परमेश्वर के दैनिक वचन | "एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है" | अंश 300

0 |09 अगस्त, 2020

भ्रष्टाचार के हजारों सालों बाद, मनुष्य सुन्न और मूर्ख बन गया है, एक दुष्ट आत्मा जो परमेश्वर का विरोध करती है, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज है, और यहाँ तक कि मनुष्य खुद भी अपने विद्रोही स्वभाव का पूरा लेखा देने के अयोग्य है—क्योंकि मनुष्य शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान के द्वारा रास्ते से भटका दिया गया है कि नहीं जानता कि कहाँ मुड़ना हैं। आज भी, मनुष्य परमेश्वर को धोखा देता है: जब मनुष्य परमेश्वर को देखता है, वह उसे धोखा देता है, और जब वह परमेश्वर को नहीं देख सकता, तब भी वह उसे धोखा देता है। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने परमेश्वर के श्रापों और परमेश्वर के कोप का अनुभव भी किया है, फिर भी उसे धोखा देते हैं। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल कार्य को खो दिया है, और मनुष्य के अन्तश्चेतना, ने भी, अपने मूल कार्य को खो दिया है। मनुष्य जिसे मैं देखता हूँ मानव रूप में एक जानवर है, वह एक जहरीला साँप है, और कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी आँखों के सामने वह चाहे कितना भी दयनीय बनने की कोशिश करे, मैं उसके प्रति कभी भी दयावान नहीं बनूँगा, क्योंकि मनुष्य को काले और सफेद के बीच में, सत्य और असत्य के बीच में अन्तर की समझ नहीं है, मनुष्य की समझ इतनी सुन्न हो गई है, फिर भी वह आशिषें पाने की कामना करता है; उसकी मानवता बहुत नीच है फिर भी वह एक राजा के प्रभुत्व को पाने की कामना करता है। ऐसी समझ के साथ, वह किसका राजा बन सकता है? कैसे वह एक ऐसी मानवता के साथ, एक सिंहासन पर बैठ सकता है? सचमुच में मनुष्य को कुछ शर्म नहीं है! वह नीच ढ़ोंगी है! तुम सब जो आशिषें पाने की कामना करते हो, मैं सुझाव देता हूँ कि पहले एक शीशे को ढूंढ़ों और अपनी खुद की बदसूरत प्रतिबिंब देखो—क्या तू एक राजा बनने लायक है? क्या तेरे पास एक ऐसा चेहरा है जो आशिषें पा सकता है? तेरे स्वभाव में एक छोटा सा भी बदलाव नहीं आया है और तूने किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, फिर भी तू एक अद्भुत कल की कामना करता है। तू अपने आप को भुलावे में रख रहा है! एक ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा गंभीर रूप से अभिशप्त किया जा चुका है, वह सामंती नैतिकता के द्वारा प्रभावित किया जा चुका है, और "उच्च शिक्षा के संस्थानों" पर सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, तिरस्कार-योग्य दर्शनशास्त्र, पूर्ण रूप से बेकार अस्तित्व, और भ्रष्ट जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीजों ने मनुष्य के हृदय पर गंभीर रूप से घुसपैठ की है, और उसके सद्विवेक पर हमला किया और उसे गंभीर रूप से कम आंका है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर है, और परमेश्वर के और अधिक विरोध में रहा है। दिन प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और कोई एक भी व्यक्ति नहीं है जो स्वेछा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग देगा, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेछा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करेगा, न ही, इसके अलावा, एक भी व्यक्ति स्वेछा से परमेश्वर के रूप को खोजेगा। इसके बजाये, शैतान की प्रभुता के आधीन, मनुष्य कुछ नहीं करता परन्तु आनंद का पीछा करता है, कीचड़ की जगह में अपने आप को देह के भ्रष्टाचार के लिए दे देता है। यहाँ तक कि वे जब सत्य को सुनते हैं, वे जो अन्धकार में जीते हैं इसे अभ्यास में लाने का कुछ भी विचार नहीं करते, न ही वे परमेश्वर को खोजने के प्रति झुकते हैं भले ही चाहे उन्होंने उसके रूप को भी देखा हो। एक इतनी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार का मौका कैसे है? इतनी पतनो-मुख मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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