परमेश्वर के दैनिक वचन : धर्म-संबंधी धारणाओं का खुलासा | अंश 293

19 जुलाई, 2020

परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य, मनुष्यों में उसका कार्य जो प्रभाव प्राप्त करता है, और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की जो इच्छा है : इन्हीं बातों को हर उस व्यक्ति को समझना चाहिए जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। आजकल सभी इंसानों में परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अभाव है। परमेश्वर ने इंसान पर कौन-से कर्म किए हैं, परमेश्वर के समस्त कार्य और सृष्टि की रचना से लेकर वर्तमान समय तक, इंसान के लिए परमेश्वर की क्या इच्छा रही है—इन बातों को इंसान न तो जानता है न ही समझता है। यह अपर्याप्तता न केवल समस्त धार्मिक जगत में देखी जाती है, बल्कि परमेश्वर के सभी विश्वासियों में भी देखी जाती है। जब वह दिन आता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर को देखते हो, उसकी बुद्धि को समझते हो; जब तुम परमेश्वर के किए सभी कर्मों को देखते हो और परमेश्वर के स्वरूप को पहचान जाते हो; जब तुम उसकी विपुलता, बुद्धि, चमत्कार और उन तमाम कार्यों को देखते हो जो उसने लोगों पर किए हैं, उस दिन तुम परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेते हो। जब परमेश्वर को सर्वव्यापी और अत्यधिक विपुल कहा जाता है, तब वह किन मायनों में सर्वव्यापी होता है? और वह किन मायनों में अत्यधिक विपुल होता है? यदि तुम इस बात को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासी नहीं माने जा सकते। मैं क्यों कहता हूँ कि धार्मिक जगत के लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं होते, बल्कि कुकर्मी होते हैं, शैतान की ही किस्म के होते हैं? जब मैं कहता हूँ कि वे कुकर्मी होते हैं, तो ऐसा इसलिये कहता हूँ क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते, उसकी बुद्धि को नही देख पाते। परमेश्वर कभी भी अपना कार्य उन पर प्रकट नहीं करता। वे अंधे होते हैं; वे परमेश्वर के कर्मों को नहीं देख पाते, परमेश्वर ने उन्हें त्याग दिया है और उन्हें परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा बिल्कुल भी प्राप्त नहीं है, पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने की तो बात ही दूर है। जो लोग परमेश्वर के कार्य से वंचित हैं, वे कुकर्मी और परमेश्वर के विरोधी हैं। मैं परमेश्वर के जिन विरोधियों की बात कर रहा हूँ, वो उन लोगों के संदर्भ में है जो परमेश्वर को नहीं जानते, जो ज़बान से तो परमेश्वर को स्वीकारते हैं, मगर परमेश्वर को जानते नहीं, जो परमेश्वर का अनुसरण तो करते हैं मगर उसकी आज्ञा का पालन नहीं करते, और जो परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद तो उठाते हैं मगर उसकी गवाही नहीं दे पाते। परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को या मनुष्य में उसके कार्य को समझे बिना, मनुष्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं हो सकता, न ही वह परमेश्वर की गवाही दे सकता है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर के विरोध का कारण, एक ओर तो मनुष्य का स्वभाव भ्रष्ट है, दूसरी ओर, परमेश्वर के प्रति अज्ञानता, उन सिद्धांतों की जिनसे परमेश्वर कार्य करता है और मनुष्य के लिए उसकी इच्छा की समझ की कमी है। ये दोनों पहलू मिलकर परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध के इतिहास को बनाते हैं। नौसिखिए विश्वासी परमेश्वर का विरोध करते हैं क्योंकि ऐसा विरोध उनकी प्रकृति में बसा होता है, जबकि कई वर्षों से विश्वास रखने वाले लोगों में परमेश्वर का विरोध, उनके भ्रष्ट स्वभाव के अलावा, परमेश्वर के प्रति उनकी अज्ञानता का परिणाम है। परमेश्वर के देहधारी बनने से पहले के समय में, क्या किसी मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया है, यह इस बात से तय होता था कि क्या उसने स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा निर्धारित आदेशों का पालन किया है। उदाहरण के लिये, व्यवस्था के युग में, जो कोई यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं करता था, वह परमेश्वर का विरोधी माना जाता था; जो कोई यहोवा के प्रसाद की चोरी करता था या यहोवा के कृपापात्रों के विरुद्ध खड़ा होता था, उसे परमेश्वर-विरोधी मानकर पत्थरों से मार डाला जाता था; जो कोई अपने माता-पिता का आदर नहीं करता था, दूसरों को चोट पहुँचाता था या धिक्कारता था, तो उसे व्यवस्था का पालन न करने वाला माना जाता था। और जो लोग यहोवा की व्यवस्था को नहीं मानते थे, उन्हें यहोवा विरोधी माना जाता था। लेकिन अनुग्रह के युग में ऐसा नहीं था, तब जो कोई भी यीशु के विरुद्ध खड़ा होता था, उसे विरोधी माना जाता था, और जो यीशु द्वारा बोले गये वचनों का पालन नहीं करता था, उसे परमेश्वर विरोधी माना जाता था। इस समय, जिस ढंग से परमेश्वर के विरोध को परिभाषित किया गया, वह ज़्यादा सही भी था और