारी नीयत पश्चाताप करने की नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही आचरण पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर के साथ ज़रा-सा भी सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का भाव नहीं रखते, तब तुम्हारे जैसे दुराग्रही और न सुधरने वाले व्यक्ति को निश्चित रूप से दण्ड दिया जाएगा, और परमेश्वर तुम्हें कभी पूर्ण नहीं बनाएगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु हो और कल भी परमेश्वर के शत्रु रहोगे और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के विरोधी और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। ऐसी स्थिति में, परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है? परमेश्वर का विरोध करना इंसान की प्रकृति है, लेकिन इंसान को महज़ इसलिए जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने के "रहस्य" को पाने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि अपनी प्रकृति बदलना दुर्गम कार्य है। यदि ऐसी बात है, तो बेहतर होगा, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए तुम चले जाओ, ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना अधिक कठोर हो जाए, और तुम्हारी क्रूर प्रकृति उभर आए और उच्छृंखल हो जाए, जब तक कि अंत में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे भौतिक शरीर को समाप्त न कर दिया जाए। तुम आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो; लेकिन अगर अंत में, तुम पर दुर्भाग्य आ पड़े, तो क्या यह शर्मिंदगी की बात नहीं होगी। मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि बेहतर होगा कि तुम कोई अन्य योजना बनाओ। तुम जो भी करो, वो परमेश्वर में आस्था रखने से बेहतर होगा : यकीनन ऐसा तो नहीं हो सकता कि यही एक मार्ग है। अगर तुमने सत्य की खोज नहीं की तो क्या तुम जीवित नहीं रहोगे? तुम क्यों इस प्रकार से परमेश्वर के साथ असहमत हो?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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