परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 27 | अंश 372

परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 27 | अंश 372

0 |27 अगस्त, 2020

मानवजाति ने मेरी गर्मजोशी का अनुभव किया, उन्होंने ईमानदारी से मेरी सेवा की, और वे ईमानदारी से मेरे प्रति आज्ञाकारी थे, मेरी उपस्थिति में मेरे लिए हर चीज़ कर रहे थे। परन्तु आज लोग किसी भी तरह से इस प्रकार की स्थिति में होने का प्रबंधन नहीं कर सकते हैं, और वे केवल अपनी आत्मा में विलाप कर सकते हैं मानो उन्हें किसी खूँखार भेड़िए के द्वारा बल पूर्वक ले जाया गया हो। वे केवल अहसाय भाव से मेरी ओर देख सकते हैं, लगातार मुझे सहायता के लिए पुकार सकते हैं, परन्तु अंत में अपनी दुर्दशा से बच निकलने में वे असमर्थ रहते हैं। मैं पीछे की बातों को सोचता हूँ कि किस प्रकार अतीत में लोगों ने मेरी उपस्थिति में प्रतिज्ञाएँ की थीं, अपने स्नेह से मेरी दयालुता को चुकाने की स्वर्ग और पृथ्वी की शपथ ली थी। वे मेरे सामने दुःखी होकर रोते थे, और उनके रोने की आवाज़ हृदय-विदारक और असहनीय थी। मैंने प्रायः मानवजाति को उसके संकल्प की शक्ति के आधार पर अपनी सहायता प्रदान की। अनगिनत बार लोग मेरे प्रति समर्पण करने के लिए ऐसे आराध्य तरीके से मेरे सामने आए हैं जो अविस्मरणीय हैं। अनगिनत बार उन्होंने अविचल निष्ठा के साथ मुझसे प्रेम किया है, और उनकी सच्ची भावनाएँ प्रशंसनीय हैं। अनगिनत अवसरों पर, उन्होंने अपने जीवन को बलिदान करने की हद तक मुझसे प्रेम किया है, उन्होंने अपने आप से अधिक मुझ से प्रेम किया है, और उनकी ईमानदारी को देखकर, मैंने उनके प्रेम को स्वीकार कर लिया है। अनगिनत अवसरों पर, उन्होंने मेरी उपस्थिति में अपने आप को अर्पित किया है, और मेरे वास्ते मृत्यु का सामना करने पर भी विरक्त रहे हैं, और मैंने उनके चेहरों से चिन्ता को मिटा डाला है, और सावधानीपूर्वक उनके चेहरों का बारीकी से निरीक्षण किया है। ऐसे अनगिनत अवसर हैं आए जहाँ मैंने उन्हें अपने स्वयं के खज़ाने के रूप में प्यार किया है, और ऐसे अनगिनत अवसर भी आए जहाँ मैंने उनसे अपने स्वयं के शत्रु के रूप में नफ़रत की है। मैं एैसा ही हूँ—मनुष्य कभी भी इस बात की थाह नहीं पा सकता है कि मेरे मन में क्या है? जब लोग दुःखी होते हैं, तो मैं उन्हें सान्त्वना देने के लिए आता हूँ, और जब वे कमज़ोर होते हैं, तो मैं उनकी सहायता के लिए उनके साथ हो जाता हूँ। जब वे खो जाते हैं, मैं उन्हें दिशा निर्देश देता हूँ। जब वे रोते हैं, तो मैं उनके आँसुओं को पोंछता हूँ। हालाँकि, जब मैं उदास होता हूँ, तो कौन अपने हृदय से मुझे सान्त्वना दे सकता है? जब मैं चिंतित हो कर अस्वस्थ होता हूँ, तो कौन मेरी भावनाओं के बारे में विचारशील होता है? जब मैं दुःखी होता हूँ, तो कौन मेरे हृदय के घावों को भर सकता है? जब मुझे किसी की आवश्यकता होती है, तो कौन मेरे साथ कार्य करने के लिए स्वेच्छा से प्रस्तुत होगा? क्या ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरे प्रति लोगों की पूर्व की प्रवृत्ति अब खो गई है और कभी वापस नहीं आएगी? ऐसा क्यों है कि उनकी स्मृति में रत्ती भर भी नहीं बचा है? ऐसा कैसे है कि लोग इन सभी बातों को भूल गए हैं? क्या यह सब इसलिए नहीं है क्योंकि मानवजाति को उसके शत्रुओं के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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