ज़्यादा व्यवाहारिक भी। जिस दौरान, परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब कोई इंसान परमेश्वर विरोधी है या नहीं, यह इस बात से तय होता था कि क्या इंसान स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना और उसका आदर करता था या नहीं। उस समय परमेश्वर के प्रति विरोध को जिस ढंग से परिभाषित किया गया, वह उतना भी व्यवाहारिक नहीं था क्योंकि तब इंसान परमेश्वर को देख नहीं पाता था, न ही उसे यह पता था कि परमेश्वर की छवि कैसी है, वह कैसे कार्य करता है और कैसे बोलता है। परमेश्वर के बारे में इंसान की कोई धारणा नहीं थी, परमेश्वर के बारे में उसकी एक अस्पष्ट आस्था थी, क्योंकि परमेश्वर अभी तक इंसानों के सामने प्रकट नहीं हुआ था। इसलिए, इंसान ने अपनी कल्पनाओं में कैसे भी परमेश्वर में विश्वास क्यों न किया हो, परमेश्वर ने न तो इंसान की निंदा की, न ही इंसान से अधिक अपेक्षा की, क्योंकि इंसान परमेश्वर को देख नहीं पाता था। परमेश्वर जब देहधारण कर इंसानों के बीच काम करने आता है, तो सभी उसे देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, और सभी लोग उन कर्मों को देखते हैं जो परमेश्वर देह रूप में करता है। उस क्षण, इंसान की तमाम धारणाएँ साबुन के झाग बन जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखा है, यदि वे अपनी इच्छा से उसका आज्ञापालन करेंगे, तो उनका तिरस्कार नहीं किया जाएगा, जबकि जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से उसकी आज्ञा मानते हैं, वे निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की नीयत और क्रियाकलापों के आधार पर उसे दंडित करता है, उसके विचारों और मत के आधार पर कभी नहीं। यदि वह विचारों और मत के आधार पर इंसान को दंडित करता, तो कोई भी परमेश्वर के रोषपूर्ण हाथों से बच कर भाग नहीं पाता। जो लोग जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसकी अवज्ञा करने के कारण दण्ड पाएँगे। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, उनका विरोध परमेश्वर के प्रति उनकी धारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप वे परमेश्वर के कार्य में व्यवधान पैदा करते हैं। ये लोग जानते-बूझते परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। परमेश्वर के बारे में न केवल उनकी धारणाएँ होती हैं, बल्कि वे उन कामों में भी लिप्त रहते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि इस तरह के लोगों की निंदा की जाएगी। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालने में लिप्त नहीं होते, उनकी पापियों के समान निंदा नहीं की जाएगी, क्योंकि वे अपनी इच्छा से आज्ञापालन कर पाते हैं और विघ्न एवं व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त नहीं होते। ऐसे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जाएगी। लेकिन, जब कोई कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के बाद भी परमेश्वर के बारे में कई धारणाएँ मन में रखता है और देहधारी परमेश्वर के कार्य को समझने में असमर्थ रहता है, और अनेक वर्षों के अनुभव के बावजूद, वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और उसे जान नहीं पाता, और अगर कितने भी सालों तक उसके कार्य का अनुभव करने के बाद भी वह परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है और फिर भी उसे जान नहीं पाता तब वह भले ही व्यवधान उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में लिप्त न हो, लेकिन उसका हृदय परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता है, और अगर ये धारणाएँ स्पष्ट न भी हों तो, ऐसे लोग किसी भी प्रकार से परमेश्वर के कार्य के उपयोग लायक नहीं होते। वे सुसमाचार का उपदेश देने या परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग किसी काम के नहीं होते और मंदबुद्धि होते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते और परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं का परित्याग करने में एकदम अक्षम होते हैं, इसलिए वे निंदित किए जाते हैं। ऐसा कहा जा सकता है : नौसिखिए विश्वासियों के लिये परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखना या परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना सामान्य बात है, परंतु जिसने वर्षों परमेश्वर में विश्वास किया है और परमेश्वर के कार्य का बहुत अनुभव किया है, उसका ऐसी धारणाएँ रखे रहना, सामान्य बात नहीं है, और उसे परमेश्वर का ज्ञान न होना तो बिल्कुल भी सामान्य नहीं है। ऐसे लोगों की निंदा करना सामान्य स्थिति नहीं है। ऐसे असामान्य लोग एकदम कचरा हैं; ये ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और जिन्होंने व्यर्थ में ही परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाया होता है। ऐसे सभी लोग अंत में मिटा दिए जाएँगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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