परमेश्वर के दैनिक वचन : इंसान की भ्रष्टता का खुलासा | अंश 324

13 जुलाई, 2020

तुम सभी को अब परमेश्वर में आस्था का सही अर्थ समझना चाहिए। परमेश्वर में आस्था रखने के जिस अर्थ के बारे में मैंने पहले बोला था, वह तुम लोगों के सकारात्मक प्रवेश से संबंधित था। आज बात अलग है : आज मैं परमेश्वर पर तुम लोगों की आस्था के सार का विश्लेषण करना चाहूँगा। बेशक, यह तुम लोगों का नकारात्मकता के पहलू से मार्गदर्शन करना है; अगर मैंने ऐसा नहीं किया, तो तुम लोग अपना सच्चा चेहरा कभी नहीं देख पाओगे, और हमेशा अपनी धर्मपरायणता और निष्ठा की डींग हाँकोगे। यह कहना उचित है कि अगर मैंने तुम लोगों के हृदय की गहराई में छिपी कुरूपता प्रकट न की, तो तुम लोगों में से प्रत्येक अपने सिर पर मुकुट रखकर समस्त महिमा अपने लिए रख लेगा। तुम लोगों की अभिमानी और दंभी प्रकृति तुम लोगों को अपने ही अंतःकरण के साथ विश्वासघात करने, मसीह से विद्रोह करने और उसका विरोध करने, और अपनी कुरूपता प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है, और इस तरह तुम लोगों के इरादों, धारणाओं, असंयत इच्छाओं और लालच से भरी नजरों को प्रकाश में ले आती है। फिर भी तुम लोग मसीह के कार्य के लिए अपने जीवन भर के जोश के बारे में बक-बक करते रहते हो और बार-बार मसीह द्वारा बहुत पहले कहे गए सत्य दोहराते रहते हो। यही तुम लोगों की "आस्था"—तुम लोगों की "अशुद्धता-रहित आस्था" है। मैंने पूरे समय मनुष्य के लिए बहुत कठोर मानक रखा है। अगर तुम्हारी वफादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहना चाहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ, जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों द्वारा मुझसे जबरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्य से सिर्फ यही चाहता हूँ कि वह मेरे प्रति पूरी तरह से वफादार हो और सभी चीजें एक ही शब्द : आस्था—के वास्ते—और उसे साबित करने के लिए करे। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद का तिरस्कार करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम लोगों के साथ ईमानदारी से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम लोगों से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्ची आस्था के साथ कार्य करो। जब आस्था की बात आती है, तो कई लोग यह सोच सकते हैं कि वे परमेश्वर का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि उनमें आस्था है, अन्यथा वे इस प्रकार की पीड़ा न सहते। तो मैं तुमसे यह पूछता हूँ : अगर तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो उसके प्रति श्रद्धा क्यों नहीं रखते? अगर तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो तुम्हारे हृदय में उसका थोड़ा-सा भी भय क्यों नहीं है? तुम स्वीकार करते हो कि मसीह परमेश्वर का देहधारण है, तो तुम उसकी अवमानना क्यों करते हो? तुम उसके प्रति अनादरपूर्वक क्यों पेश आते हो? तुम उसकी खुलेआम आलोचना क्यों करते हो? तुम हमेशा उसकी गतिविधियों की जासूसी क्यों करते हो? तुम उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित क्यों नहीं होते? तुम उसके वचन के अनुसार कार्य क्यों नहीं करते? क्यों तुम उसकी भेंटें जबरन छीनने और लूटने का प्रयास करते हो? क्यों तुम मसीह की स्थिति से बोलते हो? क्यों तुम यह आकलन करते हो कि उसका कार्य और वचन सही हैं या नहीं? क्यों तुम पीठ पीछे उसकी निंदा करने का साहस करते हो? क्या तुम्हारी आस्था इन्हीं और अन्य बातों से मिलकर बनी है?

तुम लोगों के शब्दों और व्यवहार में मसीह के प्रति तुम्हारे अविश्वास के तत्त्व प्रकट होते हैं। तुम जो कुछ भी करते हो, उसके इरादों और लक्ष्यों में अविश्वास व्याप्त रहता है। यहाँ तक कि तुम लोगों की नजरों के भाव में भी मसीह के प्रति अविश्वास होता है। कहा जा सकता है कि तुम लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति हर पल अविश्वास के तत्त्व मन में रखता है। इसका अर्थ है कि हर पल तुम लोग मसीह के साथ विश्वासघात करने के खतरे में हो, क्योंकि तुम लोगों के शरीर में दौड़ने वाला रक्त देहधारी परमेश्वर में अविश्वास से तर रहता है। इसलिए, मैं कहता हूँ कि परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर जो पदचिह्न तुम लोग छोडते हो, वे वास्तविक नहीं हैं; जब तुम लोग परमेश्वर में आस्था के मार्ग पर चलते हो, तो तुम जमीन पर अपने पैर मजबूती से नहीं रखते—तुम बस बेमन से चलते हो। तुम लोग कभी मसीह के वचन पर पूरी तरह से विश्वास नहीं करते और उसे तुरंत अभ्यास में लाने में अक्षम हो। यही कारण है कि तुम लोगों को मसीह में आस्था नहीं है। उसके बारे में हमेशा धारणाएँ रखना उस में तुम्हारी आस्था के न होने का दूसरा कारण है। मसीह के कार्य के बारे में हमेशा संशयग्रस्त रहना, मसीह के वचनों पर कान न देना, मसीह द्वारा जो भी कार्य किया जाता है उसके बारे में राय रखना और उस कार्य को सही तरह से समझने में समर्थ न होना, चाहे कोई भी स्पष्टीकरण दिया जाए, पर अपनी धारणाएँ छोड़ने में कठिनाई महसूस करना, इत्यादि—अविश्वास के ये सभी तत्त्व तुम लोगों के दिलों में घुल-मिल गए हैं। यद्यपि तुम लोग मसीह के कार्य का अनुसरण करते हो और कभी पीछे नहीं रहते, लेकिन तुम लोगों के हृदयों में अत्यधिक विद्रोह मिश्रित हो गया है। यह विद्रोह परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास में एक अशुद्धि है। शायद तुम लोगों को ऐसा न लगता हो, लेकिन अगर तुम इसके भीतर से अपने इरादे पहचानने में असमर्थ हो, तो तुम्हारा नष्ट होने वाले लोगों में होना निश्चित है, क्योंकि परमेश्वर केवल उन्हें ही पूर्ण करता है जो वास्तव में उस पर विश्वास करते हैं, उन्हें नहीं जो उस पर संशय करते हैं, और उन सबको तो बिल्कुल नहीं, जिन्होंने कभी यह नहीं माना कि वह परमेश्वर है और फिर भी अनिच्छा से उसका अनुसरण करते हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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