परमेश्वर के दैनिक वचन | "जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं" | अंश 538

परमेश्वर के दैनिक वचन | "जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं" | अंश 538

0 |14 अक्टूबर, 2020

मनुष्य में पवित्र आत्मा के मार्ग का पहला चरण है, सबसे पहले, मनुष्य के हृदय को सभी व्यक्तियों, घटनाओं और चीज़ों से अलग करते हुए परमेश्वर के वचनों में खींच लाना, जिससे मनुष्य का हृदय यह विश्वास करने लगे कि परमेश्वर के वचन संदेह से परे हैं और पूर्णतया सत्य हैं। अगर तू परमेश्वर पर विश्वास करता है, तो तुझे उसके वचनों पर विश्वास करना चाहिए; यदि, बरसों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, तू पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग से अवगत नहीं है, तो क्या तू सच में एक विश्वासी है? एक सामान्य इंसानी जीवन—एक सामान्य इंसानी जीवन जिसका परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध है—पाने हेतु तुझे पहले उसके वचनों पर विश्वास करना होगा। अगर तूने, लोगों में पवित्र आत्मा के कार्य के पहले चरण को हासिल नहीं किया है तो तुम्हारे पास कोई आधार नहीं है। अगर सबसे बुनियादी सिद्धांत भी तेरी पहुँच से परे है तो तू आगे का सफर कैसे तय करेगा? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण किए जाने के सही मार्ग में कदम रखने का अर्थ है पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य के सही मार्ग में प्रवेश करना; इसका अर्थ है पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग पर कदम रखना। इस वक्त पवित्र आत्मा जिस मार्ग को अपनाता है वह परमेश्वर के मौजूदा वचन हैं। अतः अगर लोग पवित्र आत्मा के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं, तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के मौजूदा वचनों का पालन करना चाहिए, और उन्हें खाना तथा पीना चाहिए। जो कार्य वह करता है वो वचनों का कार्य है, सब कुछ उसके वचनों से शुरू होता है, और सब कुछ उसके वचनों, उसके मौजूदा वचनों, पर स्थापित होता है। चाहे बात परमेश्वर के देहधारण के बारे में निश्चित होने की हो या उसे जानने की, हरेक के लिए उसके वचनों पर अधिक समय देने की आवश्यकता है। अन्यथा लोग कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उनके पास कुछ शेष नहीं रहेगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के परिणामस्वरूप उसे जानने और संतुष्ट करने के आधार पर ही लोग धीरे-धीरे उसके साथ उचित संबंध स्थापित कर सकते हैं। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा उन्हें अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के साथ श्रेष्ठ सहयोग है। ऐसे अभ्यास के द्वारा वे परमेश्वर के जन होने की अपनी गवाही में मजबूत खड़े रह पाएंगे। जब लोग परमेश्वर के मौजूदा वचनों को समझते हैं और उसके सार का पालन करने में सक्षम होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा द्वारा मार्गदर्शन किए जाने के पथ पर जीते हैं और वह परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सिद्ध करने के सही मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं। पहले लोग बस परमेश्वर के अनुग्रह की खोज करने या शांति और आनंद की खोज करने से परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर सकते थे, लेकिन अब बात अलग है। देहधारी परमेश्वर के वचनों के बगैर, उसके वचनों की वास्तविकता के बगैर, लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं और वे सभी परमेश्वर द्वारा खत्म कर दिए जाएँगे। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए, लोगों को पहले परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और उनका अभ्यास करना चाहिए; और फिर इस आधार पर परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए। तू कैसे सहयोग कर सकता है? तू परमेश्वर के जन की गवाही में मजबूती से कैसे खड़ा रह सकता है? तू परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध कैसे स्थापित कर सकता है?

रोजमर्रा की जिंदगी में परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध हैं या नहीं, इसे कैसे जानें :

1. क्या तू परमेश्वर की स्वयं की गवाही पर विश्वास करता है?

2. क्या तू अपने मन में विश्वास करता है कि परमेश्वर के वचन पूरी तरह सत्य और अचूक हैं?

3. क्या तू उसके वचनों पर अमल करता है?

4. क्या तू उसके आदेशों के प्रति निष्ठावान है? उसके आदेशों के प्रति निष्ठावान होने के लिए तू क्या करता है?

5. क्या तू अपना हर कार्य परमेश्वर के प्रति वफादार रहने और उसे संतुष्ट करने के लिए करता है?

ऊपर सूचीबद्ध की गयी बातों से तू जाँच सकता है कि वर्तमान चरण में परमेश्वर के साथ तेरा संबंध सामान्य है या नहीं।

अगर तू परमेश्वर के आदेशों को स्वीकारने में उसके वादे को स्वीकारने में सक्षम है, और पवित्र आत्मा के मार्ग का अनुसरण कर पाता है, तो तू परमेश्वर की इच्छा का पालन कर रहा है। क्या तू भीतर से पवित्र आत्मा के मार्ग के बारे में स्पष्ट है? इस वक्त, क्या तू पवित्र आत्मा के मार्ग के अनुरूप आचरण करता है? क्या तेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है? क्या तू पवित्र आत्मा के नवीनतम प्रकाश के साथ तालमेल बनाकर चलना चाहता है? क्या तू परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना चाहता है? क्या तू पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति बनना चाहता है? क्या तुझमें परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का संकल्प है? जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं तब यदि तू सहयोग करने का संकल्प रखता है, और तू उसे संतुष्ट करने का संकल्प रखता है—यदि यही तेरी मानसिकता है—तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर के वचन ने तेरे हृदय में फल उत्पन्न किया है। यदि तुझमें ऐसा संकल्प नहीं है और तू किन्हीं भी लक्ष्यों को पाने की कोशिश नहीं करता, तो इसका यह अर्थ है कि तेरा हृदय अभी तक परमेश्वर द्वारा द्रवित नहीं हुआ है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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